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निरर्थक विवादों को छोड़ लेखक सार्थक बहस चलाएं

17 August 2009 9 Comments

♦ रमेश उपाध्‍याय

रमेश उपाध्‍याय हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। अब लगभग ज़रूरी हो गयी पत्रिका कथन का संपादन करते हैं। ये जो लेख है, उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग बेहतर दुनिया की तलाश पर पहले छाप लिया था, लेकिन नई दुनिया ने इस संडे को दोबारे इसे प्रकाशित किया। आलोक मेहता ने ऐसा शायद इसलिए किया, क्‍योंकि इस लेख में इंटरनेट पर चलने वाले विमर्श को निरर्थक बताया गया है। संभव है, अपने मूल संदर्भ में लेख में किया गया चिंतन जायज़ हो – लेकिन पिछले दिनों मोहल्‍ला लाइव पर चली बहसों के आलोक में इस लेख के पुनर्प्रकाशन को देखें, तो दूसरे निहितार्थ हमारे सामने आ सकते हैं : मॉडरेटर

ramesh-upadhyay-naiduniaहिंदी भाषा और साहित्य का विकास न होने देना चाहने वाली शक्तियां आजकल यह देखकर परम प्रसन्न होंगी कि वे जो चाहती हैं, हिंदी वाले स्वयं कर रहे हैं। कुछ दिन पहले वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिकाओं के संपादकों की नियुक्ति का मामला विवादों में रहा। फिर दिल्ली की हिंदी अकादमी में उपाध्यक्ष की नियुक्ति और संचालन समिति के कुछ सदस्यों के त्यागपत्र विवाद का विषय बने। गोरखपुर में एक कथाकार का एक योगी के हाथों सम्मानित होना अभी चर्चा में ही था कि रायपुर में एक सम्मान समारोह में कुछ लेखकों का भाग लेना और कुछ लेखकों द्वारा उसका बहिष्कार करना विवाद का विषय बन गया। ये विवाद पत्रिकाओं में कम, इन्टरनेट पर अधिक हो रहे हैं और उनमें व्यक्त विचारों तथा भाषा के प्रयोगों को देख कर लगता है कि हिंदी में होने वाली चर्चाओं का स्तर कितना घटिया और शर्मनाक हो गया है। लगता है, हिंदी के लेखक-पाठक देश, दुनिया, मानवता, समाज, साहित्य, सभ्यता और संस्कृति से सम्बंधित बृहत्तर प्रश्नों पर विचार करना छोड़ निरर्थक चर्चाओं में व्यस्त हो गए हैं, जिनका उद्देश्य येन केन प्रकारेण स्वयं को चर्चित बनाना होता है। और इसका तरीका होता है कोई ऐसा मुद्दा उछालना, जिस पर बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के कोई भी कुछ भी कह सके। ऐसी चर्चाओं में भाग लेने के लिए न किसी विषय के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता होती है, न चिंतन-मनन की। न भाषा पर ध्यान देने की ज़रूरत होती है, न बातचीत को विषय पर केंद्रित रखने के अनुशासन की। अतः कोई भी कितनी ही भद्दी भाषा में कुछ भी कह गुज़रता है।

इन विवादों में भाग लेने वाले लोग आजकल हिंदी के लेखकों को अनैतिक सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका दावा है कि वे हिंदी साहित्य में मौजूद गंदगी के विरुद्ध एक सफाई अभियान चला रहे हैं। वे दूसरों को अनैतिक बताते हुए स्वयं को परम नैतिकतावादी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उनके विचारों से ही नहीं, उनकी भाषा तक से पता चल जाता है कि वे नैतिकता का ‘न’ भी नहीं जानते और स्वयं किसी प्रकार नैतिक अनुशासन को नहीं मानते। दूसरों पर कीचड़ उछालने को वे सफाई करना समझते हैं और यह भी नहीं देखते कि ऐसा करते समय वे स्वयं कितने और कैसे कीचड़ में सन रहे हैं। उन्हें यह भी होश नहीं रहता कि हिंदी में जो कुछ होता है, उससे हिंदी वाले ही नहीं, दूसरी भाषाओं के लोग भी प्रभावित होते हैं। हिंदी देश की इतनी बड़ी और महत्वपूर्ण भाषा है कि अन्य भारतीय भाषाओं के लेखक हिंदी लेखकों से एक नेतृत्वकारी भूमिका तथा मार्गदर्शन की अपेक्षा करते हैं। सोचने की बात है कि हिंदी में हो रही कुचर्चाओं से वे हिंदी लेखकों तथा हिंदी साहित्य के बारे में कैसी धारणाएं बनाते होंगे और कैसे निष्कर्ष निकालते होंगे।

इन्टरनेट का सदुपयोग किया जाए, तो वह अपनी भाषा और साहित्य के विकास तथा व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए बेहतरीन माध्यम हो सकता है। लेकिन बड़े खेद की बात है कि इसका दुरुपयोग अपनी भाषा और साहित्य से लोगों को विमुख करने के लिए किया जा रहा है। और यह काम हिंदी वाले स्वयं कर रहे हैं!

