प्रभाषजी के विचार मानवताविरोधी हैं
प्रभाष जी, काश आपने यह सब न कहा होता, तो हिंदी प्रेस और पत्रकार जगत का बड़ा उपकार करते। आपका उपरोक्त विवेचन पुराने किस्म के अप्रासंगिक पंडितों की तरह है। विचार, नज़रिया और तथ्य इन तीनों दृष्टियों से आपने ग़लत कहा है। क्या इस साक्षात्कार को प्रभाष जोशी के असली विचार मानें? अथवा तरन्नुम में कहे विचार मानें? मज़े के लिए कहे विचार मानें?
प्रभाष जी आप व्यक्ित की पहचान को जाति, धर्म, कौशल आदि से क्यों जोड़ कर देख रहे हैं? क्या आपको मनुष्य की पहचान दिखाई नहीं देती? देती है तो फिर बोलते समय या लिखते समय उसे भूल क्यों जाते हैं? कठोरतम भाषा में कहूं तो आपके विचार एकसिरे से प्रतिक्रियावादी ही नहीं बल्कि मानवताविरोधी भी हैं। चीज़ों, लोगों को देखने की जो पद्धति आपने अपनायी वह प्रतिगामी है। आपके साक्षात्कार पर मुझे एक चुटकुला याद आ रहा है। हरियाणा के जाट के बारे में। अब तो यह आप पर भी लागू होता है। चुटकुला कुछ इस प्रकार है – एक बार एक जाट से एक व्यक्ित ने पूछा, तू पहले जाट है या आदमी है? जाट बोला जाट हूं।
प्रभाषजी वही दशा आपकी भी हुई है। आपके अंदर का बुद्धिजीवी मनुष्य अचानक ब्राह्मण में बदल जाएगा, यह तो कायाकल्प ही कहा जाएगा। गद्य अच्छा लिखते हैं, अच्छा बोलते हैं, नाम भी है, किंतु इससे कोई महान नहीं बनता, महान बनता है नज़रिये के कारण। आपने जिस नज़रिये की वकालत की है, उसे रेनेसां के बुद्धिजीवी 19वीं सदी में दफन कर चुके हैं। हिंदी में प्रत्येक बूढ़े को अंत में अतीत ही शांति देता है और वह जब अतीत में जाता है तो धुर अतीत में जाकर ही पूर्ण शांति पाता है। काश, हम बूढ़े न होते!
♦ एकलव्य
अब देखते हैं कि उदय प्रकाश और राजेंद्र यादव की तरह प्रभाष जोशी का भी दाना-पानी बंद होता है कि नहीं? उन पर भी ‘कांव कांव’ करते दस्ते टूट पड़ते हैं कि नहीं? उन्हें भी मानसिक रोगी बताया जाता है कि नहीं? उनका भी बहिष्कार होता है की नहीं? उनके ख़िलाफ़ दस्तख़त अभियान चलता है कि नहीं?
वक़्त है असलियतों और औकातों के सामने आने का। षड्यंत्रों के खुलने का।
आइए, सांस रोक देखें प्रगतिशीलों की असलियत।
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ये जो षड्यंत्र की परंपरा है, अपने विरोधियों में उन्हीं के जैसे बन कर घुस जाने और नष्ट कर देने का जो अपन का कौशल है, वह भी धारण करने की अपन की जो क्षमता है, हज़ार साल की अपन की जो ट्रेंनिंग है, उसी से आता है क्या? इतिहास में बहुत चर्चा है इसकी। खासकर बौद्धों, दलितों और नास्तिकों के संदर्भ में। अपन का मन से बनाकर नहीं बोल रहा हूं।
ब्राहमण बाबू तो सिलीकोनिया जा सकते थे, क्योंकि हज़ार साल की ट्रेनिंग थी, साधन थे, दक्षिणा थी, सामाजिक रुतबा था। मगर जो दलित झोंपड़ी और पाखाने तक से भी वंचित है, वो सिलीकोनिया कैसे जाएंगे? ब्राहमण प्रभु तो कुछ भी कर लेता है। दूसरों से कहता है संस्कृत पढ़ो, अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाकर विदेश में फिट कर देता है। कहता है कि अमिताभ बच्चन अय्याश है और खुद एक अय्याश और लगभग सांप्रदायिक बन चुके खेल क्रिकेट पर एक राष्ट्रीय अखबार में अपने लिखे दो-दो, तीन-तीन इश्तिहार लगा देता है। एक मुखपृष्ठ पर, एक अंदर बकसिया में, कभी एक संपादकीय में तो कभी एक उसी के नीचे मुख्य लेख में। दूसरे के अखबार में अइसा रुतबा। अपनी लघुपत्रिका निकाले होते, तो साल में आठ तो क्रिकेट-विशेषांक निकालते होते।
दो पेज होते हैं रविवारी जनसत्ता में। उसमें से एक का लगभग आधा आपके पास है। उसमें कभी-कभार साम्प्रदायिक ताकतों की जो खिंचाई आप करते हैं, अब तो उस पर भी शक होने लगा है। कागद कारे निकाल कर देख लेउ। आधा तो घटना का ब्यौरा देने में निकल जाया करे है। तब कहीं जाकर आया करे है विचार टाइप कोई चीज़। उसमा भी महीना में दुई बार अपन का बेनजी, अपन का माधो, अपन का लड्डू, अपन का ये, वो। ई जूनियर गोयनका बोल दिये हैं क्या गुरुदेव कि महीना का पंद्रह दिवस जनसत्ता अपन के रिश्तेदार और दोस्तन का वास्ते आरक्षित रहेगा। बाकी पंद्रह दिन अपन का लेखकन के वास्ते। पाठक ससुर कोई आता ही नहीं, तो ससुर उसका चिंता काहे करना। स्टाफ के ऊपर सारा शो चल रिया है, चलने दो। हां, बाकी जो डेढ़ पेजवा है, उसमा अपने हजारा साला टिरेनिंग वाला बिरादन का छपवाय का कोसिस करो जियादा से जियादा। कौन भकुआ पूछता है इहां।
देखा नहीं, चार दिन हुआ रविवार मा साक्षात्कारवा छपे, कोई निकल के आ रहा है बोलने को। एक गांधीवादी, अहिंसावादी विद्वान संपादक से कैसा खौफ खाया बैठा है अपना शेर लोग। ई कौन सी ट्रेनिंग से आता है गुरुदेव? हमको भी सिखाइए ना। हमारा तो खुद अपना असली नाम से लिखने का हिम्मत नहीं पड़ रहा। कहीं सहिष्णुतावादी ट्रेनिंग से हमका मार दिया, तो हम तो ससुर ब्लाग लिखने के काबिल भी नहीं बचेगा।
♦ खरी बात
प्रभाष जोशी ब्राह्मणवादी हैं, ये आप लोगों को आज पता चल रहा है? आपके इस भोलेपन के क्या कहने? अस्सी के दशक के अंत में जनसत्ता में जब लगभग 400 संपादकीयकर्मी थे, तो उनमें सिर्फ एक दलित और मुसलमान एक भी नहीं था। ये संयोग था या साज़िश। प्रभाष जोशी के नायकों को देखें – विष्णु चिंचालकर, कुमार गंधर्व, तेंडुलकर, नरसिंह राव, अनुपम मिश्र, राहुल बारपुते… इन्हीं सब की तारीफ में तो वो कागद कारे करते हैं। पूरी लिस्ट पढ़ जाइए। प्रभाष जोशी के चेले बताएं कि उनके कितने हीरो अब्राह्मण, अवर्ण, मुसलमान और महिलाएं हैं? प्रभाष जोशी नाम की प्रतिमा अगर कुछ लोगों ने अपने मन में बसा रखी थी, तो उसके खंडन-विखंडन का समय आ गया है।
