ए आर रहमान और उनका पहला अलबम, मां तुझे सलाम

गुज़रे रविवार के जनसत्ता से। यह अंश कामिनी मथाई की किताब ‘एआर रहमान: अ म्युज़िकल स्टॉर्म’ के एक अध्याय से अवतरित है। किताब वाइकिंग/पेंगुइन से इसी साल कुछ महीने पहले आयी है। अनुवाद मेरा है : रविकान्त

arrmusicalstormएक बार जब एआर रहमान का करियर परवान चढ़ने लगा तो न तो उसकी गति थमने का नाम लेती थी, न ही उसके पीछे मुड़ने का अवकाश था। फ़िल्‍मों के ऑफ़र तेज़ी से आ रहे थे और रहमान उन पर जुनूनी रफ़्तार से जुटे हुए थे। तभी उनके एक पुराने स्कूली सहपाठी भारत बाला अचानक नमूदार हुए। दोनों ने अस्सी की दहाई के अंतिम सालों में विज्ञापनों के लिए साथ काम किया था। भारत का परिचय दिलीप से उनके साझा दो स्त वेणुगोपाल के ज़रिये हुआ था, जो पीएसएसबी के उनके सहपाठी रह चुके थे, और जिनके साथ मिलकर रहमान ने अपना पहला बैण्‍ड बनाया था। तक़रीबन सौ विज्ञापनों में एक साथ – कभी-कभार मुंबई में, पर अक्‍सरहां दिलीप के चेन्‍नई वाले छोटे स्‍टूडियो में – काम करते हुए दोनों में दोस्‍ती हो गयी थी। हालांकि दिलीप का फ़िल्‍मी करियर नब्‍बे के दशक की शुरुआत में चल निकला था, पर भारत अब भी उन्‍हें विज्ञापन फ़िल्‍में भेज दिया करते थे, चूंकि उन्‍हें किसी और संगीतकार के काम से तसल्ली नहीं होती थी।

सन 1996 की बात है। रहमान मुंबई गये हुए थे, स्टार स्क्रीन पुरस्कार समारोह के लिए कि उन्हें बताया गया था कि उन्हें पुरस्कार दिया जाएगा। वे समारोह-भर इंतज़ार करते रहे पर ऐसा कुछ हुआ नहीं – सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार करण अर्जुन के लिए राजेश रोशन को दिये जाने की घोषणा हो गयी। दुखी रहमान ने मुंबई में रह रहे बाला को फोन किया और बाला, उनकी बीवी कणिका, रहमान और उनकी पत्नी सायरा ने वह शाम साथ गुज़ारी। बाला की गाड़ी में बैठकर वे मुंबई की सड़कें नापते रहे और गाड़ी में संयोगवश जो गीत बजता रहा था वह था माइकल जैक्‍सन का ‘दे डोन्ट केयर अबाउट अस’। रहमान उसकी सुर में सुर मिलाते रहे।

तक़रीबन दो महीने बाद अपने स्वतंत्रता सेनानी पिता के उपदेश – भारतीयों को भारत बेचो – से प्रेरणा पाकर बाला रहमान के चेन्नई स्टूडियो में आ धमके। उनके हाथ में एक सीडी के कवर का खाका था, जिसके ऊपर थोट्टा तरनी का बनाया भारतीय तिरंगा था, और आर-पार ‘वंदे-मातरम’ अंकित था। बाला ने रहमान से कहा, ‘बॉस तुम्हारा अभी तक कोई अल्बम नहीं आया है, ये तुम्हारा पहला अल्बम होगा।’

सीडी कवर देखकर रहमान की पहली प्रतिक्रिया थी, ‘या अल्लाह, ये मैं कैसे करूंगा?’ लेकिन जल्द ही असर तारी हो गया, और अगले आठ महीने बाला के साथ अल्बम बनाने की कोशिश में लगे रहे। ‘मैं देख रहा था कि दूसरे प्रोड्यूसर और निर्देशक खीझ रहे थे कि ये बंदा फ़िल्‍मों की इतनी लंबी क़तार लगी होने के बावजूद एक अदद अल्बम पर अपना वक़्त कैसे ख़राब कर सकता है! पर रहमान इस अल्बम को पूरा करने पर आमादा था’, बाला का कहना है। सच कहें तो रहमान की ये एक ख़ासियत है कि उन्हें अगर लग गया कि ये करने लायक़ काम है, तो वह उसमें अपना सब कुछ झोंक देगा, फिर चाहे दुनिया उसे पागल क्यों न समझने लगे। अगर उन्हें लग गया कि निर्देशक किसी आम कहानी को उठाने की हैसियत रखता है, तो वह उसका साथ देगा – जैसा कि रंगीला के साथ हुआ, जो उनके मुताबिक़ काफ़ी अमफ़हम प्‍लॉट था, पर उन्हें राम गोपाल वर्मा के तसव्वुर पर भरोसा था।

