‘कमीने’ है बदहवास शहर में फंसी जिंदगियों की कहानी
मिहिर ने यह समीक्षा जनसत्ता के लिए लिखी थी। किन्हीं वजहों से वहां ये छप नहीं पायी। हालाकि संपादक ओम थानवी के शब्दों में, अच्छी समीक्षा है. भाषा भी जानदार है। हम यहां इसे छाप रहे हैं। पूरी समीक्षा से लगता है कि मिहिर विशाल की इस कृति पर मुग्ध हैं। किसी भी मसले पर राय रखने की यह उनकी अदा है। वह मुग्ध होते हुए अपनी बात कहते हैं। एक दूसरी समीक्षा भी हम पाठकों को पढ़ा रहे हैं, टीवी पत्रकार रवीश कुमार की। रवीश कमीने को औसत से भी बेकार फिल्म मान रहे हैं। इन दोनों ही समीक्षाओं को यहां प्रस्तुत करने के पीछे की मंशा पाठकों से ये जानने की है कि क्या एक ही क्रिएशन एक आदमी को बेमिसाल और दूसरे को वाहियात लग सकता है? कृपया बताएं : मॉडरेटर
♦ मिहिर पंड्या
उस शाम सराय में रविकांत और मैं मुंबई की पहचान पर ही तो भिड़े थे। ‘मुंबई की आत्मा महानगरीय है लेकिन दिल्ली की नहीं’ कह कर मैंने एक सच्चे दिल्लीवाले को उकसा दिया था शायद। ‘और इसी महानगरीय आत्मा वाले शहर में शिवसेना से लेकर मनसे तक के मराठी मानुस वाले तांडव होते हैं?’ रविकांत भी सही थे अपनी जगह। मैं मुंबई का खुलापन और आज़ादी देखता था और वो बढ़ते दक्षिणपंथी राजनीति के उभार चिह्नित कर रहे थे। हम ‘मेट्रोपॉलिटन’ और ‘कॉस्मोपॉलिटन’ के भेद वाली पारिभाषिक बहसों में उलझे थे। हमारे सामने एक विरोधाभासी पहचानों वाला शहर था। हम दोनों सही थे। मुंबई के असल चेहरे में ही एक फांक है। यह शहर ऐसी बहुत सारी पहचानों से मिलकर बनता है, जो अब एक-दूसरे को इसके भीतर शामिल नहीं होने देना चाहती। हां यह कॉस्मोपॉलिटन है। लेकिन अब कॉस्मोपॉलिटन शहर की परिभाषा बदल रही है। दुनिया के हर कॉस्मोपॉलिटन शहर में एक धारा ऐसी भी मिलती है, जो उस रंग-बिरंगी कॉस्मोपॉलिटन पहचान को उलट देना चाहती है। दरअसल इस धारा से मिल कर ही शहर का ‘मेल्टिंग पॉट’ पूरा होता है।
‘मेल्टिंग पॉट’। विशाल भारद्वाज की ‘कमीने’ ऐसे ही ‘मेल्टिंग पॉट’ मुंबई की कहानी है, जहां सब गड्ड-मड्ड है। सिर्फ़ चौबीस घंटे की कहानी। यह दो भाइयों (शाहिद कपूर दोहरी भूमिका में) की कहानी है, जो एक-दूसरे की शक्ल से भी नफ़रत करते हैं और इस नफ़रत की वजह उनके अतीत में दफ़्न है। चार्ली तेज़ है, उसके सपने बड़े हैं। वह रेसकोर्स का बड़ा खिलाड़ी बनना चाहता है। गुड्डू छोटी इच्छाओं वाला जीव है, जिसकी ज़िंदगी का ख़ाका पॉलीटेक्नीक में डिप्लोमा, नौकरी, तरक्की, शादी से मिलकर बनता है। लेकिन इस सबके बीच एक प्रेम कहानी है। गुड्डू की ज़िंदगी में स्वीटी (प्रियंका चोपड़ा) है, जो