प्रभाष जी की मति भ्रष्ट हो गयी है, आप सब रहम करें
♦ विभा रानी
तो अब बारी है प्रभाष जोशी की। क्यों भई, आपलोगों को नहीं पता कि इस हिंदुस्तान से ज़ातिवाद नहीं जानेवाला। और इसके पहरुए वे ही होते हैं, जो ऊपर से धर्म-निरपेक्षता के बड़े-बड़े दावे करते हैं, मगर बेटी की शादी की बात आने पर कट्टर हिंदू बन जाते हैं।
मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे लोगों पर बहस चला कर हम क्यों अपना और दूसरों का समय ज़ाया करते हैं?
सुना है कि इश्क़ में लोगों की चर्चाएं बड़ी होती हैं। यह भी कहा जाता है कि इश्क़िया माहौल बड़ा सूफियाना होता है और इश्क़ की लौ जब ख़ुदा से लग जाए, तब इश्क़ आध्यात्मिक हो जाता है।
हमारे समाज में सेलेब्रेटी के नाम से जो एक कौम उभरी है, वे इसी इश्क़ की गिरफ्त में है। समाज का यह सेलेब्रेटी पहले फिल्म उद्योग से निकल कर आता था। मगर अब समाज का दायरा बढ़ा है तो हर क्षेत्र का भी दायरा बढ़ा है। लोग अब प्रसिद्धि को सेलेब्रेशन की संज्ञा देते हैं और प्रसिद्ध को सेलेब्रेटी कहते हैं।
तो अब समाज सेलेब्रेटी का है। जो जितना ज़्यादा मशहूर, वह उतना ही बड़ा सेलेब्रेटी। लेखक, पत्रकार सभी सेलेब्रेटी हैं। सेलेब्रेटी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह होती है कि वह हमेशा ख़बरों में बने रहना चाहता है और ख़बरों में बने रहने के लिए वह कोई भी चाल चलता रहता है। हम जैसे पागल और सनकी लोग उन्हें अपनी ख़बरों में लेने को आतुर बने रहते हैं। शायद अपने सेलेब्रेटी न बन पाने की खाज इसी बहाने खुजला लेना चाहते हैं।
प्रभाष जोशी आज सती प्रथा के पक्ष में बोल रहे हैं, तो कोई ग़लत बोल रहे हैं क्या? लोग तो मूड और मिज़ाज की तरह पल-पल अपने वक्तव्य बदलते रहते हैं। मगर आपको दाद देनी चाहिए कि उम्र, अनुभव, प्रसिद्धि के इस पड़ाव पर भी वे अपनी बात भूले नहीं हैं और न ही अपने वक्तव्य बदले हैं। आप सबको याद होगा ही कि रूप कुंअर के सती होने पर इन्हीं प्रभाष जोशी ने अखबार ने समर्थन में संपादकीय लिखा था। तब वे जनसत्ता के संपादक थे। बड़ी मात्रा में लोगों ने इस संपादकीय का विरोध किया था। एक्सप्रेस कार्यालय के सामने उनके ख़िलाफ नारे लगाये थे, नुक्कड़ नाटक खेले थे। अब इतने बरसों बाद भी अगर वे सती प्रथा के समर्थन में बोलते हैं, तो आपको तो खुश होना चाहिए कि वे अपनी बात भूले नहीं हैं। उम्र के इस मोड़ पर भी, जब लोग इस उम्रवाले को बुड्ढ़ा, कूढ़ मगज़ और जाने क्या-क्या कहने लगते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि प्रभाष जोशी अब उम्र के इसी मुकाम पर पहुंच गये हैं जहां तिष्यरक्षिता के बूढ़े सम्राट अशोक की नाईं उनके प्रति सहानुभूति ही जतायी जा सकती है?
सरकार भी साठ साल की उम्र के बाद लोगों को सेवा से निवृत्त कर देती है। मगर हम हैं कि प्रभाष जोशी जैसे लोगों की उम्र पर रहम ही नहीं करना चाहते हैं। क्या हिंदी साहित्य और पत्रकारिता में नये लोग आज के आइकन बनने की कूवत नहीं रखते या हमारे भीतर इतनी भी अक्ल नहीं है कि ऐसे लोगों की बातों को एक बूढ़े का प्रलाप मान कर उसे या तो उपेक्षित कर दें या उसे भूल जाएं। याद रखें कि ये सब सेलेब्रेटी हैं और इन्हें अपने को ख़बर में बनाये रखना आता है और इसके लिए ये हर चाल चलेंगे ही चलेंगे। हम क्यों ऐसे शिकारियों के जाल में फंसते हैं, यह रटते हुए कि “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमें फंसना नहीं।”
प्रभाष जोशी जी सीता को सती बना गये। अपने देश की हर महान नारी सती ही होती है। भले ही वह पति द्वारा लगायी गयी आग में जले या ना जले। सती तो कुंती भी रही, जिसने पति की आज्ञा से अन्य पुरुषों के साथ संसर्ग करके अपने पति को अपने बच्चों का पिता बनाया। सती तो द्रौपदी भी हुई, जिसे एक को चाहने के एवज़ में पांच-पांच पतियों की पत्नी बनना पड़ा। आज का समय होता तो शायद कह दिया जाता कि “अरे वाह! एक पर चार फ्री?” सती तो भारती मिश्र भी हुई, जिसने पराजित होते अपने पति मंडन मिश्र के बदले शंकराचार्य से शास्त्रार्थ कर के पति को जिता दिया था और सती तो भंवरी देवी भी है, जो समाज के कल्याण की खातिर जाने कितनों की वासना के दंश झेल आयी।
मगर हमारा समाज सती इसे नहीं मानता। वह सती उसे मानता है, जो अपने मृत पति की चिता में रूप कुंअर की तरह जीवित जल जाती या जला दी जाती है। तो प्रभाष जोशी जी से पहले पूछें कि जब से वे वयस्क हुए हैं, तब से उनके घर में कोई तो विधवा हुई होगी? तो सती प्रथा के समर्थक के रूप में क्या उसे उन्होंने समाज की मान्यता के अनुसार सती बनाया, क्योंकि कहा भी गया है – “चैरिटी बिगिन्स एट होम।” ऊपरवाला प्रभाष जोशी जी को लंबी उम्र दें, मगर फिर भी एक बार यह सोचने में आ जाता है कि उनके न रहने पर (धृष्टता के लिए माफी) वे यह वसीयत करके जाएंगे कि उनकी पत्नी उनके साथ सती हो जाएं? या क्या वे यह गारंटी दे सकते हैं कि उनकी धर्मपत्नी उनकी इस वसीयत को पूरा-पूरा सम्मान देते हुए सती हो ही जाएंगी या उनके घरवाले उन्हें ऐसा कर ही लेने देंगे? प्रभाष जोशी जी की मति भ्रष्ट हो जाने से क्या उनके पूरे परिवार का माथा फिर जाएगा? नहीं ना। तो फिर उनकी भ्रष्ट मति पर आप क्यों माथा पीट रहे हैं?










कोई रहम नहीं विभाजी, निर्मम कुटाई होगी। ताकि फिर कोई सिरफिरा इंटेलेक्चुअल नामधारी प्राणी सती और ब्राह्मणवाद का ऐसा नग्न समर्थन न कर पाए। आपने शानदार लिखा है। लेकिन मर्दवादी प्रभाष जोशी को महिला के नाम पर गुलामों को देखने की लिप्सा है।
आलोचना करते करते चार्वाक जी, जगदीश्वर, अनाम घोस्ट राइटिंग और सती प्रथा जैसे नामधारी सीधे गाली गलौज पर उतर आए हैं. अपनी साईट को चलाने के लिए इतना ओछापन PSEUDO INTELLIGENCE की निशानी है.
विभाजी, पाश ने कहा था कि सबसे खतरनाक होता है, सपनों का मर जाना। मैं उनकी इज़्ज़त करती हूं। मैं क्षमायाचना सहित कहना चाहूंगी कि उससे भी खतरनाक होता है सपनों का दूषित हो जाना। जब सपने ही संदिग्ध हों तो उन्हें देखने और उन्हें पूरा करने के काम में लगे होने का दावा करने वालों का क्या विश्वास किया जाए !? बात सिर्फ प्रभाष जोशी की नहीं है, विभाजी। बात यह है कि यह वक्त है कि हम गहराई से जानें कि और कौन-कौन हैं जो दूषित सपनों को छुपाए हमारे आपके दिलों और घरों में घुसा है और बदलाव का नाटक खेल रहा है।
आप पहली महिला हैं जो इस प्रकरण पर सामने आयी हैं। मैं आपको यकीन दिलाती हूं कि इस वक्त नेट पर एक इतिहास लिखा जा रहा है। यह ऐसा माध्यम है जिस पर लिखे से कलको कोई अपना मुंह नहीं फेर सकता। यह काग़ज़ की तरह फाड़ा या जलाया नहीं जा सकता। यह किसी चैनल की (सामूहिक होते हुए भी) निजी आर्काइव का हिस्सा भी नहीं है जिसे एडिट करके या छुपा के या अन्य तरह से नष्ट कर दिया जाए। यहां किसी चीज़ को संदर्भ से काटकर पेश नहीं किया जा सकता। यह जनसत्ता या दैनिक हिंदुस्तान नहीं है। हर साइट या ब्लाग जिस संदर्भ पर भी बात करते हैं, ईमानदारी के साथ उसका लिंक लगाते हैं जिस पर एक क्लिक करते ही आप पूरे मामले से रुबरु हो जाते हैं। यह किसी स्टिंग का कैसेट भी नहीं है जिसमे फेरबदल करके या नष्ट करके झांसेबाजी की जाए। यहां तक कि मेरे जैसे छद्मनाम से लिखने वाले भी अपने कहे से मुंह नहीं मोड़ सकते। इतिहास पूछेगा कि कहां थी मैं अब तक ? कहां हैं मैत्रेयी पुष्पा, कहां हैं सुधा अरोड़ा, कहां हैं चोखेरबालियां, कहां हैं नारी ब्लाग, कहां हैं राजेंद्र यादव के सिगार पर हंगामा खड़ा करने वाला हिंद-युग्म ?
काश कि कोई इस सारे मामले का अंग्रेजी में अनुवाद करके नेट पर डाल देता। तब सारी दुनिया के हमारे मित्र जानते कि हिंदुस्तान कहां खड़ा है ! हिंदुस्तान से जो तथाकथित प्रगतिशील आ-आकर विदेशों में अय्याशी करते हैं उसकी कीमत कौन चुकाता है ! कितने संदिग्ध और दूषित हैं उनके स्वप्न !
वे जानेंगे कि गांधीवाद से लेकर वामपंथ तक यहां जितने भी आंदोलन चलते हैं, उनकी मलाई, हलवा, आइसक्रीम और चाकलेट कौन सा वर्ग/वर्ण खाए जा रहा है !
