वीओआई की घटना ज्वालामुखी के सुलगने की शुरुआत है
♦ विनीत कुमार
जैन टीवी से लाइव करवाकर चैन नहीं मिलेगा

देश का सबसे तेज़तर्रार एंकर कहाने वाला स्वयंभू शख्स जिसने यू ट्यूब पर अपने वीडियो अपलोड कर करके हद कर दी है, जैन टीवी से लाइव करवाने में जुट गया है। अजी ये वही शख्स है जिसको कई चैनलों से निकाला गया था और अंत में वीओआई में शरण ली थी। अभी हाल ही में एक खुशवंत जैसे विचारक के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी उसने। उसने हर बार पंगा खड़ा किया है, हर ऑर्गेनाइजेशन में। धक्के मारकर निकाल दिया गया था उसे एक बार तो।
यहां जब हडताल हो रही थी तो यही भाई था जिसने सबसे पहले गालियां दी थी। “मां, बहन… हम भीख मांग रहे हैं क्या…. ” ये कहके इसने माहौल गरमाया और खुद फरार हो गया। यही था जिसने दावा किया था कि मैं आप सभी के साथ हूं। 150 लोगों के सामने कहा था इसने तैश में आकर।
इसके साथ वाला आदमी जिसका मुंह टेढा है और तेज़तर्रार एंकर का सबसे बड़ा चमचा है। अरे वही जिसे कुछ दिन पहले निकाल दिया गया था खबर न चलने की वजह से। हड़ताल के वक्त वह अपने पैसों से उनके लिए खाने का इंतजाम करने की बात कर रहा था जो रात में रुकने वाले थे। लेकिन थोड़ी ही देर में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सिर से सींग। अब वही जैन में जाकर लाइव कराने में जुटा है। क्यों ताकि उसकी नौकरी बच जाए। साथ में जो लोग इनके साथ हैं उनके बारे में कहा ही क्या जाए। इनका कोई आधार नहीं है।
एक महाबॉस हैं जो सरेआम नारेबाजी कर रहे थे, और जब खुद उनके खिलाफ नारेबाजी हुई तो गायब हो गए। अब कुख्यात पोर्टल में बयान दे रहे हैं। एक आदमी हैं जो तारणहार के साथ मिलकर चैनल का “कल्याण” करने में लगे हुए हैं। पहले गाली देते हैं और फिर पासा पलट लेते हैं।
अब ये जितने भी लोग हैं जो जैन टीवी गए हैं ये फील्ड के दुत्कारे हुए लोग हैं। एक को श्रीपाल शक्तावत ने लंपट कहा था, एक अज्ञानी लेकिन मूर्ख के नाम से प्रसिद्ध है, एक सांप्रदायिक पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध है और एक शख्स ऐसे हैं जो सीधे ही प्रोड्यूसर से चैनल हेड हो गए। इन सभी की औकात है कि इन्हें बाहक कहीं भी चैनल हेड के रूप में नौकरी नहीं मिलनी है।
इसीलिए ये इस तरह दगेबाजी कर रहे हैं। सभी रिपोर्टर जो जैन टीवी गए हैं, सभी तारणहार को भद्दी गालियां दे रहे थे। खुद तो गंद मचाकार भाग गए और अब दूध के धुले बनने की कोशिश कर रहे हैं। ऊपर वाला साथ है।
बहरहाल एफआईआर करवा दी गयी है, तोड़फोड़ के झूठे इल्जाम लग रहे हैं। और कई कुछ…
सच क्या है आपको तय करना है, हम तो अपनी लड़ाई जारी रखेंगे…
आप हमारा साथ देंगे?