मां बनने वाली है और बदकिस्मती से वो लोकल माफिया डॉन भोपे भाऊ (अमोल गुप्ते) की बहन है। पूरी फ़िल्म धोखे और फरेब से भरी है, लेकिन अंत में आपको महसूस होगा कि असल में यह फ़िल्म अच्छाई के बारे में है। यह इंसान के भीतर छिपी अच्छाई की तलाश है। यह कबूतर के भीतर छिपे मोर की तलाश है। ‘कमीने’ को लोकप्रिय हिंदी सिनेमा की सार्वकालिक महानतम क्लासिक ’शोले’ का आधुनिक संस्करण कह सकते हैं। और इस आधुनिक संस्करण के मूल सूत्र ‘शोले’ से ही उठाये गये हैं।
इस मुंबई में अंडरवर्ल्ड माफिया के तीन अलग-अलग तंत्र एक साथ काम कर रहे हैं और जिस ‘क़त्ल की रात’ की यह कहानी है, उस रात यह तीनों माफिया तंत्र आपस में बुरी तरह उलझ गये हैं। अपने सपनों के पीछे भागता एक भाई चार्ली ज़िंदगी में शॉर्टकट लेने के चक्कर में ऐसे चक्कर में फंसा है कि अब जान बचानी मुश्किल है और दूसरा भाई गुड्डू न चाहते हुए भी अब भोपे भाऊ के निशाने पर है। मराठी अस्मिता के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वाले भोपे भाऊ के लिए एक उत्तर भारतीय दामाद उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षाओं का अंत है। और इसी सबके बीच उस बरसाती रात उनकी ज़िंदगियां आपस में टकरा जाती हैं। जैसे एक-दूसरे का रास्ता काट जाती हैं। तेज़ बरसात है। घुप्प अंधेरा है। एक गिटार है, जिसमें दस करोड़ रुपये बंद हैं। उस गिटार के आसपास खून है, गोलियां हैं, लालच है, विश्वासघात है, मौत है। एक तरफ शादी की शहनाई बज रही है और दूसरी तरफ अंधाधुंध गोलियों की बौछार है। इस सारे मकड़जाल से भाग जाने की इच्छा लिये हुए हमारे दोनों नायक हैं और चीज़ों को और जटिल बनाने के लिए इन दोनों नायकों की शक्लें भी एक हैं। इसी सबके बीच पुलिस के भेस में माफिया के गुर्गे हैं, बाराबंकी से मुंबई रोज़ी की तलाश में होते विस्थापन के किस्से हैं, रिज़वानुर्रहमान से तहलका तक के उल्लेख हैं और सबसे ऊपर आरडी बर्मन के गीत हैं। ‘सत्या’ के साथ हिंदी सिनेमा ने मुंबई अंडरवर्ल्ड का जो यथार्थवादी स्वरूप हमारे सामने प्रस्तुत किया है, उसे अनुराग कश्यप और विशाल भारद्वाज अपने सिनेमा में नये आयाम दे रहे हैं।
गुड्डू की भूमिका में शाहिद कपूर हकलाते हैं और चार्ली की भूमिका में उनका उच्चारण ग़लत है (मैं ’फ़’ को ’फ़’ बोलता हूं! आपने सुना ही होगा।) लेकिन इन शारीरिक भेदों से अलग शाहिद ने अपनी अदाकारी से दो अलग व्यक्तित्वों को जीवित किया है। स्वीटी के किरदार की आक्रामकता उसे आकर्षक बनाती है और एक मराठी लड़की के किरदार में प्रियंका बेहतर लगी हैं। भाइयों की कहानियां देखने की अभ्यस्त