विभाजी, जिनको कर्मकाण्डों में ही सब कुछ होता दिखता हो, जिनके लिए पाखण्ड रुटीन हो उन्हें बहुत ज़्यादा फर्क पड़ता ही नहीं पड़ता कि कौन सी पार्टी शासन में है और कौन सी व्यवस्था समाज में लागू है। नयी व्यवस्था होगी तो वे गर्लफ्रेंड बना के सब कुछ कर लेंगे और उस व्यवस्था के नायक बन जाएंगे। पुरानी व्यवस्था होगी तो वे किसी को भी बहिन बना लेंगे, राखी भी बंधवा लेंगे और इस विधि से उसके करीबी होकर अपनी यौनिक गरीबी दूर कर लेंगे। और आपको हैरानी हो तो हो मुझे कोई हैरानी नहीं है कि इस दूसरी विधि से भी हमारी बहुत सी बहिनें भी उतनी ही खुश और संतुष्ट रहती हैं जितने कि भाई। क्योंकि सारा मामला कमरे के अंदर ‘सेफ’ रहता है। बाहर वही राखी वही तिलक वही सभ्यता वही संस्कृति वही परंपरा वही महानता वही विभिन्नता में एकता। सांप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती।
आपने तो लिखा भी है ‘सच का सामना’ पर। सबको आबजेक्शन है कि भई ऐसी-ऐसी गंदी-भद्दी बातें परदे पर क्यों कही जा रहीं हैं। गंदी बातें अगर गंदी थीं तो की ही क्यों गयीं ? मैं आपको सही बात बताऊं तो इसपर सचमुच एतराज बहुत ही कम लोगों को होता है कि दरी के नीचे क्या है ? अभी कहीं पढ़ा भी था कि कैसे सरिता-मुक्ता और ‘कांसे कहूं’ आदि में समस्याएं छपती थीं कि ’‘मेरे अपने भांजे से संबंध हो गए हैं, ‘इनको‘ पता चल गया तो क्या होगा?’’ ‘‘मैं अपनी साली से मालिश करवा रहा था कि बिजली चली गया और संबंध हो गए, पत्नी को पता चल गया तो क्या होगा ?’’ ‘‘मैं अपनी भतीजी को लेकर पहाड़ चढ़ रहा था, हम लुढ़के तो हमने एक-दूसरे को पकड़ लिया और फिर छोड़ा ही नहीं।’’ वगैरह-इत्यादि। इनमें अपराध-बोध इतना नहीं झलकता था जितना कि ‘इनको-उनको’ पता लग जाने का डर।
तो सारा मामला पता चलने, न चलने का है विभाजी।
यह सुंदर गद्य का देश है। और प्रभाषजी भी, सभी जानते हैं, सुंदर गद्य लिखते हैं। मैं तो यादवजी, उदयजी, मुद्राराक्षसजी और ऐसे सभी ‘जीओं’ को सलाह दूंगी कि भैय्या, सुंदर गद्य लिखो, आलतू-फालतू चक्करों में क्यो पड़ते हो !? अब उस सुंदर गद्य के डब्बे में अस्पष्टता का मलबा भरा पड़ा हो, तर्क हों न हों, तथ्य गलत-सलत हों, कौन देखता है ?
सही बात तो यह है विभाजी कि हमारे स्वपन प्रदूषित हैं। कोई भी आंदोलन चलाने से पहले हम सारा गणित लगा लेते हैं कि कहीं इस आंदोलन से फलां जाति-वर्ण को या हमारे अलावा किसी जाति-वर्ण को तो कोई फायदा नहीं पहंुच जाएगा ? इस मामले पर हमारी बहिनों की चुप्पी का राज़ भी यही लगता है। मैं भी कोई अपवाद नहीं हूं। मैंने बस इतनी ईमानदारी बरती है कि अपना नाम स्वप्नदोषी रख लिया है। पाश भाई जिन्हें मैंने कभी राखी नहीं बांधी, अपना नाम इस घटिया प्रसंग में लाने के लिए मुझे माफ करेंगे।
बाकी इतिहास सब देख ही रहा है।
दिलचस्प है कि प्रभाष ‘जी‘ के जितने समर्थक हैं, दो-चार पंक्तियों से ज्यादा में प्रतिक्रिया नहीं दे रहे। लेदेकर एक-दो बातें उनके पास हैं कि ये नीच लोग हैं, ये चोर हैं, ब्लाग या साइट चलाने के लिए कर रहे हैं। प्रभाष ‘जी’ ने जो अच्छा कहा उसका जिक्र नहीं कर रहे। आप इन समर्थकों का (धारण-शक्ति से आया ?) कांफिडेंस देखिए कि लंबे-लंबे, तर्कों-तथ्यों-विश्लेषणों से भरे आलेखों को दुपंक्तिया गालीनुमा भाषा से झुठलाकर मोहल्ला और टिप्पणीकारों पर ही गाली देने का आरोप भी लगाए दे रहे हैं।
भाई मेरे, जब दूसरों पर बेसिर-पैर के लट्ठ चलते हैं तब नहीं याद आता कि यह साइट चलाने के लिए हो रहा है कि जनसत्ता बेचने के लिए !? तब आपकी समझ में बड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठ रहे होते हैं !? और अपनी कही ‘अच्छी’ बातों का बहुत फल और तारीफ खा चुके हैं प्रभाष‘जी‘।
मेरी मोहल्ला और मानवीय दृष्टिकोण रखने वाले अन्य सभी व्यक्तियों/संस्थाओं से गुजारिश है कि यह ‘उच्च’ जाति-वर्ण, ‘निम्न’ जाति-वर्ण, सवर्ण-अवर्ण आदि शब्दों का प्रयोग बंद किया जाए। व्यक्ति या समूह का मूल्यांकन उसके कर्म और संवेदना के आधार पर हो न कि जन्म के आधार पर। मजबूरी हो तो निम्न या उच्च से पहले कथित शब्द का प्रयोग करें। चली आ रही ऐसी भाषा के चलते योग्य कथित निम्न लोगों का हौसला और घटता है और अयोग्य कथित उच्च लोगों का हौसला (धारण-क्षमता ?) और बढ़ जाता है और उन्हें अपने अंदर झांकने की ज़रुरत ही नहीं महसूस होती।
सिद्धार्थ जी ,लगता है आप समझदार व्यक्ति हैं,लिखा हुआ पढ़ लेते हैं,मेरा सारा लिखा आपके सामने है आप कृपया बताएं कि कहां पर गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया गया है। क्या आलोचना लिखना गाली है ? यदि आलोचना लिखना गाली है तो फिर आलोचना विधा को क्या कहेंगे ? लिखा हुआ और यथार्थ की कसौटी पर परखा हुआ छद्म नहीं वास्तविक होता है,छद्म लेखन के लिए जिन उपायो की जरूरत होती है उनमें से एक है रूपकों के जरिए अनेकार्थी बातें करना और यह काम प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्कार में खूब किया है ,सती के प्रसंग में।
किसी के लिखे पर लिखना,आलोचनात्मक नजरिए से लिखना गाली-गलौज नहीं कहलाता,यह स्वस्थ समाज का लक्षण है, आंखें बंद करके रखना,जो कहा गया है उसे अनालोचनात्मक ढ़ंग से मान लेना आधुनिक होना नहीं है, आधुनिक व्यक्ित वह है जो असहमत होता है,आप जब असहमत होने वालों को गलत ढ़ंग से व्याख्यायित करते हैं तो हमें दिक्कत होगी ,हम चाहेंगे आप हमसे तर्क के साथ असहमति व्यक्त करें।निष्कर्ष और जजमेंट सुनाकर फैसला न दें।
आज देशकाल.काम ने भी प्रभाषजी के सामने कुछ महत्वपूर्ण सवाल रखे हैं। लिंक है:
http://www.deshkaal.com/Details.aspx?nid=228200921575027
बिल्कुल सही कहा जगदीश्वर जी ने. आलोचना करना लेखन की एक विधा है. लेकिन यहां मुद्दों में कंफ्यूजन है. आलोचना करना और निर्मम कुटाई होगी, कूडेदान में जाओगे जैसी शब्दावली इस्तेमाल करने में बहुत फर्क है. दूसरी बात ये है कि आपके मनपसंद प्रतिक्रियाकर्ताओं की फौज लोगों की प्रतिक्रियाओं को उनके साईजों से जज करती है… मेरे भाई पहले समझो, तौलो और फिर बोलो. ऐसी सोच पर दया के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता.
Gali-galauz बंद करो भाई. ये क्या mazak bana rakha है आप लोगों ने. अपने muh miya mitthu बन कर doosron को भी gandagai failane के लिए क्यों uksa रहे हो भैया.
अगर साइज़ देखते होते मेरे भैय्या तो साइज़ तो प्रभाष जोशी के लेखों, कैरियर और संबंधों का भी कुछ कम बड़ा नहीं है। असली समस्या तो आपकी यही है कि यहां साइज़ देखे बिना बात की जा रही है। अब उनका भी क्या क्या किया जाए जिन्हें किसी को ‘नीच’ और ‘चोर’ कहना गाली नहीं लगती और ‘इतिहास के कूड़ेदान’ जैसा मशहूर मुहावरा गाली लगती है। कुछ ढंग की बात कहो तो जवाब भी दें। आपके पास तो न साइज़ है न तर्क न तथ्य। क्यों अपना और हमारा वक्त खराब कर रहे हो।
भाई रणवीर जी, इंटरनेट पर जाओगे तो कुछ भी हो सकता है,मैं बहुत ही भरोसे कह रहा हूं, ‘मोहल्ला लाइव’ पर आयी प्रतिक्रियाओं को महज प्रतिक्रिया के रूप में लें,संपादकों के नाम पत्र तो इससे भी खराब भाषा में आते हैं और संपादकजी उन्हें पढते भी हैं,यह बात दीगर है कि छापते नहीं हैं।
‘निर्मम कुटाई’ को शाब्दिक अर्थ में ग्रहण न करें ,उसकी मूल भावना को पकडने की कोशिश करें ,जैसे प्रभाष जी से सती के ‘सत्व’ और ‘निजत्व’ की मौलिक खोज की है, वे जरा प्रमाण दें सती के ‘सत्व’ के ? उनकी सती का ‘सत्व’ सावित्री तक ही क्यों रूका हुआ है ? वह वर्तमान काल में क्यों नहीं आता ? मैं दावे के साथ कह सकता हूं यदि वे यही बात हाल के दिनों में हुई किसी सती के बारे में बताएं तो उनकी सारी पोल स्वत: खुल जाएगी। कृपया रूपकंवर के ‘सत्व’ का रहस्य बताएं ? क्या राजस्थान में सती के मंदिर स्त्री के ‘सत्व’ और ‘निजत्व’ के प्रदर्शन के लिए बने हैं ? बलिहारी है,कृपया सतीमंदिरों के सती को ‘सत्व’ में रूपान्तरित करके देखें क्या अर्थ निकलता है ? जरा उस बेलगाम गद्य की बानगी ‘नेट’ पाठक भी देखें और ‘सत्व’ का आनंद लें ? दूसरी बात यह कि मेरा परिचय और पता जान लें ,वेब पर नाम के साथ आसानी से मिल जाएगा।
जगदीश्वर चतुर्वेदी की बात सही है. प्रभाष जोशी की आलोचना इस सन्दर्भ में अवश्य होनी चाहिए. और फिर प्रभाष जी भी किसी के खिलाफ लिखते हैं तो पूरे मन से ही उसका मुकाबला करते हैं. इस तरह की आलोचना के लिए हर लेखक विचारक को तैयार रहना चाहिए. और फिर प्रभाष जोशी की ओर से कोई चाहे तो उन सवालों का जबाव लिखकर दे सकता है. भाषा थोडी कठोर हो तो भी चलेगा लेकिन बात होनी चाहिए.
इसी विषय पर कुछ और जगहों पर भी बहस जारी है। देखें इस लिंक को –
http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com
yah सारी बहस जनसत्ता मो क्यों नहीं छप sakti
महेन्द्र जी, छप तो सकती है लेकिन यह क्यों जरूरी है कि ब्लाग पर हो रही बातचीत के प्रति हम उतना ही गंभीर रवैया रख सकें? वहां जब चीज आयेगी (अगर आयी तो) आप देखेंगे कि एक पक्ष दूसरे पक्ष को ढंक कर ऐसे इस विषय को उठायेगा मानो कोई जानबूझ कर जोशी जी पर कीचड उछाल रहा है. यह सही नहीं है. जोशी जी ने हाल में ही हम सबको बताया है कि वे ब्लाग में लिखे को नहीं पढते, प्रिंट आउट तक निकलवाकर नहीं देखते. वे जिसमें सुविधा महसूस करते हैं उसी में ‘रहते’ हैं.
