जिन्ना एक दर्द है, एक चुभता हुआ एहसास…
♦ विश्वदीपक
टीवी पत्रकार विश्वदीपक ने जिन्ना पर यह संक्षिप्त सा अपना बयान हमें भेजा है। क्यों भेजा है, इसकी कोई वजह उन्होंने नहीं बतायी है। हम मान कर चलते हैं कि अभी अभी बीजेपी से निकाले गये जसवंत सिंह की जिन्ना पर आयी किताब का संदर्भ उनके दिमाग़ में रहा होगा। ये भी कि उन्होंने जिन्ना पर कोई और किताब पढ़ ली होगी – या कोई फिल्म देख ली होगी। बिना किसी हील-हुज़्जत के हम उनका बयान यहां पब्लिश कर रहे हैं : मॉडरेटर
इतिहास अपराध और दुर्भाग्य के विवरण से ज्यादा कुछ नहीं
वाल्तेयर
जिन्ना इतिहास की एक सतत त्रासदी का नाम है। मुक्ति पाने की तलाश में भटकता इतिहास का प्रेत नायक – आप उसे कायदे आजम कहिए या भारत के विभाजन का गुनहगार, लेकिन जिन्ना होना किसी खुदा से कम नहीं। जिन्ना ऐसी गलती है (खुदा की ना-पाक ख्वाहिश का नतीजा), जिसका अंजाम एक महाद्वीप पिछले साठ साल से भुगतने के लिए बाध्य है।
जिन्ना के अंदर प्यार पाने और देने की कूव्वत थी। आज़ादी जैसे नरम, मखमली खयाल के लिए सब कुछ लुटा देने का साहस था। समय की धारा के विपरीत चलने का हौसला था। भविष्य को भांप लेने की संजय दृष्टि थी। फिर भी वो इतिहास के किसी अंधेरे बंद कमरे में ज़ंजीरों में क़ैद है। मुक्तिबोध के ब्रह्मराक्षस की तरह हर बार बावड़ी के पानी से मल-मल कर हाथ धोता है, लेकिन उसके दामन की गंदगी कम नहीं होती। बल्कि बढ़ती जाती है। जिन्ना हिंदुस्तान के आकाश में भटकती हुई काली आत्मा है।
जिन्ना जो नहीं करना चाहता था, वही करता रहा और जो करना चाहता था, ठीक वही करने का साहस नहीं जुटा सका। वो अपने सीने में हमेशा एक ब्रूटस दबाये घूमता रहा। जब भी सही की ओर क़दम बढ़ाया, होश आने पर पता चला कि एक ग़लती और हो गयी। हर बार वो बुदबुदाता रहा – यू टू ब्रूटस, एक ग़लती और हो गयी। ताउम्र हिंदू मुसलमानों की एकता के लिए लड़ता रहा, लेकिन कायदे आजम बनकर रह गया। खुद पारसी लड़की से प्रेम विवाह किया, लेकिन जब बेटी ने एक पारसी से प्रेम किया तो उसे छोड़ दिया। खुद अंग्रेज़ीयत (आधुनिकता) के साये में पला बढ़ा, लेकिन आखिरी दौर में जिहाद के बोल बोलने लगा।
नीत्शे की तरह खुद को काटता रहा जिन्ना। एक पागलपन, एक उन्माद, एक जोश, एक जिजीविषा, एक विखंडित स्वप्न। जिन्ना के लिए आप एक बार नहीं दस बार रो सकते हैं। आपकी आंखों में पानी उतर सकता है बशर्ते आप यही नहीं मान बैठे हैं कि वो हमारे दौर का खलनायक था।
जिन्ना एक दर्द है। जिन्ना एक चुभता हुआ अहसास है।









hindustan aur Pakistan, in donon mulkon ne apane-apane adab yaani itihas ko itana toD marod kar rakh diya hai, likh diya hai ki ab kisi bhi soorat mein badalaav kii ummid nahi ki ja sakati. koi bhi age badhega, vah sunega, deshdrohi banega, aur pata nahin, kya-kya. vykti me virodhabhas hota hi hai, jinnah me bhi tha aur hamare tab ke netaon me bhi. varana kya us samay ke netaon ko pata nahi tha ki jinnah cancer se grast hain aur kuchh hi dino tak jiivit rahanevale hain. agar unki tamanna (pahale vazireajam banane ki) ko pooraa kar diyaa jaataa to shayad vibhajan ruk jata. magar ab vah sab ho gaya jo nahi hona chahiye. magar itana to hona hi chahiye ki log kisi ke bhi oopar apani ray de saken, itihas ke naye sire se khangal saken.
जिन्नाह ने पाकिस्तान इस लिए बनाया ताकि मुसलमानों को सम्मान के साथ जीने का मोका मिले लेकिन पाकिस्तान की हालत किसी से छुपे नहीं . आज कल जिन्नाह को महान बनाना का फैशन चल पड़ा है. लेकिन सच यही है की जिन्नाह एक सांप्रदायिक नेता था. लाखों लोगों की मौत का जिम्मेदार. क्या प्रधानमंत्री न बन सकने की कीमत पर कत्लेआम को जायज़ ठराया जा सकता है. जिन्नाह ने मुसलमानों के लिए नहीं बल्कि अपने लिए पाकिस्तान बनया था.
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