शर्तें मानी गयीं, वीओआई की हड़ताल ख़त्‍म, ब्‍लॉग बंद

सुना है कि वॉयस ऑफ इंडिया के प्रबंधन ने मीडियाकर्मियों की मांगें मान ली हैं। उन्‍हें बकाया वेतन दिया जा रहा है। इसके साथ ही वीओआई कर्मियों की हड़ताल फिलहाल समाप्‍त हो गयी है। लोग काम पर लौट गये हैं। सिर्फ आंदोलन के लिए बनाया गया ब्‍लॉग long live voi पढ़ने की सुविधा आम पाठकों के लिए ख़त्‍म कर दी गयी। लिहाज़ा हम इस ब्‍लॉग पर अभी तक छपी सामग्रियों को यहां पुनर्पस्‍तुत कर रहे हैं : मॉडरेटर

TUESDAY, AUGUST 25, 2009

विजय तो होनी ही थी…

अंतत: संघर्षरत कर्मचारियों की सभी मांगें मान ली गयी। आज का दिन जश्न मनाने का दिन है। हमारा उद्देश्य चैनल बंद कराना नहीं था। हम तो अपना मेहनताना चाहते थे। अब तनख्वाह आ रही है। जो हुआ सो हुआ। हमारे मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं। जो हमारे साथ थे उन्हें धन्यवाद और जो लोग दगा दे गए उन्हें साधुवाद!!! हमारे मन में उनके प्रति भी कोई मैल नहीं। कोई बात नहीं, हम साथ काम करेंगे। हां दुख ज़रूर है, लेकिन दिल के घाव वक्त के साथ भर जाते हैं। हम उन्हें भी दिल से लगाते हैं। जिन लोगों ने सम्मान खो दिया है, वो लोग दोबारा सम्मान तो हासिल नहीं कर पाएंगे लेकिन हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। जब वो अभिनय कर सकते हैं तो हम भी कर लेंगे। अब प्रोफेशनलिज्म अपना लिया है हमने भी। संघर्ष के दौर ने बहुत कुछ सिखा दिया। कई उतार-चढ़ाव देखे।

इस विजय के साथ ही इस ब्लॉग का उद्देश्य भी समाप्त होता है। सभी साथियो का धन्यवाद। हमारा उद्देश्य कीचड़ उछालना नहीं था। जो बातें इसमें लिखी गईं सभी सच थीं और हर किसी को आइना दिखाने वाली थीं। लोग सबक लें।

हमें एकजुट रहना है, कोई भी संस्थान हो, हम एक साथ रहेंगे एक दूसरे के सुख-दुख में।

चैनल ऑन एयर करवा रहे लोगों का तर्क क्या है?

जो लोग जैन टीवी से चैनल ऑन एयर करवा रहे हैं उनका पक्ष जानना भी ज़रूरी है। हालांकि उनका कच्चा चिट्ठा तो पहले ही खोला जा चुका है लेकिन फिर भी उनके ‘तर्क’ को जान लेना बेहद जरूरी हो जाता है।

इन लोगों का कहना है कि ‘तारणहार’ वाकई में नेक दिल आदमी है। वो दिल से चैनल को चलाना चाहता है लेकिन वो बिल्डर बंधुओं के चक्कर में फंस गया है। इस वक्त कंपनी के पास कैश नहीं है इसलिए तनख्वाह टाइम पर नहीं आ रही। इस वक्त हरियाणा सरकार का डेढ करोड़ रुपये का एक विज्ञापन मिला है जिसका चलना जरूरी है। ताकि कहीं से पैसा तो आए। अगर चैनल ऑफ एयर रहेगा तो विज्ञापन कैसे चलेगा?