माफ करना मित्रो, ब्राहमण नहीं हूं फिर भी वक्तव्य देने चला आया। दरअसल एक ज़रुरी सच्चाई बताने आया हूं कि इस देश को मैंने नहीं नाथूराम ने आज़ाद कराया था। आपको तो मालूम है कि नाथूराम ब्राहमण था और उसकी धारण-क्षमता की गोली मेरे सीने में मलाई की तरह घुल गई थी।
गुरुदेव प्रभाष जोशी जी से कहना आपका चेला गांधी आया था। कमज़ोर धारण-क्षमता की वजह से ज्यादा देर रुक नहीं पाया। अच्छा मित्रो चलता हूं, पाचक-क्षमता भी जवाब दे रही है।
आलोक तोमर आखिरकार गुरु के बचाव में उतर ही आए। कौन कहता है कि इंटरनेट पर लिखे से “महानायकों” को फर्क नहीं पड़ता। आलोक तोमर को पढ़िए भड़ास पर। यहां हैं उस लेख के तीन पैराग्राफ अविकल। आखिर लाइन में भाषा के लठैतपने पर गौर जरूर करें। प्रभाष जोशी के बचाव में हजारों साल की ट्रेनिंग और धारण क्षमता वाला कोई नहीं आया। पहला वार आया है एक ऐसे शख्स की ओर से जिसमें बकौल प्रभाष जी, धारण छमता नहीं है और जो ब्रह्म से संवाद भी नहीं करता है। गुड डिफेंस प्रभाषजी। टिके रहने के कौशल का अच्छा प्रदर्शन। लेकिन गेंद बाउंड्री के अंदर है अभी। -
“सुबह-सुबह हमारे गुरु और हिंदी के या शायद भारत के महान संपादक प्रभाष जोशी का फोन आया। पहले तो उन्होंने यही पूछा कि कहां गायब हो। लेकिन वे जल्दी ही मुद्दे पर आ गए। मुद्दा यह है कि अखबारों की ईमानदारी का क्या आलम है और लोकसभा चुनाव के दौरान खबरों को छापने के लिए अखबारों ने जो निर्लज्ज धंधा किया है, उसके लिए क्या उन्हें माफ कर देना चाहिए? प्रभाषजी हालांकि इंटरनेट पर बहुत नहीं जाते। उन्होंने कई बड़े अखबारों जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, अमर उजाला और दैनिक जागरण आदि के नाम ले कर खुलेआम लिखा और जगह-जगह बोला कि इन लोगों ने अपना ईमान बेचा है।
इन अखबारों ने अपने उस पाठक को मूर्ख बनाया है जो उनके पन्नों पर छपे हर शब्द पर भरोसा करते हैं और पैसा दे कर अखबार खरीदते हैं। प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को ले कर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई। फिर उन्होंने कहा कि नेट भारत में अभी दो प्रतिशत से ज्यादा लोगों के पास नहीं पहुंचा है और नेट का कोई समाज नहीं हैं इसलिए मुख्यधारा यानी अखबारों में यह बहस होनी चाहिए।
प्रभाष जी पूज्य हैं और सारा जीवन पत्रकारिता के ईमानदार और एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं इसलिए पत्रकारिता के साथ हो रहे द्रोह पर उनकी चिंता और आक्रोश में मैं उनके साथ हूं। लाखों और लोग भी हैं। लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए। गुनाहगार अखबारों के भाड़ मीरासियों ने प्रभाष जी और उनके सरोकार के साथ जुड़ने वालों को कोसा और आरोप भी लगाया कि प्रभाष जी सठिया गए हैं और अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। प्रभाष जी को इन अल्लू पल्लू लोगों के बयानों से कोई फर्क नहीं पड़ता। वे हिंदी पत्रकारिता के महानायक हैं।”
बेटा, एक ज़रुरी बात रह गयी थी, आना पड़ा। अच्छा बताओ तो, गुरुदेव प्रभाष जी ने इस बहस के बारे में कुछ कहा कि नहीं। क्या बोला! आप सब को लल्लू-पंजू बोल रहे हैं। ठीक ही तो है बेटा, मैं तो अपने अखबारों में छात्रों से बराबरी के स्तर पर संवाद करता था। अब इतनी धारण-क्षमता तो थी नहीं कि भेद-भाव करता ! अच्छा पूछना कि जो प्रयोग मैं किया करता था वही बा ने किए होते तो क्या वे तब भी मेरे गुरु बने रहते ? थोड़ा अजीब तो लगता है बेटा पर हिम्मत करके पूछ ही लेना। धारण-क्षमता का सवाल है, बेटा। अच्छा चलता हूं। इस सवाल पर गुरुदेव नाराज़ न हुए तो फिर आऊंगा। अभी रास्ते में गुरु गौडसे की समाघि पर मत्था भी टेकना है। सी यू बेटा, हां।
एक महत्त्वपूर्ण बहस को इस तरह अगंभीर मोड देना शायद ठीक नहीं है. यह एक गंभीर मुद्दा है कृपया इस तरह भदेस भाव से चलता करने का प्रयास बेमानी है.
अपने ही अखबार में ‘कागद कारे’ करते रहे प्रभाष जोशी अगर हिम्मत और नैतिकता है, तो यहां उनके खिलाफ आईं समस्त असहमतियों का उत्तर दें। वाह प्रभाषजी जब खुद दूसरों से असहमत हुए तो उसकी खबर आपने जनसत्ता में ले ली मगर जब हम आपसे असहमत हैं और खुलकर विरोध कर रहे हैं तब आप किस कोने में बैठे ऊंग रहे हैं? आखिर यह कौन-सी पत्रकारिता है महापुरुष?
चार्वाक सत्य जी, आप काहे को नाराज हो रहे हैं, आलोक तोमर के गद्य में व्यंग्य होता है और सत्य भी। आलोक जी का यह कथन प्रभाष जोशी के लिए काफी है,आलोक तोमर ने लिखा है ”लेकिन जहां तक भारत में नेट का समाज नहीं होने की बात है, वहां मैं अपने गुरु से विनम्रतापूर्वक असहमत होने की आज्ञा चाहता हूं। भारत में इंटरनेट का समाज आज लगभग उतना ही विकसित है जितना छपे हुए अखबारों और पत्रिकाओं का। प्रभाष जी ने अगर एक शब्द लिखा या बोला तो नेट के तमाम ब्लॉग और वेबसाइट पर हर शब्द के जवाब में हजारों लाखों शब्द लिखे गए।” इससे बेहतर प्रशंसा नेट लेखकों की नहीं हो सकती,रही बात प्रभाषजी के ‘महानायक’ होने की तो वे ‘महानायक’ रहेंगे, उस पद का फिलहाल दूर-दूर तक हिंदी में कोई संपादक दावेदार नहीं है। वे अपने चर्चित साक्षात्कार में व्यक्त किए गए प्रतिगामी विचारों के बावजूद ‘महानायक’ रहेंगे।वे प्रेस संपादकों की परंपरा के अंतिम ‘महानायक’ हैं, क्योंकि यह युग ‘नायक’ और ‘महानायक’ के अंत के साथ ही शुरू हुआ है।
आलोक तोमर ने लिखा है ”प्रभाष जी को बताया गया था कि इंटरनेट पर बहुत धुआंधार बहस उनके बयानों को लेकर छिड़ गई थी और अब तक छिड़ी हुई है। उस बहस में मैं भी शामिल था इसलिए उन्होंने मुझसे बात की। गुस्से में लिखे हुए एक वाक्य के लिए झाड़ भी लगाई।” यहां ‘ झाड़’ शब्द पर ध्यान दें। प्रभाष जोशी अपने सबसे प्रिय पत्रकार को क्या लगा रहे हैं ? ‘झाड़’, हम लोगों से संवाद नहीं करने का मूल सूत्र यहां मिल गया है,काश हम भी उनके चेले होते अथवा सहकर्मी होते तो कम से कम जो सौभाग्य बंधुवर आलोक तोमर को मिला है वह हमें भी नसीब होता। आलोक तोमर की बाकी बातों पर कुछ नहीं कहना है क्योंकि उन्हें अपनी बात अपने लहजे में कहने का उन्हें पूरा हक है ,और ‘अल्लू पल्लू’ कोई गाली नहीं है,वैसे ही बेकार का शब्द है। दोस्त अगर गाली भी दे तो हंसकर सुन लेना चाहिए ,आलोक तोमर हमारे अजीज दोस्त रहे हैं और आज भी हैं।
चतुर्वेदी जी, नाराज तो मैं पिछले दो-ढाई हजार साल से हूं। और प्रभाष जोशी होंगे आपके नायक और महानायक संपादक। आप बनाइए उनकी मूर्ति और कीजिए उनकी पूजा।
बहरहाल, जब हम वर्तमान समय के आख्यान और विमर्श को लिपिबद्ध कर रहे होंगे, तो उनकी जगह वहीं होगी जहां होनी चाहिए यानी इतिहास के कूड़ेदान में। खरी खरी बात ही कर लीजिए। जोशी जी की पत्रकारीय उपलब्धि क्या है? उन्होंने अपने अखबार को किस तरह मौत के मुंह में डाल दिया, अगर आप ये नहीं जानते तो आप बेहद भोले हैं। इस कथित महानायक के नेतृत्व में जनसत्ता के संस्करण तब बंद हुए हैं और उसके पत्रकार तब बेरोजगार हुए, जब हिंदी मीडिया का विस्फोट काल था। उस समय कोई मंदी नहीं थी। जनसत्ता आज इस हाल में है (सुबह अपने न्यूजपेपर हॉकर से दो मिनट बात कर लीजिएगा) तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है। दफ्तर का चपरासी, मशीनमैन, कंपोजिटर या महानायक संपादक?