(long live voi से साभार)
उस समय तक वाइस ऑफ इंडिया की सांसें लगभग उखड़ चुकी थीं, जब साईं भक्त और चैनल के सीईओ अमित सिन्हा इसे मज़बूती के तौर पर खड़े करने की बात करते नज़र आ रहे थे। मीडिया ख़बरों से जुड़ी एक वेबसाइट पर बतौर सीईओ उन्होंने कहा कि मैं साईं का भक्त हूं और मुझे उन पर पूरा भरोसा है, सब ठीक हो जाएगा। जाहिर है, उस समय अमित सिन्हा ने चैनल से जुड़े लोगों को जो भरोसा दिलाया, वो एक सीईओ की हैसियत से ज़्यादा श्रद्धा में जकड़े एक भक्त की भावुकता से ज़्यादा कुछ भी नहीं था। जिन लोगों को लगता है कि उनका जीवन श्रद्धा, विश्वास और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर तय होते हैं, उन्हें अमित सिन्हा की बात पर भरोसा करने में रत्तीभर भी संदेह नहीं हुआ होगा और वो इस इंटरव्यू के पढ़े जाने के बाद से ही राहत महसूस करने लगे होंगे। वैसे भी देश के भीतर एक खास तरह की जनता हमेशा से मौजूद है जो बाबा, पुजारी, भगवान और पीर-फकीरों के प्रभाव से कोढ़ी, लाचार और अपाहिज को रातोंरात चंगा होते देखते आये हैं। अपनी इसी समझदारी के बूते पर अमित सिन्हा ने सीईओ के तौर पर एक-दो लोगों की जिंदगी नहीं बल्कि पूरा का पूरा एक चैनल ही चंगा करने की जिम्मेवारी अपने आराध्य पर डाल दी। अगर अमित सिन्हा के भीतर प्रोफेशनल एप्रोच होता, तो वो साईं मिलेनियर नाम से दूसरा चैनल खोलने के बजाय मौजूदा चैनल को दुरुस्त करने का काम करते। इस बात को समझ पाते कि दिन-रात साधना और आध्यात्म की बात करनेवाले चैनल भी बाज़ार की शर्तों पर चलते हैं, उसे कोई बाहरी शक्ति चंगा करने नहीं आती। नहीं तो अब या तो ये मानिए कि सारी गड़बड़ी उस आराध्य की है, वो अब समर्थ नहीं रह गये कि कोढ़ी को चंगा कर सकें या फिर अमित सिन्हा को इस पूरे प्रकरण के लिए जिम्मेवार मानिए कि उन्होंने सैकड़ों मीडियाकर्मियों की जिंदगी से खिलवाड़ किया है और भक्त होकर आस्था की सत्ता के आगे ढोंग रचने का काम किया है। ये मामला एक चैनल का है] इसलिए बाकी के चैनल कवरेज करने के बावजूद भी चुप्पी साधे बैठे हैं। नहीं तो दूसरी स्थिति होती तो ये पूरा मामला आस्था और कल्याण से जुड़ी स्टोरी एंगिल को लेते हुए हम ऑडिएंस के लिए एक के बाद एक पैकेज बनकर सामने आते। बहरहाल…
वेबसाइट पर इंटरव्यू पढ़ने के बाद मैंने अमित सिन्हा को एक मेल किया और सीधे तौर पर कहा कि एक पत्रकार होने के नाते ये उचित नहीं है कि आप अपनी आस्था, विश्वास और राजनीतिक अवधारणा को सार्वजनिक स्तर पर किये जानेवाले फ़ैसले का आधार बनाएं। बेहतर हो कि आप पत्रकारिता के मानकों और उनकी शर्तों के हिसाब से काम करें। मेल का कोई जवाब नहीं आया और वेबसाइट पर इस चैनल के विज्ञापन की चमक फीकी पड़ने के साथ ही बात आयी-गयी हो गयी। आज वॉइस ऑफ इंडिया की जो स्थिति है, वो आपके सामने है। मुझे तो पहली बार पढ़ कर हैरानी हुई कि इस चैनल के पास जेनरेटर चलाने के लिए पेट्रोल तक के पैसे नहीं हैं, चैनल ब्लैक आउट हो गया है। एक वेबसाइट