वर्चुअल गांधी का पत्र, प्रभाष जोशी के नाम
♦ (वर्चुअल) गांधी जी

माफ करना मित्रो, ब्राह्मण नहीं हूं, फिर भी वक्तव्य देने चला आया। दरअसल एक ज़रुरी सच्चाई बताने आया हूं कि इस देश को मैंने नहीं, नाथूराम ने आज़ाद कराया था। आपको तो मालूम है कि नाथूराम ब्राहमण था और उसकी धारण-क्षमता की गोली मेरे सीने में मलाई की तरह घुल गयी थी। गुरुदेव प्रभाष जोशी जी से कहना आपका चेला गांधी आया था। कमज़ोर धारण-क्षमता की वजह से ज्यादा देर रुक नहीं पाया। अच्छा मित्रो, चलता हूं। पाचक-क्षमता भी जवाब दे रही है।
पुनश्च : बेटा, एक ज़रुरी बात रह गयी थी, आना पड़ा। अच्छा बताओ तो, गुरुदेव प्रभाष जी ने इस बहस के बारे में कुछ कहा कि नहीं। क्या बोला! आप सब को लल्लू-पंजू बोल रहे हैं। ठीक ही तो है बेटा, मैं तो अपने अखबारों में छात्रों से बराबरी के स्तर पर संवाद करता था। अब इतनी धारण-क्षमता तो थी नहीं कि भेद-भाव करता! अच्छा पूछना कि जो प्रयोग मैं किया करता था वही बा ने किये होते, तो क्या वे तब भी मेरे गुरु बने रहते? थोड़ा अजीब तो लगता है बेटा, पर हिम्मत करके पूछ ही लेना। धारण-क्षमता का सवाल है, बेटा। अच्छा चलता हूं। इस सवाल पर गुरुदेव नाराज़ न हुए, तो फिर आऊंगा। अभी रास्ते में गुरु गौडसे की समाघि पर मत्था भी टेकना है। सी यू बेटा, हां।
♦ चार्वाक सत्य
आलोक तोमर आखिरकार गुरु के बचाव में उतर ही आये। कौन कहता है कि इंटरनेट पर लिखे से “महानायकों” को फर्क नहीं पड़ता। आलोक तोमर को पढ़िए भड़ास पर। यहां हैं उस लेख के तीन पैराग्राफ अविकल। आखिर लाइन में भाषा के लठैतपने पर ग़ौर ज़रूर करें। प्रभाष जोशी के बचाव में हजारों साल की ट्रेनिंग और धारण क्षमता वाला कोई नहीं आया। पहला वार आया है एक ऐसे शख्स की ओर से, जिसमें बकौल प्रभाष जी, धारण क्षमता नहीं है और जो ब्रह्म से संवाद भी नहीं करता है। गुड डिफेंस प्रभाषजी। टिके रहने के कौशल का अच्छा प्रदर्शन। लेकिन गेंद बाउंड्री के अंदर है अभी।
सुबह-सुबह हमारे गुरु और हिंदी के या शायद भारत के महान संपादक प्रभाष जोशी का फोन आया। पहले तो उन्होंने यही पूछा कि कहां गायब हो। लेकिन वे जल्दी ही मुद्दे पर आ गए। मुद्दा यह है कि अखबारों की ईमानदारी का क्या आलम है और लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को छापने के लिए अखबारों ने जो निर्लज्ज धंधा किया है, उसके लिए क्या उन्हें माफ कर देना चाहिए? प्रभाषजी हालांकि इंटरनेट पर बहुत नहीं जाते। उन्होंने कई बड़े अखबारों जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, अमर उजाला और दैनिक जागरण आदि के नाम ले कर खुलेआम लिखा और जगह-जगह बोला कि इन लोगों ने अपना ईमान बेचा है।
इन अखबारों ने अपने उस पाठक को मूर्ख बनाया है जो उनके पन्नों पर छपे हर शब्द पर भरोसा करते हैं और पैसा दे कर अखबार खरीदते हैं। प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को ले कर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई। फिर उन्होंने कहा कि नेट भारत में अभी दो प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास नहीं पहुंचा है और नेट का कोई समाज नहीं हैं इसलिए मुख्यधारा यानी अखबारों में यह बहस होनी चाहिए।