नैतिकता की बात करने में कोई बुराई नहीं है। लेखकों के अनैतिक आचरण की आलोचना अवश्य की जानी चाहिए। लेकिन ऐसा करने की पहली शर्त यह है कि आलोचना का सैद्धांतिक तथा मूल्यगत आधार स्पष्ट रहे तथा आलोचक जो कसौटी दूसरों के लिए अपनाए, वही अपने लिए भी अपनाए। लेकिन हिंदी लेखकों की अनैतिकता की जो आलोचना आजकल की जा रही है, उसमें कहीं भी यह स्पष्ट नहीं होता कि आलोचक स्वयं क्या है और क्या करना चाहता है।

लेखकों के आचरण को सम्पूर्ण साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में ही सही ढंग से समझा जा सकता है और उसके सन्दर्भ में पहला नैतिक प्रश्न आज यह उठाना चाहिए कि साहित्यिक गतिविधियों पर राज्य, राजनीतिक दलों और पूंजीपतियों द्वारा जो रुपया पानी की तरह बहाया जाता है, वह कहां से आता है और कहां जाता है। एक जनतांत्रिक व्यवस्था में नैतिकता की कसौटी यह है कि जनता का पैसा जनहित में खर्च होना चाहिए। साहित्यिक गतिविधि के सन्दर्भ में इसका अर्थ यह है कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए। यदि वह इस जनतांत्रिक उद्देश्य के लिए खर्च न होकर किन्हीं अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च होता है, तो यह अनैतिक है। और इस कार्य में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जो भी शामिल है, वह अनैतिक है।

इस दृष्टि से देखें, तो साहित्यिक गतिविधि में अनैतिकता का स्रोत है वह पूंजीवादी व्यवस्था और उसमें शासकवर्ग की वह राजनीति, जो अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष रूपों में लेखकों को भ्रष्ट बनाने के साथ-साथ उनमें छोटे-बड़े का भेद, आपसी ईर्ष्या-द्वेष और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विता पैदा करती है। वह साहित्य के विकास और प्रचार-प्रसार के नाम पर असंख्य सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं के जरिये भारी धनराशियां खर्च करती है, जिनसे विभिन्न प्रकार की साहित्यिक संस्थाएं, संगठन और संस्थान बनाये-चलाये जाते हैं, उनके द्वारा हर साल काफ़ी बड़े बजट वाले कार्यक्रम किए जाते हैं, छोटे-बड़े असंख्य पुरस्कार बांटे जाते हैं, पुस्तकों और पत्रिकाओं की थोक सरकारी खरीद की जाती है, साहित्यिक पत्रिकाओं को विज्ञापन तथा आर्थिक सहायतायें दी जाती हैं और लेखकों को विभिन्न प्रकार की वृत्तियां, सहायताएं, सुविधाएं आदि उपलब्ध कराई जाती हैं। इस प्रक्रिया में जो विशाल धनराशियां खर्च की जाती हैं, वे नैतिकता की इस कसौटी पर कदापि जायज़ नहीं ठहराई जा सकतीं कि जनता का पैसा जनता की भाषा की उन्नति के लिए तथा जनता को अच्छा साहित्य सुलभ कराने के लिए खर्च होना चाहिए।

अतः जो लोग हिंदी साहित्य में वाकई कोई सफाई अभियान चलाना चाहते हैं, उन्हें लेखकों की अनैतिकता के मूल स्रोत पर ध्यान देना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए कि उस स्रोत से साहित्य में गन्दगी का आना बंद हो। इस दिशा में पहला और सबसे ज़रूरी काम यह है कि यदि जनता का पैसा साहित्यिक गतिविधि में जनता के लिए खर्च न होकर किन्हीं और लोगों पर किन्हीं और उद्देश्यों के लिए खर्च हो रहा है, तो इससे सम्बंधित तमाम तथ्य और आंकडे जनता के सामने लाकर इसके विरुद्ध एक व्यापक जन-आन्दोलन चलाया जाए।

लेकिन यह गंभीरतापूर्वक मेहनत और ज़िम्मेदारी के साथ किया जाने वाला काम है और यह काम अकेले-अकेले नहीं, मिल-जुलकर ही किया जा सकता है। यह काम निरर्थक विवादों में अपना और दूसरों का समय नष्ट करके नहीं, बल्कि एक-दूसरे के साथ सार्थक बहस चला कर ही किया जा सकता है।

9 Comments »

  • अंशुमाली रस्तोगी said:

    तो जनाब रमेश उपाध्यायजी अब यह हमें आपसे सीखना-समझना पड़ेगा कि नेट पर क्या लिखना चाहिए क्या नहीं? क्या कहा जाना चाहिए क्या नहीं? किस विवाद में पड़ना चाहिए किसमें नहीं? किस वरिष्ठ की चरणवंदना करनी चाहिए किसकी नहीं? नैतिक कौन है अनैतिक कौन?

