वर्चुअल राइटिंग मि‍र्च है और मिर्च से ज्ञान नहीं नि‍कलता

सीनियर राइटर और कथन पत्रिका के प्रधान संपादक रमेश उपाध्‍याय ने इंटरनेटीय विमर्श को दो कौड़ी का बताते हुए एक राइटअप लिखा, तो अंशुमाली रस्‍तोगी भड़क उठे। उन्‍होंने तल्‍खी और तुर्शी के साथ अपनी बात रखी और उनके इसी अंदाज़ ने जगदीश्‍वर चतुर्वेदी का भेजा ख़राब कर दिया। चतुर्वेदी जी मास कम्‍यूनिकेशन के टीचर हैं और मीडिया पर किताबें लिखते हैं। उन्‍होंने रिएक्‍ट किया कि इंटरनेट का विमर्श चाहे कितना स्‍तरीय क्‍यों न हो, असरहीन है। उन्‍होंने बताया कि इंटरनेट की बाढ़ ने अमेरिका के नागरिकों की प्रतिरोध क्षमता कितनी कुंद कर दी है। वे सड़क पर उतरना भूल गये हैं। आप देखें कि इंटरनेटीय संसार में चले इस वाद-विवाद का सिलसिला क्‍या कह रहा है : मॉडरेटर

अंशुमाली रस्‍तोगी की प्रतिक्रिया


तो जनाब रमेश उपाध्यायजी, अब यह हमें आपसे सीखना-समझना पड़ेगा कि नेट पर क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं? क्या कहा जाना चाहिए, क्या नहीं? किस विवाद में पड़ना चाहिए, किसमें नहीं? किस वरिष्ठ की चरणवंदना करनी चाहिए, किसकी नहीं? नैतिक कौन है, अनैतिक कौन?

मुझे समझ नहीं आता, दिल्ली में बैठा हर वरिष्ठ हाथ में डंडा थामे अपने या अपनों से असहमत होने व लगने वालों को हर बात पर हांकने क्यों निकल पड़ता है? क्या राजधानीवालों से असहमति या विरोध रखना कोई जुर्म है? बताएं।

मुझे नहीं मालूम, रमेशजी ने इस लेख को किसे प्रसन्न करने के लिए लिखा था, पर कोई तो प्रसन्न हुआ ही होगा। ज़रूर। रमेशजी को शायद मालूम नहीं कि वरिष्ठों से असहमतियां या उन पर विरोध जताने वाले सभी ग़लत नहीं हैं। ये वो ‘दृढ़ आवाज़ें’ हैं, जिन्हें खेमेबाज अखबारों-पत्रिकाओं ने अब तक दबाये रखा था। लेकिन नेट और ब्लॉग पर वे स्वतंत्र हैं। जैसी जिसकी असहमति है, उसे वो यहां लिख-कह रहा है। हां, मैं यह मानता हूं कि उनका विरोध बेहद तीखा है। लेकिन विरोध का मजा तब ही है, जब उसमें तीखापन हो। बंधु, वो मिर्च ही क्या जो लगे नहीं?

अगर रमेशजी को यह सब इतना ही खराब और अनुचित लग रहा है, तो सबसे पहले वो अपना ब्लॉग-लेखन बंद करें। क्योंकि खुलेपन का अधिकार तो उन्हें भी हासिल है। वे भी तो कभी न कभी इसका दुरुपयोग कर ही सकते हैं। क्यों, है न!

वरिष्ठों के खिलाफ यहां जो कुछ भी कहा-लिखा जा रहा है, वो बेहद तीखी बहस की मांग करता है। जिसमें इस बहस से लड़ने-भिड़ने का दम होगा, वो ही यहां टिकेगा। कमज़ोरों का यहां कोई काम नहीं।

रमेशजी, हमें हमारी गंभीरता और ज़‍िम्मेदारी के बारे में न ही बताएं, तो बेहतर। क्योंकि हम अब बच्चे नहीं रहे।