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“क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है। क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है। तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं। यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं। सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते। ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते हैं, कौशल रखते हैं। इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ। आईटी में वो इतने सफल हुए।”
मेरा ब्राह्मण चपरासी भी रोज ब्रह्म से संवाद करता है और चाय भी अच्छी बनाता है। अयथार्थ को यथार्थ करने की एक दिन भी कोशिश की, तो उसकी नौकरी चली जाएगी। जय हो जोशी जी महाराज। आप बिना शक पुरोहित श्रेणी के निम्न ब्राह्मण हैं। लंबी धोती वाले आप हो नहीं सकते (इंदौर वालो इसकी पुष्टि करो)। श्रेष्ठ ब्राह्मण खुलकर इस तरह का बड़बोलापन नहीं दिखाता। चुपचाप मतलब की कर जाता है।
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एक रहिन प्रभाष जोशी और एक रहिन जनसत्ता। जोशी जी ने देश के चार कोने में खोले चार एडिशन। मानों शंकराचार्य के चार मठ। चारों की कमान ब्राह्मणों के हाथ। पहले बंद हुआ एक। फिर बंद हुआ दूजा। फिर तीजे की बारी आई लेकिन तब तक प्रभाष जी का राजपाट छिन गया था। तीसरे एडिशन की कमान एक अब्राह्मण के हाथ गयी और वो एडिशन अब भी चल रहा है। और चौथा तो हेडक्वार्टर है। उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार से पैरवी करके इंडियन एक्सप्रेस को नोएडा फिल्म सिटी में जमीन दिलाने वाला खेल क्या है, कोई बताएगा।
♦ प्रेमरंजन
प्रभाष जोशी को मूर्ति के रूप में प्रतिष्ठापित करने के अपराधी हम हैं। प्रभाष जोशी ने कुछ भी नया नहीं किया है। वे जन्मना, कर्मणा सब स्तर पर ब्राह्मण रहे हैं। जो बातें उन्होंने कही हैं, वह एक ऐसा व्यक्ति कह ही नहीं सकता, जो कहीं से खुद को इंसान समझता हो। प्रभाष जोशी ब्राह्मण हैं और इस नाते ही उन्होंने ये बातें कही हैं। उनकी इस घृणा को उनकी सच्चाई के रूप में स्वीकार कीजिए। और यह भी स्वीकार कीजिए कि अब तक की उनकी तथाकथित सांप्रदायिकता विरोध, तथाकथित जनपक्षधरता, तथाकथित आंदोलन या किसी भी बेईमानी के प्रच्छन्न विरोध के पीछे कौन-सी साज़िश रही होगी?











प्रभाष जोशी का ये लेखन अश्लील है। हस्ताक्षर अभियान चलाने वाली मंडली को सक्रिय हो जाना चाहिए। मंगलेश डबरालों, वीरेन डंगवालों, एक्स पांडे, वाई चुतर्वेदी, जेड मिश्रा। सभी आओ। इस जातिवादी फासीवाद के खिलाफ अपनी प्रगतिशीलता साबित करो।
बड़ी तकलीफ हुई, पढ़कर। कल ही देखा था ब्लागवाणी में नंबर-1 था वो पोस्ट जो प्रभाष जोशी के बारे में था। आखिर हो भी क्यों न, जिस व्यक्ति को हम पत्रकारिता का शीर्ष पुरुष मानते थे वो ऐसा कैसे हो सकता है। अब बचपन में सुनी उन बातों पर यकीनं करने को मन करता है कि प्रभाषजी तब से सेक्यूलर हो गए थे जब बीजेपी ने उन्हे राज्यसभा में भेजने से साफ मना कर दिया। उनके कितने जूनियर और चेले राज्यसभा में घुस गए थे-हाल ही में संभवत आलोक तोमर ने कहीं लिखा था उनके कितने ही शिष्यगण राज्यसभा में है-प्रभाषजी तो जब चाहते तब चले जाते। लेकिन लगता है कि नहीं, ये बूढ़े सरदार की बेबसी है जो पद न पाने की कुंठा में उससे अनाप सनाप बुलबा रहा है।
कहीं मैने पढ़ा था कि प्रभाष जोशी जवानी में किसी गांव में पढाते भी थे। हाल ही में जब उन्होने लोकसभा चुनावों के दौरान पैसा लेकर खबर छापने का विरोध किया था तो हमें खुशी हुई थी। प्रभाषजी से पहली मुलाकात आईआईएमसी में हुई थी जब वो व्याखान देने आए थे। क्या हिंदी क्या इंग्लिश और क्या विज्ञापन विभाग, सारे के बच्चे उन्हे सुनने के लिए आए थे। प्रभाषजी, हमारे लिए एक स्तंभ थे जिन्हे अपने से कुछ ही दूरी पर पाकर हम खुश हो रहे थे। मुझे याद है, प्रभाषजी ने जाते वक्त मेरे कंधे पर हाथ रखा था-लगा कि ये बापू का हाथ है। उन्होने बताया था कि किस चैनल में काम करना चाहते हो-मैने कहा था एनडीटीवी। प्रभाषजी ने कहा कि उनकी बेटी भी एनडीटीवी में काम करती है।
लेकिन वो देवमूर्ति एक झटके में टूट गई। तो क्या वाकई बाबा ने हमें छला लिया-अभी भी यकीन नहीं हो रहा।
भीष्म अच्चे पत्रकार होने के गुर सिखा रहे थे .देश भर में इन्हीं की धूम मची थी . आज अचानक एक साक्षात्कार ने इन्हें क्या से क्या बना दिया ? लोग तुम-ताम पर उतर ए हैं . आज कल ग्रहदशा कुछ ठीक नहीं चाल रही है . लोगों की गाडी पटरी पर से utarti हुई dikh रही है . लेकिन प्रभाष joshi के पिछले लेखन कर्म में कहीं भी पारदर्शिता का अभाव नहीं रहा है और मेरे अनुसार तो वो यहाँ भी पारदर्शी हैं . परन्तु कुछ लोगों को आभासी प्रतिबिम्बों को देख-देख कर जीने की आदत होती है . ऐसे लोगों को जोशी कुछ और नज़र आते हैं . वैसे वामपंथियों के लिए दुखी होकर चिल्लाने के अलावा एक खुश खबरी भी है . जसवंत सिंह भी अचानक पाला बदल कर सेकुलर होने की राह पर चाल पड़े और आखिरकार उन्हें शहादत देते हुए भाजपा की सदस्यता गंवानी पड़ गयी . तो भाई लोग खम्भा नोचना छोड़ कर थोडा खुश हो लो क्योंकि अपने सुख से ज्यादा इंसान को दूसरों के दुःख से प्रसन्नता होती है .