ने जब इस मामले में मेरी राय जाननी चाही, तो मैंने साफ तौर पर कहा कि जो भी लोग चैनल चला रहे हैं, दरअसल उनके पास कोई स्ट्रैटजी नहीं है। आज अगर चैनल चला रहे हैं, उसमें घाटा होगा तो सॉफ्ट लोन के लिए जुगत भिड़ाएंगे और अगर सफल नहीं हुए तो टायर की दुकान खोल लेंगे, पूरे मामले से पल्ला झाड़ देंगे। आज किसी भी मीडिया संस्थान का खुलना और अंत में हांफ-हांफ कर बंद हो जाना कितना आसान हो गया है। लेकिन इन सबके बीच पत्रकारों की जिंदगी का क्या होगा? सच पूछिए तो नोएडा की सड़क पार करते हुए और फोन पर बात करते हुए मैं एक घड़ी के लिए उन पत्रकारों के बारे में सोच कर बौखला गया जो पैकेज-दर-पैकेज के लिए कूद-फांद मचाये रहते हैं। मीडिया मालिक आज आश्वस्त हो गये हैं कि पैसा फेंकने पर देश के किसी भी पत्रकार को पालतू बनाया जा सकता है और उसे दूह कर टीआरपी के दूध निकाले जा सकते हैं। अगर वो दुधारू साबित नहीं होता है, तो गर्दन पकड़ कर बाहर निकाला जा सकता है। ये है आज देश के एक पत्रकार की हैसियत, दुनिया भर में हक की लड़ाई लड़नेवाले पत्रकारों की हकीकत, मैनेजमेंट की ओर से धमकियां सुननेवाले खट्ट-खट्ट कीबोर्ड बजाने और गर्दन की नसें फुला कर पीटीसी देनेवाले एडिटर और रिपोर्टर की असली औकात।
किसी पत्रकार के बच्चों का स्कूल से नाम कट गया, कोई पत्रकार अपनी पत्नी को खर्च से बचने के लिए उसके मायके पटक आया है, किसी ने पान-बीड़ी पर कटौती करके छोटे झोले में सब्जी दूध लाना शुरु कर दिया है। आपको ये सब सुनकर कैसा लगता है? क्या सिर्फ उनके प्रति संवेदना पैदा होती है, रहम खाकर कुछ मदद करने का मन करता है। क्या मेरी तरह आपके मन में भी घृणा, अफसोस, दया, सहानुभूति और गुस्सा एक साथ नहीं पनपता? लगता है कि इससे तो अच्छा होता वो बदहाल होकर भी अपने हक की लड़ाई लड़ने की स्थिति में होते, प्रोफेशन के स्तर पर लोगों के लिए हक की लड़ाई लड़ने के नाम पर स्वांग तो करते ही रहते हैं। मीडिया मालिकों के बीच इस मानसिकता को किसने मज़बूत किया है कि किसी भी पत्रकार की कोई आडियोलॉजी नहीं होती, जितनी मोटी रकम दोगे उतना ही रिटर्न देगा, बाकी के सारे लोग कीबोर्ड के मजदूर हैं, दो-चार पांच हजार बढ़ाते रहो, मन लगाकर काम करते रहेंगे। नये लोग मरे जा रहे हैं मीडिया में काम करने के लिए। उनके हाथ बेताब हैं माइक थामने के लिए। नतीजा, चार-चार महीने फ्री में इंटर्नशिप करने को तैयार हैं। दो-दो साल तक बिना किसी इन्क्रीमेंट के चौदह घंटे-सोलह घंटे खटता जा रहा है। अब कोई ये दलील देने लग जाए कि वो सामाजिक बदलाव के लिए इस प्रोफेशन में आया है, तो बेहतर है कि आप कोई और बकवास सुन लीजिए, इस ओर कान मत दीजिए। वॉइस ऑफ इंडिया के हवाले से अगर आप मीडियाकर्मियों की स्थिति पर गौर करें तो इनकी स्थिति गर्दन झुका कर पत्थर फोड़नेवाले मज़दूरों से भी गयी-गुजरी है। उस मज़दूर के सामने संभव है कि बेहतर दुनिया की तस्वीर साफ न हो और हो भी तो पाने के आधार की जानकारी न हो लेकिन मीडियाकर्मी के पास सब चीजों की जानकारी होते हुए हाथ रहते लूला है, ज़ुबान रहते गूंगा है, आंख रहते कुछ भी न देख पाने की स्थिति में है। वो दूसरों के लिए चाहे कुछ भी लिख दे, दिखा दे अपने लिए उसके पास न तो शब्द हैं और न ही विजुअल्स।