कृपया मुझे गलत साबित कीजिए और बताइए कि जोशी जी एक सफल संपादक हैं। आप उन्हें सफल बता देंगे, इतने भर से हम उन्हें महान मान लेंगे। या यही साबित कर दें कि वर्तमान कालखंड के निर्णायक मोड़ों पर उन्होंने जनता का पक्ष लिया है। तब तो हम उनकी प्रोफेशनल नाकामी को भी झेल लेंगे और उन्हें महानायक मान लेंगे।
पंडों की तरह पोंगापंथी लेखन, निजी और प्रोफेशनल जीवन में घनघोर जातिवादी, घोषित महिला विरोधी, पत्रकार के तौर पर असफल। ऐसे महानायक आपको ही मुबारक हों।
प्रभाष जी से असहमति होनी ही चाहिए लेकिन बहस का सरलीकरण तीख नहीं है
चार्वाक सत्य जी,’जनसत्ता’ को बर्बाद करने में मालिकों की बड़ी भूमिका है,संपादक तो निमित्त मात्र है। आप प्रभाष जी को कहां रखते हैं यह समस्या नहीं है, वे जहां हैं वहीं रहेंगे। किसी पत्रकार को प्रबंधन क्षमता के आधार पर नहीं संपादकीय क्षमता के आधार पर देखना चाहिए। प्रभाष जोशी निश्चित रूप से अद्वितीय संपादक थे। यह स्थान उन्होंने लेखन के बल पर बनाया है,भूल और गलतियों के आधार पर नहीं,प्रत्येक लेखक से भूलें होती हैं,दृष्टिकोणगत भूलें भी होती हैं,’परफेक्शन’ की कसौटी पर प्रभाषजी को परखने की जरूरत नहीं है,वे उन बीमारियों के भी शिकार रहे हैं जो प्रतिष्ठानी प्रेस के संपादक में होती हैं। ये बीमारियां प्रतिष्ठानी प्रेस के संपादक में कहीं पर भी हो सकती हैं। ‘एक्सप्रेस ग्रुप’ की हालत को समग्रता में देखें, किस तरह वह धीरे धीरे मार्केट में कमजोर होता चला गया है,’जनसत्ता’ इस प्रक्रिया में तुलनात्मक तौर पर ज्यादा बर्बाद हुआ है,यह दुख की बात नहीं है, आप अखबार को यदि ‘विचार’ साहित्य का पर्याय बना देंगे तो यह दुर्गत किसी के भी साथ हो सकती है, खबरों के युग में,नई तकनीक और नई प्रबंधन कला के युग में ‘एक्सप्रेस’ ग्रुप के मालिक अपने को समय के अनुरूप तेज गति से बदल ही नहीं पाए और एक्सप्रेस ग्रुप को समग्रता में संकट से गुजरना पड़ रहा है। ‘जनसत्ता’ अखबार बेखबर लोगों का अखबार जब से बनना शुरू हुआ तब से उसका प्रेस जगत में दीपक लुप लुप करने लगा। यह दुर्दशा प्रभाषजी के संपादनकाल से ही आरंभ हो गयी थी। एक जमाना ‘जनसत्ता’ हिन्दी के जागरूक पाठकों का ही नहीं हिन्दी अनिवार्य अखबार था,बाद में किसी को पता ही नहीं है कि वह कहां है, क्या छाप रहा है,पाठकों से जनसत्ता का अलगाव पैदा क्यों हुआ यह अलग बहस का विषय है।
निमित्त मात्र महानायक संपादक! वाह चतुर्वेदी जी, ये है भाषा की जलेबी। इसे डिकंस्ट्रक्ट करके देखने की जरूरत है। प्रतिष्ठानी पत्रकारिता की बीमारियों से ग्रस्त भी और अद्वितीय संपादक भी। आप भाषा के अंतर्द्वद्व का मैनेजमेंट करके प्रभाष जी को ऐसे ही महान नहीं साबित कर सकते। आपके मुताबिक जब जनसत्ता की दुर्दशा शुरू हुई थी तो क्या जोशी जी ने संपादक की अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी। वो जनसत्ता की दुर्दशा के शिकार थे या कारण। अपने घर की तुलसी पर आधे-आधे पेज कारे करने और जो लिख दूंगा चलेगा का उनका दंभ भी तो इस अखबार के पतन के कारणों में शामिल था। और “जनसत्ता का पाठकों से अलगाव क्यों हुआ ये अलग बहस का विषय” क्यों है चतुर्वेदी जी? क्या सिर्फ इसलिए कि इससे एक भू-देव संपादक की छवि गंदी होती है। समग्रता में चीजों को देखिए। वरना आपका सत्य आभासी सत्य होगा। भाषाई सिंटेक्स के साथ ही समाजशास्त्रीय व्याख्याओं को भी ध्यान में रखिए।
और यकीन मानिए, मालिकों को सफल जनसत्ता से कोई शिकायत नहीं थी। जनसत्ता अगर कमाई करके देता तो मालिक एडिशन बंद नहीं करते।
चार्वाक सत्य जी, मुश्किल यह है प्रभाष जी सोचते हैं वे ‘महान’ कार्य कर रहे थे , ‘महान’ लेखन कर रहे थे , वे जो भी कुछ लिखते हैं ‘महान’ लिखते हैं ,और इस ‘महानता’ के बोझ ने ही ‘जनसत्ता’ अखबार के बारह बजा दिए। संपादक के नाते और सलाहकार संपादक के नाते प्रभाष जोशी अपनी भूमिका निभाने में एकदम असफल रहे हैं, ‘जनसत्ता’ की दुर्दशा के कारणों में से उनका संपादकीय रवैयाया गैर पेशेवर था, वे प्रधान कारण थे। वे यह मानते ही नहीं थे, कि अखबार के लिए नयी तकनीक,नयी प्रबंधन शैली,नयी मार्केटिंग आदि की जरूरत होती है, वे तो सिर्फ ‘विचार’ और ‘अपने नाम’ पर अखबार बेचना चाहते थे और परिणाम सामने हैं। उनके नाम से अखबार पसर चुका है, कोई उसे खरीदने को तैयार नहीं है। आज ‘जनसत्ता’ को कम से कम छापा जाता है और उससे भी कम बिक्री होती है।अधिकांश शहरों में तो वह स्टाल पर भी नजर नहीं आता,यह स्थिति दिल्ली की भी है। ‘जनसत्ता’ का पराभव ठोस सच्चाई है आभासी अगर कुछ है तो प्रभाष जोशी का लेखन। आलोक तोमर ने सही बात कही है उसे गंभीरता से लेना चाहिए,आलोक तोमर ने प्रभाष जी के बारे में सही लिखा है वह,’ एक हद तक आत्मघाती सरोकारों से जुड़े रहे हैं ।’ एक संपादक के ‘आत्मघाती सरोकार’ उसके व्यक्ितत्व,पेशे और पाठक सबको नष्ट करते हैं। ‘जनसत्ता’ कमाए यह चिन्ता प्रभाषजी की कभी नहीं थी,यह बात दीगर थी कि जनसत्ता के बहाने उन्होंने अपना हिसाब-किताब ठीक जरूर रखा। उनके गैर पेशेवर रवैयये के कारण ही बेहतरीन पत्रकारों को जनसत्ता से अलग होना पड़ा।
इन सबसे बावजूद वो आपके महानायक हैं और आप चाहते हैं कि सभी उन्हें महानायक मानें? तथ्य और विचार को लेकर ऐसा हीगेलियन द्वंद्व अद्भुत है। विचार की सत्ता अगर वस्तु से इतर नहीं है तो ये विरोधाभास क्यों।ये तो वही बात हुई जो जोशी जी कह रहे हैं। लेकिन अमूर्त से मूर्त की उल्टी गंगा बहाएंगे तो विश्वसनीयता कहां से लाएंगे। 21वीं सदी के पहले दशक के अंत में भारतीय समाज की कई संरचनाएं स्क्रूटनी के दौर में हैं और कई मठ दरकने लगे हैं। प्रभाष जोशी को एक व्यक्ति की तरह मत देखें। वो एक पतनशील विचार के प्रतिनिधि मात्र हैं। लेकिन भोंडे और क्रूड प्रतिनिधि।
चार्वाक सत्य का ब्लाग लेखन एक आब्शेश्ड लेखन है जहाँ एक गलत के खिलाफ दूसरा गलत पेश किया जा रहा है.
आज की तारीख में आप जरूर देखिये इसी बहस से जुडी कुछ जरूरी लिंक :
http://deshkaal.com/Details.aspx?nid=२२८२००९२१५७५०२७
http://janatantra.com/2009/08/24/charwak-satya-reply-to-prabhash-ji/
http://janatantra.com/2009/08/24/questions-on-prabhash-ji-interview/
शुक्रिया
लेकिन मान्यवर पटेल जी, वो दूसरा गलत है क्या जो चार्वाक ओब्सेस्ड होकर कह रहा है। या ऐसे ही जो मन में आया बोल दिया। इतने अगंभीर और पानदुकान टाइप तो आप न थे। चार्वाक का असत्य आप खोलिए ना। महंथ की तरह फैसले मत सुनाइए। वो जोशी जी को ही शोभा देता है। आप तो ब्रह्म से संवाद भी नहीं कर सकते न आपमें कई पीढ़ियों की धारण करने की क्षमता है।
चार्वाक सत्य जी,थोड़ा गंभीरता के साथ इस ‘डिस इनफारर्मेशन’ अभियान यानी ‘सत्य का अपहरण कांड’ पर भी ध्यान दें,
प्रभाष जोशी के अभी पुराने साक्षात्कार की स्याही सूखी भी नहीं थी कि उन्होंने अपने ‘ज्ञान’ और ‘सत्यप्रेम’ का परिचय फिर से दे दिया है। जो लोग उनके प्रति श्रद्धा में बिछे हुए हैं उन्हें गंभीरता के साथ ‘जनसत्ता’ (23 अगस्त 2009) के ‘कागद कारे’ स्तम्भ में प्रकाशित ‘सड़ी गॉठ का खुलना’ शीर्षक टिप्पणी पर सोचना चाहिए। यह टिप्पणी एक महान सम्पादक के सत्य- अपहरण की शानदार मिसाल है।
प्रभाष जोशी ने अपने मिजाज और नजरिए के अनुसार चाटुकारिता की शैली में जसवंत सिंह प्रकरण पर जसवंत सिंह के बारे में लिखा है ,” अपने काम,अपनी निष्ठा और अपनी राय पर इस तरह टिके रहकर जसवंत सिंह ने अपनी चारित्रिक शक्ति और प्रमाणिकता को ही सिद्ध नहीं किया है, अपने संविधान में से दिए गए अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को भी बेहद पुष्ट किया है।” आश्चर्यजनक बात यह है कि प्रभाषजी एक ऐसे व्यक्ति के बारे में यह सब लिख रहे हैं जो खुल्लमखुल्ला भारत के संविधान और संप्रभुता को गिरवी रखकर कंधहार कांड का मुखिया था,इस व्यक्ति को मौलिक अधिकार का इस्तेमाल करने का अधिकार देने का अर्थ है हिटलर की टीम के गोयबल्स को बोलने का अधिकार देना , सवाल यह है गोयबल्स यदि हिटलर से अपने को अलग कर लेगा तो क्या उसके इतिहास में दर्ज अपराध खत्म हो जाएंगे ? प्रभाषजी जब जसवंत सिंह की पीठ थपथपा रहे हैं तो प्रकारान्तर से जसवंत सिंह के ठोस राजनीतिक कुकर्मों ,राष्ट्रद्रोह और सत्य को भी छिपा रहे हैं, क्या भाजपा और शिवसैनिकों के द्वारा किए गए सांस्कृतिक हमले और अभिव्यक्ति की आजादी पर किए गए हमलों का जसवंत सिंह द्वारा किया गया समर्थन हम भूल सकते हैं ? क्या बाबरी मस्जिद विध्वंस और दंगों में संघ और उनके संगठनों की भूमिका और उसके प्रति जसवंत सिंह का समर्थन भूल सकते हैं ? प्रभाषजी जब संघ के बारे में,कांग्रेस के बारे में लिखते हैं उन्हें अतीत की तमाम सूचनाएं याद आती हैं,घटनाएं याद आती हैं,लेकिन जसवंत सिंह प्रकरण में उन्हें जसवंत सिंह की कोई भी पिछली घटना याद नहीं आयी, इसी को कहते हैं सत्य का अपहरण और ‘डिस- इनफॉरर्मेशन’ .
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रभाष जी को इतिहास और राजनीतिक दलों के अन्तस्संबंध पर विचार करते समय यह भी धन रखना होगा कि कांग्रेस,कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट आदि सभी दलों के मानने वाले इतिहासकारों में अपनी ही विचारधारा और नजरिए के लोगों के बीच मतभेद रहे हैं, इतिहास को लेकर मतभिन्नता के आधार पर कभी कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने अपने सदस्य इतिहासकारों के खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं की।
प्रभाष जी यदि जसवंत सिंह को अपनी एक सडी गॉठ खोलने के लिए यदि साढे छह सौ पेज चाहिए तो आपको जसवंत सिंह के राजनीतिक सत्य का उजागर करने के अभी कितने पन्ने और चाहिए ? प्रभाषजी जैसा महान पत्रकार यह विश्वास कर रहा है कि जसवंत सिंह को किताब लिखने के कारण निकाला गया,सच यह है कि राजस्थान के अधिकांश भाजपा विधायक और उनकर नेत्री चाहती थीं कि पहले अनुशासनहीनता के लिए जसवंत सिंह को पार्टी से निकालो, वरना वे सब चले जाते,भाजपा ने हानि लाभ का गणित बिठाते हुए जसवंत सिंह को निकालने में पार्टी का कम नुकसान देखा, उनके निष्कासन में अन्य किसी कारक की खोज करना मूर्खता ही है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इतिहास के प्रति प्रभाषजी का किस्सा गो का रवैयया रहा है। भक्तों से जबाव की अपेक्षा है।
शोले फिल्म का चक्की पिसिंग सीन याद है। अमिताभ बच्चन मौसी के पास धर्मेंद्र के लिए बसंती का हाथ मांगने जाता है। वो धर्मेंद्र को जुआरी, शराबी, कोठे पर जाने वाला सब कहता है लेकिन आखिर में वो यही कहता है कि धर्मेंद्र दिल का बहुत अच्छा है। यही गति चतुर्वेदी जी की है। घपले चाहे लाख हों पर चतुर्वेदी जी जोशी जी को महानायक बताएंगे। जोशी जी चतुर्वेदी जी को प्रखर विश्लेषक बताएंगे। दोनों एक दूसरे के लिए कहेंगे कि इनकी बात ध्यान से चुनो, विचारों की प्रखरता के सामने दंडवत हो जाओ। इसमें जातिवाद की कौन सी बात है। भोले लोगों को कुछ समझ में नहीं आता। चार्वाक निपट मूर्ख है।
अभी इसे छोड़ो। यह देखो कि ब्रहम-रत्नों, जोशी-चक्रधर-पुराणिक (आजकल गायब हैं) से सजी तहलका हिंदी में जोशी जी ने विनोद कांबली को कैसा चरित्रप्रमाणपत्र बख्शा है:-
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विनोद कांबली के ‘सामना’ के सिर्फ प्रोमो मैंने देखे हैं. इस या उस चैनल पर उसके कटे छंटे टुकड़े देखे हैं. लेकिन विनोद कांबली को मैं जानता हूं. उसने सचिन तेंदुलकर के साथ मिल कर स्कूल के एक मैच में रेकॉर्ड 664 रनों की भागेदारी की थी तब से मैं उसके क्रिकेट कैरियर को नजदीक और बड़ी रुचि से देख रहा हूं. देश में जहां तहां उसे खेलते देखा है. सन् इंकानवे में आस्ट्रेलिया के दौरे और फिर विश्व कप में मैदान पर खेलते और उसके बाहर होटलों में और समारोहों में बरतते देखा है. आस्ट्रेलिया के तो उस दौरे पर सचिन, विनोद और सौरभ तीनों थे और तीनों अभी लड़के थे. तब इन्हें देख कर कोई भी अंदाज लगा सकता था कि क्रिकेट में कौन कितनी दूर जाएगा. विनोद तब भी खेलने के साथ उन सब शगल और धींगामुश्ती में पड़ा रहता था जिनमें महानगरों के बिगड़ैल लड़के लगे रहते हैं. शाम वह लड़कियों और लाड़ लड़ाने वाले प्रवासी भारतीय परिवारों में बिताता और देर से होटल लौटता.