प्रभाष जी पूज्य हैं और सारा जीवन पत्रकारिता के ईमानदार और एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं इसलिए पत्रकारिता के साथ हो रहे द्रोह पर उनकी चिंता और आक्रोश में मैं उनके साथ हूं। लाखों और लोग भी हैं। लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए। गुनाहगार अखबारों के भाड़ मीरासियों ने प्रभाष जी और उनके सरोकार के साथ जुड़ने वालों को कोसा और आरोप भी लगाया कि प्रभाष जी सठिया गए हैं और अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। प्रभाष जी को इन अल्लू पल्लू लोगों के बयानों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिंदी पत्रकारिता के महानायक हैं।
♦ जगदीश्वर चतुर्वेदी
चार्वाक सत्य जी, आप काहे को नाराज हो रहे हैं। आलोक तोमर के गद्य में व्यंग्य होता है और सत्य भी। आलोक जी का यह कथन प्रभाष जोशी के लिए काफी है, आलोक तोमर ने लिखा है, ”लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है, जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला, तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गये।” इससे बेहतर प्रशंसा नेट लेखकों की नहीं हो सकती। रही बात प्रभाषजी के ‘महानायक’ होने की, तो वे ‘महानायक’ रहेंगे। उस पद का फिलहाल दूर-दूर तक हिंदी में कोई संपादक दावेदार नहीं है। वे अपने चर्चित साक्षात्कार में व्यक्त किये गये प्रतिगामी विचारों के बावजूद ‘महानायक’ रहेंगे। वे प्रेस संपादकों की परंपरा के अंतिम ‘महानायक’ हैं, क्योंकि यह युग ‘नायक’ और ‘महानायक’ के अंत के साथ ही शुरू हुआ है।”
आलोक तोमर ने लिखा है, ”प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को लेकर छिड़ गयी थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था, इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगायी।” यहां ‘झाड़’ शब्द पर ध्यान दें। प्रभाष जोशी अपने सबसे प्रिय पत्रकार को क्या लगा रहे हैं? ‘झाड़’। हम लोगों से संवाद नहीं करने का मूल सूत्र यहां मिल गया है। काश, हम भी उनके चेले होते अथवा सहकर्मी होते तो कम से कम जो सौभाग्य बंधुवर आलोक तोमर को मिला है, वह हमें भी नसीब होता।
आलोक तोमर की बाकी बातों पर कुछ नहीं कहना है ,क्योंकि उन्हें अपनी बात अपने लहजे में कहने का पूरा हक है। और ‘अल्लू पल्लू’ कोई गाली नहीं है, वैसे ही बेकार का शब्द है। दोस्त अगर गाली भी दे तो हंस कर सुन लेना चाहिए, आलोक तोमर हमारे अजीज दोस्त रहे हैं और आज भी हैं।
♦ चार्वाक सत्य
चतुर्वेदी जी, नाराज़ तो मैं पिछले दो-ढाई हजार साल से हूं। और प्रभाष जोशी होंगे आपके नायक और महानायक संपादक। आप बनाइए उनकी मूर्ति और कीजिए उनकी पूजा।
बहरहाल, जब हम वर्तमान समय के आख्यान और विमर्श को लिपिबद्ध कर रहे होंगे, तो उनकी जगह वहीं होगी, जहां होनी चाहिए यानी इतिहास के कूड़ेदान में। खरी खरी बात ही कर लीजिए। जोशी जी की पत्रकारीय उपलब्धि क्या है? उन्होंने अपने अखबार को किस तरह मौत के मुंह में डाल दिया, अगर आप ये नहीं जानते तो आप बेहद भोले हैं। इस कथित महानायक के नेतृत्व में जनसत्ता के संस्करण तब बंद हुए हैं और उसके पत्रकार तब बेरोज़गार हुए, जब हिंदी मीडिया का विस्फोट काल था। उस समय कोई मंदी नहीं थी। जनसत्ता आज इस हाल में है (सुबह अपने न्यूजपेपर हॉकर से दो मिनट बात कर लीजिएगा), तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है। दफ्तर का चपरासी, मशीनमैन, कंपोजिटर या महानायक संपादक?