हाँ भैया, ये budhau log ज्यादा खतरनाक हैं. क्योंकि ये प्रगतिसिलिया-धोती पहने हैं. कल टी वी पर जसवंत सिंह के साथ अपने हाथ में जिन्ना वाली किताब लिए नामवर सिंह को देखकर आखें चोंधिया गयी… पर बात यहाँ सिंह की थी … जात-बिरादरी से नामवर थोड़े बहार हैं… कि जोशी.. कि यादव….कि कायथ
यही प्रभाष जोशी हैं जिन्होंने एन.डी.टी.वी. इण्डिया के ‘हम लोग’ कार्यक्रम में सुनीता जैन (मधुर भंडारकर-प्रसंग) के यह कहने पर कि ‘‘मेरा शरीर है, मैं चाहे जैसे कपड़े पहनूं’’ कहा था कि ‘‘तो फिर मुझे भी छूट है कि मैं आपके साथ जो चाहे करुं।‘‘
ऐसी कुत्सित सोचवाली बात किसी दलित-पिछड़े या उनके हमदर्द संपादक ने कही होती तो सोचिए कैसा हंगामा मच जाता। मगर देवता का क्या, जो न कहें थोड़ा है। भक्त-भक्तिनें ताका-निहारा करते हैं मंत्रमुग्ध भाव से। ताको। ताको। स्त्री विषयों पर ब्लाग चलाने और विशेषांक निकालने वालो भी ताको।
प्रभाष जी, जैसा कि आपने इंटरव्यू में कहा कि विनोबा के आंदोलन में शामिल न होते तो टेस्ट क्रिकेट खेलते। लेकिन अपने बेटे को प्रमोट करने के लिए तो हर सीमा लांघ दी थी आपने। क्रिकेट पर कागद कारे करना आपका क्रिकेट प्रेम था या पुत्र प्रेम इसकी मीमांसा होनी चाहिए। आपके बेटे में “ब्राह्मणों में जन्मजात पाई जाने वाली धारण क्षमता” का अभाव क्यों था। वो क्यों आगे नहीं बढ़ पाया? इंटरनेट के मुक्त युग में आपने ये इंटरव्यू देकर अपने साथ क्या कर लिया प्रभाष जी। वरना तो सारी बातें दबी-ढकी रह जाती और आप महान बने रह पाते। अब तो पता नहीं क्या क्या राज खुलेंगे।
यह धारण-वारण कुछ नहीं जोशी साहब। यह खुल्ली समझौतापरस्ती है, मौकापरस्ती है। सुबह ‘सर झुक गया है’ और शाम ‘मुसलमान कहीं भी मिल-जुलकर नहीं रहते’ कहने वाली अटलवाणी की पलटबयानी को धारण शक्ति कहने से पहले कुछ तो सोचिए। सीधे-शर्मीले, श्री फीरोज़ गांधी के सुपुत्र, राजीव गांधी को ब्राहमण कहने से पहले भी थोड़ा सोचिए। अगर धारणशक्ति यही होती है तो वो तो आपके दो अन्य नजदीकियों चंद्रशेखर और देवीलाल में भी थी। अब आप मान ही रहे हैं कि मौकापरस्ती और समझौतापरस्ती ही वास्तविक राजनीति है तो छोड़िए न उन अखबार वालों को जिनके पीछे आप आजकल हाथ धोकर पड़े हैं। उन्होंने कुछ अलग थोड़े कर दिया है। धारण क्षमता ही तो दिखाई है।
मैं तो यही नहीं समझ पा रहा हूं कि संसद में नोट फेंके जाने की घटना पर आप इतना बिफर क्यों गए थे ! वो भी तो धारण-क्षमता का ही एक आयाम था। और अब उसी कांग्रेस में एकाएक ऐसे कौन नैतिक फूल उग आए हैं कि आपको सुगंध ही सुगंध आ रही है ?
भाई लोग, आप सब माने या ना माने परन्तु इस सत्य को आप अब स्वीकार करे की प्रभात जोशी नाम के वह महान पत्रकार-संपादक-चिंतक अब पूरी तरह से सठिया गए है।
पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर आजकल उनका उजूल-फिजूल लिखना, कभी किसी अखबार और उनके मालिकों को टारगेट कर आलोचना करना, कभी झारखंड के एक अखबार के बारे में कसीदे लिखना और अब अपने मनुवादी भद्दे चेहरे को सबके सामने पेश कर चर्चा में बने रहना इनके सठियेपन की निशानी नहीं है तो क्या है।
सतीप्रथा का समर्थन करना, अपने समकालीन समय से विद्रोह करना है. यह विशुद्ध भावुकता में उठाया गया कदम है. इसे रोकना भी मुश्किल है लेकिन इस कदम का महिमा मंडन करने की भावुकता में समझदार किस्म के रूप में पहचाने जाने वाले लोग तो न पड़े. प्रभास जोशी जैसे पत्रकार ऐसी चूक करते है तो आश्चर्य होता है. जवानी तो विद्रोही तेवरों के साथ कट गयी, मगर अब बुढापे में ये क्या कर रहे है पंडित जी ?
ए कहा समझते हो ! जोशी जी कोई उदयप्रकाश हैं कि यहां दलित चैरे में सफाई देने और माफी मांगने आएंगे। ए हटो। छूना मत। चलो-चलो, भागो यहां से। बग।
यह इंटरव्यू कई दिशाओं में गया है. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जिस जगह जोशी जी को धरा है वहां जोशी जी सही नहीं हैं. कोई भी परंपरा सती जैसी अमानवीय प्रथा का समर्थन नहीं कर सकती. यह सही है कि हम अपनी परंपरा की रक्षा करें, लेकिन अपनी परंपरा के नाम पर जाति व्यवस्था, सती प्रथा, बहुविवाह का समर्थन तो नहीं किया जा सकता. जोशी जी से निवेदन है कि वे इस तरह के विषयों पर लिखते-बोलते समय इस बात का ध्यान रखें कि उनकी बातों में इस तरह के विचारों को समर्थन न मिले जो किसी भी तरह से जातिवादी और विभेदकारी शक्तियों के लिए रसद जुटाए. इस सती प्रसंग में उनकी फजीहत पहले भी हो चुकी है. अब उसे दुहराया न जाए.
इंटरव्यू का बाकी हिस्सा अच्छा है.
Dr Jameer Ahasan का एक sher
कितनी aasani से mashoor किया है खुद को,
Hamney apney से badey लोगों को gaali दी है.
..
लगे raho भाई लोग.
मुझे नहीं लगता कि यहां चल रही बहस से प्रभाष जी को कोई फर्क पड़ने वाला है। अच्छा है। कमेंट लिखिए। पढ़िए और मजे लीजिए।
प्रभाष जोशी जी
…….जातीवादी श्रेष्टता रूपी महामुर्खता पर इतना लिखा गया है उसमे से कुछ तो पढना चाहिए था….
…. क्यूंकि ये मामला एक साक्षात्कार का है इसलिए इनके पास कई चोर रास्ते होंगे…. प्रभाष जोशी में चार आना भी साहस है तो वो अपने इस ब्रह्म ज्ञान पर केंदित “कागद कारा” करके दिखायें….
…..मुझे विश्वास है जवाब का प्रिंट आउट उनके चाहने वाले खुद उनके घर पहुचा देंगें…….ज़रा हम भी तो देखें की “ब्रह्म का दम” !!
जे तूं बांभन बभनी का जाया।
आन द्वार काहे नहीं आया ।।
dear brethren,
i have asked many such type of question to you around 1500 years ago but you damn lazy hypocrite people have not replied yet. do reply as soon as possible.
here are some panda who have forcefully encroached alot of space in SVARG inspite of the originally being the resident of NARAK. let me tell you they have not left their habit of illegal encrochement pursued by them on the earth. these people told me that still their kins are spreading ugly casteism on the earth. if this true then plz gift all those stupid hollow minded a KABIR GRANTHAVALI…
sorry for promoting my own writing, but what you people say in hindi…इसी का जमाना है ??
dont forget to give answer of my such age old questions !!