    मुझे समझ नहीं आता दिल्ली में बैठा हर वरिष्ठ हाथ में डंडा थामें अपने या अपनों से असहमत होने व लगने वालों को हर बात पर हांकने क्यों निकल पड़ता है? क्या राजधानीवालों से असहमति या विरोध रखना कोई जु्र्म है? बताएं।

    मुझे नहीं मालूम रमेशजी ने इस लेख को किसे प्रसन्न करने के लिए लिखा था पर कोई तो प्रसन्न हुआ ही होगा। जरूर। रमेशजी को शायद मालूम नहीं कि वरिष्ठों से असहमतियां या उन पर विरोध जताने वाले सभी गलत नहीं हैं। ये वो ‘दृढ़ आवाजें’ हैं जिन्हें खेमेबाज अखबारों-पत्रिकाओं ने अब तक दबाए रखा था। लेकिन नेट और ब्लॉग पर वे स्वतंत्र हैं। जैसी जिसकी असहमति है उसे वो यहां लिख-कह रहा है। हां, मैं यह मानता हूं कि उनका विरोध बेहद तीखा है। लेकिन विरोध का मजा तब ही है जब उसमें तीखापन हो। बंधु, वो मिर्च ही क्या जो लगे नहीं?

    अगर रमेशजी को यह सब इतना ही खराब और अनुचित लग रहा है तो सबसे पहले वो अपना ब्लॉग-लेखन बंद करें। क्योंकि खुलेपन का अधिकार तो उन्हें भी हासिल है। वे भी तो कभी न कभी इसका दुरउपयोग कर ही सकते हैं। क्यों, है न!

    वरिष्ठों के खिलाफ यहां जो कुछ भी कहा-लिखा जा रहा है वो बेहद तीखी बहस की मांग करता है। जिसमें इस बहस से लड़ने-भिड़ने का दम होगा वो ही यहां टिकेगा, कमजोरों का यहां कोई काम नहीं।