अंशुमाली रस्‍तोगी जी,
नाराज़ न हों तो कृपया गंभीरता से पढें और सोचें। मैं व्‍यक्तिगत तौर पर आपके तेवर का कायल हूं, लेकि‍न अलोकतांत्रि‍क भाव का नहीं। भाई रमेश उपाध्‍याय ने सही जगह इंजेक्‍शन लगाया है। इसके बारे में अनेक कि‍स्‍म से कहा जा सकता है। समस्‍या यह नहीं है कि‍ कौन से वि‍षय वि‍वाद के बनाए जाएं। समस्‍या यह भी नहीं है कि‍ क्‍या लि‍खें और कैसे लि‍खें। हिंदी के इंटरनेट लेखकों में एक वि‍शेष लेखकीय भाव है, जो स्‍वागतयोग्‍य है, लेकि‍न इसमें अनेक ऐसे भी लेखक हैं, जो अतार्किकता की हद पर जाकर बहस कर रहे हैं और अतार्किकता को अपना लोकतांत्रि‍क हक बता रहे हैं। ऐसी ही तल्‍ख टि‍प्‍पणी अंशुमाली रस्‍तोगी की है, उनका मानना है – अगर रमेशजी को यह सब इतना ही खराब और अनुचित लग रहा है तो सबसे पहले वो अपना ब्लॉग-लेखन बंद करें। बहस का यह स्‍तर जब होगा, तो शायद कभी भी इंटरनेट को समृद्ध नहीं कर पाएंगे। आप भी लि‍खें और वे भी लि‍खें, किंतु भद्रता और संस्‍कृति‍ के मानक बनाते हुए।

मैं अंशुमालीजी से अनुरोध करना चाहूंगा कि‍ कभी पश्‍चि‍म के ब्‍लॉगर, साहि‍त्‍यकार, अच्‍छे पत्रकार, वि‍चारक और समाजवि‍ज्ञानि‍यों से भी कुछ हमें सीख लेना चाहि‍ए। यह कैसे हो सकता है कि नेट पर तो लि‍खना चाहते हैं लेकि‍न नेट बनाने वालों की लेखन सभ्‍यता से सीखना नहीं चाहते? रमेशजी ने सही जगह हस्‍तक्षेप कि‍या है, आपको अपनी राय कहने का हक है, तीखी बहस का भी हक है, वरि‍ष्‍ठों से असहमति‍ का भी हक है किंतु बहस का तेवर शि‍रकत और असहमति‍यों को बढ़ावा देने वाला होना चाहि‍ए, ‘स्‍टारडस्‍ट’ पत्रि‍का की शैली में लेखन करेंगे तो बहस से क्‍या नि‍कालेंगे? रमेशजी पर बहस मत कीजि‍ए, उस मुद्दे पर बहस कीजि‍ए जो उन्‍होंने उठाया है। मुद्दे को व्‍यक्‍ति‍ से अलग करके बहस करने पर ही कोई सार नि‍कलेगा। नेट का नि‍र्माण गंभीर काम के लि‍ए कि‍या गया है, हम चाहें तो मि‍र्च लगाने के लि‍ए भी कर सकते हैं।

अंशुमालीजी का यह कथन काफी रोचक और सारगर्भित है, लि‍खा है, लेकिन विरोध का मज़ा तब ही है, जब उसमें तीखापन हो। बंधु, वो मिर्च ही क्या जो लगे नहीं? बंधु मि‍र्च से ज्ञान नहीं नि‍कलता, मि‍र्च ही नि‍कलेगी। लेखन का लक्ष्‍य भी होना चाहि‍ए। कुछ भी तय कर लो। रही बात दमखम की, तो नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि‍ नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्‍लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के वि‍चार सि‍र्फ वि‍चार हैं और वह भी बासी और मृत वि‍चार हैं। उनमें स्‍वयं चलने की शक्‍ति‍ नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांति‍कारी कि‍ताब लि‍खकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनि‍या नहीं बदल सकते।

