वीओआई प्रकरण : यही मौक़ा है, आओ संगठित हो जाएं

♦ मज़्कूर आलम

mazkoor-voiसमाज में दो तरह के लोगों के बीच की विभाजक रेखा अब और साफ दिखने लगी है। मीडिया में यह लकीर इतनी साफ है कि इसे देखने के लिए ज़्यादा माथापच्ची की भी ज़रूरत नहीं है। पहले तरह के लोग बड़े अधिकारी हैं, जिनकी ट्यूनिंग मालिकान से हमेशा बढिय़ा रहती है और वे मलाई खाते रहते हैं। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बड़े अधिकारियों के वर्ग को तिकड़मबाज़ी में महारत होती है और मालिकान को भी उनकी ज़रूरत होती है, अपने गलत-सही धंधों में, उसे प्रोटेक्ट रखने के लिए।

और दूसरी तरह के वे लोग हैं, जिन्हें जीवन-यापन के लिए एक अदद नौकरी की ज़रूरत होती है। उनके ऊपर अपने समेत घर-परिवार की तमाम ऐसी ज़‍िम्मेदारियां होती हैं, जिसे निभाने में वे असमर्थ होते हैं। इसका फ़ायदा उठा कर मालिकान उन पर अमानवीय शर्तें लाद देते हैं और वह मजबूर हैं कि काम करें। क्योंकि इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। बीच-बीच में नौकरी से निकाल देने की धमकियों के बीच वे काम करते रहते हैं।

हमें याद है बहुत दिन पहले की बात नहीं, जब श्रमजीवी पत्रकारों का संघ मज़बूत हालत में होता था और उससे जुडऩे में पत्रकार फख्र महसूस करता था। हमारे सीनियर साथी आज भी बीते ज़माने की गौरवगाथाएं गाते रहते हैं। किस तरह उन्होंने सेंटर टेबल टॉक में अपनी बात (श्रमजीवी पत्रकारों की) मालिकान से मनवायी। वे सारे संगठन हैं तो आज भी, लेकिन निष्क्रिय पड़े हैं। श्रमजीवी पत्रकारों के हकूक को लेकर उनके अभियान थम चुके हैं। नवोदित पत्रकारों को भी तरक्की की जल्दी रहती है। उनके पास इन संगठनों के लिए वक्त नहीं बचा।

पत्रकार अकेला होता जा रहा है। इसका फ़ायदा उठाकर मालिकान संगठन से जुड़े पत्रकारों को नज़रअंदाज करके वैसे ही युवा चाहे वरिष्ठ पत्रकारों को अपने संस्थान में रखने पर तरजीह देने लगे हैं, जो किसी संघ से नहीं जुड़े हैं। नतीजा आप देख रहे हैं। मंदी के नाम पर ख़तरे के निशान को पार कर चुकी छंटनी रुकने का नाम नहीं ले रही और कोई बोलने वाला नहीं बचा। एक बासलाहियत वरिष्ठ पत्रकार (बड़े पद पर भी हैं), जिन्हें लोग कभी उनके तेवरों की वजह से जानते थे, उनसे इसी मंदी और छंटनी पर जब एक बार मैं बात कर रहा था, तो उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में काफी पैसा है और हम यहां काम करने के लिए आये हैं, अगर हमें इनकी यह शर्तें मंजूर है, तो ठीक है, नहीं तो यह हमें मजबूरन काम करने के लिए थोड़े ही कह रहे हैं। वह संगठन के पक्ष में नहीं थे।

मतलब यह कि तुम्हें काम करना है तो करो, नहीं तो भाड़ में जाओ। मतलब यह कि आपको कॉरपोरेट कंपनियों की लाद दी गयी शर्तों पर काम करना होगा। मतलब यह कि अपनी लड़ाई में तुम अकेले हो।