कृपया मुझे ग़लत साबित कीजिए और बताइए कि जोशी जी एक सफल संपादक हैं। आप उन्हें सफल बता देंगे, इतने भर से हम उन्हें महान मान लेंगे। या यही साबित कर दें कि वर्तमान कालखंड के निर्णायक मोड़ों पर उन्होंने जनता का पक्ष लिया है। तब तो हम उनकी प्रोफेशनल नाकामी को भी झेल लेंगे और उन्हें महानायक मान लेंगे।
पंडों की तरह पोंगापंथी लेखन, निजी और प्रोफेशनल जीवन में घनघोर जातिवादी, घोषित महिला विरोधी, पत्रकार के तौर पर असफल। ऐसे महानायक आपको ही मुबारक हों।









बेटा अंदर आ जाऊं क्या ? जोशी सर तो नहीं हैं न यहां ? नहीं बेटा, पानी-वानी नहीं चाहिए, बहुत पी लिया। बस अपने ख़्यालात के लिए माफी मांगने आया था। न न, कहे तो कभी किसी से नहीं, बस सोचे थे। अब सोचता हूं सोचे भी क्यों ? बात ऐसी थी माय सन कि मैं सोचता था कि हम लोग जो सेवा करते आए हैं, मैला ढोया, जूते गांठे, क्या-क्या न किया, गालियां सुनी, बलात्कार करवाए, देखो भाई अब कहने दो मुझे, अब पानी-वानी नहीं चाहिए, तो जो लोग कुछ न करके दान-दक्षिणा खाते थे और हम सेवा करे जाते थे। तो एक ही बात सोच-सोच के खुश हो लेते थे कि चलो ये हमारी धारण-क्षमता है कि हमने निठल्लों को धारण कर लिया है। कभी सुघर जाएंगे और अपना काम खुद करना सीख जाएंगे। तब तक धारण किए रहो इन्हे। पर आज मालूम हुआ माय सन कि अपन को, माफ करना बाबा, मतलब हम लोगों को धारण-क्षमता का मतलब ही नहीं मालूम था। आज मालूम हो गया रे बाबा। माफ करना जोशी सर। जो बोल गया उसको पाचक-क्षमता से पचा लेना। जब आता हूं जोशी सर तो मिलते नहीं पर माहौल वही मिलता है बिलकुल प्राचीनकाल जैसा। कपड़े बोली ज़रुर बदल गयी है आपकी। चलो कभी तो खुद भी बदलोगे। तब तक तो धारण करना पड़ेगा न….ओ नहीं नहीं रे बाबा, फिर ग़लत बोल गया….ओके बाबा…। हां, पानी खुद ही पी लेना…
कितनी दुखद बात है कि कुछ छुटभैय्ये कथुत बुद्धिजीवी दोनों साईटों पर कभी आंबेडकर के नाम पर तो कभी गांधीजी के नाम पर अपनी बात रख रहे हैं. अरे भैय्या इसमें कम से कम देश के महान नेताओं के नाम लाकर इस मुद्दाहीन बहस को जातीय टन देने की और समाज को बांटने की कोशिश तो मत करो.