नेट लेखन सि‍र्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्‍य भूमि‍का भी नहीं है। संचार में आप गाली दें, बकवास करें, प्रेम करें, वि‍वाद करें, खुशी की बातें करें, यहां सब कुछ वर्चुअल है और कभी ठोस नहीं बन सकता। वर्चुअल के आधार पर आप कि‍सी लेखक, पत्रकार, वि‍चारक, नेता आदि‍ को प्रति‍ष्‍ठि‍त अथवा अपदस्‍थ नहीं कर सकते। वर्चुअल में न सम्‍मान होता है और अपमान होता है, वर्चुअल तो वास्‍तव में होता ही नहीं है, फलत: प्रभाव के परे होता है। नेट लेखन बलवानों का खेल नहीं है, यह तो महज लेखन है। वैसे ही जैसे कोई बच्‍चा लि‍खता है और भूल जाता है। अंशुमाली जी ने लि‍खा है – रमेशजी हमें हमारी गंभीरता और जिम्मेदारी के बारे में न ही बताएं, तो ही बेहतर। क्योंकि हम अब बच्चे नहीं रहे। यह प्रति‍क्रि‍या कि‍स बात का संकेत है? हम से वि‍वाद मत करो, हमसे बातें मत करो, हमें अपनी दुनि‍या में मशगूल रहने दो, और इससे भी ख़तरनाक प्रवृत्ति‍ भी व्‍यक्‍त हुई है कि‍ ‘हम ठीक हैं।’

दोस्‍त, बहस का यह गैर-लोकतांत्रि‍क तरीका है। सम्‍मान और प्‍यार के साथ बहस करने पर ही संवाद होता है। संवाद के लि‍ए कि‍सी को भगनाने, गरि‍याने और मि‍र्च लगाने की नहीं, थोड़ी मि‍सरी और बुद्धि‍ चाहि‍ए। मि‍र्च नहीं। आप नि‍श्‍चि‍त तौर पर बच्‍चे नहीं हैं। आप ज़‍ि‍म्‍मेदार नागरि‍क हैं और सचेत नागरि‍क हैं। नेट यूज़र हैं। मुश्‍कि‍ल यह है कि आप नागरि‍क के बोध को त्‍यागकर बहस करना चाहते हैं। नेट के लि‍ए ‘नागरि‍क’ और ‘यूजर’ दोनों ही भावों की ज़रूरत है। खासकर आप जैसे प्रति‍भाशाली व्‍यक्‍ि‍त के लि‍ए। अंत में रमेश जी बड़े हैं, बुजुर्ग हैं, तो इसमें उनका क्‍या दोष और आप अभी जवान हैं, तो इसमें आपकी कोई भूमि‍का नहीं है। यह तो शरीर और उम्र का स्‍वाभावि‍क धर्म है। आप कल्‍पना कीजि‍ए, रमेश जी आठ साल के बच्‍चे होते, तो क्‍या आप उनकी बात पर ग़ौर करते? नेट लेखन उम्र, हैसि‍यत, पद, दंभ, बल आदि‍ नहीं देखता। ये तो नेट में आने के बाद समाप्‍त हो जाते हैं। वहां सि‍र्फ लेखन होता है और कुछ भी नहीं। लेखक तो मर जाता है।

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आदरणीय जगदीश्वर जी,
मैं आपकी इस बात से सहमत हूं कि अंशुमाली किसी का विरोध करें तो स-तर्क करें। जैसे कि अगर वे कहते हैं कि प्रभाषजी या अशोकजी का ‘जनसत्ता’ में कूड़ा भी छप जाता है, तो वे उदाहरण, कारण और विश्लेषण के साथ बताएं। भाषा भी ‘लौंडे-लौंडिया’ वाली न रखें, थोड़ी बेहतर कर लें। यह अलग बात है कि कथित सभ्य और वरिष्ठ लोग कई बार सभ्य भाषा में भी ऐसे घटिया निहितार्थ वाली बातें कह देते हैं कि गालियां खुदकुशी को सोचने लगती हैं। बहरहाल अपने लंबे बयान में आपने एक निहायत ही बचकाना-सा तीर छोड़ दिया है कि वर्चुअल लेखन कुछ पानी का बुलबुला है।

