सिनेमा कहानी नहीं है, सिनेमा जादू है

♦ अरविंद शेष

दरअसल, “ओंकारा” या “मकबूल” देने के बाद विशाल भारद्वाज भी पीवीआर संस्कृति के उपभोक्ताओं और उस सामाजिक वर्ग के अनुकूल कुछ देने के लोभ से बच नहीं सके। “कमीने” में किये गये जिन कुछ प्रयोगों की बात की जा रही है, वह महज पिछले एक-दो सालों के भीतर आयी कई फिल्मों की खासियत रही है। और “सब कुछ इतना तेज दिखाओ कि उसे समझना मुश्किल बना रहे”- यह फार्मूला फिल्मकारों को इसलिए सूट कर रहा है, क्योंकि हमारा शहरी पीवीआर वर्ग यही देखने और “समझने” में खुद को बड़ा समझता है।

♦ वरुण

अरविंद जी, आप मकबूल और ओमकारा को पीवीआर संस्कृति के अनुकूल नहीं मानते, तो ये आपका बड़प्पन है। जहां तक मुझे याद है और जहां तक फिल्म इतिहासकार इसे देखेंगे – मकबूल तो बनी ही पीवीआर की audience के लिए थी। मक़बूल खास कर के, कहा जाता था, कि आम आदमी के समझने या taste की फिल्म ही नहीं है। और इसके box office परिणाम भी इसी तरफ इशारा करते हैं।

“Dumbing down” – या किसी भी work of art को आम जनता की समझ के हिसाब से आसान, accessible, simplistic, spoon-feeding वाला बना देना – ये शब्द भी पिछले कुछ सालों में ही आया है, जिसकी वजह भी विशाल, अनुराग, दिबाकर, नवदीप, और श्रीधर जैसों का सिनेमा है, जो इन मापदंडों/ज़रूरतों को ठेंगा दिखाता आगे निकल जाता है।

अब अगर आप smart सिनेमा, जो कि असल में उपभोक्ता की समझ से आगे जाता है, को ही उपभोक्तावादी कहेंगे, तो ये ग़लत ही नहीं contradiction भी होगा।

और रही बात सब कुछ तेज़ दिखाने की, तो बात सिर्फ इतनी है, जैसा मीर ने कहा था:

परस्तिश की आदत कि ऐ बुत तुझे,
नज़र में सबों की, खुदा कर चले।

♦ अरविंद शेष

वरुण जी, मैं आपकी ही कुछ बातों को दोहराता हूं।
– पीवीआर की ऑडियंस और “आम आदमी…”
– “मकबूल” “आम आदमी” की टेस्ट की फिल्म नहीं है…
– बॉक्स ऑफिस पर “मकबूल” के परिणाम भी इसी तरफ इशारा करते हैं…
– “वर्क ऑफ आर्ट” को “आम जनता” की समझ के हिसाब से बेहद आसान बना देना…

अब आपसे विनम्र निवेदन है, कि –
– क्या पीवीआर की ऑडियंस और आम आदमी की आपकी परिभाषा एक ही है…
– “मकबूल” सचमुच “आम आदमी” के टेस्ट की फिल्म नहीं है। यह “खास आदमी” के टेस्ट की फिल्म है। यह भी आम आदमी (जिस आम आदमी की बात आप कर रहे हैं) के टेस्ट की फिल्म हो सकती थी, अगर इसमें भी “बीड़ी जलाइ ले…” जैसा कोई गीत (चिप्पी के तौर पर ही सही, लगाया जाता) होता।
– “वर्क ऑफ आर्ट” की कामयाबी यही मान ली गयी है कि हमारे सामने हमारी कल्पनाओं से भी आगे चीज़ इस रूप में रखी जाएं कि उस पर मुग्ध होने के लिए उसे समझना ज़रूरी नहीं हो। (बहुत सारे लोग सिनेमा को यों ही खालिस मनोरंजन की चीज़ नहीं कहते हैं)।
– कुछ खालिस वर्क ऑफ आर्ट पर आधारित फिल्मों को अगर इस श्रेणी में रखें, तो “कमीने” उसके आसपास से ज़्यादा का मज़ा नहीं देता।