वीओआई के प्रतिद्वंद्वी चैनल उस कुख्यात पोर्टल पर काम बंद होने की खबर छपने की खबर का हवाला देकर वीओआई से ये विज्ञापन हथियाने की योजना बना रहे थे। इसलिए उस पोर्टल चलाने वाले व्यक्ति की मदद ली गई और काम शुरु होने की खबर छपवाई गई।

इससे विज्ञापन वीओआई के पास बचा रहा। उधर संघर्षरत पत्रकार किसी सूरत में प्रसारण होने देने के पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में जैन टीवी से प्रसारण कराया जा रहा है। अगर विज्ञापन चला तो कमाई होगी और अगर कमाई होगी तो तनख्वाह आएगी। इसलिए काम रोका जाना सही नहीं।

ऑन एयर करवा रहे लोगों का कहना है कि उन्हें तारणहार की बातों पर पूरा भरोसा है। जब तारणहार ने जून की आधी बची सैलेरी एक दिन में ट्रांसफर कर दी तो वो बाकी भी दे देता। इसलिए उन्हें बुधवार तक इंतज़ार कर लेना चाहिए।

जैन टीवी से ऑन एयर करवा रहे लोग वीओआई के दफ्तर में रुक कर संघर्ष कर रहे पत्रकारों पर लूट-खसूट का इल्जाम लगा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कुछ लोगों ने पुर्जे निकाल लिए हैं।

संघर्षरत पत्रकारों का पक्ष अलग है। लूट-खसूट का आरोप निराधार हैं। संघर्षरत पत्रकार तो बारी-बारी से पहरा दे रहे हैं ताकि कहीं कोई बाहरी तत्व आकर तोड़फोड़ न कर दें और नाम उनका खराब हो जाए। जिस दिन हड़ताल हुई थी उस दिन 5 जीप भरकर गुंडे दफ्तर के बाहर आ गए थे। वो तो पुलिस ने हस्तक्षेप करवा कर उन्हें वहां से खदेड़ा था। प्रश्न ये है कि वो गुंडे किसने भेजे थे? क्या उन्ही गुंडो के डर से ये लोग चैनल ऑन एयर करवा रहे हैं?

दूसरी बात अगर उन लोगों को तारणहार पर इतना ही भरोसा है तो क्यों नहीं वो पहले से ही विरोध में रहे। क्यों पहले साथ दिया और बीच में पल्टी खा गए। क्या आधी तनख्वाह से तुम्हारा काम हो गया?

जिन 76 पन्नों की डील की बात खुद तारणहार ने की थी, आप सभी के सामने बिल्डर्स ने उस डील की बात का खंडन कर दिया। झूठ कौन बोल रहा है?

ऐसा क्यों है कि हर बार कार्य बहिष्कार करने के बाद ही तनख्वाह आती है? और कार्यबहिष्कार करने के 12 घंटे के अंदर अगर तनख्वाह आ जाती है तो उसे पहले ही क्यों नहीं दे दिया जाता है?

हमारे बीवी-बच्चे भूखे मर रहे हैं। दवा-दारू के पैसे नहीं है। दोस्तों के सामने हाथ फैलाना पड़ रहा है, इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है? जब औकात ही नहीं थी तो क्यों बड़े-बड़े दावे किए गए और क्यों डील की तरफ कदम बढ़ाया गया। आते ही अपने प्रोमो बनवाए गए?

आदमी एक बार वादा टूटने पर सहन कर सकता है , दो बार कर सकता है लेकिन बार-बार नहीं। दिसंबर की तनख्वाह जिसे हम दु्स्वप्न की तरह भूल गए थे, उसे देने का वादा भी किया, क्यों? आखिर क्यों?

क्या गलत कर रहे हैं हम अपनी बात कह कर? हम भी नहीं चाहते कि चैनल को जो पैसा आ रहा है वो रुके, लेकिन इन हालात के लिए दोषी कौन है? हमें बेवकूफ समझ लिया गया। अगर समय पर तनख्वाह मिलती तो क्या ये नौबत आती। संघर्षरत कर्मचारी अनपढ़, मूर्ख नहीं जो ऐसे ही बौर्रा गए हैं। वो अपने हकों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। हमने काम करने में कभी कोई कोताही नहीं बरती लेकिन फिर भी हमसे बंधुआ मजदूरों जैसा सुलूक???