    रमेशजी हमें हमारी गंभीरता और जिम्मेदारी के बारे में न ही बताएं, तो ही बेहतर। क्योंकि हम अब बच्चे नहीं रहे।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    अंशुमाली रस्‍तोगी जी ,
    नाराज न हों तो कृपया गंभीरता से पढें और सोचें। मैं व्‍यक्‍ि‍तगत तौरपर आपके तेवर का कायल हूं,लेकि‍न अलोकतांत्रि‍क भाव का नहीं। भाई रमेश उपाध्‍याय ने सही जगह इंजेक्‍शन लगाया है , इसके बारे में अनेक कि‍स्‍म से कहा जा सकता है समस्‍या यह नहीं है कि‍ कौन से वि‍षय वि‍वाद के बनाए जाएं,समस्‍या यह भी नहीं है कि‍ क्‍या लि‍खें और कैसे लि‍खें,हि‍न्‍दी के इंटरनेट लेखकों में एक वि‍शेष लेखकीय भाव है जो स्‍वागतयोग्‍य है,लेकि‍न इसमें अनेक ऐसे भी लेखक हैं जो अतार्किकता की हद पर जाकर बहस कर रहे हैं और अतार्किकता को अपना लोकतांत्रि‍क हक बता रहे हैं,ऐसी ही तल्‍ख टि‍प्‍पणी अंशुमाली रस्‍तोगी की है,उनका मानना है – ”अगर रमेशजी को यह सब इतना ही खराब और अनुचित लग रहा है तो सबसे पहले वो अपना ब्लॉग-लेखन बंद करें। ” बहस का यह स्‍तर जब होगा तो शायद कभी भी इंटरनेट को समृद्ध नहीं कर पाएंगे। आप भी लि‍खें और वे भी लि‍खें,किंतु भद्रता और संस्‍कृति‍ के मानक बनाते हुए। मैं अंशुमालीजी से अनुरोध करना चाहूंगा कि‍ कभी पश्‍चि‍म के ब्‍लॉगर, साहि‍त्‍यकार,अच्‍छे पत्रकार,वि‍चारक और समाजवि‍ज्ञानि‍यों से भी कुछ हमें सीख लेना चाहि‍ए। यह कैसे हो सकता है नेट पर लि‍खना चाहते हैं लेकि‍न नेट बनाने वालों की लेखन सभ्‍यता से सीखना नहीं चाहते। रमेशजी ने सही जगह हस्‍तक्षेप कि‍या है,आपको अपनी राय कहने का हक है,तीखी बहस का भी हक है, वरि‍ष्‍ठों से असहमति‍ का भी हक है किंतु बहस का तेवर शि‍रकत और असहमति‍यों को बढावा देने वाला होना चाहि‍ए,’स्‍टारडस्‍ट’ पत्रि‍का की शैली में लेखन करेंगे तो बहस से क्‍या नि‍कालेंगे ? रमेशजी पर बहस मत कीजि‍ए उस मुद्दे पर बहस कीजि‍ए जो उन्‍होंने उठाया है, मुद्दे को व्‍यक्‍ति‍ से अलग करके बहस करने पर ही कोई सार नि‍कलेगा। नेट का नि‍र्माण गंभीर काम के लि‍ए कि‍या गया है हम चाहें तो मि‍र्च लगाने के लि‍ए भी कर सकते हैं ,अंशुमालीजी का यह कथन काफी रोचक और सारगर्भित है,लि‍खा है, ” लेकिन विरोध का मजा तब ही है जब उसमें तीखापन हो। बंधु, वो मिर्च ही क्या जो लगे नहीं?” बंधु मि‍र्च से ज्ञान नहीं नि‍कलता मि‍र्च ही नि‍कलेगी,लेखन का लक्ष्‍य भी होना चाहि‍ए कुछ भी तय कर लो, रही बात दमखम की तो नेट पर हिंदी बड़ी कमजोर