एक बात अपनी ओर से कहना चाहूंगा –

सामने मौजूद दो तरह की स्थितियों को समझना बेहद आसान होता है –

एक, जो सीधे-सीधे समझ में आ रहा हो और दूसरा, जिसका कुछ भी समझ में नहीं आ रहा हो…

और बाकी तो आपके इस पसंदीदा शे’र में है ही –

परस्तिश की आदत कि ऐ बुत तुझे,
नज़र में सबों की, खुदा कर चले।

शुक्रिया…

♦ रंगनाथ सिंह

वरुण भाई, हम जैसे सिर्फ दर्शकों की बात को जरा सहिष्णु ढंग से पढ़ना और जवाब देना। हम तो सिर्फ सिनेमा देखते हैं। यानि हम हुए दर्शक। लेकिन वादा है कि तुम्हें हमें चम्मच से फिल्म कला का ज्ञान नहीं देना पड़ेगा…

1. क्या तुम जिनके सिनेमा को वर्क आफ आर्ट बता रहे हो, क्या तुम पूरी गंभीरता से बता रहे हो ? (विशाल भारद्वाज को छोड़ कर, कमीने मैंने नहीं देखी है, सुना है ठीक-ठाक मनोरंजक फिल्म… अफ़सोस तुमने रजत कपूर का नाम नहीं लिया। मेरा फेवरेट है यार!)

2. कहीं ऐसा तो नहीं कि डेविड धवन और उनके जैसे अन्य से तो तुम कहते हो कि बकवास मत बनाइए और अडूर गोपालकृष्णन, मृणाल सेन से ये कहते हो कि थोड़ा ख्याल टिकट विंडो का भी रखना चाहिए। मेरा फिल्मी ज्ञान बहुत कम है, इसलिए तुम मुझे साफ-साफ बताओ कि हिंदी सिनेमा में बर्गमैन, तारकोवस्की, वांग कार वाई जैसों के ढर्रे पर कौन-सा मेकर चल रहा है? (तुम्हारे शब्दों में कहूं तो, जब फिल्म इतिहासकार पीछे देखेंगे तो… वो तुम्हारे उल्लिखित किस मेकर को इनके ढर्रे पर पाएंगे?)

3. क्या तुम बता सकते हो कि हॉलीवुड का मेनस्ट्रीम सिनेमा क्या है? जिस वर्क आफ आर्ट की तुमने दुहाई दी है, उसी की कसम है तुम्हें इसका जवाब ज़रूर देना होगा।

4. भाई, हमने तो सुना था कि “सिनेमा इज द आर्ट आफ स्टोरी टेलिंग” इस पर तुम्हारी क्या राय है? दर्शक टेक्नीकल एक्सीलेंस देखने जाता है क्या? सिनेमा और मोटर एक्सपो में क्या फर्क है, जरा इसे भी समझाओ?

5. क्राफ्ट के सहारे किसी फिल्म को प्रज़ेनटेबल तो बनाया जा सकता है, ठीक है। दर्शक को एक से डेढ़ घंटा (माफ करना तीन नहीं!) हॉल में रोका जा सकता है, ठीक है। लेकिन प्यारे वरुण तुम कहीं यह तो नहीं कह रहे हो कि क्राफ्ट इज आर्ट! भई ऐसा कह रहे हो, तो हमें भी बताओ कि हिंदी की कौन-सी फिल्म का क्राफ्ट आर्ट बन गया है? भाई एक्सपेरीमेंटलिज्म अपने चेहरे पर गुलाल पोत ले तो वो आर्ट हो जाएगा क्या? …नावेल्टी, पूअरली फारवर्डेड आइडिया या चीपली स्टोलन स्टाइल की बात बाद में करेंगे।

6. कुछ हिंदी फिल्‍मों के संदर्भ में बात करते हुए तुमने बताया है कि हिंदुस्तानी सिनेमा को दुनिया भर के प्रोग्रेसिव सिनेमा के समकक्ष रख के दिखाया जा सकता है!!

भाई प्रोगेसिव सिनेमा शब्द का प्रयोग तुम किस अर्थ में करते हो, जरा ए भी बताओ?

