मेरे खयाल से बस इतना ही काफी है कि मेरा घर एक पूरी दुनिया है

tribute to ramlakhanyadavशनिवार, 22 अगस्‍त 2009 को अक्षर प्रकाशन, दरियागंज में रामलखन यादव की शोकसभा में उन्‍हें जानने, न जानने वाले बहुतेरे रचनाकार आये। राजेंद्र यादव, हरिनारायण, अर्चना वर्मा, महेश दर्पण, श्रीधरम आदि ने रामलखन से जुड़ी यादों को साझा किया। रामलखन के मित्र अविनाश मिश्र खामोश रहे। कुछ कह नहीं पाये। शोकसभा में वीरेंद्र कुमार बरनवाल, भालचंद्र जोशी, बलविंदर सिंह, दिलीप मंडल, समरेंद्र, अजय नावरिया, रमेश ऋतंभर, अच्‍युतानंद मिश्र मौजूद थे। शोकसभा ख़त्‍म होते-होते पंकज विष्‍ट और योगेंद्र आहूजा भी पहुंचे। कवि नीलाभ ने उनकी कुछ कविताओं का पाठ किया। पाठ में वे कविताएं भी थीं, जो पहली बार हंस में छपीं। हम मोहल्‍ले के पाठकों को रामलखन यादव की उन पहली प्रकाशित कविताओं से रूबरू करा रहे हैं : मॉडरेटर

घर की रेत और रेत का अतीत हो जाना

घर में हैं कुछ वस्‍तुएं, उन्‍हें बचाये कौन?
जिन्‍हें घर की ज़रूरत है, वे कहां हैं?
घर इतने दिनों से बन बिगड़ रहा है
कहां है उनका औचित्‍य
घर इतने दिनों से खाली पड़ा है
सुरक्षा की ईंटें उखड़ रही हैं
बच्‍चों की ज़‍िद की तरह
उनका रचाव कहां है
प्रांगण में फैली धूप काली हो रही है
आग, चूल्‍हा, रोटी आख़ि‍र कहां बच पाया राख होने से?

वर्षों बाद वह घर घास में दब गया
जिसे जंगल में खंडहर कहा गया
रहीं जो यादें बीती हुई
वे दादी की सुनी हुई कहानियां थीं

एक लंबे अंतराल के बाद वह घर बाढ़ की धार में बह गया
रेत जो थी, वह रेगिस्‍तान बन गयी
क़रीब ढाई हज़ार साल बाद पुरातत्‍व विद्वानों ने खोज निकाली एक जगह नयी
एकदम नयी
कार्बन चालीस ने कई महत्‍वपूर्ण जानकारियां दीं
मसलन बटुए में तांबे के सिक्‍के
पुरानी-सी एक माला
और पत्‍थर की सफेद डिबिया
कुछ गिन्नियां
और दादी का काला संदूक

और एक विचित्र सी गंध
जो दादी की आत्‍मकथा थी
उनकी पतीली रखी हुई थी
जिसमें भी दाल रोटी और कच्‍ची अमियां
सब बसियाई हुई
यह है एक कहानी
वैज्ञानिकों की खोजी हुई

और कुछ नहीं तो प्रश्‍न

हमसे हमारा घर पूछ कर उन्‍होंने अपमान किया
सदभावनाओं का कोई अर्थ नहीं रहा
मेरे खयाल से बस इतना ही काफी है कि मेरा घर एक पूरी दुनिया है

खत्‍म हो रही दुनिया के लिए वक्‍त कितना कम है
कि हम कुछ करें उसे बचाने के लिए

जहां जीवन पलता है

अदृश्‍य सीमाएं लांघकर चले आते हैं जो
नष्‍ट करने
हमारी नसों का लोहा
आख़‍िर वे कौन हैं?
भला ऐसी कौन सी होगी युक्ति
कि जिसमें बचा रहे जीवन
थोड़े से थोड़ा
और चलती रहे सांसें।

अगर

अगर समा पाता ब्रह्मांड मेरी बांहों में
तो चला जाता मैं लिये अपने पार
वहीं कहीं जहां
जीवन मृत्‍यु की ज़रूरत न होती कतई
इस अंधेरे से बेहतर अगर समझ पाता मैं
कि मुझे निगल न सकेगा कोई खौफ़
कोई ख़तरनाक बीमारी मुझे जकड़ न सकेगी
किसी अंधियारे बियाबान में
भटका न सकेगी कोई मौत
तो मैं लिये आता जन्‍मजात सूर्य की कतारें
और कहीं भी जल जाता आदिम गंध के अनजान प्रदेश में

अगर मैं कह देता खुद से
कि तुम मात्र एक भ्रम हो
और इस धरती के जीव-जंतुओं से कि ढूंढो
ईश्‍वर या उसके विपर्यय के भार का कोई शब्‍द
तो तुम्‍हारी स्‍वतंत्रता सुनिश्‍िचत है

अगर मैं चाहता
तमाम भीषण नरसंहार के बदले लबलबाती हुई करुणा
तो कम पड़ गये होते तुम्‍हारे आंसू
और मेरे शब्‍दों का अर्थ चुक गया होता
अगर मैं बता पाता कि कैसे गरुआ रही है धरा मेरे सर पर
और यह कि कैसी मार से छिन गया मेरा विश्‍वास
घर लौटने की खातिर

और कह पाता कि किन अनिच्‍छाओं की
अंधेरी बस्तियों में
गुज़ार दी मैंने ताज़ी सुबहें
अब वे न मिल सकेंगी मैं न लौट सकूंगा

अगर मैं रह पाता बग़ैर प्‍यार के
बिना किसी की चाह के
बिना मेहनत की गंधाती तड़प के
और कह पाता मैं हर किसी से सीधी सच्‍ची बात
यह अपने लिए नहीं यह सबके लिए है
तो कर देता ऐलान
हम जिएंगे
जीतेंगे।

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