i m eagerly waiting……
c u soon guys,
bba bi…
प्रभाष जी के साक्षात्कार के अंश छापकर जो तीखी प्रतिक्रिया आई है उसे थोड़ा और गंभीर दायरों में ले जाने की जरूरत है। प्रभाष जोशी के विचार एक व्यक्ति के विचार के साथ समाज में अनेक लोगों में भी मिलते हैं, इस समस्या को हम एक फिनोमिना के रूप में देखें और सती और जातिवाद के फिनोमिना को थोड़ा व्यापक फलक पर रखकर देखें तो ज्यादा सार्थक इस्तक्षेप कर पाएंगे।
जातिवाद कैंसर है। कैंसर की प्रशंसा नहीं की जाती उससे मुक्ति का मार्ग खोजा जाता है, वरना वह जीवन से मुक्त कर देता है। आप लोग प्रभाषजी पर व्यक्तिगत हमले करेंगे और उनकी निजी जिंदगी की भूलों का पुलिंदा दिखाने की कोशिश करेंगे तो मामला फिर हाथ से निकल जाएगा।
हिन्दी में कहावत है ‘चोर को न मारो चोर की अम्मा को मारो’, हमें प्रभाषजी के विचारों की अम्मा को मारना होगा जहां से ऐसे विचार अभी भी आ रहे हैं, हमें उन वैचारिक, दार्शनिक,सामाजिक और आर्थिक स्रोतों,उन विचारधारात्मक आधारों को खोलना होगा जहां से सती,जातिप्रथा आदि के समर्थन की बात कही जा रही है।
इटली के प्रसिद्ध मार्क्सवादी अन्तोनियो ग्राम्शी का कहना था युद्ध के मैदान में शत्रु के कमजोर ठिकाने पर हमला करो और विचारधारात्मक युद्ध में शत्रु के मजबूत किले पर हमला करो। प्रभाष जोशी का मजबूत विचारधारात्मक किला है है ‘आब्शेसन’।
हमें रहस्य खोलना चाहिए कि आखिरकार जातिप्रथा,सती प्रथा,स्त्री विरोधी रूझान आते कहां से हैं ? वे किस तरह के वातावरण में फलते फूलते हैं ? प्रभाषजी से भी अपील है वे इस बहस में उठे सवालों पर किनाराकशी न करें। मीडिया का लेखक जबावदेही और सामाजिक जिम्मेदारी से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता।
प्रभाष जोशी का सती प्रथा का महिमामंडन और उसे परंपरा कहना मूलत: इन दिनों व्यापक स्तर पर पनप रही स्त्री विरोधी मानसिकता और स्त्री को एक बेजान इंसान समझने वाली विचारधारा की देन है। देखिए यह संभव नहीं है आप सचिन का समर्थन करें,क्रिकेट का समर्थन करें और विज्ञापन संस्कृति पर कुछ न बोलें। अपना सचिन महान है,लाजबाव है,लेकिन अंतत: है तो विज्ञापन संस्कृति का खिलौना,सचिन के लिए खेल ही सब कुछ है बाजार के लिए सचिन का ब्रॉण्ड ही सब कुछ है,सचिन को ब्रॉण्ड बनाने में कई फायदे हैं,क्रिकेट चंगा,वर्चस्वशाली जातियां और विचारधारा भी खुश। साथ ही प्रभाष जोशी जैसे दिग्गज भी मस्त।
अब हम क्रिकेट नहीं देखते,बल्कि उसका उपभोग करते हैं, क्रिकेट देखते तो मैदान में जाते टिकट खरीदते, मुहल्ले में मैदान बनाने के लिए संघर्ष करते,स्कूल,कॉलेजों में टीम बनवाने के लिए प्रयास करते,खेल का मैदान बनाने की जद्दोजहद करते लकिन यह सब करते नहीं हैं। सिर्फ टीवी पर क्रिकेट देखते हैं। यही हमारा खेल ‘प्रेम’ है।
इसी तरह प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार की सारी चिन्ताएं मायावती,लालूयादव,मुलायमसिंह, दिग्विजय सिंह आदि के इर्दगिर्द घूमती हैं ,थोडा जोर लगाया तो साम्प्रदायिकता,धर्मनिरपेक्षता,आतंकवाद आदि पर जमकर बरस पड़े। दोस्तो ये सारे एजेण्डा जनता के नहीं वर्चस्वशाली ताकतों के हैं, हमें लेखक के नाते अंतर करना होगा हमारी जनता का एजेण्डा क्या है ? सवाल किया जाना चाहिए प्रभाष जोशी ने जनता के एजेण्डे पर कितना लिखा और सरकारी एजेण्डे पर कितना लिखा ?
प्रभाष जोशी के लेखन की विशेषता है ‘आब्शेसन’, ‘आब्शेसन’ शासकीय विचारधारा का ईंधन है। प्रभाष जोशी कुछ विषयों के प्रति अपने ‘आब्शेसन’ को छिपाते ही नहीं बल्कि महिमामंडित करते हैं, उनके लेखन के ‘आब्शेसन’ हैं क्रिकेट,साम्प्रदायिकता,धर्मनिरपेक्षता,कांग्रेस ,आरएसएस आदि।
लेखन में ‘आब्शेसन’ वर्चस्वशाली ताकतों का कलमघिस्सु बनाता है,रूढिवादी बनाता है। लकीर का फकीर बनाता है। ‘आबशेसन’ में आकर जब लेखन किया जाएगा तो वह छदम गतिविधि कहलाता है।इसे परिवर्तनकामी लेखन अथवा परिवर्तनकामी पत्रकारिता समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
लेखन में सत्य गतिविधि का जन्म तब होता है जब आप शासकवर्गों के एजेण्डे के बाहर आकर वैकल्पिक एजेण्डा बनाते हैं,वैकल्पिक एजेण्डे पर लिखते हैं।
भूमंडलीकरण, समलैंगिकता ,अपराधीकरण,साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार,ओबीसी आरक्षण,अयोध्या में राममंदिर आदि शासकवर्ग का एजेण्डा हैं, इन्हें जनता का एजेण्डा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए, हमारे प्रभाषजी की कलम की सारी स्याही इसी शासकीय एजेण्डे पर खर्च हुई है। उन्होंने विकल्प के एजेण्डे पर न्यूनतम लिखा है।
‘आब्शेसन’ में लिखे को पढने में मजा आता है और वह चटपटा भी होता है,उसकी भाषा हमेशा पैनी होती है, और ये सभी तत्व संयोग से प्रभाष जोशी के यहां भी हैं,’आब्शेसन’ में लिखा लेख अपील करता है और आपका तर्क छीन लेता है,आलोचनात्मक बुद्धि छीन लेता है।
‘आबशेसन’ में लिखे को जब एकबार पढना शुरू करते हैं तो धीरे धीरे लत लग जाती है और यही ‘लत’ प्रभाष जोशी के पाठकों को भी लगी हुई है,वे हमेशा मुग्धभाव से उन्हें पढते हैं और जरूर पढते हैं, वे नहीं जानते कि आब्शेसन में लिखे विचार इल्लत होते हैं।
‘आब्शेसन’ में लिखे को पढकर आप सोचना और बोलना बंद करके अनुकरण करने लगते हैं, हॉं में हॉ मिलाना शुरू कर देते हैं,वाह वाह करने लगते हैं, बुद्धि खर्च करना बंद कर देते हैं,इस तरह आप दरबारी भी बना लेते हैं, आज की भाषा में कहें तो प्रशंसक भी बना लेते हैं।
‘आबशेसन’ में लिखने के कारण अपना लिखा सत्य नजर आने लगता है, आपकी बातें ‘वास्तविक’ एजेण्डा नजर आने लगती हैं, हकीकत में ऐसा होता नहीं है, हकीकत में ‘आब्शेसन’ में लिखने के कारण प्रभाष जोशी कोल्हू के बैल की तरह एक ही विचार और भाव के इर्दगिर्द चक्कर लगाते रहे हैं, यही ‘आब्शेसन’ का दार्शनिक खेल है। इस परिपेक्ष्य में देखें तो प्रभाष जोशी का सती प्रेम ‘आब्शेसन’ है,नकली वैचारिक गतिविधि है, इस गतिविधि का हिन्दी भाषी यथार्थ और हिन्दुस्तान के यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है।
जैसा कि किन्हीं मिमी बैनर्जी ने लिखा है कि प्रभाषजी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला, पता नहीं उन्होंने व्यंग्य में लिखा है या गर्व में, पर एक ख़तरनाक प्रवृत्ति की तरफ इशारा है। बिलकुल इसी तरह तरह के ‘वक्तव्य‘ भाई लोगों, दादा लोगों या माफियाओं की तरफ से भी सुनने को मिला करते हैं। बहरहाल जितना मैं प्रभाषजी को, दूर से ही सही, जानता हूं वे जवाब ज़रुर देंगे। क्यों कि एकलव्य, शंबूक, रामकिशन धाकड़, नयी सती, जगदीश्वर चतुर्वेदी, रंगनाथ, कबीरदास, सुशांत झा आदि ने जो प्रश्न उठाएं हैं (भाषा किसी-किसी की हल्की या चटपटी हो सकती है) , अत्यंत गंभीर हैं और साक्षात्कार के संदर्भों से बाहर बिलकुल भी नहीं हैं। यह ठीक है कि वहां उन्होंने अच्छी और प्रामाणिक बातें भी कही हैं मगर उनकी तारीफ़ तो हम हमेशा से ही और काफी मात्रा में करते आए हैं। मैं खुद इस बात को जानने के लिए मरा जा रहा हूं कि वो मूल वजुहात क्या हैं कि उदयप्रकाशजी और राजेंद्र यादवजी को तो बार-बार माफी मांगनी पड़ती है और उनके व्यक्तिगत पर विशेषांक तक निकल जाते हैं मगर प्रभाषजी और अशोकजी सस्ते में छूट जाते हैं !?