क्रांति तो होनी ही थी। अब भला जैन टीवी से जो टेलिकास्ट कराया जा रहा है वो क्या फ्री में हो रहा है ? उसके लिए भी तो आपको पैसे देने पड़ेंगे? फिर क्यों नहीं उतने रुपये की तनख्वाह ही दे दी जाती । या फिर ये साजिश थी, सेटिंग थी लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने की…?

आप हमें हमारी औकात दिखाना चाहते थे, हमने आपको अब आपकी औकात दिखा दी।

MONDAY, AUGUST 24, 2009

कहीं काम रुकवाना किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं था?

जो महाबॉस अनकंडीशनल सपोर्ट वाला ड्रामा खेल सकता है इस बार भी उसी के खिलाफ कई सारी बातें जा रही हैं। लोग कयास लगा रहे हैं कि महाबॉस जिस चैनल को छोड़कर यहां आए हैं, उस चैनल से उनके खेमे के कई लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। महाबॉस उन लोगों को इस चैनल में सेट करवाने की जुगत में है। उसका एक उदाहरण है एक ऐसा व्यक्ति जिसे बिहार-झारखंड चैनल का हेड बनाकर लाया गया है। चैनल अभी आया नहीं लेकिन वो महाराज कई माह से कैबिन में डेरा डाले बैठे हैं।

माना जा रहा है कि जिस तरह महाबॉस ने मालिकों के करीब आने के अनकंडीशनल सपोर्ट वाला नाटक खेला था, ठीक उसी तरह इस बार और नाटक खेला है। महाबॉस कार्य बहिष्कार में खुद मौजूद रहा। लेकिन उसके तुंरत बाद वह रात को घर चला गया और सभी चैनल हेड्स को बताया कि आगामी आदेशों तक किसी एडिटोरियल के आदमी को ऑफिस नहीं आना है। जो नहीं आएगा, निकाले जाने वाले लोगों की सूची से उनका नाम हटा दिया जाएगा।

दरअसल ये साजिश थी। इस तरह महाबॉस ने एलान किया कि हड़ताल में सिर्फ टेकिनकल टीम के लोग हैं। पूरा इल्जाम टेक्निकल हेड पर आ गया कि वही स्ट्राइक करवा रहे हैं। एक पोर्टल में महबॉस के बयान कि कुछ लोग 9x चैनल में जा रहे हैं, के निशाने पर भी संभवत: टेक्निकल हेड थे।

उधर टेक्निकल हेड अपने मातहतों में बेहद लोकप्रिय हैं। कोई उनकी बात नहीं टालता। इन्हीं के कहने पर रात में हड़तालरत लोगों ने चैनल को पुराने बुलेटिन के साथ रिकॉर्ड कराया था। लेकिन महाबॉस अपनी नौकरी बचाने के लिए उन्हीं के सिर पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। टेक्निकल टीम पर इल्जाम लगाने वाले महाबॉस को शायद मालूम नहीं कि अगर टेक्निकल टीम ने नहीं चाहा होता तो चैनल ब्लैक आउट ही रहता।

हड़ताल से पल्ला झाड़ना और इल्जाम दूसरे सिर पर लगाना दर्शाता है कि इनकी मानसिकता कितनी कुत्सित हो गई है। महाबॉस को मीडिया फील्ड से त्यागपत्र दे देना चाहिए। क्योंकि आदमी इस लेवल दो चीजों के लिए काम करता है, एक सम्मान के लिए और दूसरा पैसे के लिए। सम्मान तो इन्हें भविष्य में मिलने से रहा ( चाटुकारों से मिलेगा तो खुश हो लेंगे।

महाबॉस अपनी साजिश में कामयाब होते दिखाई दे रहे हैं। गिने-चुने लोगों से साथ जैन से लाइव करवा रहे हैं। इस तरह ये मैनेजमेंट के करीबी बन गए और इनके लिए उन लोगों को हटाना आसान हो गया जो इनके साथ नहीं। इंडिया न्यूज़ से निकाले गए अपने क्षेत्र विशेष के भाइयों को चैनल में लाने के लिए रास्ता अब साफ हो चुका है। खैर, संघर्षरत पत्रकार भी उनका स्वागत करने के लिए तैयार बैठे हैं…

काम रुकने के लिए दोषी कौन?