7. एक सवाल जो हमारे मुद्दे से अलग है, लेकिन मुझे लगा कि तुमसे पूछा जा सकता है, सिड फील्ड ने कौन-कौन सी फिल्में लिखी हैं? (उनकी किताबों के नाम मत बताना और न ही जिन फिल्मों के वो कंसल्टेंट थे, उन फिल्मों के नाम देना। वो लिस्ट नेट पर मिल गई है।)

(थ्री एक्ट स्ट्रक्चर अरस्तु के बिगनिंग, मिडिल एन एंड से बेसिकली कितना अलग है, इसे भी स्पष्ट कर सको तो कर दो)

तुमने कुछ स्टेटमेंट दर्ज कराएं हैं, उनका भी कुछ पल्लवन कर दो, तो हमें तुम्हारी बात समझने में आसानी हो… जैसे,

1. “कहानी कहां है?” आप कहेंगे। और मैं बस इतना ही कहूंगा कि कहानी ज़रूरी नहीं होती – सिनेमा सिर्फ कहानी नहीं, उससे बहुत ज़्यादा, बहुत बड़ा है। सिनेमा के अर्थ अगर सिर्फ उसकी कहानी में छुपे होते, तो कोई करोड़ों लगा कर उसे बनाता ही क्यूं?…”

2. “….craft को सही इस्तेमाल करना आना चाहिए। एक चीज़, जो हम लोग कभी नहीं सीख पाये थे – हममें और विदेशी सिनेमा में सबसे बड़ा फर्क भी यही था…” (हिंदी फिल्म मेकरों के इतिहास के बारे में कम जानकारी के कारण यह सवाल पूछ रहा हूं : रंगनाथ)

3. “Dumbing down” – या किसी भी work of art को आम जनता की समझ के हिसाब से आसान, accessible, simplistic, spoon-feeding वाला बना देना – ये शब्द भी पिछले कुछ सालों में ही आया है

(तुमने जिनका नाम लिया, इनमें से किस मेकर के वर्क आफ आर्ट!! को डम्ब डाउन किया जा रहा है??)

तुमने मीर के फिल्म में प्रयुक्त किये जा चुके शेर का ज़‍िक्र करके माहौल को शायराना बना दिया है, इसलिए एक शेर अर्ज है, मुलाहयजा फरमाएं,

कलामे मीर समझे या कलामे मीरज़ा समझे
मगर इनका कहा यह आप समझें या ख़ुदा समझे

disclousre : अरविन्द शेष मेरी मित्र मंडली के नहीं है। न मैं ही उनकी मित्र मंडली का हूं।

पुनश्‍च : एक बात यहां मल्टीप्लेक्स बनाम खटारा सिनेमा हाल की चला दी गयी है। बहुत लोगों को मुग़ालता है कि मल्टीप्लेक्स का दर्शक ज़्यादा समझदार दर्शक होता है। खैर, उनकी अपनी राय है। हमें तो यही पता है कि मल्टीप्लेक्स का मतलब है कि अब आप शहरी उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग की रुचि और पसंद के हिसाब का सिनेमा बनाएं तो भी उसका पैसा डूबेगा नहीं। मामला अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र का भी है!! सारा मामला सिर्फ समझ का नहीं है। गुरूदत्त, राजकपूर, हृषीकेश मुखर्जी की हिट और फ्लॉप दोनों तरह की फिल्मों को समान दर्शकों ने देखा और नकारा था। आज भी इसमें बहुत कमी नहीं आयी है। आमिर या गांधी माई फादर जैसी फिल्मों के बिजिनेस को लेकर जो सरल निष्कर्ष निकाले जाते हैं – ऐसा करने वालों को मार्केटिंग, प्रमोशन और स्टारडम का फिल्म बिजिनेस पर प्रभाव दिखाई नहीं देता। समझदार दर्शक और नासमझ दर्शक का ढोल पीटने वाले ये नहीं बताते कि कैसे एक साधारण फिल्म को पांच स्टार दे दिया जाता है और दूसरी अच्छी फिल्म को नहीं दिया जाता। और इससे उस फिल्म को हाइप मिलती है या नहीं? इससे फिल्म का बिजनेस बढ़ता है कि नहीं। ऐसे ही तमाम मीडिया प्रोपगैंडा को काउंट किये बिना दर्शकों की समझदारी को अपनी समझदारी की चलनी से चालना उनके संग नाइंसाफी है भाई…

♦ वरुण

रंगनाथ जी। सबसे पहले, बहुत खुश हूं कि आपके सवालों ने बहुत-सी खिड़कियां खोली हैं। सबमें से हवा अंदर ही आये, ये ज़रूरी नहीं, कुछ में से कुछ मुद्दे उछल कर बाहर भी कूद सकते हैं, पर इसे एक meaningful debate बनाने की कोशिश साफ़ है। उम्मीद है, मैं भी अपनी तरफ से अपना देखा-समझा रख पाऊं।