सवालों उठाने वालों में मैं ‘खरी बात‘ का नाम जोड़ना भूल गया। उनके दिए सवाल और तथ्य भी महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा अविनाश जी के जुझारुपन, साहस और बौद्धिक कौशल की तारीफ करने का भी मन होता है। एक नितांत नए माध्यम के साथ उन्होंने पत्रकारिता को एक बिलकुल अलग शक्ल दे दी है। जबकि उनके पीछे न तो कोई व्यवसायिक घराना है, न कोई सामाजिक नेटवर्क। और कम्प्यूटर और इंटरनेट की पहुंच भी फिलहाल अत्यंत सीमित है। अशोक पाण्डेय और विनीत जैसे अपने साहसी मित्रों की मोहल्ला में कल से अनुपस्थिति के बारे में अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा हूं।
इतना ज़रुर है कि मोहल्ला की भाषा में कभी-कभार हल्कापन आ जाता है। हांलाकि इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि बेबस, मजबूर और विक्षिप्तता की हदों के पार पहुंचा दिए गए व्यक्तियों या समूहों की धारण-क्षमता इतनी नहीं होती और अंततः उसके पास चिल्लाने के अलावा चारा नहीं रह जाता। फिर भी हम सब चाहें तो मिलकर ऐसी समस्याओं से छुटकारा पा सकते हैं।
जगदीश्वर जी की टिप्पणी पूरे प्रसंग को सैद्धांतिक आधार देती है. किसी का वह लिखा हुआ भी हमारे लिए अप्रश्नेय क्यों हो जाता है, जिससे खुद हमारी अस्मिता खंडित और अपमानित होती है?
एक बड़ा सवाल है कि क्या प्रभाष जोशी अपने कागद-कारे में इस प्रसंग पर कुछ लिखेंगे?
रविवार.कॉम पर यह लम्बा साक्षात्कार ३ बार पढ़ा. एक तो यकीन नहीं हो रहा था, दूसरा विचारों को किस संदर्भ में रखा गया है और उसके आगे पीछे क्या लिखा गया है – अपनी समझ से यह जानने की कोशिश कर रहा था. कहीं से भी और किसी भी तरह से यह विचार आज के दौर के विचार नहीं लग रहे थे. और अगर यह विचार आज के दौर में पत्रकारिता के महान स्तम्भ कहे जाने वाले प्रभाष जोशी जी के हो तो आर्श्चय को ठिकाना मिलना मुश्किल ही है. उनके विचारों से जाहिर होता था- उनके रूह रूह से अपनी जाति का अभिमान फूटा जा रहा है. आखिरी में मानने के सिवाय कोई चारा नहीं रहा कि यह आज के समय का एक भयानक हादसा है, इसे होना ही था. आखिर कब तक बारूद को अपने में रखा जा सकता था, एक दिन तो फटना ही था, अच्छा हुआ फट गया, प्रभात जी भी हल्के हो गए. सब बाहर आ गया और देर से सही बहुत से लोगों को असलियत की खबर लगी. हालांकि एक तबका पहले से ही खबरदार था, हम तो जैसा उन्हें दिखाते रहे या वह खुद दिखते रहे, देखते रहे. असल में नायक बनाने का हमारा रिवाज बहुत पुराना भी है, ठीक भी नहीं है. देखा जाए तो जब हम किसी के विचारों से जुड़ते है तो कहीं न कहीं हमारे दिल भी उससे जुड़ते ही है. आज जब विचार टूटे हैं, दिल भी टूटने थे. वह जितने बड़े कहलाते है उनके विचार समाज के उतने बड़े हिस्से को अपने बुरे असर में ले सकते हैं इसलिए विरोध यहां जरूरी है. उनके विचार इतने साफ साफ है कि उनसे किसी जबाव की उम्मीद भी सूख चुकी है.
ravivar.कॉम पर आये २ कमेंट्स की भाषा और आरोप देखिये ज़रा –
Ashutosh Noida, UP
सुनंदा जी, आपकी राय बिल्कुल सही है. दिल्ली में कथित प्रगतिशीलों का एक गिरोह है, जिसमें बलात्कारी, छेड़खानी करने वाले और चोरी करने वाले लोग भी शामिल हैं. ये लोग इसी तरह कौव्वा कान ले गया की तर्ज पर आधी-अधूरी चीजों को पेश करके हंगामा खड़ा करते रहते हैं और फिर दारू पी कर उसका जश्न मनाते हैं. उदय प्रकाश पर, चरणदास चोर पर, फिर आलोक मेहता पर अब प्रभाष जोशी पर ये गिरोह पड़ा हुआ है. इनमें हिम्मत है तो प्रभाश जोशी की बातों का सिलसिलेवार जवाब क्यों नहीं देते ?
Sunanda Singh रांची, झारखंड
आज सुबह से कई ब्लागों पर प्रभाष जी का यह इंटरव्यू टुकड़े-टुकड़े में पढने को मिला और मैं सोचती रह गई कि क्या सच में प्रभाष जोशी ने ऐसा कुछ कहा है.
अभी जब रविवार पर पूरा इंटरव्यू पढ़ गई हूं तो सोच रही हूं कि कुछ लोग अपने छुद्र स्वार्थ के लिए और अपने ब्लाग की हिट्स बढ़ाने के लिए संदर्भों से काट कर बकवास कर रहे हैं. यह बेशर्मी है, पत्रकारिता के नाम पर नीचता है. जो कुछ प्रभाष जोशी ने कहा है, उस पर तो बात करो. केवल उन्हें गरियाने के लिए…..शर्म आनी चाहिए.
सुनंदा सिंह और आशुतोष नोयडा पर दया कीजिए…
जितने लोग कमेन्ट लिख रहे है. प्रभाष जी के खिलाफ काउंटर लगाने की परंपरा पुराणी है. कभी ये काउंटर पंकज बिष्ट लगाया करते थे. अब कई चिल्लारों के अपनी अपनी खोखे लगाये है. ये सब एस इंतज़ार में है की प्रभाष जी लिखे और ये जीवन भर उसे बेच कर खाएं की मेरी बात पे उन्होने ये लिखा. साहेब, ये मोरल पोलिसिंग से इतनी दुर्गन्ध आएगी की सिर्फ बीमार लोग ही एस तरह की बहस में बचेंगे.