मर जाएगा, खप जाएगा, बचेगा नहीं… आदि-इत्यादि। अगर ऐसा ही होता, तो क्या आपको और रमेशजी को यहां अपनी बात रखने आना पड़ता? कमाल की बात है कि इतना वरिष्ठ व्यक्ति (आपके ही तर्क से इसमें मेरा कोई दोष नहीं) तकनीक के बदलाव को इतने बचकाने ढंग से देख रहा है! अरे, किसी को सस्ते में मेट्रो में लोकल से ज़्यादा सुविधाएं मिल रही हैं तो वो क्यों लोकल बस में जाएगा? ब्लाग में आप खुलकर अपनी बात सारी दुनिया के सामने मामूली खर्च में रख सकते हैं। तकनीक के दुरुपयोग की बात है, तो वो तो लघुपत्रिकाओं तक का हो रहा है। हज़ारों रुपये के सरकारी/गैर-सरकारी विज्ञापन लेने वाली कथित लघु-पत्रिकाओं के दफ्तरों का आलम बिलकुल सरकारी दफ्तरों जैसा बना रखा है जहां बड़े-बड़े तोपचियों से लेकर सामान्य नवलेखक तक अपनी रचनाएं, फाइलों की तरह कोई रुक्का दिखाकर, पद-पदवी दिखाकर, जाति-वर्ण का सिक्का चलाकर या ऐसे ही अन्यान्य तरीकों से सरकाते फिरते हैं। तकनीक और उसके कारण बना माहौल बहुत कुछ करते हैं चतुर्वेदी जी। एक वक्त था, जब बंबई फिल्म इंडस्ट्री में लता, आशा, रफी, किशोर, महेंद्र, मन्ना के अलावा कोई घुस नहीं सकता था। आज देखिए हर महीने एक नया गायक आ रहा है। एक से एक टैलेंटेड। बल्कि हमारे प्रतिभाशाली बुज़ुर्गों, मसलन ओम पुरी, पंकज कपूर, वीरेंद्र सक्सेना, मीता वशिष्ठ (सूची बहुत लंबी है) जो काम के लिए तरसते थे, को भी नये माहौल, नये लोगों और नयी तकनीक की वजह से ही उनका वास्तविक हक मिल पाया है। यही वर्चुअल वर्ल्‍ड एक दिन पीली पड़ गयी, सड़ गयी किताबों में लिखे महत्वपूर्ण विचारों (जहां कि विचारों के नाम पर रिपीटा-घसीटा भी बहुत कुछ है) को पेन-ड्राइवों, सीडीओं, ई-बुक्स और अन्य नयी तकनीकों में स्टोर करके बचाएगा। जिनको ग़लतफहमियां हों, वे पीपल के पत्तों पर सरकंडों से लिखते रहें।

सौहार्दपूर्ण माहौल में संवाद की आपकी बात स्वागत-योग्य है, पर क्या आज से पहले किसी वरिष्ठ ने ऐसा सोचा।