एक और छोटी सी बात – मैं भी सिर्फ एक दर्शक ही हूं। क्रमवार चलते हैं :

1. “Work of art” का reference मैंने जहां दिया है, वहां मैंने किसी भी सिनेमा या निर्देशक का नाम नहीं लिया। और एक बार फिर context साफ़ कर दूं – मैंने बात dumbing down नाम के नये उगे phrase पर की थी। हम इस विषय पर बिलकुल बात कर सकते हैं कि मैं किन फिल्मों को work of art मानता हूं और किन्हें पूरी तरह कचरा, पर शायद यहां मुद्दा वो नहीं है। (रजत कपूर की ‘मिथ्या’ और ‘मिक्सड डबल्स’ मेरी बहुत ही पसंदीदा फिल्मों में से हैं – और उन्होंने भी सच में बहुत से पुराने ढर्रों को तोड़ा है। आपने ज़िक्र किया इसलिए…)

2. मैं जनाब किसी से न तो कुछ कहता हूं, न ही मानता हूं कि किसी को कहना चाहिए। सिनेमा महंगा भले ही हो, पर एक स्वतंत्र मीडियम है। यहां सबको अपनी दुकान लगा कर अपना माल बेचने का पूरा हक है। और हर तरह के माल के ग्राहक भी हैं। हर निर्माता-निर्देशक के पास अपने-अपने कारण हैं फिल्म बनाने के। मेरे पास इतनी choice है कि मैं एक तरह की फिल्म देखूं और दूसरी तरह की छोड़ दूं।

वांग कार वाई, तार्क्वोसकी और बर्गमान को मैंने आज तक नहीं देखा है। एक फिल्म भी नहीं। (आपको ऐसा भरम शायद इसलिए हुआ हो, क्यूंकि मेरी यह पोस्ट एक तरह की ‘गाली’ के तौर पर मोहल्ला के main पेज पर लगा दिया गया है कि देखो – kaminey नहीं समझे न, अब सीखो इन गुरु जी से। पर सच ये है मैं फिल्में कम और फिल्मों का दुनिया पर प्रभाव ज़्यादा देखता हूं, या कम से कम कोशिश करता हूं।)

3. हॉलीवुड का main-stream, जिसे वहां स्टूडियो सिनेमा भी कहते हैं, साल के दो सबसे बड़े सीज़न – समर रिलीज़ और क्रिसमस रिलीज़ पर टिका है। दोनों मौकों पर बड़ी एक्शन फिल्में (Transofrmers, terminator, End of The World सरीखी), 3-डी एनीमेशन फिल्में (Harry Potter, Star Wars etc.), जानवरों और अन्य अजब जंतुओं वाली फिल्में (Titanic वाले जनाब की ‘अवतार’ नाम से आ रही है इस साल, पिछले साल Benjamin Button आयी थी), या फिर vanila-flavor rom-coms पर ही मार्केट लूटने का दारोमदार होता है। इसके अलावा एक और lobbying वहां प्रचलित है – जिसके तहत सिर्फ ऑस्कर में आने वाली फिल्में आती हैं (जो अक्सर पैसा नहीं कमातीं, सिर्फ नाम कमाती हैं।) Intellectual या एक्सपेरिमेंटल या फिर गहरे अर्थों वाला सिनेमा, वहां भी fringes पर ही है।

4. आप शायद technical और technological शब्दों में धोखा खा गये। (आपने मोटर शो का उदाहरण दिया, इसलिए कह रहा हूं।) सिनेमा एक तकनीकी मीडियम है। बिना तकनीक के इसमें एक परिंदा भी नहीं फड़फड़ा सकता। (असरानी साहब याद आ गये!)

और आपने एकदम सही सुना है – सिनेमा बिलकुल कहानी कहने की कला है। मतलब, एक कहानी जो मैं एक तरह से कहूंगा, वो आप दूसरी तरह से कह सकते हैं और दोनों में से एक बेहतर होगा (या कभी-कभी हो सकता है दोनों में कोई comparison करना भी मुश्किल हो जाए)। ज़रा सोचिए क्यूं? क्यूंकि आपका story-telling CRAFT मुझसे अलग होगा। आपको ज्यादा (या कम) technique आती होगी।

मतलब, कहानी, technique से कम ज़रूरी है सिनेमा में। (ज़रूरी है भी, ये भी ऐतेहासिक तथ्यों से पूरा नहीं कहा जा सकता। सबसे पहले – कहानी क्या है, किसे कहानी कहा जाए, यही तय करना पड़ेगा। आसान नहीं है सर!)