खोखानंदनजी होगा कोई तो होगा , ये प्रभाषजी को मेरी हमारी बात पर नही, अपनी कही बात पर लिखना है। मुर्दों पर बैठकर खीर खाने वालों से कोई कमाई करने की उम्मीद करेगा तो कोई ज्यादा ही गिरावाला होगा, ढंग का तो ऐसा सोच ना सकता मेरे भाई।
सुनंदा सिंह जी,
आपने सही सवाल उठाया है कम से कम प्रभाष जोशी ने जो लिखा है,उस पर बातें करो,मैं कहना चाहता हूं कि ब्लाग लिखने वाले पढ़ लेते हैं और पढकर ही लिखते हैं। आप यह क्यों मानकर चल रही हैं कि बगैर पढे लिखा जा रहा है। वेब के पाठकों पर हमें भरोसा रखना होगा,रही बात प्रभाष जी के लिखे की तो वह इतना बुरा है कि पढकर और उनके मर्दवादी कुतर्क देखकर शर्म आती है । गंभीरता से सोच रहा हूं कि इतना बड़ा पत्रकार इतनी बड़ी मूर्खतापूर्ण बातें क्यों लिख रहा है ? यदि प्रभाषजी अमेरिकी पत्रकार होते और इसी भाव से वहां पर ब्लाग या प्रेस में लिखते तो कोई उन्हें छापता तक नहीं। उनके ज्ञान की कुछ झलकियां देखें तो शायद मन ‘गदगद’ हो जाए,
प्रभाष जोशी ने लिखा है ”जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता। दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है। क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अवव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है। क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है। तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारिरिक रूप में नहीं खड़ी है, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं। यानी चीजों को इमेजीन करके काम करते हैं। सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते। ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कूव्वत रखते है, कौशल रखते हैं। इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ। आईटी में वो इतने सफल हुए।”
अब गंभीरता से इस मूर्खता पर विचार कीजिए कि दक्षिण भारत में सिलीकॉन वैली इसलिए नहीं बना क्योंकि दक्षिण भारत में आरक्षण था। गोया आरक्षण न होता तो कम्प्यूटर की दुनिया में हमने छलांग लगा दी होती, प्रभाषजी जानते ही नहीं हैं कि भारत सरकार की तरफ से विज्ञान और खासकर सूचना तकनीकी से संबंधित बुनियादी शोध पर आज भी एक फूटी कौड़ी खर्च नहीं की जाती।
सूचना तकनीक के किसी भी बुनियादी अनुसंधान के क्षेत्र में भारत से लेकर अमेरिका तक किसी भी ब्राह्मण का कोई पेटेंट नहीं है। आज तक किसी भी भारतीय को सूचना तकनीक के किसी भी बुनियादी अनुसंधान का मुखिया पद अमेरिकी की सिलीकॉन बैली में नहीं दिया गया है, सिलीकॉन बैली में बुनियादी अनुसंधान में आज भी गोरों और अमेरिकी मूल के गोरों का पेटेण्ट है। आज इस संबंध में सारे आंकड़े आसानी से वेब पर उपलब्ध हैं, प्रभाष जी को चुनौती है कि वे ऐसे पांच ब्राह्मणों के नाम बताएं जिन्होने सूचना तकनीक के क्षेत्र में बुनियादी अनुसंधान का काम किया हो, वे पता करें कि भारत के आईआईटी में कहां सूचना तंत्र से जुड़ी समस्याओं पर बुनियादी अनुसंधान हो रहा है ?
एक और दिलचस्प बात बताऊं, हम जिस यूनीकोड मंगल हिन्दी फाण्ट में काम कर रहे हैं, उसका निर्माण भी किसी ब्राह्मण ने नहीं माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के गोरे वैज्ञानिकों ने किया है,इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें 11 हजार करोड़ रूपये दिए,काश यह काम कोई ब्राह्मण भारत में कर देता, आईआईटी वाले कर देते ? प्रभाष जी जानते ही नहीं हैं कि दुनिया ‘धारण’ करने वाले ब्राह्मण नहीं गोरे जाति के लोग हैं,दूसरी बात यह कि कितने ब्राह्मण हैं जो सिलिकॉन बैली में हैं ?
प्रभाष जी कहीं से जल्दी से आंकड़ा दें और उसका स्रोत बताएं वरना जाकर देखें कि हैदराबाद और बैंगलौर में सूचना कंपनियों में काम करने वाले ब्राह्मण क्या काम कर रहे हैं, सबसे बड़ा ब्राह्मण तो सत्यम कंपनी का मालिक था ,कहने की जरूरत नहीं है कितना ईमानदार और देशभक्त था ?
भारत की सूचना कंपनियां क्या काम कर रही हैं ,कम से कम वे सूचना के क्षेत्र में बुनियादी शोध का काम तो नहीं कर रही हैं। हमें शर्म भी नहीं आती कि अरबों डालर कमाने वाला भारत का सूचनाउद्योग सूचना के क्षेत्र में बुनियादी शोध पर फूटी कौड़ी खर्च नहीं कर रहा,वे आउटसोर्सिंग कर रहे हैं,बुनियादी रिसर्च नहीं।जबकि यह सच है भारत के सूचना उद्योग में सवर्णों की संख्या ज्यादा है।
प्रभाष जोशी ने लिखा है ” मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे हैं। अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा। क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्र, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है। वो कुछ करके दिखा देने का है। जिताने के लिए आप को ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धारण शक्ति वाला।”
प्रभाषजी से सवाल किया जाना चाहिए कि उनकी ब्राह्मण मंत्रमाला इतनी छोटी क्यों है जिसमें 11 ब्राह्मण खिलाड़ियों की विश्व टीम तक नहीं बन पा रही है, हम एक प्रस्ताव देते हैं कि प्रत्येक राज्यऔर भारत के लिए कम से कम 11-11 ब्राह्मण खिलाड़ियों के नाम क्रिकेट टीम के रूप में प्रभाषजी घोषित करें,इसके बाद महिला टीम के लिए भी इतनी ही महिला ब्राह्मणियों के नाम सुझाएं, ज्यादा नहीं ऐसी टीमें वे फुटबाल और हॉकी के लिए कम से कम सुझाएं और यह भी बताएं कि आखिरकार कितने ब्राह्मण खिलाडी अब तक अर्जुन पुरस्कार ले चुके हैं, खेल रत्न ले चुके है, ओलम्पिक और एशियाई खेलों में कितने ब्राह्मण बटुक पदक प्राप्त कर चुके हैं। थोड़ा दूर जाएं तो मामला एकदम गडबडा जाएगा प्रभाषजी का। वेस्ट इंडीज,दक्षिण अफ्रीका का क्या करें वहां कोई ब्राह्मण नहीं इसके बावजूद लंबे समय से वेस्टइंडीज की टीम शानदार खेलती रही है, काश वेस्टइंडीज वाले ब्राह्मण होते और वहां भी जातिप्रथा होती तो कितना अच्छा होता। प्रभाषजी को ब्राह्मणों का जयगान करने में सहूलियत होती।
प्रभाष जी ने लिखा है “अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है। अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में। अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन हैं? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण। क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है। बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा।”