है,सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं, दूसरी बात यह कि‍ नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्‍लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी,नेट के वि‍चार सि‍र्फ वि‍चार है और वह भी बासी और मृत वि‍चार हैं,उनमें स्‍वयं चलने की शक्‍ति‍ नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांति‍कारी कि‍ताब लि‍खकर और उसे करोड़ लोगों को पढाकर दुनि‍या नहीं बदल सकते। नेट लेखन सि‍र्फ संचार है और संचार से ज्‍यादा इसकी कोई अन्‍य भूमि‍का भी नहीं है, संचार में आप गाली दें,बकबास करें,प्रेम करें,वि‍वाद करें,खुशी की बातें करें,यहां सब कुछ वर्चुअल है और कभी ठोस नहीं बन सकता। वर्चुअल के आधार पर आप कि‍सी लेखक ,पत्रकार,वि‍चारक ,नेता आदि‍ को प्रति‍ष्‍ठि‍त अथवा अपदस्‍थ नहीं कर सकते,वर्चुअल में न सम्‍मान होता है और अपमान होता है,वर्चुअल तो वास्‍तव में होता ही नहीं है फलत: प्रभाव के परे होता है। नेट लेखन बलवानों का खेल नहीं है,यह तो महज लेखन है वैसे ही जैसे कोई बच्‍चा लि‍खता है और भूल जाता है। अंशुमाली जी ने लि‍खा है ” रमेशजी हमें हमारी गंभीरता और जिम्मेदारी के बारे में न ही बताएं, तो ही बेहतर। क्योंकि हम अब बच्चे नहीं रहे।” यह प्रति‍क्रि‍या कि‍स बात का संकेत है ? हम से वि‍वाद मत करो,हमसे बातें मत करो,हमें अपनी दुनि‍या में मशगूल रहने दो, और इससे भी खतरनाक प्रवृत्‍ति‍ भी व्‍यक्‍त हुई है कि‍ ‘हम ठीक हैं।’ दोस्‍त बहस का यह गैर लोकतांत्रि‍क तरीका है,सम्‍मान और प्‍यार के साथ बहस करने पर ही संवाद होता है,संवाद के लि‍ए कि‍सी को भगनाने,गरि‍याने और मि‍र्च लगाने की नहीं थोड़ी मि‍सरी और बुद्धि‍ चाहि‍ए।मि‍र्च नहीं। आप नि‍श्‍चि‍त तौर पर बच्‍चे नहीं हैं आप जि‍म्‍मेदार नागरि‍क हैं और सचेत नागरि‍क है, नेट यूजर हैं, मुश्‍कि‍ल यह है आप नागरि‍क के बोध को त्‍यागकर बहस करना चाहते हैं,नेट के लि‍ए ‘नागरि‍क’ और ‘यूजर’ दोनों ही भावों की जरूरत है खासकर आप जैसे प्रति‍भाशाली व्‍यक्‍ि‍त के लि‍ए। अंत में रमेश ज बड़े हैं,बुजुर्ग हैं तो इसमें उनका क्‍या दोष और आप अभी जवान हैं तो इसमें आपकी कोई भूमि‍का नहीं है, यह तो शरीर और उम्र का स्‍वाभावि‍क धर्म है आप कल्‍पना कीजि‍ए रमेश जी आठ साल के बच्‍चे होते तो क्‍या आप उनकी बात पर गौर करते ? नेट लेखन उम्र,हैसि‍यत,पद,दंभ,बल आदि‍ नहीं देखता ये तो नेट में आने के बाद समाप्‍त हो जाते हैं।वहां सि‍र्फ लेखन होता है और कुछ भी नहीं। लेखक तो मर जाता है।