संजय ग्रोवर

संजय ग्रोवर जी,
आप मेरी बात को हल्‍के में टाल नहीं सकते। वर्चुअल क्‍या है? इस पर हज़ारों-लाखों पन्‍नों में सामग्री बाज़ार में आ चुकी है और उसमें से कुछ नेट पर भी उपलब्‍ध है। जि‍न लोगों ने वर्चुअल को बनाया, वे भी इसके मायावी रूप पर मुग्‍ध ही हैं। आप चूंकि‍ गंभीरता के साथ हस्‍तक्षेप में शामि‍ल हुए हैं, इसलि‍ए सि‍र्फ एक ही उदाहरण रख रहा हूं। इंटरनेट का सबसे बड़ा एक्‍सपोजर भूपू अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ बि‍ल क्‍लिंटन के सेक्‍स कांड का है, वह आदर्श है नेट पत्रकारि‍ता का। आज अमरीकी समाज में क्‍लिंटन साहब को कोई भी घृणि‍त नज़र से नहीं देखता। सि‍र्फ इतने से ही समझ सकते हैं कि‍ उन्‍हें इस्‍तीफा नहीं देना पड़ा था। इसके वि‍परीत वाटरगेट कांड ने तत्‍कालीन अमेरि‍की राष्‍ट्रपति‍ की हवा नि‍काल दी थी। यह बुनि‍यादी फर्क है नेट लेखन और प्रेस के लेखन में। प्रेस के ज़माने में वि‍यतनाम युद्ध के समय अमेरि‍का सारी दुनि‍या में नंगा हुआ। अमरीकी जनता में ज्‍वार पैदा हुआ और अंत में वि‍यतनाम से बि‍स्‍तर बांधकर अमेरि‍का को पराजि‍त भाव से लौटना पड़ा। भारत की सड़कों पर भी प्रति‍वाद के स्‍वर सुनाई दि‍ये थे। आज अफगानि‍स्‍तान और इराक धू धू करके जल रहे हैं, लेकि‍न कोई प्रति‍वाद नजर नहीं आता। अमेरि‍का में इराक युद्ध के खि‍लाफ सन 2003 में शांति‍ मार्च भी नि‍कले थे। आज अमरीका सोया हुआ है। लेकि‍न अफगानि‍स्‍तान युद्ध के खि‍लाफ भारत से लेकर अमरीका तक कहीं पर भी मार्च नहीं नि‍कले। अफगानि‍स्‍तान और इराक में जो तबाही मच रही है, वह वि‍यतनाम युद्ध की तबाही को भी लज्‍जि‍त करती है। जि‍तनी सूचनाएं इन दोनों देशों के बारे में नेट पर हैं, उसकी तुलना में वि‍यतनाम युद्ध के समय एक प्रति‍शत सूचनाएं तक नहीं थीं। हिंदी के लेखक उस जमाने में वि‍यतनाम के बारे में लघु पत्रि‍काओं से ही जान पाये थे और लेखकों से लेकर संस्‍कृति‍कर्मि‍यों तक कर्मचारि‍यों से लेकर छात्रों, युवाओं तक वि‍यतनाम युद्ध के खि‍लाफ व्‍यापक प्रति‍क्रि‍या दि‍खाई दी थी। आज क्‍या अफगानि‍स्‍तान और इराक को लेकर वैसी जागरूकता हिंदी लेखन और हिंदी के युवा लेखन से लेकर नेट वि‍वादों में नज़र नहीं आती है, महानगरों में तो अमेरि‍की साम्राज्‍यवाद वि‍रोधी जुलूस अब दुर्लभ हो गये हैं। जागरूक लोगों के महानगरों का आज जब यह हाल है, तो बाकी का क्‍या कहना।

कुछ देर के लि‍ए अमरीका पर ही नजर डाल लें। वह नेट यूज़रों का सबसे बड़ा देश है और वहां धड़ाधड़ बैंक दि‍वालि‍या हो रहे हैं। कारखाने दि‍वालि‍या हो रहे हैं। किंतु प्रति‍वाद में अमरीका की सड़कों से जनता ग़ायब है। नेट पर आर्थि‍क मंदी की बेशुमार सूचनाएं हैं। तबाही के हजारों पन्‍नों में आंकडे हैं। लेकि‍न प्रति‍वाद करती जनता अमरीका में कहीं नज़र नहीं आती। यही जनता नेट के पहले आसानी से प्रति‍वाद करती नज़र आती थी। इसी अर्थ में मैंने यह कहा था वर्चुअल लेखन ‘है भी और नहीं भी’, वह प्रभावहीन होता है।

यह सच है कि‍ नयी संचार तकनीक ने बहुत लोगों को काम दि‍लाया है, बहुत सारे हाशि‍ये के लोगों को अभि‍व्‍यक्‍ति‍ दी है, लेकि‍न कड़वी सच्‍चाई है कि नेट सामाजि‍क सरोकार के प्रति‍ जागरूक नहीं बनाता। खासकर युवाओं को नयी संचार तकनीक ने सामाजि‍क सरोकारों के प्रति‍ सचेत कम और अचेत ज़्यादा कि‍या है, यह बात मैं समग्रता में रख रहा हूं। मेरी बात पर वि‍श्‍वास न हो तो इंटरनेट के ईमेल से होने वाले संवाद के विषयों के बारे में वि‍भि‍न्‍न सर्वेक्षणों को ग़ौर से पढें तो शायद चीजें ज़्यादा बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