हिंदुस्तानी जनता को विशाल ने खूब पकड़ा है। अब तक देखे मुख्यधारा के बॉलीवुड सिनेमा से आपकी जो भी समझ बनी है उसे साथ लेकर थिएटर में जाइएगा, वो सारे फॉर्मूले आपको बहुत काम आयेंगे इस फ़िल्म का आनंद उठाने में। वही बॉलीवुडीय परंपरा कभी आपको खास सूत्र देगी फ़िल्म को समझने के और वही कई बार आपको उस क्षण तक भी पहुंचाएगी जिसके आगे आपने जो सोचा होगा वो उलट जाएगा। श्रीराम राघवन की ही तरह विशाल भारद्वाज ने भी एक थ्रिलर को अमली जामा पहनाने के लिए हमारी साझा फ़िल्मी स्मृतियों का खूब सहारा लिया है। इस फ़िल्म की बड़ी खासियत इसके सह-कलाकारों का सही चयन और अभिनय है। कमाल किया है भोपे भाऊ की भूमिका में अमोल गुप्ते ने एवं मिखाइल की भूमिका में चंदन रॉय सान्याल ने। चंदन तो इस फ़िल्म की खोज कहे जा सकते हैं। अपने किरदार में वो कुछ इस तरह प्रविष्ट हुए हैं कि उन्हें उससे अलगाना असंभव हो गया है।
विशाल का पुराना काम देखें, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि ‘कमीने’ सबके बीच कहां ठहरती है? क्या इसे शेक्सपियर की रचनाओं के विशाल द्वारा किये तर्जुमे ‘मक़बूल’ और ‘ओमकारा’ के आगे की कड़ी माना जाए? बेशक ‘कमीने’ विशाल की पिछली ‘ओमकारा’ और ‘मक़बूल’ से अलग है। इसमें शेक्सपियर की कहानियों का मृत्युबोध नहीं है, इसमें संसार की निस्सारता और नश्वरता का अलौकिक बोध नहीं है। इस मायने में यह फ़िल्म अपने अनुभव में ज़्यादा सांसारिक फ़िल्म है। ज़्यादा आमफ़हम। शायद इसमें मृत्यु भी एक आमफ़हम चीज़ बन गयी है। और यहीं यह फ़िल्म क्वेन्टीन टेरेन्टीनो की फ़िल्मों के सबसे नज़दीक ठहरती है।
इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि एक बेहतरीन थ्रिलर की तरह यह पूरे समय अपना तनाव बरकरार रखती है। और यह तनाव बनाने के लिए विशाल ने किसी तकनीकी सहारे का उपयोग नहीं किया है बल्कि यह तनाव किरदारों के आपसी संबंधों से निकल कर आता है। ‘कमीने’ कसी पटकथा और सटीक संवादों से रची फ़िल्म है, जिसमें बेवजह कुछ भी नहीं है। हां, इस कहानी में ‘मक़बूल’ जितने गहरे अर्थ नहीं मिलेंगे लेकिन ‘कमीने’ एक रोचक फ़िल्म है। और यह रोचक फ़िल्म अपना आकर्षण बनाये रखने के लिए हमेशा सही रास्ता चुनती है, कोई ‘फॉर्टकट’ नहीं। यही मुंबई का ‘मेल्टिंग पॉट’ है।
फिल्म : कमीने
पटकथा, संवाद एवं निर्देशन : विशाल भारद्वाज
कलाकार : शाहिद कपूर, प्रियंका चोपड़ा, अमोल गुप्ते, चंदन रॉय सान्याल, शिव सुब्रमणियम और तेंजिंग निमा
(समीक्षक सिनेमा के शोधार्थी हैं)