  • संजय ग्रोवर said:

    आ. जगदीश्वर जी, मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि अंशुमाली किसी का विरोध करें तो स-तर्क करें। जैसे कि अगर वे कहते हैं कि प्रभाषजी या अशोकजी का ‘जनसत्ता’ में कूड़ा भी छप जाता है तो वे उदाहरण, कारण और विश्लेषण के साथ बताएं। भाषा भी ‘लौंडे-लौंडिया’ वाली न रखें, थोड़ी बेहतर कर लें। यह अलग बात है कि कथित सभ्य और वरिष्ठ लोग कई बार सभ्य भाषा में भी ऐसे घटिया निहितार्थ वाली बातें कह देते हैं कि गालियां खुदकुशी को सोचने लगती हैं। बहरहाल अपने लंबे बयान में आपने एक निहायत ही बचकाना सा तीर छोड़ दिया है कि वर्चुअल लेखन कुछ पानी का बुलबुला है।
    मर जाएगा, खप जाएगा, बचेगा नहीं…आदि-इत्यादि। अगर ऐसा ही होता तो क्या आपको और रमेशजी को यहां अपनी बात रखने आना पड़ता !? कमाल की बात है कि इतना वरिष्ठ व्यक्ति (आपके ही तर्क से इसमें मेरा कोई दोष नहीं) तकनीक के बदलाव को इतने बचकाने ढंग से देख रहा है ! अरे, किसी को सस्ते में मेट्रो में लोकल से ज़्यादा सुविधाएं मिल रहीं हैं तो वो क्यों लोकल बस में जाएगा !? ब्लाग में आप खुलकर अपनी बात सारी दुनिया के सामने मामूली खर्च में रख सकते हैं। तकनीक के दुरुपयोग की बात है तो वो तो लघुपत्रिकाओं तक का हो रहा है। हज़ारों रुपए के सरकारी/गैर-सरकारी विज्ञापन लेने वाली कथित लघु-पत्रिकाओं के दफतरों का आलम बिलकुल सरकारी दफतरों जैसा बना रखा है जहां बड़े-बड़े तोपचियों से लेकर सामान्य नवलेखक तक अपनी रचनाएं, फाइलों की तरह कोई रुक्का दिखाकर, पद-पदवी दिखाकर, जाति-वर्ण का सिक्का चलाकर या ऐसे ही अन्यान्य तरीकों से सरकाते फिरते हैं। तकनीक और उसके कारण बना माहौल बहुत कुछ करते हैं चतुर्वेदी जी। एक वक्त था जब बंबई फिल्म इण्डस्ट्री में लता, आशा, रफी, किशोर, महेंद्र, मन्ना के अलावा कोई घुस नहीं सकता था। आज देखिए हर महीने एक नया गायक आ रहा है। एक से एक टेलेंटेड। बल्कि हमारे प्रतिभाशाली बुज़ुर्गोे, मसलन ओम पुरी, पंकज कपूर, वीरेंद्र सक्सेना, मीता वशिष्ठ (सूची बहुत लंबी है) जो काम के लिए तरसते थे, को भी नए माहौल, नए लोगों और नयी तकनीक की वजह से ही उनका वास्तवित हक मिल पाया है। यही वर्चुअल वल्र्ड एक दिन पीली पड़ गयी, सड़ गई किताबों में लिखे महत्वपूर्ण विचारों (जहां कि विचारों के नाम पर रिपीटा-घसीटा भी बहुत कुछ है) को पेन-ड्राइवों, सी.डि.ओं., ई-बुक्स और अन्य नयी तकनीकों में स्टोर करके बचाएगा। जिनको ग़लतफहमियां हों वे पीपल के पत्तों पर सरकण्डों से लिखते रहें।
    सौहाद्रपूर्ण माहौल में संवाद की आपकी बात स्वागत-योग्य है, पर क्या आज से पहले किसी वरिष्ठ ने ऐसा सोचा।
    -संजय ग्रोवर