शुरूआती वर्षो में विनोद कांबली का प्रदर्शन सौरभ गांगुली से तो अच्छा था ही सचिन से भी बेहतर था. लेकिन सफलता उसके माथे में घुस गई और उसका दिमाग खराब कर दिया. अब क्रिकेट पर उसका ध्यान कम और एक्स्ट्रा करिक्यूलर एक्टिविटी में ज्यादा लगता था. वह कहीं से भी उस अनुशासन को मानता दिखता नहीं था जिसके बिना कोई भी लड़का या युवक गंभीर या बड़ा खिलाड़ी नहीं हो सकता. यह कोई नहीं कहता कि एक खिलाड़ी को बाकी जीवन को निलंबित कर देना चाहिए. लेकिन अगर आपका जीवन आपके खेल पर केंद्रित नहीं है तो आप खेलते तो रह सकते हैं बड़े या महान खिलाड़ी नहीं हो सकते. सभी खेलों के बड़े खिलाड़ियों के जीवन और शैली को देखिए. वे खेल और कैरियर से खेल नहीं करते. विनोद कांबली जितना खेलता था उससे ज्यादा अपने खिलाड़ी होने की प्रसिद्धि पर खेल करता था. समझदार लोग बहुत पहले कहने लगे थे कि वह अपने को बरबाद कर रहा है.
आप स्कूल में उस रेकॉर्ड भागेदारी से अब तक सचिन और विनोद के कैरियर को देखिए. सचिन अगर ब्रेडमन के बाद का सबसे महान बल्लेबाज और आदर्श खिलाड़ी माना जाता है तो सिर्फ क्रिकेट की प्रतिभा पर नहीं. सचिन को सचिन तेंदुलकर उसके एकाग्र और एकांतिक समर्पण ने बनाया है. विनोद कांबली में यह समर्पण किसी भी चीज पर नहीं है. वह बेचारा फुदकने वाला पतिंगा है. उसने प्रसिद्धि की शमा पर अपने को जला दिया. इसके लिए सिर्फ वह और वही जिम्मेदार है. पिच पर आप जब गेंद का सामना कर रहे होते हैं तो कोई सचिन क्या भगवान भी आपकी मदद नहीं करता. इसलिए जब विनोद कांबली कहता है कि उसे लगता है कि सचिन उसकी ज्यादा मदद कर सकता था तो वह
सरासर झूठ बोल रहा है. वह अपनी विफलता की जिम्मेदारी एक ऐसे खिलाड़ी पर डाल रहा है जिसने अपने किए-अनकिए के लिए सिर्फ खुद अपने को जिम्मेदार माना. विनोद कांबली की बहानेबाजी को कोई सच कह सकता है?
विनोद की झूठी बहानेबाजी को सच बता कर इसलिए प्रचारित किया गया कि सचिन महान खिलाड़ी और महान आदमी है. कांबली उसका दोस्त है और एक लंगोटिया जिगरी दोस्त उस पर लांछन लगा रहा है. इससे सनसनी मचती है और लोग शो देखने को लालायित होते हैं. यह न कांबली का सच है न सचिन का न उनकी दोस्ती का. प्रोग्राम को बेचने के लिए खेला गया हथकंडा है. यह कहीं से भी विनोद का सच नहीं है कि उसने इसका सामना किया है. यह निजी विकृति, बहानेबाजी और शोशेबाजी को बेचने की कोशिश है. लोगों में निंदा करने और दूसरों को बुरा बताने की इच्छा होती है. जितनी बुरी बातें और जितनी वाहियात निंदा उतनी ही लोगों को ताक-झांक करने की इच्छा. इसे आप सच कैसे कह सकते हैं? यह निजता को बेचने का धंधा है. सच का सामना बनाने वाले सिद्धार्थ बसु से प्रणय रॉय ने पूछा – हम कितना गिर सकते हैं? बसु ने कहा – इस देश का ध्येय सत्यमेव जयते है. सच से कैसा डरना? वाह! विनोद कांबली का तो सत्यमेव जयते हो गया! सिर पीट लीजिए.
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लिंक संभालो:-
http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/aughatghaat/348.html
शंबूक जी, बहस को हल्का बनाने से क्या होगा ? आप उन्हें नायक,महानायक नहीं मानते ठीक है, आपका लोकतांत्रिक हक है और लोकतांत्रिक विवेक है कि आप उन्हें ही क्यों किसी को कुछ भी मानें,आप धन्य हैं,हमें धिक्कार है, आपका मूल्यांकन सही ,मामला अगर इतने से ही शांत हो जाए और जोशी जी बोलें तो समझें ठीक है, वरना तो विभारानी की बात ही ठीक है ‘हम सब रहम करें’,
अव्छी नेट पत्रकारिता को खराब करने से क्या लाभ ? आप जिस तरह के उदाहरण दे रहे हैं और हल्की बातें कहकर सारे मामले को दूसरी दिशा देना चाहते हैं वह तो प्रभाष जोशी के लिए अच्छा होगा और उनके भक्तों की इस बहस में व्यक्त धारणाओं की पुष्टि ही होगी।आप कम से कम अपना नहीं तो अपने कहे के प्रभाव का तो ख्याल रखें,ऐसा करते रहेंगे तो इससे साख नहीं बनेगी, इसे उपदेश न समझें,यह सुझाव भी नहीं है, यह महज एक राय है। इसे मानें या न मानें आपके ऊपर है। सबसे अच्छा तो यही होता कि आपको लोग वास्तव में नामों से सामने अपनी बातें रखते, खुलकर प्यार से बातें करते, नाम बदलकर लिखने से बात का वजन खत्म हो जाता है,मुखौटों पर लोग वैसे भी विश्वास नहीं करते। आप अच्छे लोग हैं और लोकतांत्रिक लय में रहते हैं, हमारे लिए तो यही काफी है अब यह आपके ऊपर है अपना गांव किसे सौंपें ,अपना काम कैसे करें,कैसे व्यक्त करें,सही नाम से या छद्म नाम से ,यह तो आपके ऊपर है। आप अपने दोस्त और दुश्मन को नहीं पहचानेंगे तो फिर हम बहस क्यों कर रहे हैं ?मैं फिर दोहरा रहा हूं, प्रभाष जोशी हमारे वर्ग शत्रु नहीं हैं। हम लोग लिखते हैं,घृणा का व्यापार नहीं करते। जो लेखक,पाठक, यूजर, राजनीतिज्ञ,संस्कृतिकर्मी घृणा का व्यापार करता है उसका समाज में कोई स्थान नहीं है।हमें अभी तक यही लगा है आप अच्छे लोग हैं,लोकतंत्र में विश्वास करते हैं,घृणा तंत्र में नहीं। हमारे मतभेद,विरोध,असहमति आप जो भी कुछ कहें वह प्रभाष जोशी के लिखे के साथ हैं, उनके व्यक्तिगत जीवन से हमें क्या लेना-देना जब तक वह सामाजिक नहीं होता।
नाम क्यों जानना चाहते हैं चतुर्वेदी जी। हम डरते हैं नाम बताने से। बेहद डरपोक हैं हम। दोबारा शिरोच्छेद न हो जाए, इस बात से भयभीत हैं। अपनी हजारों साल की ट्रेनिंग से जानते हैं कि ये कितना हिंसक समाज है। नाम सामने आ गया तो जोशी जी अहिंसक गांधीवादी नहीं रहेंगे। उनकी भाषिक हिंसा तो आप देख ही रहे हैं।
और इंटरनेट तो किसी की पहचान का मोहताज भी नहीं है। दुनिया के कुछ सबसे पॉपुलर ब्लॉगर कौन हैं, कोई नहीं जानता। लेकिन उनकी बात पर बात होती है। हिंदुस्तानयों को नाम जानने की कुछ ज्यादा ही इच्छा होती है। क्यों, आप जानते हैं। बहरहाल आपकी भाषा अपना धैर्य और संतुलन खो रही है। इसलिए कृपया उसे विश्राम दें। हमारे लिए तो ये कुमारसंभव के काल से और उससे भी पहले से चली आ रही लड़ाई है। स्पार्टकस अभी मरा नहीं, थका नहीं। नेट पत्रकारिता को हम हिंदी प्रिंट की साहित्यिक पत्रकारिता की तरह गुडी-गुडी नहीं रहने देंगे। भ्रम में न रहें। हम अच्छे लोग नहीं हैं।
चार्वाक सत्य प्रभाष जी से चिढ कर उनके बारे में ऐसी बातें लिख रहे हैं जिससे सहमत होना संभव नहीं है. बताइये इस बात को सुनकर जोशी जी की पत्रकारीय उपलब्धि क्या है? इंडियन एक्सप्रेस की नीतियों की जानकारी रखने वाले किसी भी सज्जन को यह बात समझ में आयेगी कि हिन्दी पत्र के संपादक के हाथ में कितना पावर है. लेकिन इन सब बातों का क्या है? बस यह दिखाइये कि उनके दफ्तर में कितने ब्राह्मण है और सत्य को समझ लिया मान लीजिये. यह बहुत ही स्थूल किस्म की सोच है जो हिन्दी जगत में बहुत विध्वंसकारी भूमिका अदा कर रही है. प्रभाष जी के विचार का विरोध करिए. हम सब कर रहे हैं. लेकिन इस लिए नहीं कि वे पोंगा पंडित हैं और हमेशा ही ब्राह्मणवाद के प्रसार के लिए सक्रिय रहे हैं. माफ कीजिये. यह भी एक तरह का स्थूल, पिछडावादी आब्शेस्ड लेखन है. इस नये जमाने में यह स्थूल पिछडावाद ब्राह्मणवाद की तरह एक खतरनाक विचारधारा है.
Aur Bhi gam hai jamane me Iske siva,
Jo bhai Kripya Ise Gali-galauj ka adda na banaye.
PLZ
हितेंद्र जी, प्रभाष जी के पास जनसत्ता में अनलिमिटेड पावर थे। जनसत्ता में काम करने वाला हर आदमी इसकी पुष्टि कर सकता है। ये कोई रहस्य नहीं है। उन्होंने जो चाहा, जैसे चाहा छापा, जिसे चाहा काम पर रखा। आपका महानायक बेहद पावरफुल था। इस पावर से उन्होंने क्या किया ये और बात है। गोयनका परिवार का हस्तक्षेप उन्हें न्यूनतम झेलना पड़ा।
और हां, अगर चार्वाक का लेखन विध्वंसकारी भूमिका निभा रहा है तो ये बेहद सार्थक लेखन है। यही तो इस लेखन का लक्ष्य है। हम ऐसे अधोगामी विचारों का क्षय ही तो चाहते हैं। आप भी चाहते होंगे। सिरजने का काम तो उसके बाद शुरू होगा। इस बारे में बात करने से कुछ लोगों का दम क्यों फूलने लगता है कि जनसत्ता के संपादकीय विभाग में काम करने वाले हर तीन में दो शख्स एक ही जाति का था। भय किस बात का है? किस विचारधारा के विध्वंस से आपको डर लग रहा है?