इधर देखिए। एक औसत आदमी भी पान-बीड़ी, परचून और दूध-दही की दूकान खोलता है, चाट-गोलगप्पे के खोमचे लगाता है, उनके पास स्ट्रैटजी होती है। उन्हें पता होता है कि कितनी लागत है और कितना प्रॉफिट है। एक-एक चीज़ पर बारीकी से विचार करता है। लेकिन करोड़ों रुपये की लागत पर चलनेवाले चैनल को देखकर लगता है कि उनके पास सामाजिक बदलाव को लेकर कोई विजन तो नहीं ही है, चैनल को बनाये रखने का भी कोई प्लान नहीं है। जब तक चला तो चला, नहीं तो बेतहाशा छंटनी करो, लोगों को हाथ-पैर रहते अपाहिज कर दो या नहीं तो फिर अपने घाटे की भरपाई के लिए सरकार से जुगाड़ करके लोन लो, भूत-प्रेत, ढिंचिक-ढिंचिक स्टोरी और खबरों के पीछे पानी की तरह पैसे बहाओ। न तो कोई हिसाब लेनेवाला है कि किसका पैसा है, आम आदमी की गाढ़ी कमाई को कोई ऐसे कैसे बहा सकता है। देश की जिस जनता को कफ सिरप चाहिए, उसके पैसे से स्वर्ग की सीढ़ी क्यों खोजे जा रहे हैं? कहीं कोई सवाल नहीं, कोई हलचल नहीं। सब चल रहा है। इस पक्ष पर अगर कोई काम करे और तथ्यों को सामने रखे तो अंदाजा लग जाएगा कि चीख-चीख कर खबरों को पेश करनेवाले चैनल, समाज को झक-झक सफेद करने का दावा करनेवाला मीडिया आम आदमी के लिए किस तरह विष घोलने का काम करता है। वॉयस ऑफ इंडिया की घटना मीडिया इंडस्ट्री के भीतर सुलगनेवाली ज्वालामुखी का धुआं भर है, आगे की स्थिति और ज्यादा खतरनाक होने जा रही है। सरोकारों से कटकर हमें क्या लेना-देना के अंदाज में मीडिया के भीतर जो लोग भी काम कर रहे हैं। उन्हें अभी ये समझ में भले ही नहीं आ रहा हो कि आनेवाले कल के लिए, वो अपने लिए मौत की डमी तैयार कर रहे हैं लेकिन एहसास करना होगा कि हक की लड़ाई के मोर्चे पर वो बिल्कुल अकेले हैं। विदर्भ के किसानों की तरह उन्हें अकेले आत्महत्या करनी होगी जिसके ऊपर शायद ही सामूहिक रुदन हो। इसलिए ज़रुरी है कि स्वार्थ और हक के फर्क को समझने की कोशिश में वॉयस ऑफ इंडिया के भीतर जो मीडियाकर्मी जुटे हैं, उनकी आवाज़ को बुलंद करें और दलालों से मुक्त होकर दलाल संस्कृति की पत्रकारिता को खत्म करने की कोशिश करें। यहां से दुनिया भर के लोगों के पक्ष में लड़ाई लड़ने का ढोंग रचनेवाले मीडिया के विरोध में हमारी लड़ाई शुरु होती है।
(टिप्पणीकार युवा मीडिया विश्लेषक और मीडिया के शुभेच्छु हैं)










विनीत जी, आपने एकदम सही सवाल उठाए हैं और सही मांग भी रखी है, इस जंग में हम आपके साथ हैं। मीडिया का चमकीला संसार अंदर से बेहद भयावह,असुरक्षित और अलोकतांत्रिक है, हमारे वीओआई के दोस्तों को इस प्रसंग में कानूनी और राजनीतिक गोलबंदी और हस्तक्षेप के लिए एकजुट प्रयास करना चाहिए, राजनीतिक और कानूनी दबाव के साथ आंदोलन ही एकमात्र सहारा है।