  • विनीत कुमार said:

    महान हैं वो लोग जो इसी वर्चुअल स्पेस से मटीरियल टीप-टीप कर हिंदी में अनुवाद करके सात-सात सौ रुपये की किताब छपवाते हैं। हम उनके आगे नतमस्तक हैं जो बुलबुले को छपवाकर चिरस्थायी बनाने में जुटे हैं।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    संजय ग्रोवर जी,
    आप मेरी बात को हल्‍के में टाल नहीं सकते, वर्चुअल क्‍या है ? इस पर हजारों लाखों पन्‍नों में सामग्री बाजार में आ चुकी है और उसमें से कुछ नेट पर भी उपलब्‍ध है,जि‍न लोगों ने वर्चुअल को बनाया वे भी इसके मायावी रूप पर मुग्‍ध ही हैं। आप चूंकि‍ गंभीरता के साथ हस्‍तक्षेप में शामि‍ल हुए हैं,इसलि‍ए सि‍र्फ एक ही उदाहरण रख रहा हूं। इंटरनेट का सबसे बड़ा एक्‍सपोजर भू.पू; अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ बि‍ल क्‍लिंटन के सेक्‍स कांड का है ,वह आदर्श है नेट पत्रकारि‍ता का। आज अमरीकी समाज में क्‍लिंटन साहब को कोई भी घृणि‍त नजर से नहीं देखता, सि‍र्फ इतने से ही समझ सकते हैं कि‍ उन्‍हें इस्‍तीफा नहीं देना पड़ा था,इसके वि‍परीत वाटरगेट कांड ने तत्‍कालीन अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ की हवा नि‍काल दी थी, यह बुनि‍यादी फर्क है नेट लेखन और प्रेस के लेखन में। प्रेस के जमाने में वि‍यतनाम युद्ध के समय अमेरि‍का सारी दुनि‍या में नंगा हुआ,अमरीकी जनता में ज्‍वार पैदा हुआ और अंत में वि‍यतनाम से बि‍स्‍तर बांधकर अमेरि‍का को पराजि‍त भाव से लौटना पड़ा। भारत की सड़कों पर भी प्रति‍वाद के स्‍वर सुनाई दि‍ए थे। आज अफगानि‍स्‍तान और इराक धू धू करके जल रहे हैं,लेकि‍न कोई प्रति‍वाद नजर नहीं आता . अमेरि‍का में इराक युद्ध के खि‍लाफ सन् 2003 में शांति‍ मार्च भी नि‍कले थे,आज अमरीका सोया हुआ है।लेकि‍न अफगानि‍स्‍तान युद्ध के खि‍लाफ भारत से लेकर अमरीका तक कहीं पर भी मार्च नहीं नि‍कले। अफगानि‍स्‍तान और इराक में जो तबाही मच रही है वह वि‍यतनाम युद्ध की तबाही को भी लज्‍जि‍त करती है, जि‍तनी सूचनाएं इन दोनों देशों के बारे में नेट पर हैं उसकी तुलना में वि‍यतनाम युद्ध के समय एक प्रति‍शत सूचनाएं तक नहीं थीं,हि‍न्‍दी के लेखक उस जमाने में वि‍यतनाम के बारे में लघु पत्रि‍काओं से ही जान पाए थे और लेखकों से लेकर संस्‍कृति‍कर्मि‍यों तक कर्मचारि‍यों से लेकर छात्रों,युवाओं तक वि‍यतनाम युद्ध के खि‍लाफ व्‍यापक प्रति‍क्रि‍या दि‍खाई दी थी,आज क्‍या अफगानि‍स्‍तान और इराक को लेकर वैसी जागरूकता हिंदी लेखन और हिंदी के युवा लेखन से लेकर नेट वि‍वादों में नजर नहीं आती है,महानगरों में तो अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद वि‍रोधी जुलूस अब दुर्लभ हो गए हैं,जागरूक लोगों के महानगरों का आज जब यह हाल है तो बाकी का क्‍या कहना।
    कुछ देर के लि‍ए अमरीका पर ही नजर डाल लें,वह नेट यूजरों का सबसे बड़ा देश है और वहां धडाधड बैंक दि‍वालि‍या हो रहे हैं, कारखाने दि‍वालि‍या हो रहे हैं किंतु प्रति‍वाद में अमरीका की सडकों से जनता गायब है , नेट पर आर्थि‍क मंदी की बेशुमार सूचनाएं हैं,तबाही के हजारों पन्‍नों में आंकडे हैं लेकि‍न प्रति‍वाद करती जनता अमरीका में कहीं नजर नहीं आती, यही जनता नेट के पहले आसानी से प्रति‍वाद करती नजर आती थी, इसी अर्थ में मैंने यह कहा था वर्चुअल लेखन ‘है भी और नहीं भी’, वह प्रभावहीन होता है।
    यह सच है कि‍ नई संचार तकनीक ने बहुत लोगों को काम दि‍लाया है,बहुत सारे हाशि‍ए के लोगों को अभि‍व्‍यक्‍ति‍ दी है,लेकि‍न कड़वी सच्‍चाई है नेट सामाजि‍क सरोकार के प्रति‍ जागरूक नहीं बनाता खासकर युवाओं को नई संचार तकनीक ने सामाजि‍क सरोकारों के प्रति‍ सचेत कम और अचेत ज्‍यादा कि‍या है,यह बात में समग्रता में रख रहा हूं। मेरी बात पर वि‍श्‍वास न हो तो इंटरनेट के ईमेल से होने वाले संवाद के विषयों के बारे में वि‍भि‍न्‍न सर्वेक्षणों को गौर से पढें तो शायद चीजें ज्‍यादा बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    वि‍नीत कुमार जी,
    समस्‍या व्‍यक्‍ि‍तगत नहीं है, बहस को व्‍यक्‍ि‍तगत बनाने से ज्‍यादा बेहतर है यह जानना कि‍ वर्चुअल तो नकल की नकल है, आपने मेरी कि‍ताबें देखी हैं तो कृपा करके पढकर भी देखें । फि‍र बताएं। मैं नि‍जी तौर पर हिंदी में इंटरनेट के जनप्रि‍य होने और इंटरनेट पर ज्‍यादातर सामग्री आने के पहले से ही कम्‍प्‍यूटर,सूचना जगत वगैरह पर लि‍ख चुका हूं। यह मेरी हिंदी के प्रति‍ नैति‍क जि‍म्‍मदारी है कि‍ हिंदी में वह सभी गंभीर चीजें पाठक पढ़ें जि‍न्‍हें वे नहीं जानते अथवा जो उनके भवि‍ष्‍य में काम आ सकती है। आप वर्चुअल की बहस को व्‍यक्‍ि‍तगत न बनाएं,वर्चुअल में झगड़ा नहीं करते, टोपी भी नहीं उछालते,वर्चुअल तो आनंद की जगह है,सामंजस्‍य की जगह है,संवाद की जगह है। कृपया हिंदी साहि‍त्‍य की तू-तू मैं- मैं को नेट पर मत लाइए,चीजों को चाहे जि‍तनी तल्‍खी से उठाएं किंतु व्‍यक्‍ि‍तगत न बनाएं। आप अच्‍छे लोग हैं और अच्‍छे लोग अच्‍छे ही रहते हैं,संवाद करते हैं।