और यही वजह है कि पत्रकारों से फुलटाइम काम करवा कर उन्हें रिटेनर (पार्ट टाइमर) का कागज़ पकड़ा दिया जाता है। स्ट्रिंगर को कोई कागज़ नहीं दिया जाता। कई पत्रकार आज भी 10 (प्रिंट में, इलेक्ट्रोनिक में 200 रुपये न्यूज) रुपये न्यूज़ पर काम कर रहे हैं। अगर उनके ऊपर कोई केस होता है, तो वही मीडिया कंपनी उस ख़बर का एक खंडन छाप कर उस पत्रकार से खुद को एक झटके में अलग कर लेती है। यह कहते हुए कि वह हमारे संस्थान का एम्‍प्‍लॉय नहीं है।

आखिर ऐसा क्यों है?

सीधा जवाब है कि इस कॉरपोरेट कल्चर ने पहले एक-एक एम्‍प्‍लॉय को काटकर साथ काम करने वाले दूसरे एम्‍प्‍लॉय से अलग कर दिया। उनमें प्रतिस्पर्धा की भावना जगा दी कि उसकी तरक्की तुम्हारी पदावनति की कीमत पर होगी। तुम्हारी तरक्की रोक कर होगी। जब यह चाल क़ामयाब हो गयी, तो कर्मियों पर अपनी मनमानी शर्तें लादते चले गये। साथ में इनके भीतर दो वर्ग तैयार किया। एक सुविधाभोगी वर्ग (जो हमेशा मालिकान और बड़े अधिकारियों के कृपा प्रसाद पर रहता है), दूसरा बेचारा वर्ग। इसके साथ ही इन लोगों ने लगातार ये भी कोशिश की कि सबको एक-दूसरे की संवेदनाओं से भी काट दिया जाए और ये समझ भी न पाएं। अगर किसी को पुचकार दिया मालिकान ने, कह दिया कि अरे उसकी छोड़ो, अपनी बोलो, तुम्हारी कोई समस्या है, तो वह बताओ, हम देखते हैं – बस इतने पर उसकी हो गयी बल्ले-बल्ले। दबे पांव आने वाले इस ख़तरे को वह भांप नहीं पाये। इसका नतीजा यह हुआ कि हर रोज़ पत्रकारों की छंटनी जारी है। अनाप-शनाप शर्तें उनके सामने रखी जा रही हैं और कहीं विरोध का कोई स्वर नहीं। भई, ये पत्रकार अपने लिए कोई विरोध नहीं कर पा रहे हैं, तो वह दूसरे के हक में क्या लिखेंगे और उन्हें इंसाफ की बात क्या समझ में आएगी। है न खतरनाक बात? लेकिन ये सच है।

लेकिन ऐसा करते वक्त मालिकान भूल गये कि दमन जब-जब हद से गुजरा है, एक स्वत:स्फूर्त आंदोलन पनपा है। लोग अपने हक के लिए इकट्ठे हुए हैं। इतिहास उठाकर देख लें – हिटलर राज से लेकर अंग्रेजी राज तक – दमन जितना ज़्यादा हुआ है, प्रतिक्रिया में आंदोलन भी उतना ही तेज। ऐसे आंदोलनों की शुरुआत पहले-पहल गांधीजी को ट्रेन से फेंके जाने जैसी इक्का-दुक्का बड़ी ही व्यक्तिगत घटना से होती है, बाद में सामाजिक सारोकार जुड़ते चले जाते हैं। फिर उसके बाद विरोध में स्वत:स्फूर्त कई छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं, जो कि इस मंदी के दौर में हमने देखा कि हो चुकी हैं। उसके बाद वह सांगठनिक रूप ले लेता है और वृहत्तर होता चला जाता है। हमें तो लगता है कि वीओआई प्रकरण से इस आंदोलन ने सांगठनिक रूप ले लिया है और इसकी शुरुआत हो चुकी है। और भी मीडिया वाले खबरदार हो जाएं।

(टिप्‍पणीकार द संडे इडियन की भोजपुरी टीम से जुड़े हैं)

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