चैनल के कर्मचारी जो कर रहे हैं उसे हड़ताल कहना सही नहीं। इन लोगों पर काम रोकने का आरोप लग रहा है वो भी सही नहीं। सच क्या है आज सबके सामने आ रहा है-

आज से 3 महीने पहले चैनल में हालात ये हो गए कि प्रिंट निकालने के लिए पेपर नहीं बचे। उसके बाद से नए पेपर लाए भी नहीं गए। कई महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर्स के लाइसेंस उनके एक्सपायर होने के बाद एक्सटेंड कराए गए वो भी 1 महीने के लिए। 2 बार चैनल इसी कारण टेप पर गया था। कई बार और तकनीकी खामियों से चैनल कई घंटे तक टेप पर रहा।

अब आपको बताते हैं कि चैनल में काम रुकने की नौबत क्यों आई। आज से 5 दिन पहले जब रिपोर्टर शूट के लिए कैमरा इश्यू कराने गए तो उन्हें मना कर दिया गया। कोई भी चीज़ स्टोर से इश्यू नहीं होगी। अब भला रिपोर्टर किसी इवेंट को कवर नहीं करके लाएगा तो खबर क्या खाक चलेगी। इससे प्रबंधन के इरादों पर सभी को शक होने लगा। एक दिन पहले ही कुछ लोग कार्यालय में मौजूद सारे सामना का ब्यौरा लेकर चले गए थे। इधर 2 माह का मेहनताना न आने से ये शक और भी गहरा गया कि अब ये लोग चैनल बंद करने वाले हैं। इस समय में प्रबंधन का कोई आदमी मौजूद नहीं था जो ये आश्वस्त कर सके कि क्या होने वाला है। जो लोग थे उनकी छवि पहले ही द**लों वाली बन गई थी।

इस दौरान तक ज्यादातर ब्यूरो खबर भेजना बंद कर चुके थे क्योंकि उनके ऑफिसों का किराया भी नहीं दिया गया था। ऐसे में जब खबर आएगी ही नहीं तो इनपुट क्या करेगा, आउटपुट, एडिटर, पीसीआर, एमसीआर आदि सभी विभाग क्या करेंगे? क्या चलाएंगे? खबर जब आ नहीं रही तो चैनल बंद ही होगा न?

इस तरह से काम रुक गया और पुराने बुलेटिन ही चलते रहे। अब कर्मचारियों का शक और गहरा गया कि अब तो खबरें आनी भी बंद हो गईं है, मैनेजमेंट से कोई नहीं बात करने वाला, सो सभी एक स्थान पर इकट्ठा होकर चर्चा करने लगे। सभी ने एक स्वर में फैसला लिया कि अब कुछ करना ही होगा वरना ये हमारा पैसा ले उड़ेंगे। जब चैनल को बंद ही होना है तो क्यों न हम अपना बकाया पैसा वसूल लें।

इसी तरह से सभी ने संयुक्त फैसला लिया था कि चैनल का प्रसारण रोक दिया जाए।

अब बताइए इसमें गलती किसकी है?