  • विनीत कुमार said:

    जगदीश्वरजी
    बात बहुत साफ है। हम नेट पर लिखने वालों को अक्सर ये हिदायत देते आए हैं कि आप चीजों को व्यक्तिगत मत बनाइए,सार्थक बहस कीजिए वगैरह..वगैरह। लेकिन ऐसा कहते हुए हम इंटरनेट की दुनिया के मिजाज को नजरअंदाज कर जाते हैं। यहां तो जिसके पास बिजली की सुविधा है और इंटरनेट कनेक्शन है वही कीपैड तान देता है। मैं इसे न तो गलत मानता हूं औऱ न ही इनके पीछे उपदेश की ताकत झोंकने के पक्ष में हूं। हां इतना जरुर कहना चाहता हूं कि आज इंटरनेट की दुनिया में हिन्दी अगर इतनी तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है,आए दिन इसे लेकर नए-नए सॉफ्टवेयर लाए जा रहे हैं तो ये किसी के संपादकीय लिखने का फल नहीं है औऱ न ही किसी अखबार-पत्रिका के मीडिया विशेषांक निकाले जाने का नतीजा है। ये हम्हीं जैसे कच्चे-पक्के लिखनेवाले लोगों की बढ़ती तादात को देखते हुए किया जा रहा है क्योंकि सीधा-सीधा मामला बाजार,उपभोग और उससे जुड़ी लोकप्रियता का है।
    आप भी इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय होते हैं,हम जैसे नौसिखुए के लिखे पर प्रतिक्रिया करते हैं,पढ़कर बहुत अच्छा लगता है लेकिन जैसे ही कोई रमेश उपाध्याय या फिर मृणाल पांडे जैसा ज्ञान देने लग जाता है तो इंटरनेट की दुनिया पर लगातार लिखनेवालों का बिदकना स्वाभाविक है। हम इसी संपादकीय डंडे की मार और मठाधीशी से उबकर यहां लिखना शुरु किया है। ऐसा भी नहीं है कि हममें प्रिंट में छपने और लिखने की काबिलियत नहीं है लेकिन अब अधिकांश जगहों में छपने के पहले ही घिन आने लगती है। माफ कीजिएगा,हम कोई नई या क्रांति की बात नहीं कर रहे लेकिन शालीनता औऱ सभ्यता के नाम पर लिजलिजेपन को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
    हर मिजाज के लोग लिख रहे हैं,किसी की भाषा थोड़ी उग्र है तो किसी की थोड़ी उटपटांग,ये तो होगा ही लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि सुनियोजित तरीके से इंटरनेट लेखन के विरोध में लगातार महौल बनाए जाएं और उससे भी जी न भरे तो अखबारों में लेख और संपादकीय लिखने लग जाएं। आप आझ से दो साल पहले के इंटरनेट पर हिन्दी लेखन औऱ अब में तुलना कीजिए तो आपको साफ फर्क समझ आ जाएगा कि पहले के मुकाबले आझ की राइटिंग कितनी मैच्योर हुई है,ऐसे ही आगे भी होगा। इसमें कहीं से ज्यादा बिफरने की कोई जरुरत नहीं है। हां इतना तो आप भी जानते हैं कि इंटरनेट की दुनिया में जो कोई भी उपदेश देने का काम करेंगे वो मारे जाएंगे। आप देख लीजिए,हजारों ऐसे ब्लॉग हैं,जिनमें बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं लेकिन उस पर पांच हीटिंग भी नहीं है। ऐसा इसलिए कि वो क्या महसूस करते हैं से ज्यादा क्या महसूस कराना चाहते हैं कि शैली में लिखे गए हैं,लेखन को लेकर ईमानदारी है ही नहीं,संगोष्ठियों में ओढ ली गयी शालीनता तो यहां नहीं ही चलेगी न। कई नामचीन लोग बडी-बड़ी बातें लिख देते हैं लेकिन उन्हें कोई पूछनेवाला नहीं है,आखिर क्यों। हिन्दी समाज ज्ञान की मुद्रा से अघा चुका है,वो महसूस करने के स्तर पर लिखना-पढ़ना चाहता है।
    और जहां तक आपकी किताब पढ़ने की बात है तो सच कहूं तो माध्यम साम्राज्यवाद से लेकर माध्यम सैद्धांतिकी,युद्ध औऱ ग्लोबल मीडिया संस्कृति सबों से होकर गुजरा हूं। भाषा में एक हद तक बेहयापन हो सकता है लेकिन जिन चीजों के बारे में नहीं जानता,कोशिश करता हूं कि उस पर न ही बात करुं। शुरुआती दौर में मीडिया की जो भी कच्ची-पक्ची समझ बनी है उसमें आपकी किताबों में बड़ी मदद की है इसलिए मेरा कमेंट व्यक्तिगत न मानकर एक लेखक-पाठक के बीच का संवाद मानकर पढ़े तो मुझे भी अच्छा लगेगा। अपने पक्ष में बहुत अच्छा कहने के बजाय इतना जरुर कहूंगा कि आपको बहुत कम ही पाठक ऐसे मिलेंगे होगें जो आपसे असहमति रखते हुए भी आपकी सारी किताबों को बेचैनी से ढूंढते हुए पढ़ता है। बाकी संवाद को मैं भी सृजन प्रक्रिया का सबसे अनिवार्य हिस्सा मानता हं। भाषा को लेकर अगर बेशर्मा बरती हो तो माफ करेंगे।

  • रंगनाथ सिंह said:

    कृपया हिंदी साहि‍त्‍य की तू-तू मैं- मैं को नेट पर मत लाइए- जगदीश्वर चतुर्वेदी

    जगदीश जी इस बात से पुर्णतः सहमत हूँ. जगदीश जी की अन्य बातो से मेरी पूर्ण असहमति है.
    मुख्तसर रूप से सिर्फ ये कहूँगा की वेब दुनिया में पिछले दिनों जो बहसें चली हैं उनका ही असर है की आज हिंदी के बुजुर्गवार प्रभाष जोशी, रमेश उपाध्याय…….जैसों ने इसका नोटिस लिया है. प्रभाष जी के माने तो इन वेब वालो से ही उन्हें उम्मीद है………..

  • Mohalla Live » Blog Archive » वर्चुअल राइटिंग मि‍र्च है और मिर्च से ज्ञान नहीं नि‍कलता said:

    [...] विमर्श को दो कौड़ी का बताते हुए एक राइटअप लिखा, तो अंशुमाली रस्‍तोगी भड़क उठे। [...]

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