शिक्षा का मौलिक अधिकार खैरात में बांटने की राजनीति

अजित सिंह

adivasi-childrenमोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर पिछले कुछ दिनों से कई मुद्दों पर सार्थक बहसें हुई हैं लेकिन विकास के मुद्दों पर नीतियों से संबंधित बहुत पुख्ता आवाज़ कम ही दिखाई देती है। अरुंधती रॉय और आलोक मेहता प्रकरण के बहाने कुछ बुनियादी सवालों पर लोगों ने अपनी राय अपने अपने अंदाज़ में रखी है, लेकिन ऐसे बहुत से सवाल हैं या यूं कहें कि एक ही सवाल है कि सरकार इस देश के सभी लोगों के लिए है या सिर्फ़ उन लोगों के लिए जिन्‍होंने किसी न किसी तरह अपने को “ऊपरी खाने” में फिट कर लिया है?

सरकार हर दिन नीतिगत स्तर पर बड़े बदलाव कर रही है और ये बदलाव सिर्फ़ चंद लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए किये जा रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि इन बदलावों की “पैकेजिंग” इस तरह से की जाती है कि लोगों को यह लगे कि ये सब तो उनके फायदे के लिए ही तो हो रहा है। इसका ताजा उदाहरण है राज्यसभा और लोकसभा से हाल ही में पारित हुआ शिक्षा अधिकार विधेयक – 2008, जिसे राज्यसभा में मात्र 54 सदस्यों की उपस्थिति में पारित कर दिया गया, लोकसभा की उपस्थिति भी कोई ज़्यादा नहीं थी।

राज्यसभा में 29 सदस्यों ने इस विधेयक के विरोध में अपना भाषण दिया लेकिन विडंबना यह है कि जनता के हितों के बारे में गंभीरता से विचार करने वाले इस सदन के एक भी सदस्य ने इस विधेयक के ख़िलाफ वोट देने का साहस नहीं जुटाया। इस विधेयक का नाम तो शिक्षा अधिकार विधेयक है, जिसके बारे में इसके पक्षधर कह रहे हैं कि यह 6-14 साल के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन वे बड़ी सफाई से इस बात को गोल कर देते हैं कि इस विधेयक के लागू होने के पहले तक सुप्रीम कोर्ट के उन्नीकृष्णन फैसले के आधार पर पहले से ही 0-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला हुआ है। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल इसके लिए कौन-सा नया बहाना या तर्क पेश करने वाले हैं कि जो अधिकार बच्चों को पहले से मिला हुआ है, उसे कम क्यों किया जा रहा है? जो काम आज़ादी मिलने के 10 साल के भीतर हो जाना चाहिए था, वो अब तक नहीं हुआ, और अब जब उसे दिया भी जा रहा है, तो इस तरह कि कम से कम लोग इसका लाभ ले सकें और मौलिक अधिकार के सवाल पर सरकार को बुनियादी सवालों के जवाब भी न देने पड़ें। सवाल अधिकार का है, न कि खैरात का। सिब्बल साहब शिक्षा का अधिकार बच्चों को ऐसे दे रहे हैं मानो वे उन पर कोई बहुत बड़ा एहसान कर रहे हैं।

इस विधेयक से तो लोगों को ये उम्मीद थी कि यह कम से कम 18 साल तक के बच्चों और 12वीं तक की मुफ्त शिक्षा का मौलिक अधिकार देगा। क्योंकि 8वीं तक की मुफ्त शिक्षा का तो कोई मायने ही नहीं है, इस अकादमिक व्यवस्था में सरकार रोज़गार के लिए किसी भी तरह की व्यावसायिक या पेशेवर शिक्षा के लिए न्यूनतम योग्यता 12वीं मानती है। फिर वह किसी ग़रीब बच्चे को किस तर्क के सहारे सिर्फ 8वीं तक की शिक्षा देने की बात कर सकती है। एक तरफ तो सरकार बाल मजदूरी के उन्मूलन का अभियान चलाती है जिसके तहत अंतर्राष्ट्रीय संधियों में तो 18 साल से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह का काम नहीं कराने का वायदा करती है, और खुद ऐसी नीतियां बनाती है कि बच्चे मजबूरन बाल मजदूर बन जाएं।