मुझे खुशी है कि आपने मेरी बातों को सही तरीके से लिया और अच्छा सवाल खडा किया. चार्वाक जी, हम सब ने तुर्गनेव की ‘पिता और पुत्र’ पढी है. उसका मुख्य पात्र बाजारोव , जो एक निहिलिस्ट था, कहता है कि विध्वंस के बिना सार्थक निर्माण संभव नहीं. एक समय यह बात ठीक लगती थी. लेकिन फिर एक समय आता है जब उसी उपन्यास के एक और पात्र की बात हमारे दिमाग पर हावी होने लगती है- ‘ यू केन नाट बी द जज आव योर फादर’. हिन्दी की विचित्र स्थिति का अंदाजा मुझसे बहुत ज्यादा आपको होगा. एक समय था जब हमलोग समझते थे कि सुरेन्द्र प्रताप सिंह बहुत पावरफुल आदमी हैं. सच यह नहीं था. प्रभाष जोशी एक समय नौकरी पर रखने की ताकत रखते थे. लेकिन इस तरह की शक्ति के अलावा उनके पास ज्यादा शक्ति नहीं रही होगी. एक व्यक्तिगत किस्सा बताना चाहूंगा. भारत की एक बडी मीडिया संस्था गुजरात समाचार ने तय किया कि वह एक अखबार शुरू करेगी. उस समय जिस आदमी को यह दायित्व दिया गया कि वह जगह जगह से आये आवेदनों पर विचार करके नियुक्तियां करे उसने सबसे पहले मुझे चुना और फिर हम दोनों ने मिलकर बहुत सारी नियुक्तियां की. हमलोग बहुत पावरफुल समझे जाते थे क्योंकि 40 से ज्यादा लोगों को नौकरी दी थी, और भी दे सकते थे. करोडों रूपये का मामला हमलोगों के हाथ में था. मं व्यक्तिगत कारणों से पत्रकारिता छोड कर दूसरे काम में लग गया. बाद में असली पावरफुल व्यक्ति का जो हुआ वह मेरे लिए सबक से कम नहीं था. चार्वाक जी, आप चाहे इसे मेरा सनकीपन समझें लेकिन हो सके तो इस बात को मान लें कि अखबार मालिक हिन्दी के पत्रकार-सम्पादक को चपरासी से ज्यादा नहीं समझते. ऊपर से भले ही आप आप करें भीतर ही भीतर उसे अपना व्यक्तिगत नौकर ही समझते हैं. हिन्दी में वैसे भी दो चार लोग हैं जिसे देखकर हिन्दी वालों को भी थोडा मान मिलता है. रामविलास शर्मा, नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, मैनेजर पाण्डेय जैसे लोग कम हैं. आप इन महानुभावों से असहमत हों, उनसे झगडा करे लेकिन उन्हें बचा कर भी रखें. इन सब लोगों में कुछ कुछ ऐसा है जिससे हमें बहुत असुविधा होती है, खीज भी होती है लेकिन क्या किया जाये? हमें हिन्दी के वृहत्तर सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें बचाकर रखना पडेगा. और दो में तीन ब्राह्मण की बात ? हिन्दी का विकास जिस रूप में हुआ है उसको ध्यान में रखने पर यह कुछ स्वाभाविक ही लगेगा. हिन्दी बौद्धिक समाज का चरित्र पिछले 10-15 सालों में तेजी से बदला है. अब यहां अन्य जातियों का दखल बढा है. अब तीन में दो नहीं तीन में एक ब्राहमण ही मिलेगा. समय अब बदला है. उम्मीद है परिदृश्य और भी बदलेगा. कुछ ज़्यादा बोल गया होउं तो क्षमा प्रार्थी हूं.
पर, यह मत समझिएगा कि सती के प्रसंग में जोशी जी की जान हमलोग छोडने वाले हैं.
प्रभाष जोशी पर जो दे-दनादन चल रहा है उसका मकसद क्या है भाई…क्या लिखा है उस पर सहमती-असहमति के बजाय किसने लिखा है इसपर दिल के छाले फोडे जा रहे है…
येवगेनी विसलेविच बाजारोफ का चरित्र उपन्यास के अंत में करुणा का पात्र बनता है हितेंद्र जी, मगर ये न भूलें कि विज्ञान और मेडिसिन का ये विद्यार्थी अपने विचारों की वजह से दुनिया का पहला बॉल्वेशिक भी माना जाता है। रूसी एरिस्ट्रोक्रेसी और उसे बचाने के लिए मध्य 19वीं सदी में जिस क्षद्म उदारवाद का जन्म हुआ, उसकी परतें खोल कर रख दी थीं तुर्गनेव के इस पात्र ने। हर सही को कामयाब होना पड़ेगा, ये किसने लिखा है। बाजारोफ समय के प्रवाह में इंटरवीन करता है और अपनी भूमिका निभा जाता है।
बहुत कुछ जो पुराना है वो सिर्फ इसलिए श्रेयकर है कि वो पुराना है, की सोच कई बार आदमी को उस बंदरिया की तरह बना देता है जो अपने तीन चार दिन से सड़ रहे बच्चे को सीने से चिपकाए डाल-डाल घूमती है। वो करुणा तो जगाती है, लेकिन उसके शुभचिंतक भी चाहते हैं को उस सड़ती हुई लाश को छोड़कर जीवन में आगे बढ़े। हिंदी और हिंदू समाज में भी कई लोग पुरातन के प्रेम में बंदरिया की गति को प्राप्त हो रहे हैं।
अब पुराने नायकों से हमारे समय का काम नहीं चलने वाला हितेंद्र जी।
हितेंद्र जी, बाजारोफ बहुत सारी चीजों को खारिज करता है लेकिन मानव समाज की प्रगति में विज्ञान के महत्व को स्थापित भी करता है। हम भी खारिज करने और स्थापित करने वाली चीजों को चुन सकते हैं। हम और आप जैसे लोग अलग अलग तरह के चुनाव करके भी संवाद में बने रह सकते हैं।
आपकी आखिरी पंक्ति महत्त्वपूर्ण है. हमारे लिए तुर्गनेव की पुस्तक का पाठ थोड़ा अलग हो सकता है. लेविन (आन्ना कारेनिना) की बातों और बाजारोव (फ) की दलीलों मे भी संवाद की गुंजाइश है. संवाद जारी रहना चाहिए. ब्लाग का पता दीजिए बन्धु या फिर एक बार मिलने आइये http://hittisabablogspotcom हित्तिसबा के बाद . और blogspot के बाद . denaa ना भूलें.
“……..अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आप के समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग है….” – प्रभाष जोशी
प्रभाष जोशी के दिमाग मे छिपी जातिवाद की सड़ी गाँठ का कमाल देखिए कि जिसने सैकड़ों साल पहले धर्म बदल दिया उसकी भी जाति के नागपाश से मुक्ति नहीं हुई। प्रभाष जोषी ने मुस्लिमों की धर्मांतरण से पूर्व की जाति के आधार पर उनकी योग्यता का मूल्यांकन किया है। प्रभाष जी ने स्पष्ट कहा है कि मुस्लिम हाथ से काम करने वाले लोग हैं और वो (यानि की हिन्दु-ब्राह्मण) दिमाग से काम करने वाले लोग हैं। अभी किसी ने उनके इस ब्राह्मण-दर्शन पर ध्यान नहीं दिया है।
दूसरी जरूरी बात यह है कि प्रभाष जी ने अपने ब्राह्मण-दर्शन में यह कहीं नहीं कहा है कि गैर-ब्राह्मण क्रिकेट खेलने के लायक नहीं है। न ही उन्होंने यह कहा है कि गैर-ब्राह्मण को कम्प्युटर मं। काम करने की योग्यता नहीं है। उन्होंने ये भी नहीं कहा कि गैर-ब्राह्मणों को प्रधानमंत्री बनने का हक नहीं है। ऐसा कहने का खतरा उठाने की हिम्मत शायद उनमें नहीं है। मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आज चंद्रशेखर सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह जीवित होते तो प्रभाष जी को अपनी महान-प्रधानमंत्री सूची में………..
खैर,आप प्रभाष जोशी के जालीदार नकाब के पीछे की हकीकत देखिए। उनका कहना है कि क्रिकेट हो,कंप्युटर हो या प्रधानमंत्रित्व हो सबसे महान लोग वही होंगे जिनका जन्म ब्राह्मण पारे में हुआ है। भाई जाति व्यवस्था की क्लासिक थीसिस भी तो यही है कि ब्राह्मण सबसे ऊपर….. उसके बाद का पदानुक्रम आप सब जानते हैं।
इसी ब्राह्मण -दर्शन के तहत यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्रभाष जी के खुदमुख्तारी में जनसत्ता के भीतर महत्वपूर्ण पदों पर पहुँचने वालों को बचपन से किस बात की ट्रेनिंग दी गई थी।
कुछ लोगों को छद्म नामों से लिखी टिप्पणियों या लेखों पर एतराज है। उन लोगों से गुजारिष है कि जरा सोचें कि खुल कर विरोध कर सकने की स्थिति के अभाव में ही लोग छापामार तरीके से विरोध कर रहे हैं। जिन को जातिय भय नहीं है उनको पेट मारे जाने का भय है। कोई सिंह,चतुर्वेदी,श्रीवास्तव खुल कर घिनौने जातिवादी का विरोध कर पा रहा है तो इसके पीछे भी जातिय सुरक्षाबोध का व्यापक समाजशास्त्र है। इक्कीसवीं सदी में जातिय आधार पर सुरक्षा-असुरक्षा का समीकरण बनना हमारे देष की षर्मनाक वास्तविक स्थिति को दिखाता है।
कुछ लोगों को इन लोगों की भाषा पर एतराज है। उनसे सिर्फ यही पूछुँगा कि जब उनके आँख में सूजा चुभोया जाएगा तो उनके मुँह से कैसी ध्वनी निकलेगी। सारेगामा या…………….। सूजा चुभोने वाले से वह व्यक्ति संवाद करेगा या……….। कम से कम मेरे देखे तो अभी तक किसी ने भी ऐसी अभद्रता नहीं कि जिसके आधार पर कोई यह कह सके कि यह प्रभाष जोशी के चरित्रहनन की साजिष है।
नैतिकता और षुचिता का सोटा चलाने से पहले ठोस भौतिक सच्चाईयों को नजरअंदाज न करें। प्रभाष जोशी के सतीवाद और ब्राह्मणवाद की पैरवी करते ढीठ बयानों को पढ़ते वक्त यह भी ध्यान रखें कि यह बयान 2009 में दिया गया है न कि 1909 या 1809 या 1709 या 1609 में।
कुछ लोग प्रभाष जोशी को पत्रकारिता का महानायक जैसा कुछ बता कर उनके विरोध की धार की कुंद करना चाहते हैं। पहले तो उनको यह समझना चाहिए कि जिस तरह से वो लोग किसी को महानायक बता रहे हैं उस तर्क पद्धति पर कोई किसी को महाखलनायक भी बता सकता है। दुनिया जानती है कि महानायकत्व का गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह शब्द जिस फिल्मी दुकान से लूटा गया है वहाँ भी सुपरस्टार और सुपरएक्टर का भेद सबको समझ में आता है। फिल्मी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता महानायक नहीं बन पाते। आज भी षाहरूख खान सबसे बड़े स्टार है लेकिन विजय राज या के के मेनन से बहुत ज्यादा बेहतर अभिनेता नहीं माने जाएंगे। इस तरह के चालू स्टारडम की ओट से किसी बहस की हत्या करने की चालाक कोशिश ठीक नहीं है।
अंत में कुछ तथाकथित सुसभ्य लोगों से कहुँगा कि पाखण्डियों तुम प्रभाष जोशी से असहमत हो ऐसा कहके अभी तो अपनी खाल नहीं बचा सकते। जैसा कि प्रभाष जोशी ने सालों-साल से किया होगा। ढोगियों ऐसे कुकृत्यों से असहमत होने के पिण्डछुड़ाऊ पालिष्ड असहमति प्रदर्शन के ढोंग के बजाए मुखर विरोध करो। तुम लोग तो ऐसे सहमत या असहमत हो रहे हो कि जैसे जोशी साहेब कोई वैज्ञानिक या दार्शनिक सिद्धातं का प्रतिपादन कर रहे हैं और तुम उनसे शास्त्रार्थ करने बैठै हो। रस्मअदायगी करना बंद करो। खुल कर समर्थन करो और खुल कर विरोध करो।
[...] शीर्षक है, “प्रभाष जी की मति भ्रष्ट हो गई है”। अब आप बताइए कि अगर किसी के विचार हमसे [...]
