शरीफ खानदान के लड़के डिस्को नहीं जाते!

♦ संदीप कुमार

iimc_play_pixजी, हेडिंग पढ़ कर आप चकरा गये होंगे तो यकीन जानिए कि यही हाल तब मेरा भी रहा था। और मेरा ही क्या आईआईएमसी के ‘मंच’ (आईआईएमसी के ऑडिटोरियम को यही नाम बख्शा गया है) में मौजूद सैकड़ों लोगों का भी कुछ यही हाल था। बात 17 अगस्त की है। मौका था इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन के बर्थडे का। देखते-देखते 44 साल का हो गया अपना प्यारा-न्यारा संस्थान। आईआईएमसी का पूर्व छात्र होने की वजह से और साथ ही दफ्तरी छुट्टी और पास के ही मुनिरका में रहने-होने की वजह से सोने पर सुहागा जैसा मामला था, सो मौके पर न पहुंचने का कोई वाजिब बहाना भी नहीं था।

ऑडिटोरियम के एकदम किनारे की एक कुर्सी जाकर पकड़ ली। शुरुआती दो घंटे का कार्यक्रम हा-हा-ही-ही-हो-हो-हे-हे-हाय-हाय जैसा ही कुछ मिला-जुला-सा था। और अब बारी थी एक और प्ले की। ‘लड़का हुआ है’ – यही नाम था प्ले का। इससे पहले भी बच्चों ने दो-दो प्ले किये थे, लेकिन अभिनय से लेकर निर्देशन तक का बिखराव साफ-साफ झलक रहा था, सो ‘लड़का हुआ है’ से कोई खास उम्मीद नहीं थी। लेकिन सीट से चिपका रहा, क्योंकि गुलाबजामुन और आइसक्रीम खाने का कुछ तो कर्ज-फर्ज निभाना ही था।

मंच पर घुप्प अंधेरा। प्ले शुरू होने के पहले की ये सिग्नेचर डार्कनेस थी। पर्दा उठा और सेंटर स्टेज पर रोशनी बिखरी तो दो लड़के दिखे। बाप-बेटे के किरदार में। और फिर गृहलक्ष्मी का बाहर से आगमन होता है। शायद ऑफिस से। आगमन क्या होता है, तूफान ही बरप जाता है। अगिया-बेताल हुई पत्नी के लिए पतिदेव चाय बना कर लाते हैं। श्रीमतीजी को चाय का टेस्ट पसंद नहीं आता, तो पतिधर्म निभाते हुए श्रीमान फिर से बढ़िया चाय बनाने चले जाते हैं। दर्शकों की हंसी छूटती है और वो संभलने का नाम ही नहीं लेती। लेकिन तब तक लगने लगता है कि मामला सिर्फ कॉमेडी का नहीं है, कंटेंट भी है और कुछ खास जरूर है।

सीन टू शुरू होता है। देर रात डोर बेल बजता है। तीन बजे हैं। पत्नी की गुर्राहट सुनने के बाद पतिदेव दरवाज़ा खोलते हैं। जवान बेटी का आगमन होता है। लड़खड़ाते हुए। डिस्को से टल्ली होकर लौटी बेटी को देख बाप बौखला जाता है। कहता है – ‘ये कोई आने का टाइम है, तीन बज गये हैं!’ बेटी लड़खड़ाते हुए कहती है – ‘…तो मैंने कब कहा कि चार बजे हैं।’ बाप की अकड़ को बेटी चुटकियों में मसल देती है। तब तक मां भी पहुंच जाती है। बेटी को पुचकारती है। पतिदेव को झाड़ती है। बाप ‘ठिसुआ’ जाता है। तभी बेटा फुदकता हुआ आता है। बाप से कहता है कि दीदी डिस्को जाती है, सो मैं भी डिस्को जाऊंगा। बाप चिल्लाता है, कहता है – ‘शरीफ घर के लड़के डिस्को नहीं जाते!’ मर्दवादी अहंकार की इस टूटन पर क्या खूब तालियां बजती हैं और बाप-बेटे के चेहरे पर औरत जाति में जन्म न ले पाने का दर्द भी साफ-साफ झलकने लगता है।