यह विधेयक स्कूलों के लिए मानक तो तय करता है लेकिन ये तय नहीं करता है कि जो निजी स्कूल हैं (जिन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सरकारी सहायता मिलती है), वे स्कूल के नाम पर मुनाफा नहीं कमाएंगे। आजकल तो मंदी के दौर में स्कूल-कॉलेज चलाना (यानि शिक्षा की ठेकेदारी करना) बहुत ही चोखा धंधा है। हमारे कई नेताओं, व्यवसायियों और यहां तक कि मीडिया संस्थानों के अपने निजी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के समूह हैं। इस तरह यह विधेयक इन लोगों के हितों की अनदेखी तो नहीं ही कर सकता था। इसलिए सरकार ने आजकल एक नया मुहावरा खूब प्रचारित किया है, Public Private Partnership.

यह विधेयक यह भी तय नहीं करता है कि हर स्कूल का प्रबंधन एक जैसा होगा। विधेयक की बहुत सी शब्दावलियों को पारिभाषित करने का काम राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया है, ऐसे में सभी को अधिकार मिलना संभव नहीं है। इसके अलावा यह विधेयक संविधान में निहित बराबरी की अवधारणा और इसके मौलिक अधिकार को भी ठेस पहुंचाता है। संविधान के लिए सभी बच्चे बराबर हैं और उन्हें बराबर अवसर और सुविधाएं मिलनी चाहिए, लेकिन यह विधेयक संविधान की इस अवधारणा को स्थापित करने के लिए कोई बात नहीं करता है, उल्टे Public Private Partnership के खाके में सरकारी स्कूलों को चलाने की बात करता है, जिसका नतीजा ये होगा कि सरकार द्वारा बनाये गये बेहतर स्कूलों में तो यह Partnership चलेगी लेकिन जहां दूर-दराज गांवों के स्कूलों की बात आएगी, वहां सरकार को ही स्कूल चलाना होगा, और ऐसे स्कूलों के लिए इस विधेयक में मानदंड पहले से ही तय हो चुके हैं, जहां हर कक्षा के लिए एक-एक शिक्षक की भी व्यवस्था नहीं है। Public Private Partnership में चलने वाले स्कूलों में 25% गरीब तबके के बच्चों को दाखिला दिया जाएगा, जिनकी फीस का खर्च सरकार उठाएगी। यह फीस भी अलग-अलग स्कूलों की अलग-अलग होगी, फिर सरकार इसे कैसे सुलझाएगी? सवाल यह भी है कि ये स्कूल बाकी बच्चों के लिए फीस बढ़ाएंगे, तो उसका नियमन कैसे किया जाएगा, ये स्कूल सरकारी फीस पर पढ़ने वाले बच्चों और दूसरे बच्चों में स्कूल के भीतर भेदभाव करेंगे, उसे कैसे रोका जाएगा? निजी स्कूलों में बच्चों के साथ इस तरह के भेदभाव की घटना नयी नहीं है। दिल्ली पब्लिक स्कूल और कई अन्य निजी स्कूल ये उदाहरण बहुत पहले ही पेश कर चुके हैं।

यह सवाल सिर्फ शिक्षा का नहीं है, ये सवाल व्यक्ति के अधिकार का है। इस देश के संविधान में जितनी बातें लिखी हैं और जो अधिकार लोगों को दिये गये हैं उनका उपयोग इस देश का अंतिम व्यक्ति कब कर पाएगा? यह सवाल उस हर व्यक्ति से है, जो यह सोचता है कि वो लोगों और उनके अधिकारों के लिए कुछ सोचता है या कुछ करता है।

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