महान हैं वो लोग, जो इसी वर्चुअल स्पेस से मटीरियल टीप-टीप कर हिंदी में अनुवाद करके सात-सात सौ रुपये की किताब छपवाते हैं। हम उनके आगे नतमस्तक हैं जो बुलबुले को छपवाकर चिरस्थायी बनाने में जुटे हैं।

विनीत कुमार

वि‍नीत कुमार जी,
समस्‍या व्‍यक्‍ि‍तगत नहीं है। बहस को व्‍यक्‍ि‍तगत बनाने से ज़्यादा बेहतर है यह जानना कि‍ वर्चुअल तो नकल की नकल है। आपने मेरी कि‍ताबें देखी हैं तो कृपा करके पढ़कर भी देखें। फि‍र बताएं। मैं नि‍जी तौर पर हिंदी में इंटरनेट के जनप्रि‍य होने और इंटरनेट पर ज़्यादातर सामग्री आने के पहले से ही कम्‍प्‍यूटर, सूचना जगत वगैरह पर लि‍ख चुका हूं। यह मेरी हिंदी के प्रति‍ नैति‍क ज़‍ि‍म्‍मदारी है कि‍ हिंदी में वह सभी गंभीर चीज़ें पाठक पढ़ें, जि‍न्‍हें वे नहीं जानते अथवा जो उनके भवि‍ष्‍य में काम आ सकती है। आप वर्चुअल की बहस को व्‍यक्‍ि‍तगत न बनाएं। वर्चुअल में झगड़ा नहीं करते। टोपी भी नहीं उछालते। वर्चुअल तो आनंद की जगह है। सामंजस्‍य की जगह है। संवाद की जगह है। कृपया हिंदी साहि‍त्‍य की तू-तू मैं-मैं को नेट पर मत लाइए। चीज़ों को चाहे जि‍तनी तल्‍खी से उठाएं किंतु व्‍यक्‍ि‍तगत न बनाएं। आप अच्‍छे लोग हैं और अच्‍छे लोग अच्‍छे ही रहते हैं। संवाद करते हैं।

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्वरजी,
बात बहुत साफ है। हम नेट पर लिखने वालों को अक्सर ये हिदायत देते आये हैं कि आप चीज़ों को व्यक्तिगत मत बनाइए। सार्थक बहस कीजिए वगैरह… वगैरह। लेकिन ऐसा कहते हुए हम इंटरनेट की दुनिया के मिज़ाज को नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। यहां तो जिसके पास बिजली की सुविधा है और इंटरनेट कनेक्शन है, वही कीपैड तान देता है। मैं इसे न तो ग़लत मानता हूं और न ही इनके पीछे उपदेश की ताक़त झोंकने के पक्ष में हूं। हां, इतना ज़रूर कहना चाहता हूं कि आज इंटरनेट की दुनिया में हिंदी अगर इतनी तेज़ी से लोकप्रिय होती जा रही है, आये दिन इसे लेकर नये-नये सॉफ्टवेयर लाये जा रहे हैं, तो ये किसी के संपादकीय लिखने का फल नहीं है और न ही किसी अखबार-पत्रिका के मीडिया विशेषांक निकाले जाने का नतीजा है। ये हमहीं जैसे कच्चे-पक्के लिखनेवाले लोगों की बढ़ती तादाद को देखते हुए किया जा रहा है क्योंकि सीधा-सीधा मामला बाज़ार, उपभोग और उससे जुड़ी लोकप्रियता का है।