विनीत जी,
आपने एकदम सही कहा। एक-एक शब्द सच्चाई से भीगा हुआ है। ईश्वर आपको सदा प्रसन्न रखे।
धन्यवाद।
सैंकडो, हाँ इतनी तादाद तो हो ही चुकी है, वी ओ आई की मार झेल रहे लोगों की. सीधी धांधली चल रही है. काम करवा कर मजदूरों की तरह बहार का रास्ता दिखा दिया गया है. फिर भी खामोशी है. क्या किया जाये, लडाई शुरू होती है और दम तोड़ देती है. साल भर होने को आया बकाया बकाया ही रह गया. न जाने कब तक ये सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा. बौन्सर्स की मदद से कब तक ये खुली गुंडागर्दी चलती रहेगी?
चैनल रुकने में गलती किसकी है?
तुरंत पढ़ें।
http://longlivevoi.blogspot.com/2009/08/blog-post_3916.html
गलत कोन है आप एक पत्रकार के तोर पर सोचे ..?
हिंदुस्तान की आवाज़
विजय तो होनी ही थी। आखिरकार पत्रकार विजयी हुए, लेकिन संघर्ष जारी रहेगा।
तुरंत पढ़ें
http://www.longlivevoi.blogspot.com
LONG LIVE VOI ब्लॉग को हटा दिया गया है।
संकट की घड़ी में हमारा साथ देने वाले सभी दोस्तो को शुक्रिया।
आप ही के कारण हम सफलता की राह पर बढ़ रहे हैं।
आगे भी आपका साथ चाहिए…
विनित जी…आपकी बात शत प्रतिशत सही है…पर उन लोगो के लिए क्या कहेंगे जो पत्रकार होकर भी पत्रकार नही है…जो थोडे-थोडे स्वार्थ के लिए इस पत्रकारिता की मर्यादा को लाघं रहा है….हमारे और आपके बीच ही में मिल जांएगे ऐसे सैकडो चाटूकार…जो सिर्फ क्लर्क की तरह नौकरी करना और चाटूकारिता करने चाहते हैं…वे क्या और क्या साथ देगे हम पत्रकारों का…
ये विनीत एक नंबर का चूतिया मालूम पड़ रहा है। कुछ पता-वता है नहीं, उल्टी-सीधी बातें लिख मारी हैं। अबे विनीत, तुम खुद क्या हो, तुम्हारी क्या औकात है। अमित सिन्हा जैसे ईमानदार इंसान को तुझ जैसे झटियल से प्रमाणपत्र हासिल करने की जरूरत नहीं है। पहले खुद को इस लायक बनाओ कि लोग तुम्हे जाने-पहचाने फिर कमेंट्स करने की हिमाकत करो। अबे, अमित सिन्हा या किशोर मालवीय तो बहुत दूर की बात है, तुम तो एक इंटर्न पर भी टिप्पणी करने की औकात नहीं रखते। ये मुंह और मसूर की दाल। गधे हो जो फालतू की बातें लिख रहे हो।
अविनाश भाई, मुझे आप पर भी तरस आता है कि आपने अपने पूर्व अनुभवों से कुछ नहीं सीखा और ऐसे चिरकुटों की बातों को छाप रहे हैं। गुरूजी, ये चूतिए अपने चुतियापे से आपकी छवि की भी मां बहन कर रहे हैं। संभल जाओ दोस्त।
संजयजी,आपको पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा,आपने मुझे इतनी गंभीरता से पढ़ा और अपने संस्कार और भाषा का परिचय दिया। मैं यहां बैठे-बैठे ही आपकी छवि को समझ सकता हूं। अगर आप जैन टीवी से लाइव करनेवाले खेमे में थे तो भविष्य के लिए शुभकामनाएं। आपकी भाषा बहुत अच्छी है,अगर कोई स्टोरी इसी भाषा में लिखते हों तो आप मुझे मेल कीजिएगा,देखना चाहूंगा।….और हां अमित सिन्हा के प्रति प्रतिबद्धता को देखकर काफी प्रभावित भी हुआ। आप जैसे लोगों से वो हमेशा घिरे रहें इसके लिए उन्हें भी शुभकामनाएं…..