रवीशकुमार ने जो लिखा है उसमें उन्होंने कहानी नहीं बतायी है। उसे हम एक प्रबुद्ध दर्शक की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। फिर भी हम उसे बतौर एक दमदार टिप्पणी, मिहिर की समीक्षा के सामने रख सकते हैं। जहां तक फ को फ कहने का मामला है, ‘पराग’ और वरिष्ठ लेखक के. पी. सक्सेना याद आ जाते हैं। हमारे वक्त के इकलौते वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले बालकथा मासिक (‘नंदन’ और ‘चंदामामा’ भूतप्रेत और राजा महाराजा के किस्से छापते थे) ’पराग’ में सक्सेना साहब ने खलीफ़ा तरबूज़ी नामक पात्र रचा था जो फ को फ कहता था और अत्यधिक लोकप्रिय हुआ था। उस वक्त हमें उसमें बहुत बढ़िया व्यंग्य नज़र आता था। सबसे पहले उसे पढ़ने के लिए हम लड़ पड़ा करते थे। अब लगता है कि यह कोई स्वस्थ हास्य नहीं है। साफ कर दूं कि मैंने ‘कमीने’ नहीं देखी है।
पंड्या जी की समीक्षा पढ़ने से पहले मैंने रवीश जी की समीक्षा पढ़ ली, शायद ये एक चूक हो गई मुझसे। लेकिन अब भी मेरे विचार ज्यों के त्यों ही हैं, – विशाल भारद्वाज से ऐसी उम्मीद नहीं थी, और ये बात पंड्या जी भी मान रहे हैं। लेकिन इसके कुछ संवाद जैसे- ‘जिंदगी में हमारी वाट इसलिए नहीं लगती कि हम गलत रास्ता चुनते हैं बल्कि इसलिए लगती है कि हम सही रास्ता छोड़ देते हैं’ से यही लगता है कि अब फिर पुरानी फिल्मों का वही दौर आ गया है जिसमें कोई न कोई ‘वेदांत’ की गोली दाग दिया जाता था, जैसे कोई पूछे कि बेटा, इस फिल्म से तुम्हें क्या शिक्षा मिली तो बताने के लिए कुछ खास सोचना न पड़े और न दाग दें हम ये ‘वेदांत की गोली’…हाल ही में लव आजकल में भी कुछ ऐसा ही था…हीर रांझा, सोनी महिवाल…को निशाना बनाते हुए सैफ अली खान ने जय के किरदार में एकदम अल्ट्रा माडर्न सोच को बयां किया है….और देखने वाले ज्यादातर युवाओं की जुबां पर भी ये डायलॉग फिल्म से मिली शिक्षा की तरह चढ़ गया…लेकिन इस ‘कमीने’ से अगर कोई शिक्षा लेने की कोशिश भी करेगा तो वो केवल और केवल कमीनापन ही होगा….
मिहिर पांड्या जी काबिल आदमी है, लेकिन यहां कमीने को लेकर उनकी समीक्षा काबलियत का गलत इस्तेमाल नज़र आयी। (अपने आपको जबरदस्ती विद्वान सिद्ध करने की प्रक्रिया ) आप बेशक सिनेमा की समझ रखते है, लेकिन चश्मा तो सही लगाना पड़ेगा। अगर आप आज ऐसा लिखते है, तो कल को डेविड धवन को सार्थक और यर्थातवादी सिनेमा का पैरोकार भी दिखा सकते है। ऐसे में किसी श्याम बेनेगल या गोविन्द निहलानी के साथ कैसा महसूस होगा। मुझे इस वक्त इस समीक्षा को पढ़कर ऐसा ही लगा। शुक्र है ओम थानवी जी एक बढ़िया फिल्टर सिद्ध हुए।
Interesting and informative. But will you write about this one more?