प्रभाषजी राजनीति की इतनी घटिया तुलनाएं हिन्दी पत्रकारिता में खूब बिकती हैं, राजनीति और राजनीति विज्ञान में नहीं। यह पत्रकारिता नहीं सस्ती चाटुकारिता है। राजनीति की विकृत प्रस्तुति है।प्रेस या मीडिया की भाषा में ‘डिस -इनफॉरर्मेशन’ है। दूसरी बात यह कि राजनीति का इतना सतही और विकृत तुलनात्मक रूप सिर्फ हिन्दी का ही कोई चुका हुआ पत्रकार दे सकता है।
प्रभाषजी ने अपनी तुलनात्मक प्रस्तुति में प्रकारान्तर से जनता के विवेक का भी अपमान किया है। जनता ने उनके बताए नेताओं को ब्राह्मण होने के कारण वोट नहीं दिए,देश की जनता ने समग्रता में जाति के नाम पर कभी भी वोट नहीं दिया है,वोट राजनीति के आधार पर पड़ते रहे हैं,नेता लोग अपनी राजनीति का प्रतिनिधित्व करते थे,जाति का नहीं। प्रभाषजी ने जिन नेताओं के नाम गिनाए हैं कम से कम उनमें से किसी भी नेता ने कभी चुनाव में अपने लिए और अपनी पार्टी के लिए जाति के नाम पर सार्वजनिक तौर पर वोट नहीं मांगा। यह बात कहने का अर्थ यह नहीं है कि राजनीति में जातिवाद नहीं चलता,चलता है ,किंतु निर्णायक भूमिका जाति की नहीं राजनीति की है। हाल के लोकसभा चुनाव परिणाम इसके साक्षी हैं।
प्रभाषजी ने लिखा है ”जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं।”
सवाल यह है हमारे समाज में सदियों किसे काम करने की ट्रेनिंग मिली है ? ब्राह्मण कब से कारगरी का काम करने लगे ? कारीगरी और मेहनती हुनर वाले किसी भी काम को ब्राह्मणों ने अतीत में सीखने से इंकार किया।
प्रभाष जोशी ने लिखा है ”मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है। अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया। सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां? सीता। सीता आदमी के लिए मरी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां? पार्वती। वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए। उसके लिए। सावित्री। सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है। सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया। सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है। मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं। अब वो अगर पतित होकर… बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई। इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में। इसलिए वह घर में रहे। जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते। अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं। आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है। मेरा मूल झगड़ा ये है।”
प्रभाषजी ने सही फरमाया है हमें अपनी परंपरा को अंग्रेजों की नजर से नहीं भारतीय नजर से देखना चाहिए,समस्या यह है कि क्या हमारी कोई भारतीय नजर भी है ? किस भारतीय नजर की बात कर रहे हैं प्रभाषजी ,हम सिर्फ इतना ही कहना चाहेंगे कि सतीप्रथा पर पुरातनपंथियों और राममोहनराय के समर्थकों के बीच में जो बहस चली उसके अलावा भी सतीप्रथा को देखने का क्या कोई स्त्रीवादी भारतीय नजरिया भी हो सकता है या नहीं ? किसने कहा है कि स्त्री समस्या को मर्द की ही आंखों से ही देखो, सती समस्या स्त्री समस्या है और इसके बारे में सबसे उपयुक्त भारतीय नजरिया स्त्रीवादी नजरिया ही हो सकता है,प्रभाषजी जिस नजरिए से सती प्रथा को देख रहे हैं,वैसे न तो ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने देखा था और नहीं आज के स्त्रीवादी ही रैनेसां के नजरिए से देखते हैं । ऐसे भारतीय नजरिया क्या होगा,यह विवाद की चीज है और प्रभाषजी का नजरिया मूलत: स्त्रीविरोधी है,क्योंकि वे सतीप्रथा को ही नहीं स्त्री को भी मर्दवादी नजरिए से देख रहे हैं। प्रभाषजी का मूल झगड़ा क्या है ? मूल लक्ष्य क्या रहा है ? मर्दवाद की प्रतिष्ठा करना और स्त्री को वायवीय बनाना,प्रभाषजी स्त्री ठोस हाड़मांस का मानवीय सार है, वह ‘सत्व’ नहीं है सार है,वह स्त्री है। आपके मुंह से एक पत्रकार नहीं एक मर्दवादी बोल रहा है जिसका हमारे समाज में ,मीडिया में आज भी स्वाभाविक स्वराज्ा है,आपकी भाषा स्वाभाविक मर्दवादी भाषा है और मर्दवाद प्रेस में ही नहीं मीडिया में सबसे बिकाऊ माल है । आप महान हैं और आपके विचार महान हैं, दुख के साथ कहना पड़ रहा है, हम सम्मान सहित अपमानित हैं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी ने जिस तरह से प्रभाष जोशी के विचारों में मर्दवादी विचारधारात्मक रूझान लक्षित किया है वह एक अतिरेक है. जब मेक्स वेबर पूंजीवाद के विकास के लिए प्रोटेस्टेंट धर्म को एक कारण बताते हैं तो यह कहना गलत है कि वे दकियानूसी हैं. यह बिल्कुल सही है कि तेंदुलकर और कांबली में अंतर है. कांबली के पूरे लालनपालन और जीवन यापन में जिस किस्म की अनिस्थरता है उसे देखते हुए कोई अगर तेंदुलकर के एक ब्राह्मण परिवार के होने के कारण एक किस्म के स्थायित्व, संतुलन का दर्शन उसके पूरे व्यक्तित्व में पाता है तो यह एक दृष्टि हो सकती है. पर शायद प्रभाष जोशी से हम उम्मीद कर सकते हैं कि वे समझें कि कपिलदेव नाम का एक क्रिकेटर हुआ है जिसका योगदान और जिसका संतुलन किसी ब्राह्मण महानायक – तेंदुलकर या गावस्कर से कम नहीं है. एक जमाना था जब कपिलदेव का जाट होना ही उसके व्यक्तित्व का सबसे बडा वैशिष्ठ्य बन गया था. यह देखना चाहिए कि प्रभाष जोशी जब कपिलदेव के बारे में बात कर रहे होते हैं तो उस तरह से नहीं सोचते हैं जिस तरह से वे सचिन या गावस्कर के बारे में सोचते हैं. यहीं से हमारे लिए विमर्श का एक नया द्वार खुलता है. प्रभाष जोशी जैसे पत्रकार को यह क्यों जरूरी लगता है कि परम्परा विवेक के साथ परम्परा के प्रति एक क्रिटिकल दूरी रखना अंग्रेज का अनुसरण करना है. राहुल सांकृत्यायन जैसे विद्वान एक जगह जाकर अन्य महानों से इस लिए अलग हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने इस सीमा का अतिक्रमण किया था. इस देश के सन्दर्भ में पियरे बोर्दिये के विचारों को ध्यान में रखकर लोगों के सौंदर्य बोध के विकास को समझना चाहिए. बोर्दिये बताते हैं कि हम जिस परिवार (वे हैबिटैट का प्रयोग करते थे जिसमें परिवार शामिल है)में रहते हैं उसी के अनुसार अपना टेस्ट और अपनी प्रवृत्ति का विकास करते चलते हैं. यह देखकर बहुत सारे लोग सोच में पड जाते हैं कि उनके इर्द गिर्द के तमाम सभ्य और संस्कारित दिखने वाले लोग ब्राह्मण या उंची जाति के होते हैं और जल्दबाजी में , उग्र और मतलबी तरह के लोग छोटी जाति के अधिक होते हैं. कई बार वे बोलें या ना बोलें वे मन ही मन मानने लगते हैं कि आखिर संस्कार कुछ तो होता ही है. यही वह मायाजाल है, दलदल है जहां एक बार फंसने के बाद एक व्यक्ति के पीछे की जाति को उसके गुण के रूप में देखने का अप्रत्यक्ष प्रभाव पैदा हो जाता है. अमिताभ बच्चन कायस्थ हैं और आप गौर करेंगे कि वे ब्राह्मण जैसे व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते रहते हैं. जिस तरह से धोनी का विकास हुआ है क्या लगता नहीं कि उसके पीछे की जाति के बारे में कुछ कह पाना और उससे उसकी सफलता को जोडना बेवकूफी होगी. राहुल द्राविड का आचरण कैसे कन्नड ब्राह्मण जैसा नहीं है जबकि बे क्रिस्तान हैं.