हितेंद्र जी, मिलना तो हमें वैचारिकी के धरातल पर भी होगा। मेरा तो हिंदूवादी स्मृतियों से हजारों साल पहले देशनिकाला हो चुका है। बात की शुरुआत हुई है, आशा है जारी रहेगी। ये रियल संवाद वर्चुअल स्पेस में ही चले तो बेहतर। आपकी नीयत साफ है। जगदीश्वर जी के बारे में यही बात मैं विश्वास के साथ नहीं कह सकता। अब देखिए, जब प्रभाष जी के ब्राह्मणवादी विचारों और कुकर्मों की जब पोल खोली जा रही है तब वो चाहते हैं कि लोग जसवंत सिंह पर प्रभाष जी के लिखे की भाषिक संरचना पर विचार करें।
चार्वाक सत्य जी, अगर नीयत पर संदेह न हो तो (या कम हो) तो संवाद रचनात्मक हो जाता है जगदीश्वर जी इक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय हैं इसलिए आपको ऐसा लगता होगा.
हिन्दुवादी स्मृतियों को लेकर, हिन्दी के विद्वानों के चरित्र को लेकर मैंने लम्बा संवाद विचारकों से किया है. इस सम्बन्ध में मेरी राय अभी भी बन नहीं पायी है. परंपरा का सारा दारोमदार हम ब्राह्मणवादियों पर छोड देते हैं. हमारा इतिहास और हमारी परम्पराएं सबने मिल कर ही बनायी होंगी. या फिर, हो सकता है, दमन का जो रूप रहा होगा उसमें सांस्कृतिक वर्चस्व इस रूप में रहा होगा कि एक पक्ष दूसरे को हजारों सालों तक उठने ही न दे. मेरी राय है कि ब्राह्मणवाद का मुकम्मिल चेहरा अंग्रेजी राज के दौरान ही बना है. औपनिवेशिक दौर में. राममोहन से लेकर प्रभाष जोशी तक एक रेखा खिंचती है. पर इस रेखा को जरूरत से ज्यादा रेखांकित करना हमारे हिन्दी समाज को लाभ नहीं पहुंचाता. मैं हिन्दी समाज की दशा-दिशा को लेकर बहुत चिंतित हूं. जिस तरह से अंग्रेजी का सांस्थानिक वर्चस्व इस देश में बढा है उसे देखते हुए यह जरूरी है कि हम अपनी भाषा और समाज के मानस को ध्यान में रखने वालों को उभारें. इस दिशा में जो नया सोच आया है, जिसे मैं 1990 का शिफ्ट कहता हूं, उसमें एक किस्म की जडविहीनता है. विशेषकर दलित विमर्श से जुडे हमारे मित्रों को मैं समझा नहीं पाता कि ब्राह्मणवाद को वे जरूरत से ज्यादा श क्तिशाली न समझें. मुझे राधाकमल मुखर्जी का एक लेख याद आता है जो उन्होंने 1916 में लिखा था. इसमें वे जाति को आर्थिक उथल पुथल के बाद प्रभावित होता हुआ देखते हैं. यह देश ब्राह्मणों पर उतना आधारित था ही नहीं जितना हम माने बैठे हैं. दिलचस्प है इस सन्दर्भ में बर्नार्ड कोन को पढना. हम उन छोटी छोटी परम्पराओं की ओर देखें जिसे राहुल जी ने देखने की कोशिश की थी. याद होगा राहुल जी कहते थे कि हर गांव में टीले की एक कहानी/इतिहास होता है. क्या आपको लगता है कि इन इतिहासों में ब्राह्मणवादी विमर्श राज करता है?
संवाद जारी रहे…
चार्वाक सत्य जी , मेरा आशय यह नहीं था कि आप जसवंत प्रकरण अथवा जोशी जी की भाषा पर विचार करें,मैं सिर्फ यह बताना चाहता था कि प्रभाषजी पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों का अपने लेखन में प्रयोग नहीं कर रहे। मैं यह भी बताना चाहता है कि वे इतिहास खासकर राजनेताओं के इतिहास पर लिखते समय किस तरह की चाटुकारिता करते हैं, इससे ज्यादा मेरी टिप्पणी का अर्थ न लगाया जाए। आप मुझ पर एकदम भरोसा मत कीजिए,लिखे पर भरोसा कीजिए, लिखा समझ में आ जाएगा कि बात भरोसे लायक है या नहीं,अभी तक हिन्दी वाले व्यक्तियों पर भरोसा करते रहे हैं और लिखे को बुद्धि के किवाड़ बंद करके पढ़ते रहे हैं, हमारे युवा दोस्तों की अनास्था सर्जनात्मक है,इसके हम प्रशंसक हैं। यह बेहतर है आप लोग लेखन से संबंध,पहचान और संपर्क बनाना चाहते हैं,यह स्वागतयोग्य है। प्रभाष जी की भाषा महज भाषा नहीं है वह उनकी सड़ी हुई वैचारिक गांठों को खेलने का सबसे बड़ा रास्ता भी है,आखिरकार नेट पर भी तो जंग भाषा में लड़ी जा रही है, भाषा में ही हम संप्रेषण करते हैं, प्रभाष जी की भाषा की बजाय आप किसी और ठोस तरीके से उनके व्यक्ितक्त और कृतित्व का उद्घाटन करना चाहते हैं तो वह भी पद्धति स्वागतयोग्य है। लेकिन अंतत: आप यह सब करेंगे भाषा के जरिए ही अत: प्रभाषजी की भाषा पर यदि विचार करते हैं तो उनका वैचारिक चरित्र और गंभीरता के साथ उद्घाटित होता है।यह विचलन नहीं है, मेरी आपको विचलित कर देने की न तो मंशा है और क्षमता ही है। आप प्रभाषजी के जितने रूप हैं उन जमकर प्रहार करें देखें वे कैसे नहीं बोलते,लेकिन यह काम तैयारी से होना चाहिए,नारेबाजी,फतवेबाजी और सतहीपन के साथ नहीं होना चाहिए। आपके ऊपर इस बहस की बड़ी जिम्मेदारी है आप जिस दिशा में जाएंगे बहस भी उसी दिशा में जाएगी।
{बहुत भयावह टिप्पणियां हैं. http://www.raviwar.com समेत दूसरी जगहों में भी मैंने पाया कि यह साक्षात्कार असल में एक विस्तृत बहस की मांग करता है लेकिन बहस के बजाय उसे चूं-चूं का मुरब्बा बनाने की हास्यास्पद कोशिश हो रही है. गांधी, अंबेडकर, सती, चार्वाक, घोस्ट के नाम से जो कुछ लिखा जा रहा है, उसमें कहीं न कहीं बहस को हल्का बनाने की कोशिश हो रही है.
samrendra
8/24/2009 }
(देशकाल.काम पर समरेंद्र जी की आपत्ति के जवाब में यह टिप्पणी रखी गयी है, आप भी पढें।)
आप सवालों की गंभीरता देखेंगे या पूछने वाले का नाम सौष्ठव। गांधी नामधारी सज्जन जो सवाल पूछ रहे हैं सीधे-सीधे स्त्री-मुक्ति की अवधारणा से जुड़ा है और प्रभाष जी से स्पष्ट जवाब चाहता है ताकि सती मामले को वे जिस तरह गोलमोल कर रहे हैं, उनकी दृष्टि थोड़ी साफ होकर सामने आए, औरत के बारे में। और ये जो विचित्र मूल्य/परंपरा ‘‘धारण-क्षमता’’ का प्रतिपादन जोशीजी ने किया है, उसके अर्थ तो गांधी, अंबेडकर अपने-अपने संदर्भों में जाना चाहते ही हैं, पत्रकार, राजनेता और समाज को भी जानने चाहिए। क्योंकि ऐसी धारण-क्षमता तो सारे मूल्यों को तहस-नहस करके रख देगी। हमारी समझ में तो यही आ रहा है। बाकी आपकी बुद्धि। बड़े और वास्तविक सवाल भयावह ही लगा करते हैं।
देख रहा हूं कि कुछ लोग मुकेशजी पर दवाब बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बहस को यहां तक ले तो आए हैं पर अब न जाने किन कारणों से घबरा रहे हैं। धारण-क्षमता से घबरा गए लगते हैं। ठीक भी तो है। इस धारण-क्षमता का खेल देखना है तो मोहल्लालाइव. काम पर पिछले 10-15 दिन में चली विभिन्न बहसों में श्री जगदीश्वर चतुर्वेदी नामक विद्वान की नेट प्रैक्टिस देखिए। शुरुआत होती है वर्चुअल लेखन को पानी का बुलबुला साबित करने से। और पल-पल रंग बदलने के बाद अंततः, दस दिन के अंदर नेट के सबसे बड़े प्रवक्ता बनकर उभर आते हैंै। भयावह है यह धारण और पाचक-क्षमता। डरना है तो इससे डरिए। डरिए कि किस तरह उनसे छोटे-मोटे लैमनचूस और वजीफे पाने वाले लोग उनके ‘वायवीय और ब्रहम-संवाद’ को बहस का सैद्धांतिक आधार बनाने में जुटे हैं। वे नेट के नए प्रभाष जोशी बनकर उभरने के जुगाड़ में है। नेट का नया नामवर भी खोज लिया गया है। जो नीयत से तो साफ दिखता है पर गुरु-भक्ति उसे फिसला-फिसला देती है। ज़रुरी और चुभते सवालों को इसलिए खारिज मत करिए कि किसी ने छद्मनाम से पूछे हैं। प्रिंट में भी लोग सालों से ऐसा कर रहे हैं। खुद प्रभाष जोशी कह रहे हैं कि मैं सी के नायडू वगैरह के लिए घोस्ट रायटिंग करता था। संपादकीय तक लिखता कोई और है और नाम किसी और का होता है। इससे बड़ी गैर-जिम्मेदारी और क्या होगी ? एक बार फैसला हो जाने दीजिए सारी बातों का। नेट, इलैक्ट्रानिक और प्रिंट के विश्वसनीय (अगर बचे हों तो) लोगों का एक पैनल ही बना लीजिए जो माफी, बहिष्कार, हस्ताक्षर-अभियान और मानसिक रोगी घोषित करने को लेकर सीधे-सीधे नियम बना दे। बहुत बर्दाश्त कर चुके। अब और नहीं करेंगे। आपको करना हो तो करो।
जगदीश्वर जी, ज़रा अपने तर्कों की खुद जांच करिये :
”लेकिन अंतत: आप यह सब करेंगे भाषा के जरिए ही अत: प्रभाषजी की भाषा पर यदि विचार करते हैं तो उनका वैचारिक चरित्र और गंभीरता के साथ उद्घाटित होता है।यह विचलन नहीं है, मेरी आपको विचलित कर देने की न तो मंशा है और क्षमता ही है।”