अगले सीन में मां-बाप बेटी को लेकर एक परिवार में पहुंचते हैं। लड़का देखने। लड़का बाप के साये में सर झुकाये चाय लेकर आता है। (इस सीन में क्या तालियां बजती हैं… खास कर गर्ल्स कॉर्नर से… मेरे पीछे बैठी लड़कियां तो बल्लियों उछलती हैं…) लड़के को चलवाकर देखा जाता है। फरमाइश होने पर लड़का बैक-टू-बैक गाने भी सुनाता है। फिर लड़के-लड़की को एकांत में बात करने का मौका भी दिया जाता है। और यहां लड़की, लड़के से इस बात की गारंटी ले लेती है कि वो रात में देर-सबेर कभी भी लौट सकती है। उधर लड़के और लड़की के मां-बाप कुछ मोल-भाव करके बात पक्की कर लेते हैं।

शहनाई की शुभ घड़ी आती है। बाराती संग लड़की जमकर नाचती है। लड़का सिमटा-सकुचाया ही रहता है। वरमाला के वक्त लड़की के नाज़-नखरे के क्या कहने! लड़का उसके गले में माला डालने जाता है, तो वो अपनी गर्दन कभी दायें-बायें तो कभी ऊपर-नीचे (कैमरे की भाषा में कहें तो पैन-टिल्ट) करती फिरती है। विदाई का वक्त आता है। बाप के कंधे से लग कर बेटा बुक्का फाड़कर रोता है। लड़की को गुस्सा आता है कि विदाई में इतनी देर क्यों लगायी जा रही है। और फिर लड़के को विदा कर लड़की अपने घर ले आती है।

प्ले का अंतिम सीन। मोबाइल पर हैं दोनों समधी। लड़की का बाप लड़के के बाप से पूछता है कि पहले अच्छी खबर सुनेंगे कि बुरी खबर! अच्छी खबर सुनने की फरमाइश पर लड़के के बाप को बताया जाता है कि आप दादा बन गये हैं। अब बुरी खबर की बारी आती है। लड़की का बाप लड़के के बाप से कहता है कि बुरी खबर ये है कि लड़का हुआ है। और फिर दोनों तरफ गहरी शांति छा जाती है… इसके बाद एक-एक कर सारे किरदार स्टेज पर आते हैं और लड़के-लड़की में भेदभाव न करने का कोरस गाते हैं। धीरे-धीरे सेंटर स्टेज अंधेरे की आगोश में विलीन हो जाता है। पर्दा तो गिर जाता है लेकिन मैसेज तो ‘बुलेट-इफेक्ट’ के साथ गहरे समा जाता है।

इस प्ले की खास बात ये रही कि इसके किरदार आईआईएमसी के किसी एक कोर्स के बच्चों ने नहीं निभाये बल्कि अलग-अलग कोर्स के बच्चों की इसमें नुमांइदगी रही। बच्चों ने कैरेक्टर के साथ जस्टिस किया और ज़बर्दस्त एक्टिंग की। खासकर डिस्को से पी-पाकर लौटी बेटी के किरदार में उस लड़की ने गजब का समां बांधा। रॉकिंग… बेबी! क्या बिंदास होकर लड़खड़ायी वो! जॉनी वाकर होते तो उसकी लड़खड़ाहट देख शायद गश खा जाते। हालांकि ये नहीं बताया गया कि स्क्रिप्ट किसने लिखी या कहां से एडॉप्ट की गयी या फिर इसे किसने डायरेक्ट किया लेकिन ऑन स्टेज परफॉर्मेंस से ये ज़रूर लग गया कि बैक स्टेज भी इस पर काफी मेहनत हुई है।

वेलडन बच्चो! आपने हंसी-हंसी में ही बड़ी बात कह दी!

(लेखक टीवी पत्रकार हैं और आईआईएमसी के हिंदी जर्नलिज्म 2005-06 के छात्र रहे हैं।)

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