असली निशाना “अरुंधती राय” पर था

♦ शिरीष खरे

arundhati_roy_20080728कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि “आलोक मेहता” ने तो “अरुंधती राय” के साथ-साथ “अरुण शौरी” पर भी निशाना साधा था, लेकिन उनका तो जिक्र भी नहीं हो रहा है। दरअसल असली निशाना “अरुंधती राय” पर ही साधा गया था, भरोसे का रंग और जमाने के चक्कर में “अरुण शौरी” को वैसे ही लपेटे में ले लिया गया। लेकिन भाषा और तर्कों की सही मिलावट न होने से रंग बेहद भद्दा हो गया। इसलिए जानने में देर नहीं लगी कि असली प्रॉब्लम “अरुंधती राय” से ही है। वैसे भी “अरुण शौरी” विश्व बैंक में जॉब बजा चुके हैं, इसलिए शतरंज का जो खेल न्यूयॉर्क से चल रहा है, उसका एक इशारा मिलते ही आज नहीं तो कल “अलोक मेहता” को “अरुण शौरी” के बाजू वाले खाने में खड़ा होना पड़ेगा।

जो बात दोनों को एक दूसरे से जोड़ती है, वह यह है कि अगर दोनों दलों का एजेंडा उठा कर देखा जाए तो बहुत ज़्यादा अंतर नहीं दिखेगा। सारे के सारे एजेंडे विश्व बैंक के एजेंडे से जो जुड़े हुए हैं। बात अब साफ-साफ है कि हिंदुस्तान की राजनीतिक लड़ाई दलगत नहीं रही। यह आम जनता और कुछ कॉरपोरेट ताक़तों की लड़ाई है। मुश्किल यह है कि जो सत्ता की असली ताक़तें हैं, वो अज्ञात हैं। वह सरकार को आगे करके यहां के संस्थान और संसाधनों पर कब्जा ज़माना चाहती हैं। क्योंकि “अरुंधती राय” अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह सब देख-सुन-समझ रही हैं और उसकी ज़मीनी हकीकत से भी वाकिफ हैं इसलिए आज की तारीख में विश्व-बैंक के साथ हाथ मिला चुके सरकारी लोगों के नजरिये से “अरुंधती राय” और उन जैसी कुछेक शख्सियत सबसे बड़ा ख़तरा बन गयी हैं। परदे के पीछे से तो “अरुण शौरी” और उनका दल मददगार ही रहेगा।

सत्ता, ऐसे कॉरपोरेट मीडिया के दम पर शिल्‍पा शेट्टी, करीना कपूर के चुंबन के मामले को गरमाकर विदर्भ के किसानों और मेलघाट में भूख से मरते बच्चों पर से ध्यान हटाने की कोशिश करती रही है। इसके बावजूद जनता के दिल और दिमाग़ में बुंदेलखंड और राजस्थान का सूखा, बिहार की बाढ़, गुजरात के दंगे तथा गांव-गांव, शहर-शहर उजड़ने के किस्से छाये रहे हैं। यक़ीनन यह मानवीय हकों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज़ का ही असर रहा। जनता अब छोटी-छोटी मुठभेड़ पर भी अपने हिसाब से अटकलें लगाने लगी हैं। सरकार के लिए अब न खबर दबा पाना आसान रहा, न खबरों के उठाने वालों को। लेकिन उसकी चाहत ‘हर हालात’ में यह लड़ाई जीतने की ही है, यही तो सत्ता का नेचर है। इसलिए अब उसे कुछ पढ़े-लिखे और समझदार कहे जाने वाले लोगों को उठाना ही है। उसे वैचारिक जंग के सिपाही भी चाहिए ही हैं।

ऐसा नहीं था कि इसके पहले उसने ऐसी कोशिश की ही नहीं थी। की थी, लेकिन इस बार हम उसे एक औपचारिक, सुसंगठित, बड़े ब्रांड के बड़े ब्रांडेड आदमी के रूप में देख रहे हैं। इसका मतलब है कि विश्व बैंक और सत्ता के दलाल अब गंभीर हैं और यह जंग में एक ख़तरनाक और दिलचस्प मोड़ का संकेत है। फिलहाल “आलोक मेहता” के तीर निशाने पर लगने से पहले भले ही बहुत दूर गिर गये हों और पूरी परियोजना अभी भी कागजी ही हो लेकिन आने वाले वक़्त में कुछ नये प्यादे काले से सफ़ेद और सफ़ेद से काले खांचों में रखे जाने बाकी हैं। तब हो सकता है कि कोई और किसी और पर निशाना साधते हुए कहीं और तीर छोड़े।

बहरहाल हमें दूसरे मोर्चे पर तैनात विचारों के महारथियों और उनके तार्किक हथियारों पर पूरा भरोसा है। करीब 20 साल पहले ‘सरदार सरोवर परियोजना’ से विश्व बैंक रातोंरात भागा था, अब उसके चेलों की बारी है।

(लेखक CRY के क्रिएटिव कार्यकर्ता और सचेत मीडिया फ्रीलांसर हैं)

What kind of resistance is effective?

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