क्या हम इस पूरी बहस में भाषा-वैग्यानिक, शिल्पशास्त्री, वैयाकरणिक (ग्रामेरेरियन) की हैसियत से शामिल हैं कि आपकी लच्छेदार जलेबी और जोशी जी की ‘अपन’ ‘तुपन’ ‘भेनजी’ की व्युत्पत्ति (एटिमोलाजी) की चाशनी में डूब मरने के लिए। बात यहां जोशी जी के ‘रविवार.काम.’ में दिए गए इंटरव्यू में बेपर्दा हो जाने वाले उस फ़ाशिस्ट ब्राह्मणवादी डरावने ‘दिमाग के हाइपोफाइसिस’ पर हो रही है, जिसकी दूसरी मिसाल फ़्यूहरर हिटलर था। फ़ाशीवाद नस्लवादी श्रेष्ठता की दिमागी ग्रंथि से ही पैदा होता है। नस्ल की एक पहचान उसके ‘वर्ण’ (रंग या कलर) से भी की जाती है। इतिहास सबूत है -गोरे और काले में भेद का। हमारे यहां ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म में जो ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ है, बताएं कि क्या वह ‘वर्ण’ या ‘रंग’ की हायरार्की की सैद्धांतिकी है या नहीं। और ‘रंगभेद’ को ही ‘एपार्थीज़्म’ कहा जाता है या नहीं? क्या हिटलर के बाद दूसरा सबसे बड़ा नस्लवादी इयान बोथा नहीं था, जिसके विरुद्ध नेल्सन मंडेला को २८ साल जेल में बिताने पड़े ? कौन नहीं जानता कि मंडेला गांधी के ही सिद्धांतों पर अमल कर रहे थे, उसी गांधी के सिद्धांतों पर, जिसे ‘हिंदूवादी वर्णवाद’ (हिंदू एपार्थीज़्म या हिंदू फ़ाशिज़्म) के एक जोशी जैसे दिमाग के ब्राह्मणवादी ने गोली मार दी थी। उसका नाम नाथूराम गोडसे था।
आप अपनी जनेऊ की अटल एकता बनाए रखने के लिए भाषा के जिमनास्ट बन कर अपने गुरु और गोत्र की हिफ़ाज़त में कलाबाजियां खाते रहिए लेकिन एक सच यह कान खोल कर सुन लीजिए कि आपके ‘महानायक’ प्रभाष जोशी न हिंदी पत्रकारिता के गणेश शंकर विद्यार्थी हैं, न पराड़्कर, न राजेंद्र माथुर और न एस.पी. सिंह। हम लख कर देते हैं कि वे हिंदी-हिंदू पत्रकारिता के इयान बोथा हैं। और उन्होंने निचली जातियों के हज़ारों मंडेलाओं को, प्रतिभाओं को, बेरोजगारी और भुखमरी के कैदखानों में २८ साल से नहीं, ३८ साल से डाल रखा है।
वे होंगे आप ब्राह्मणों-ठाकुरों के ‘महानायक’, हमारे लिए वे बोथा और फ़्यूहरर से कम डरावने नहीं।
जोशी जी के बारे में चतुर्वेदी जी की कही इन बातों को समझने की कोशिश करें। कृपया संदर्भों के लिए इसी साइट पर उनके लेखों को पढ़ें। जब पक्ष और विपक्ष सब गड्डमड्ड हो जाए और नजरों को साफ दिखना बंद हो जाए तो इन्हें एक बार फिर से पढ़ें। उसके बाद थोड़ा पानी पीएं। फिर प्रभाष जी का मूल इंटरव्यू रविवार डॉट कॉम पर पढ़ें। एक खास समुदाय की धारण क्षमता और पाचन और समझौता करने की क्षमता के बारे में उनके उच्च विचारों को जानें। दृष्टिदोष अगर है, तो शर्तिया दूर हो जाएगा -
“रही बात प्रभाषजी के ‘महानायक’ होने की तो वे ‘महानायक’ रहेंगे, उस पद का फिलहाल दूर-दूर तक हिंदी में कोई संपादक दावेदार नहीं है। वे अपने चर्चित साक्षात्कार में व्यक्त किए गए प्रतिगामी विचारों के बावजूद ‘महानायक’ रहेंगे।वे प्रेस संपादकों की परंपरा के अंतिम ‘महानायक’ हैं, क्योंकि यह युग ‘नायक’ और ‘महानायक’ के अंत के साथ ही शुरू हुआ है।”
“प्रभाष जोशी निश्चित रूप से अद्वितीय संपादक थे। यह स्थान उन्होंने लेखन के बल पर बनाया है,भूल और गलतियों के आधार पर नहीं,”
“मैं सिर्फ यह बताना चाहता था कि प्रभाषजी पत्रकारिता के न्यूनतम उसूलों का अपने लेखन में प्रयोग नहीं कर रहे। मैं यह भी बताना चाहता है कि वे इतिहास खासकर राजनेताओं के इतिहास पर लिखते समय किस तरह की चाटुकारिता करते हैं”
“प्रभाष जी की भाषा महज भाषा नहीं है वह उनकी सड़ी हुई वैचारिक गांठों को खेलने का सबसे बड़ा रास्ता भी है”,
“संपादक के नाते और सलाहकार संपादक के नाते प्रभाष जोशी अपनी भूमिका निभाने में एकदम असफल रहे हैं, ‘जनसत्ता’ की दुर्दशा के कारणों में से उनका संपादकीय रवैयाया गैर पेशेवर था, वे प्रधान कारण थे।”
“जनसत्ता’ कमाए यह चिन्ता प्रभाषजी की कभी नहीं थी,यह बात दीगर थी कि जनसत्ता के बहाने उन्होंने अपना हिसाब-किताब ठीक जरूर रखा। उनके गैर पेशेवर रवैयये के कारण ही बेहतरीन पत्रकारों को जनसत्ता से अलग होना पड़ा।”
“प्रभाषजी राजनीति की इतनी घटिया तुलनाएं हिंदी पत्रकारिता में खूब बिकती हैं, राजनीति और राजनीति विज्ञान में नहीं। यह पत्रकारिता नहीं सस्ती चाटुकारिता है। राजनीति की विकृत प्रस्तुति है। प्रेस या मीडिया की भाषा में ‘डिस-इनफॉरर्मेशन’ है। दूसरी बात यह कि राजनीति का इतना सतही और विकृत तुलनात्मक रूप सिर्फ हिन्दी का ही कोई चुका हुआ पत्रकार दे सकता है।”
“ऐसे भारतीय नज़रिया क्या होगा, यह विवाद की चीज़ है और प्रभाषजी का नजरिया मूलत: स्त्रीविरोधी है, क्योंकि वे सतीप्रथा को ही नहीं स्त्री को भी मर्दवादी नज़रिये से देख रहे हैं।”
“आपकी भाषा स्वाभाविक मर्दवादी भाषा है और मर्दवाद प्रेस में ही नहीं, मीडिया में सबसे बिकाऊ माल है। आप महान हैं और आपके विचार महान हैं। दुख के साथ कहना पड़ रहा है, हम सम्मान सहित अपमानित हैं।”
“प्रभाषजी ने काफी कुछ गलत कहा है अभी तो कम बताया है समय आएगा तो और भी बताऊंगा,मैं निजी तौर पर प्रभाषजी का प्रशंसक हूं,उनके पत्रकारिता में योगदान के हम ऋणी हैं,उनका बेहद सम्मान करता हूं,वे हम सबके आदरणीय हैं और आदरणीय रहेंगे,लेकिन इस जंग में वे अकेले ही रहेंगे।”
“प्रभाष जी, काश आपने यह सब न कहा होता, तो हिंदी प्रेस और पत्रकार जगत का बड़ा उपकार करते। आपका उपरोक्त विवेचन पुराने किस्म के अप्रासंगिक पंडितों की तरह है। विचार, नज़रिया और तथ्य इन तीनों दृष्टियों से आपने ग़लत कहा है। क्या इस साक्षात्कार को प्रभाष जोशी के असली विचार मानें? अथवा तरन्नुम में कहे विचार मानें? मज़े के लिए कहे विचार मानें?”
यार मामला व्यक्तिगत होता जा रहा है . बहस कहाँ से कहाँ जा रही है? ब्राह्मणों, हज्जामों, ठाकुरों….यानी जातिवाद ही सत्य है …महज यही तो भारत का सत्य नहीं है.
पंचरवाला और रामकिशन धाकड़ जी, बाकी पाठकों से भी यही अनुरोध है बुरा न मानें। मैं आप दोनों के किसी भी कथन का बुरा नहीं मानता , वह मात्र कथन है और कुछ नहीं, आप जैसे चाहे निबट लें,लिखकर या कुतर्क करके मैं कुतर्क में शामिल नही हूं। मैं मोहल्ला लाइव का सम्मान करता हूं, मैं उन्हें नहीं जानता,आपको भी नहीं जानता ,इसके बावजूद आपसे प्यारभरा संवाद बना रहेगा, यह आरंभ है अंत नहीं है, हिन्दी को आप जैसे जुझारूओं की ही जरूरत है, इससे भाषा भी समृद्ध होगी और विमर्श भी समृद्ध होगा, आपको अगर प्रभाष जोशी को मेरे ‘महानायक’ कहने पर आपत्ति है तो मैं मान लेता हूं कि ने ‘महानायक’ नहीं हैं, मैं यह भी मान लेता हूं वे बोथा है, फ्यहूर हैं, क्या मेरे मानने से बात खत्म हो जाएगी? क्या मेरे मानने से यह सिद्ध हो जाएगा, जी नहीं, यह मानने न मानने की बात नहीं है, आप गाली देकर प्रभाषजी को परास्त नहीं कर सकते सिर्फ अपना गुस्सा व्यक्त कर सकते हैं उन्हें पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए गंभीरता के साथ हस्तक्षेप करना होगा और मैंने वही किया है, मैं आपके साथ हूं, पता नहीं आप क्यों बिदक और भड़क रहे हैं ? ये एक खास साक्षात्कार की आलोचना से उपजे सवाल हैं जिन्हें मोहल्ला लाइव ने उठाया है और वे इसके लिए बधाई के हकदार हैं, हम सब निमित्त मात्र है, कर्त्ता तो वे हैं,दूसरी बात यह कि क्या मैं आपके मत से सहमत हो जाता हूं तो आप मुझे प्यार करने लगेंगे ? प्रभाष जोशी के साक्षात्कार का मामला प्यार और घृणा में से चुनने या व्यक्त करने का मामला नहीं है। वह घटिया विचार है और इसीलिए इतना प्रतिवाद हो रहा है।अगर चीजों को सही ढ़ंग से और मनुष्यता की कसौटी पर परखना है तो दोस्तो दिल से प्यार करना होगा,शब्दों से नहीं। नेट पर भी बातें करने के लिए बड़ा दिल चाहिए,यह आपके पास है और हम चाहते हैं कि आप इसी तरह बने रहें और उलझे रहें तो शायद अपने को और पाठकों को यथार्थबोध कराने में मददगार साबित होंगे। मैं आपकी उपस्थिति को आनंद के साथ ले रहा हूं,शेष सोचकर लिखें तो बातें करने में ज्यादा आनंद आएगा।
जगदीश्वर जी, सच मानिये हमारे मन में किसी व्यक्ति-विशेष के लिए कोई घृणा नहीं। मानवता और सामाजिक बराबरी , भाईचारे और सबको समान अवसर मिले ऐसी हमारी आकांक्षा है। पाश और भगत सिंह, मार्क्स और गांधी भी सिर्फ़ ब्राह्मणों और सवर्णों के लिए ‘सपने’ नहीं देख रहे थे। आपने अभी भी आरोप लगाया कि आप ‘कुतर्क’ कर रहे हैं, प्रभाष जी को ‘गाली’ दे रहे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। मैंने जो आपसे प्रश्न पूछा था उसे एक बार फिर देखें :
”फ़ाशीवाद नस्लवादी श्रेष्ठता की दिमागी ग्रंथि से ही पैदा होता है। नस्ल की एक पहचान उसके ‘वर्ण’ (रंग या कलर) से भी की जाती है। इतिहास सबूत है -गोरे और काले में भेद का। हमारे यहां ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म में जो ‘वर्णाश्रम व्यवस्था’ है, बताएं कि क्या वह ‘वर्ण’ या ‘रंग’ की हायरार्की की सैद्धांतिकी है या नहीं। और ‘रंगभेद’ को ही ‘एपार्थीज़्म’ कहा जाता है या नहीं? क्या हिटलर के बाद दूसरा सबसे बड़ा नस्लवादी इयान बोथा नहीं था, जिसके विरुद्ध नेल्सन मंडेला को २८ साल जेल में बिताने पड़े ?”
ये वो सवाल थे, जो व्यक्तिगत नहीं, समाजिक-ऐतिहासिक और राजनीतिक भी थे। इनका उत्तर आपने नहीं दिया। क्यों?
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