वैसे इस देश में ब्राह्मण वैचारिक दबाव इतना अधिक है कि हिन्दी पट्टी के बहुत सारे ब्राह्मण नेहरू की महानता के पीछे उनका ब्राह्मण होना महत्त्वपूर्ण मानते हैं. अब इतने सारे मिश्रण के बाद भी नेहरू परिवार तो ब्राह्मण होने का दावा नहीं कर सकता फिर भी एक छवि ऐसी बन चुकी है कि नेहरू परिवार में ब्राहम्ण संस्कार है. प्रभाष जोशी के पूरे लेखन में एक तरह का ब्राहम्णवादी आग्रह है इससे इंकार करना कठिन है. हालांकि वे एक महान पत्रकार हैं, और उनका यह ब्राह्मणवादी विचारधारात्मक प्रभाव उनके सांसारिक व्यवहार में सायास आता हो यह जरूरी नहीं. इस अर्थ में वे मदनमोहन मालवीय की परंपरा के राष्ट्रीय व्यक्तित्व हैं. उनकी इस सीमा को समझना चाहिए. बाकी की बातें इस बडी सीमा के पीछे पीछे चलती हैं. सती प्रथा के प्रसंग में जोशी जी हठ का परिचय दे रहे हैं. वे गलत हैं. स्त्री विमर्श के जिन सन्दर्भों की तरफ जगदीश्वर चतुर्वेदी गये हैं उस सन्दर्भ में प्रभाष जोशी के विचारों का अध्ययन नहीं किया जा सकता. अंत में, यह निवेदन है कि प्रभाष जोशी को चाहिए कि ‘सबसे महान ब्राह्मण’ गांधी का अनुसरण करें और बामनी जिद न रखकर अपनी भूल को सुधारें. राहुल सांकृत्यायन के कनैला की कथा के एक पाठ के बाद जब जोशी जी इन बातों पर सोचेंगे तो हो सकता है कि उनके सोच के भीतर जो एसेंसियलिज्म और सब्सटांसियलिज्म है उसके प्रति वे सचेत हो सकते हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से उनको हिन्दी समाज का एक महान बुद्धिजीवी मानता हूं और जीवन भ उनसे सीखता रहा हूं और रहूंगा. इस प्रसंग में बस इतना ही.
हितेन्द्र पटेल ने प्रभाष जी के जिन कमजोर बिंदुओं को सामने रखा है,वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। प्रभाष जी के लेखन की पद्धति की धुरी है ‘अतिरेक’ ,वे इसके बिना कभी कुछ भी नहीं लिखते,’अतिरेक’ के कारण ही उनके गद्य की भाषा में निहित ‘मर्दवाद’ हमें प्रभावित करता है। ‘अतिरेक’ की पद्धति का इस्तेमाल करने के कारण ही वे अपनी कमजोरियों को खूबियों में बदलते रहे हैं। प्रभाष की भाषा में ‘अतिरेक’ और ‘मर्दवाद’ के उदाहरण सामने रखने का यहां अवसर नहीं है, इसे भविष्य के लिए छोडते हैं। कहने के लिए चर्चित साक्षात्कार की भाषा इन दोनों ही रूझानों से भरी पडी़ है। मुश्किल यह है कि हमने कभी आलोचनात्मक कसौटी पर प्रभाषजी की भाषा अथवा किसी भी पत्रकार की भाषा को स्त्रीवादी भाषिक सैद्धान्तिकी की कर्साटी पर तो कभी परखा ही नहीं है, हमारे सभी दिग्गज पंडित एक-दूसरे की मर्दानी भाषा को लोकभाषा कहकर भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहते हैं, हमारे यहां अभी भाषा आलोचना के दायरे में आयी ही नहीं है, हमने भाषा की सिर्फ प्रशंसा की है, प्रशंसा और अभिव्यक्ति से ज्यादा भाषा की कोई महत्ता हमारे विद्वानों को नजर ही नहीं आती।
यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है कि भाषा को आलोचना के दायरे में लाया जाए. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने हिन्दी में एक नये प्रकार की बह्स को बढाया है. जब से हेडेन व्हाइट जैसे विद्वानों का जोर बढा है और भाषा के भीतर छिपे (स्तरीय रूप में) विचारधारात्मक दबावों को समझने का प्रयत्न बढा है. यह बात बहुत सही है कि हमारे भीतर एक श्रद्धाशील पाठक पहले से मौजूद रहता है जिसके लिए श्रद्धेय लोग खास किस्म का प्रसाद बांटते चलते हैं और हम तृप्त होकर सर झुकाए चलते रहते हैं. यह भेडचाल हिन्दी में इतनी ज्यादा है कि एक बौद्धिक समुदाय के रूप में हिन्दी के बौद्धिकों की कोई हैसियत बन ही नहीं पाई. आज के इंडियन एक्सप्रेस में शेखर गुप्ता (संपादक) ने भारत में जिस किस्म की बौद्धिक क्षय का चित्र खींचा है वह कम से कम हिन्दी के मामले में तो सही ही लगता है. गुप्ता ने कहा है कि भारत मे समाज विज्ञान के क्षेत्र में कोई नया काम नहीं होता क्योंकि यहां राजनैतिक दबाव बहुत अधिक है. वे बतलाते हैं कि इतिहास में लगभग हर नया और उत्कृष्ट काम भारत के बाहर ही होता है. यह बात साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में भी है. मीडियाक्रिटी का ऐसा वर्चस्व है कि कोई भी नये विमर्श में शामिल होना नहीं चाहता. सांस्थानिक दबाव भी कम नहीं है. अब गौर करिए. जसवंत सिंह की किताब को रिलीज करने वाले प्रोग्राम में नामवर सिंह उपस्थित थे. नामवर सिंह पिछले तीस-चालीस सालों से हिन्दी बौद्धिक समुदाय में जिस तरह के विचारों को लेकर सबसे महान और बडे (प्रभाष जोशी के शब्द) बने हुए हैं उसकी भी किसी ने पडताल की हो (ठीक से) याद नहीं पडता. हिन्दी में नये लोगों को खुल कर बोलना पडेगा और चीजों को उघाड उघाड कर देखना पडेगा. गादामार (या गादामेर) की एक उक्ति का स्मरण होता है जिसमें वे कहते हैं कि हम भाषा में ही होते हैं. अगर भाषा के भीतर जाया जाए और उसे डीकंसट्रक्ट किया जाए तो कुछ नयी बातें आयेंगी. हम अपने प्रति भी क्रिटिकल सम्पर्क रखें तब जाकर वैसी दृष्टि हमें मिल सकेगी जिससे हम लगातार नये समय के साथ तादात्म बिठा सकेंगे. प्रभाष जोशी की भाषा का समाजशास्त्रीय विवेचन तो हो ही विचारधारात्मक विश्लेषण भी हो यह अभीष्ट है. आखिर क्या कारण है कि उन जैसा विद्वान ब्राह्मणों की संस्थाओं में जाकर सम्मानित होता है और इस बात के पीछे के सच को देखना नहीं चाहता. सचमुच हम भाषा के तिलिस्म में ही न अटक जाएं उसके पीछे के विचारों को भी खोलने का अभ्यास करे.
ऐसा लगता है बहस को एक गंभीर मोड देते ही ब्लाग लेखक गणों का धैर्य चुक जाता है. वे तो गर्मागर्म मारपीट को ही बहस मानते हैं. इस तरह इस बह्स को कई जगह फैलाने का जो मसला है वह भी सलटाने के बजाए फैलाता है.
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