अच्छी भाषा का गलत इस्तेमाल। अविनाश जी ने शायद सही कहा है कि यह “मुग्धावस्था” का चरम नमूना है।
इसका नाम “कमीने” रखा गया, सबसे पहले तो इसी पर सवाल उठाना चाहिए था। लेकिन कोई बात नहीं। निर्माता-निर्देशक चूंकि प्रस्तोता है, वह “हरामजादा” या “हरामी” भी रख देगा तो भी चल ही जाएगा…।
इस समीक्षा (अगर इसे समीक्षा कहें तो…) में फिल्म के बारे में ही इतनी गलतबयानी है कि इसे पढ़ते हुए मिजाज भिन्ना जाता है।
फ़ को फ नहीं, नायक स या श को फ़ बोलता है। गीतकार आरडी बर्मन नहीं, गुलजार हैं।
क्लासिक शोले का आधुनिक संस्करण… और कबूतर के भीतर छिपा मोर… सुभान अल्लाह…।
एक तुर्रा- सर जी, भाई के लिए बहन का दूल्हा बहनोई होता है, दामाद नहीं।
बल्कि रवीश कुमार जी थोड़ा करीब गए हैं, लेकिन वे भी फ और फ़ के चक्कर में फंसे हैं।
एक और बात। कसे निर्देशन का मतलब अगर एक झटके में कई-कई दृश्यों को गड्डमड्ड कर देना है, तो माफ करिए… -यहां गुलजार के गीतों का कोई काम नहीं। उन संवादों का कोई काम नहीं, जो इस फिल्म में कहीं-कहीं ही नजर आते हैं…।
और मिहिर पांड्या जी, शहर अपने बाशिंदों के शरीर से चलता है, आत्मा से नहीं।
प्रिय अरविन्द जी ,
दो बातें :’मैं फ को फ बोलता हूँ ‘,यह फिल्म का एक संवाद है जो वह नायक बोलता है जो स को फ बोलता है (और इसीलिए ज़ाहिर है ,वह किसी को समझायेगा तो यही बोलेगा ….),समीक्षा में इसी संवाद का उद्धरण चिह्न के साथ प्रयोग है .दूसरी बात ,फिल्म में आर.डी. बर्मन के पुराने गाने संभवत पार्श्व में चलते रहते हैं .
यह दोनों तथ्य मैं सिर्फ देखे गए ट्रेलर के आधार पर ही दुरुस्त कर रहा हूँ.
हिमांशु
सबसे पहले disclosure: मिहिर से मेरा परिचय भी है, दोस्ती भी. (क्या इसके बाद मेरा लिखा सच भी झूठ कहा जाएगा? शायद…)
मैंने कमीने देखी. बहुत पसंद आई. या यूँ कहूँ कि अंत के चंद मिनट छोडकर बाकी के हिस्सों में मैं बस उछलता ही रहा. कैमरा की नई भाषा, किरदारों का नया ‘कमीनापन’ (एक ‘हीरो’ जो ‘हीरोईन’ से कमज़ोर है, उसको गाली देता है, उससे कम ईमानदार है, और उससे कम समझदार भी – ऐसा कितनी बार होता है?), बंबई की पाँच भाषाएँ हैं (गुजराती रह गई वैसे पर जो मुंबई में रहते हैं वो जानते हैं कि बंगाली और अफ्रीकी सुनना भी अब यहाँ मुश्किल नहीं), ढेर सारे शानदार संवाद हैं और सतह के नीचे की एक ईमानदारी है जो सिर्फ हिंदी फिल्मों में ज़रूरी होती है.
ऊपर लिखे comments का जवाब देने का बहुत मन है, सबसे पहले इसलिए कि करीबन हर गलत बात को सही करना न सही, उसे गलत कहना तो हमारा हक है. फिर डरता हूँ कि the argumentative Indian पढा हुआ कोई विद्वान मज़ाक ना बनाने लगे – कि देखो, फिर भिड गए!
इसलिए सिर्फ २-३ ही बातें कहूँगा. बहुत ज़रूरी वाली!
१. बहुत से लोग कह रहे हैं कि “ये तो सीधी सपाट मसाला फिल्म है. इसे आसमान क्यूँ चढा रहे हो?” सही बात है. सीधी सपाट मसाला फिल्म है. लेकिन आज के दौर की. इसे दुनिया के किसी भी देश में, हिन्दुस्तानी mainstream cinema कह कर दिखाया जा सकता है. यह technically, performance wise, pace wise, और texture wise (texture माने फिल्म की look-feel-sound-color) दुनिया के किसी भी progressive सिनेमा से पीछे नहीं है.