‘हम रहमान के स्टूडियो फ़्‍लोर पर रात-दर-रात गुज़ारते चले जाते थे पर कोई धुन ही नहीं सूझती थी’, बाला फ़रमाते हैं। बाला ने भी इस अल्बम के लिए अपने तमाम विज्ञापन वाले प्रॉजेक्ट टाल रखे थे। तभी एक रात अचानक – रहमान का कहना है कि वो रमज़ान की कोई रात थी – कोई डेढ़ बजे रहमान की नींद खुली, उन्होंने बाला को जगाया, और फ़ौरन अपने ध्वनि-अभियंता शिवा को ढूंढ लाने को कहा। शिवा से संपर्क नहीं सधा, तो रहमान ने बाला से कहा कि मैं और इंतज़ार नहीं कर सकता, उन्हें अभी-का-अभी ये गाना रिकॉर्ड करना है। रहमान ने बाला को आनन-फ़ानन में रिकॉर्डिंग का फ़ौरी कोर्स दे डाला और कहा कि संभालो और ख़ुद ध्वनि-कक्ष में मोमबत्ती जलाकर चालू हो गये – ‘मां तुझे सलाम’! वंदे मातरम का यह अनोखा अनुवाद रहमान का ही सोचा हुआ था, और बाला आदि ने इसमें और अंतरे डालने का काम पूरा किया।

रहमान ने यह पूरा गाना बग़ैर किसी साज़-ओ-संगीत के गाया, लेकिन उनकी आवाज़ में एक ग़ज़ब का जुनून था, और जब वे वापस रिकॉर्डिंग कक्ष में आये तो बाला को आंसुओं से नम पाया। रहमान ने जो संस्करण उस रात गाया, वही बाग़ी, विस्फोटक संस्करण अल्बम में जस-का-तस रहा – सिवाय उन नये अंतरों के जो बाद में जोड़े गये। ‘उस रात उसकी आवाज़ में ऐसी देशभक्ति कशिश, ऐसा हाल था कि मुझे अपने अल्बम के लिए उससे अलग कोई तर्ज़े-बयानी नहीं चाहिए थी। वही फ़ायनल था,’ बाला का कहना है।

उसके बाद दोनों ने एक-दो और गीतों पर काम किया, जैसे कि ‘जन गण मन’, और ‘प्रे फ़ॉर मी ब्रदर’। वंदे मातरम को सोनी ने ख़रीद लिया। ये पहला मौक़ा था जब रहमान के गाये किसी गाने का विडियो भी बना, और ये उनका पहला आधिकारिक अल्बम भी था, जिसे आज़ादी के पचासवें साल पर लोकार्पित किया गया। इसमें लगा रहमान का पंचम सुर उनकी ख़ासियत – ट्रेडमार्क – बन गया, जिसे अब हर कोई पहचान लेगा। इसके बाद रहमान के फ़िल्‍मी संगीत में भी बतौर गायक उनकी दख़ल बढ़ने लगी, पर दिलचस्प है कि उन्होंने जिन गानों को अपना सुर दिया वे या तो देशभक्ति-गीत थे, या फिर धार्मिक क़िस्म के गीत थे।

‘मां तुझे सलाम’ का पहला मंचीय प्रदर्शन दिल्ली में पेश हुआ। फिर अमेरिका की एक संगीत-संगत में। गाने के बाद ‘मार-तमाम श्रोता सम्मान देते हुए उठ खड़े हुए। मुझे लगा कि हरेक समुदाय आनंदित और पुलकित है’, रहमान ने याद करते हुए कहा। एक और बातचीत में रहमान ने बताया कि वे दरअसल चाहते थे कि लोग – ख़ास तौर पर ‘एमटीवी पीढ़ी के जवान’ – इस गीत को उल्लास से, न कि किसी कर्तव्यबोध से दबकर गाएं, भावविह्वल होकर गाएं। वंदे मातरम की सीडी के आवरण पर भी रहमान की यह मंशा साफ़ झलकती है – क्योंकि ये भारत की भावी पीढ़ियों को इस संदेश के साथ समर्पित है कि वे देश के बुनियादी मूल्‍यों, और उसकी नैतिकता को समझें।

वंदे मातरम की रचना के दौरान रहमान ने अपने बाल भी बढ़ा लिये थे, और ख़ुद को युवतर, हिप बना डाला था। यह रूप उस जीन्स और सफ़ेद टी-शर्ट के लिबास के साथ जंचता था, जिसे रहमान को वीडियो के लिए पहनाया जाना था। अल्बम को कुल अट्ठाइस देशों में लोकार्पित किया गया, और दुनिया-भर में इसकी लाखों प्रतियां बिकीं। रहमान को लगता है कि वंदे मातरम की यात्रा तो अभी शुरू हुई है, और लोग इसे अगले पचास साल तक इसे सराहेंगे।