संजय देशवाल, यदि विनीत कुमार ने उल्टा-सीधा लिखा है तो आप सीधा में उत्तर दीजिए, क्यों ऐसे अपशब्दों के प्रति आप अपनी प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं, जैसा आपने अपने कमेंट में प्रयोग किया है। जहां तक विनीत कुमार की औकात को लेकर आप बात कर रहे हैं तो उसे छोड़ दीजिए,क्योंकि वे पढ़ने-लिखेन वाले लोग हैं, हमारी तरह नहीं…..।
बांकी यदि कुछ लिखना है तो सार्थक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए लिखें, पाठकों को अच्छा लगेगा।
संजय देशवाल का लिखा पढ़ा…देशवाल को पढने से पहले अमित सिन्हा व किशोर मालवीय के प्रति किसी तरह की धारणा नहीं बन पाई थी…सीधे तौर पर तो मैं अभी भी उन पर लगे आरोपों से ना सहमत हूँ और ना असहमत…मगर देवता कैसा है यह उसके पुजारियों को देखकर पता चलता है…कहतें भी तो है कि जैसा देव वैसे पुजारी या जैसे पुजारी वैसा देव…अगर किसी के देशवाल जैसे भक्त हैं तो उस भगवान का तो भगवान ही मालिक है…ऐसे उज्जड गंवार मूर्ख अभद्र लोग पूजा करते हैं क्या सिन्हाजी की-मालवीयजी की…जो देशवाल ने लिखा वह तो किसी पाले हुए गुंडे की मालिक के प्रति वफादारी दिखाने की छटपटाहट से ज्यादा कुछ नहीं लगता…
और विनीत आपको क्या हो गया जो ऐसे लोगो को रेस्पोंस दे रहे हो…ये तो अविनाश पर भी तरस खा रहा है…वैसे देशवाल जैसे लोग भी मोहल्ले की सभाओं में शामिल होतें हैं तो ये वाकई अविनाश पर तरस खाने वाली बात ही है…देशवाल जैसे लोगों को मोहल्ले में मंडराने से तो नहीं रोक सकते मगर घर में घुसने पर तो रोक लगाई ही जा सकती है…अविनाश, कृपया सोचे जरुर…मोहल्ले में इस तरह की गुंडागर्दी रोकने की जिम्मेदारी आपकी ही बनती है आखिर…
मेरा बेनामी रहना बहुत ज़रूरी है। दरअसल ये जो संजय देशवाल है वह अतुल अग्रवाल ही है। जो लोग अतुल अग्रवाल को करीब से जानते हैं वो पहचान गए होंगे इस टिप्पणी की भाषा से। न्यूज २४ में इसी तरह की भाषा का प्रयोग किया करते थे जनाब। अगर किसी को कोई संदेह है तो जनाब की वेब साईट http://www.hindikhabar.com पर जाकर पढ़ लें। भाषा एक जैसी है।
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