“कहानी कहाँ है?” आप कहेंगे. और मैं बस इतना ही कहूँगा कि कहानी ज़रूरी नहीं होती – सिनेमा सिर्फ कहानी नहीं, उससे बहुत ज़्यादा, बहुत बडा है. सिनेमा के अर्थ अगर सिर्फ उसकी कहानी में छुपे होते तो कोई करोडों लगाकर उसे बनाता ही क्यूँ?
क्या आपने पूरी फिल्म में सबसे जादूई तकनीक – shifting focus को नोट किया? पूरी फिल्म में कैमरा बदहवास कभी एक किरद्रा तो कभी दूसरे किरदार को फोकस करने की कोशिश में है. (आप कहेंगे ये तो सिर्फ स्टाइल है और मैं अब चुप हो जाऊँगा. जादू तो देखने की चीज़ है, समझाने की नहीं)
२. जो लोग इसे विशाल की पिछली फिल्मों से जोड कर देख रहे हैं उनके लिए! —- ये क्यूँ ज़रूरी है कि विशाल हमेशा वही बनाए, उतना ही गहरा और डार्क बनाए, जितना हमने पहले देखा है. एक फिल्ममेकर अगर अपने फितूर जाँचना चाहता है, और जाँचते हुए भी वो एक नई तरह का सिनेमा लेकर आया है, तो इसमें क्या गलत है? क्या गुलज़ार को सिर्फ ‘मेरा कुछ सामान’ ही लिखना चाहिए था – ‘लकडी की काठी’ नहीं?
३. आपने कहा डेविड धवन? अगर हर सिनेमा, जो ‘बेमतलब’ हो उसे ‘डेविड धवन’ के नाम का शाप मिल जाए तो ये दोनों के साथ नाइंसाफी होगी, और long term में देखने वालों के साथ भी. अगर सिर्फ moral tales बनाना ही सिनेमा का मकसद होता (या रह जाए) तो सिनेमा और स्कूल में क्या फर्क रह जाएगा? बेमतलब का celebration भी सिनेमा हो सकता है, बल्कि hollywood main-stream तो बना ही इससे है. लेकिन, craft को सही इस्तेमाल करना आना चाहिए. एक चीज़, जो हम लोग कभी नहीं सीख पाए थे – हममें और विदेशी सिनेमा में सबसे बडा फर्क भी यही था…जो अब, विशाल, अनुराग, दिबाकर जैसे नए लोगों के साथ खत्म हो रहा है. (शुरुआत राम गोपाल वर्मा ने की थी वैसे…लेकिन वो अकेले थे इस कोशिश में…आज बहुत से हैं.)
और सच कहूँ तो मुझे तो कमीने में भी बहुत से मतलब मिले. ज़रूरी नहीं आपको मिले हों…लेकिन मैं ये नहीं मान सकता कि technical excellence आपकी नज़रों से छूट गया….वो कहानियाँ जो किसी शहर के पत्थर, सडकें, बरसात, ट्रेनें, गलियाँ, रातें, और सपने कहते हैं वो आपसे छूट गई. और अगर छूट गई हैं तो मैं अकेला खुशकिस्मत हूँ, ये मानना भी ज़रा मुश्किल है, पर मानना ही पडेगा.
[...] ऊपर लिखे comments का जवाब देने का बहुत मन है, सबसे पहले इसलिए कि करीबन हर गलत बात को सही करना न सही, उसे गलत कहना तो हमारा हक है। फिर डरता हूं कि the argumentative Indian पढ़ा हुआ कोई विद्वान मज़ाक ना बनाने लगे – कि देखो, फिर भिड़ गये! [...]
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