प्राचीन और रहमान के वंदे मातरम को गाने वाली लता मंगेशकर ने शायद संगीतकार से कहा भी कि उन्हें उनका संस्करण बेहतर लगता है। आप जानते ही हैं कि लता जी ने आनंद मठ फ़िल्‍म (1952) के लिए हेमंत कुमार के संगीत निर्देशन में ये गीत गाया था। (कहना चाहिए उस ज़माने का वंदे मातरम गाया था।)

मज़ेदार बात है कि ये पहला मौक़ा था जब आम जनता ने अपने रहमान को वाक़ई देखा था। और बाक़ायदा सफ़ेद टीशर्ट, नीली जीन्स और लंबे बालों में क्षितिज के छोरों पर मां तुझे सलाम का आर्तनाद करते सुना था। ये रहमान का नया, लोकप्रिय अवतार था। रहमान इस गाने को ख़ुद पर फ़िल्‍माना नहीं चाहते थे पर बाला ने ज़िद की कि पर्दे पर भी वही गाएं क्योंकि वह अनुपम भावोद्रेक कोई और नहीं जगा सकता था।

ज़ाहिर है कि रहमान का वंदे मातरम बंकिम चंद्र चटर्जी के मौलिक प्रार्थना-नुमा प्रयाण गीत से ख़ासा मुख़्तलिफ़ था। वो कुछ गांधीवादी-सा था – निहायत मधुर पर ढोल-झाल का समायोजन उसमें सिरे से ग़ायब था। रहमान का वंदे मातरम वाक़ई आक्रामक और साहसिक था, तुर्की-बा-तुर्की तेवर वाला। स्वाभाविक था कि ये उस नये देश का कंठहार बन गया जिसने ख़ुद को बतौर राष्ट्र पुनराविष्कृत करने की ठान ली थी।

आप वाक़िफ़ होंगे कि तक़रीबन 130 साल पहले लिखे इस गाने का भारतीय इतिहास में अप्रतिम स्थान है, और समय-समय पर इससे अनेक विवाद उलझे-पुलझे रहे हैं; जाकि रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी वाली स्थिति रही है। इसकी रचना 1875 में हुई, और फिर बंकिम बाबू ने जब इसे आनंदमठ में शामिल किया तो आज़ादी के दीवाने हर जगह इसे गाने लगे, और अंग्रेज़ों का सिरदर्द बढ़ाने लगे।

इतिहास यह भी बताता है कि कांग्रेस के 1923 के सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे मोहम्मद अली ने इसके गाये जाने पर यह कहकर आपत्ति जतायी कि उनका धर्म किसी देवी-देवता के पूजे जाने की इजाज़त नहीं देता, और यह गीत भारतमाता की देवीरूप में स्तुति ही तो है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने बुतपरस्ती की मिसाल बताकर इसका विरोध किया और 1937 में कॉङ्रेस ने पहले दो अंतरे छोड़कर बाक़ी निकाल दिये। कहा जाता है कि पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना साहब इसके प्रबलतम आलोचकों में से थे।

यही वजह रही होगी कि रहमान को वंदे मातरम के लोकार्पण के बाद 1997 में इस्लामी और हिन्दू दोनों क़िस्म के कठमुल्लों से धमकियां मिलने लगीं – एक तरफ़ अगर यह इस्लामी नज़रिये से क़ुफ़्र माना गया, तो दूसरी तरफ़, हिन्दू दृष्टि से अनाधिकार चेष्टा।

आपको याद होगा कि वंदे मातरम अल्बम में एक और गाना था ‘गुरुज़ ऑफ़ पीस’ (शांतिगुरु), जिस पर उस्ताद नुसरत फ़तह अली ख़ान और रहमान ने साथ काम किया था। बाला को याद है कि ‘जब रहमान 1997 में मुंबई में नुसरत साहब से अल्बम की बाबत बात करने के लिए मिलने गये तो उनके यहां पहुंचते-पहुंचते रात के ढाई बज चुके थे। और रहमान ने जो पहला इसरार नुसरत साहब से किया वो ये था कि वे उन्हें क़व्वाली सिखाएं। उस्ताद भी फ़ौरन तैयार! अपने साज़िन्‍दों को जगाया, कमरे में बुलाया और लगे गाने। बाला ने देखा कि रहमान गाने की हर नज़ाकत-नफ़ासत को तमिल में लिखते चले जा रहे हैं। और थोड़ी देर में ही दोनों में ऐसी पटी कि चार बजे दोनों जुगलबंदी करते नज़र आये।

(दीवान मेल ग्रुप पर जारी)

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