अब यह बात किसी से छुपी नहीं है कि गांधी और अंबेडकर को आप कितना महान समझते हो और कैसे वक्त-वक्त पर उनका इस्तेमाल करते हो। यह भी अब सब जान गए हैं कि समाज को वर्ण व्यवस्था बनाकर किसने बांटा ! अब समानता की कोशिशों को कौन रोक रहा है ‘समाज बांटने की कोशिश’ कहकर, यह भी दलित-पिछड़े जान चुके हैं। अब कोई नयी चाल लाओ, सिद्धार्थ भैय्या।
सिद्धार्थ नाम रख लेने से कोई बुद्ध या प्रबुद्ध नहीं हो जाता।
असली बात तो यह है कि गांधीजी और अंबेडकरजी जो सवाल पूछ रहे हैं उनका जवाब दो।
प्रभाष जी को अपमानित करने के अभियान में शामिल लोगों से एक अपील
प्रभाष जी पर हमला करके क्या हासिल करने की तमन्ना है..उनको पतित कहना ,ब्राह्मणवादी कहना ,सीधी बात तो नहीं हो सकती…जो आदमी जिन्दगी भर गाँधी जी की तरह सच की लड़ाई के अगले दस्ते का कमांडर रहा हो, उसको हमले का निशाना बना कर मूर्ती भंजक मुद्रा में खड़े होकर क्या हासिल करना चाहते हैं आप लोग.मैंने प्रभाष जी के साथ कभी काम नहीं किया लेकिन मैंने दिल्ली के वह भयानक १९ महीने देखे हैं जब इस देश में इमर्जेंसी लगी हुयी थी .पत्रकारिता के बड़े बड़े सूरमा इंदिरा गाँधी के कारिंदों के तलवे चाट रहे थे, उस दौर में यह आदमी विरोध के स्वर को ताक़त दे रहा था.एक बात और जिन लोगों ने प्रभाष जी के साथ काम नहीं किया है उन्हें मालूम ही नहीं कि प्रेस की स्वतंत्रता क्या चीज़ है. मेरे भाइयों, इस बात में कोई शक नहीं कि प्रभाष जोशी को गाली देने से नाम होता है. वैसे नाम कमाने के और भी रास्ते हैं. इससलिए अपने को बहुत भारी मूर्ती भंजक सिद्ध करने के लिए कोई और धंधा कर लो. हिन्दी पत्रकारिता के शलाका पुरुष को अपमानित मत करो क्योंकि हम जैसे लोग भी हैं जो प्रभाष जी के लेखन को पढ़ कर कुछ लिखना पढना सीखने में कामयाब हुए हैं. अपनी रोटी कमा रहे हैं .हम लोग बहुत मामूली लोग हैं .आप लोगों की ऊर्जा का जवाब नहीं दे सकते. लेकिन आपको यह बताना ज़रूरी समझते हैं कि हमें प्रभाष जी के खिलाफ अनर्गल प्रलाप सुन कर तकलीफ होती है..और अगर कोई प्रभाष जी को जातिवादी कहने की हिम्मत भी जुटा सकता है तो उसका पत्थर का कलेजा होगा.आप लोग सूचना क्रान्ति के जिस मोड़ पर खड़े हैं ,वहां से किसी को भी बे-इज्ज़त कर सकते हैं. इन्टरनेट का हथियार आपके पास है लेकिन प्रभाष जोशी को दफ़न करके आपके हाथ हिन्दी पत्रकारिता के नाम पर गर्व करने लायक कुछ नहीं बचेगा और किसी को गाली देकर आप महान नहीं बन जायेंगें . जहां तक प्रभाष जी का सवाल है वे निराला, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी , मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,पराड़कर की परंपरा के पत्रकार हैं उन्हें अपमानित करने की कोशिश न करें ,आप पत्रकारिता का बहुत नुकसान कर रहे हैं..मेरी बातों का बुरा मानकर मुझे ही मत गरियाने लगियेगा. मैं बहुत मामूली आदमी हूँ..
आपके देवता सम प्रभाष जोशी के उन इंदिरा गांधी के बारे में उच्च विचार पढ़ें, जिनके लगाए आपातकाल के दौरान विरोध को स्वर वो दे रहे थे। इसके बाद भी साफ नजर न आए तो अपकी मर्जी।
“अब धारण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धारण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते है. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है ? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते है. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके है कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा.”
लेकिन ये सब कहने के बावजूद प्रभाष जोशी जातिवादी या ब्राह्मणवादी नहीं है। कम से कम उनका तो यही मानना है। आप भी पढ़ें-
“एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्र में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है. इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बना कर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगो की फौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते है. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते है. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते है.”
पूरा इंटरव्यू रविवार डॉट कॉम पर पढ़ें।
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