आप भी इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय होते हैं, हम जैसे नौसिखुए के लिखे पर प्रतिक्रिया करते हैं, पढ़कर बहुत अच्छा लगता है लेकिन जैसे ही कोई रमेश उपाध्याय या फिर मृणाल पांडे जैसा ज्ञान देने लग जाता है तो इंटरनेट की दुनिया पर लगातार लिखनेवालों का बिदकना स्वाभाविक है। हमने इसी संपादकीय डंडे की मार और मठाधीशी से ऊबकर यहां लिखना शुरू किया है। ऐसा भी नहीं है कि हममें प्रिंट में छपने और लिखने की काबिलियत नहीं है लेकिन अब अधिकांश जगहों में छपने के पहले ही घिन आने लगती है। माफ कीजिएगा, हम कोई नयी या क्रांति की बात नहीं कर रहे लेकिन शालीनता और सभ्यता के नाम पर लिजलिजेपन को बर्दाश्त नहीं कर सकते।

हर मिज़ाज के लोग लिख रहे हैं, किसी की भाषा थोड़ी उग्र है तो किसी की थोड़ी उटपटांग। ये तो होगा ही लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं है कि सुनियोजित तरीके से इंटरनेट लेखन के विरोध में लगातार महौल बनाये जाएं और उससे भी जी न भरे तो अखबारों में लेख और संपादकीय लिखने लग जाएं। आप आज से दो साल पहले के इंटरनेट पर हिंदी लेखन और अब में तुलना कीजिए तो आपको साफ फर्क समझ आ जाएगा कि पहले के मुकाबले आज की राइटिंग कितनी मैच्योर हुई है। ऐसे ही आगे भी होगा। इसमें कहीं से ज़्यादा बिफरने की कोई ज़रूरत नहीं है। हां इतना तो आप भी जानते हैं कि इंटरनेट की दुनिया में जो कोई भी उपदेश देने का काम करेगा, वो मारा जाएगा। आप देख लीजिए, हजारों ऐसे ब्लॉग हैं, जिनमें बहुत अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं लेकिन उस पर पांच हीटिंग भी नहीं है। ऐसा इसलिए कि वो क्या महसूस करते हैं से ज़्यादा क्या महसूस कराना चाहते हैं की शैली में लिखे गये हैं। लेखन को लेकर ईमानदारी है ही नहीं। संगोष्ठियों में ओढ़ ली गयी शालीनता तो यहां नहीं ही चलेगी न। कई नामचीन लोग बडी-बड़ी बातें लिख देते हैं लेकिन उन्हें कोई पूछनेवाला नहीं है, आखिर क्यों? हिंदी समाज ज्ञान की मुद्रा से अघा चुका है। वो महसूस करने के स्तर पर लिखना-पढ़ना चाहता है।

और जहां तक आपकी किताब पढ़ने की बात है, तो सच कहूं तो माध्यम साम्राज्यवाद से लेकर माध्यम सैद्धांतिकी, युद्ध और ग्लोबल मीडिया संस्कृति सबों से होकर गुज़रा हूं। भाषा में एक हद तक बेहयापन हो सकता है लेकिन जिन चीज़ों के बारे में नहीं जानता, कोशिश करता हूं कि उस पर न ही बात करूं। शुरुआती दौर में मीडिया की जो भी कच्ची-पक्ची समझ बनी है, उसमें आपकी किताबों ने बड़ी मदद की है। इसलिए मेरा कमेंट व्यक्तिगत न मानकर एक लेखक-पाठक के बीच का संवाद मानकर पढें, तो मुझे भी अच्छा लगेगा। अपने पक्ष में बहुत अच्छा कहने के बजाय इतना ज़रूर कहूंगा कि आपको बहुत कम ही पाठक ऐसे मिले होंगे, जो आपसे असहमति रखते हुए भी आपकी सारी किताबों को बेचैनी से ढूंढते हुए पढ़ता है। बाकी संवाद को मैं भी सृजन प्रक्रिया का सबसे अनिवार्य हिस्सा मानता हूं। भाषा को लेकर अगर बेशर्मी बरती हो, तो माफ करेंगे।

♦ विनीत कुमार

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