सिनेमा को लेकर मेरी सबसे सीधी समझ यही है कि सिनेमा जादू है। एक जादूगर सिर्फ हाथ से सिक्का निकाल कर भी हमें मुग्ध कर सकता है, अगर उसने जादू टूटने नहीं दिया तो, और वहीं दूसरा जादूगर हाथी ग़ायब कर के भी कभी-कभी वो सम्मोहन नहीं ला पाता कि हम उस पर भरोसा कर लें – बिना सोचे ही ताली बजाने लग जाएं। (रजत कपूर का सिनेमा हमेशा छोटा जादू दिखाता है, पर शानदार दिखाता है। यश चोपड़ा का सिनेमा हर बार हाथी ग़ायब करने की फिराक में रहता है, पर हर बार हम पहले ही जादू पकड़ लेते हैं – जादूगर के बगल में खड़ी लड़की इतनी नकली लगती है कि हमें पहले ही पता चल जाता है कि हमें उल्लू बनाया जा रहा है। और इसी Perfection of craft के बारे में मैंने ऊपर भी बात की है – कमीने की खासियत ही यही है कि ये हाथी भी ग़ायब करती है और हमें बांध के भी रखती है।)

5. सच्चा जवाब यही है कि ‘नहीं बना’। आज तक हिंदी में तो ऐसी फिल्म नहीं ही बनी होगी कि जिसका क्राफ्ट आर्ट मान लिया जाए। और मैं क्राफ्ट को आर्ट नहीं मान रहा, पर हां, सिनेमा में क्राफ्ट, आर्ट तक पहुंचने का बहुत ही ज़रूरी जरिया है – जिसे आज तक इग्नोर ही किया गया। यहां तक कि यह जताया गया कि हमें क्राफ्ट सीखने की ज़रूरत नहीं – हम कहानी प्रधान फिल्म बनाते हैं। और इसी कहानी-प्रधानता ने हमें उस चौराहे पर लाकर छोड़ दिया, जहां एक रास्ता था हॉलीवुड से ‘कहानियां’ चुराओ, एक रास्ता था वोही घिसी-पिटी कहानियां दोबारा बनाते रहो, और सबसे मुश्किल रास्ता था – नया क्राफ्ट सीखो (या क्राफ्ट में भी ‘बाहर’ से inspire हो जाओ। जैसा अनुराग पर अक्सर आरोप लगता है!)

6. दुनिया भर के सिनेमा को अगर एक मापदंड पर लाना हो, तो वो कभी भी कहानी के बल पर नहीं लाया जा सकता। सबकी अपनी कहानियां हैं, सबके अपने दुःख और तरीके हैं उनसे निबटने के। लेकिन इस दम पर लाया जा सकता है कि वो अपनी कहानियां कैसे कह रहे हैं। किन तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। (सिनेमा जैसे individualistic मीडियम में कोई वर्ल्ड कप तो नहीं हो सकता।)

ये context इसलिए ताकि आप समझ सकें कि मैं progressive cinema दुनिया के हर उस सिनेमा को कह रहा हूं, जो आज की तकनीक, आज की भाषा, आज के किरदारों और आज के विभाजनों को अपनी-अपनी कहानी में (फिर वो कहानी ईरानी बच्चों की हो या इटालियन माफिया की, इससे फर्क नहीं पड़ता) पूरे जादू के साथ उतार दे। (फिर दोहराऊंगा – इसमें तकनीक का बहुत बड़ा हाथ है – और तकनीक में किरदारों का सही चयन, उनकी अदाकारी, संवाद और लोकेशन, सब शामिल हैं।)

7. सिड फिल्ड की न तो मैंने कोई किताब पढ़ी है, न ही मालूम ही है कि उन्होंने ज़‍िंदगी में और क्या किया है। नाम सुना है, बस इतना ही मालूम है कि उनके नाम के साथ ‘थ्री एक्ट स्ट्रक्चर’ जैसा एक शब्द जोड़ा जाता है।

***

इसके बाद के आपके सब सवालों के जवाब आपको ऊपर के लम्बे बयान में मिल जायेंगे।

***

शम्मा-ए-महफ़िल जलाये रखने के लिए शुक्रिया। नया-ताज़ा पेश है :

शोले की फितरत, क्या कहें, कैसे किसे बतावें,
आवे हवा तो भड़के, ना आये तो जलावे।

kaminey large

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