जैन टीवी से लाइव करवाकर चैन नहीं मिलेगा

देश का सबसे तेज़तर्रार एंकर कहाने वाला स्वयंभू शख्स जिसने यू ट्यूब पर अपने वीडियो अपलोड कर करके हद कर दी है, जैन टीवी से लाइव करवाने में जुट गया है। अजी ये वही शख्स है जिसको कई चैनलों से निकाला गया था और अंत में वीओआई में शरण ली थी। अभी हाल ही में एक खुशवंत जैसे विचारक के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी उसने। उसने हर बार पंगा खड़ा किया है, हर ऑर्गेनाइजेशन में। धक्के मारकर निकाल दिया गया था उसे एक बार तो।

यहां जब हडताल हो रही थी तो यही भाई था जिसने सबसे पहले गालियां दी थी। “मां, बहन… हम भीख मांग रहे हैं क्या…. ” ये कहके इसने माहौल गरमाया और खुद फरार हो गया। यही था जिसने दावा किया था कि मैं आप सभी के साथ हूं। 150 लोगों के सामने कहा था इसने तैश में आकर।

इसके साथ वाला आदमी जिसका मुंह टेढा है और तेज़तर्रार एंकर का सबसे बड़ा चमचा है। अरे वही जिसे कुछ दिन पहले निकाल दिया गया था खबर न चलने की वजह से। हड़ताल के वक्त वह अपने पैसों से उनके लिए खाने का इंतजाम करने की बात कर रहा था जो रात में रुकने वाले थे। लेकिन थोड़ी ही देर में ऐसे गायब हो गया जैसे गधे के सिर से सींग। अब वही जैन में जाकर लाइव कराने में जुटा है। क्यों ताकि उसकी नौकरी बच जाए। साथ में जो लोग इनके साथ हैं उनके बारे में कहा ही क्या जाए। इनका कोई आधार नहीं है।

एक महाबॉस हैं जो सरेआम नारेबाजी कर रहे थे, और जब खुद उनके खिलाफ नारेबाजी हुई तो गायब हो गए। अब कुख्यात पोर्टल में बयान दे रहे हैं। एक आदमी हैं जो तारणहार के साथ मिलकर चैनल का “कल्याण” करने में लगे हुए हैं। पहले गाली देते हैं और फिर पासा पलट लेते हैं।

अब ये जितने भी लोग हैं जो जैन टीवी गए हैं ये फील्ड के दुत्कारे हुए लोग हैं। एक को श्रीपाल शक्तावत ने लंपट कहा था, एक अज्ञानी लेकिन मूर्ख के नाम से प्रसिद्ध है, एक सांप्रदायिक पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध है और एक शख्स ऐसे हैं जो सीधे ही प्रोड्यूसर से चैनल हेड हो गए। इन सभी की औकात है कि इन्हें बाहक कहीं भी चैनल हेड के रूप में नौकरी नहीं मिलनी है।

इसीलिए ये इस तरह दगेबाजी कर रहे हैं। सभी रिपोर्टर जो जैन टीवी गए हैं, सभी तारणहार को भद्दी गालियां दे रहे थे। खुद तो गंद मचाकार भाग गए और अब दूध के धुले बनने की कोशिश कर रहे हैं। ऊपर वाला साथ है।

बहरहाल एफआईआर करवा दी गई है, तोड़फोड़ के झूठे इल्जाम लग रहे हैं। और कई कुछ…

सच क्या है आपको तय करना है, हम तो अपनी लड़ाई जारी रखेंगे…
आप हमारा साथ देंगे?

SUNDAY, AUGUST 23, 2009

अनकंडीशनल सपोर्ट का सच

एक नाटक खेला गया था वीओआई कर्मचारियों के संग कुछ दिन पहले। ऐतिहासिक, स्क्रिप्ट रोचक थी लेकिन डायरेक्शन और एक्टिंग में कमी थी तो पकड़े गए। 2 महीने से तनख्वाह नहीं मिली जब वीओआई कर्मियों को तो सभी उबलने लगे। साईंबाबा के भक्त के सारे वादे झूठे साबित हो गए थे। ऐसे में हड़ताल होने के आसार बढ़ रहे थे। वहीं नए मालिक के सामने कर्मचारियों के प्रमुख यानि बॉस को एक नया मौका दिखाई दिया अपने नंबर बनाने का। इस ड्रामें की स्क्रिप्ट रचने वाला व्यक्ति बहुत सम्मानित है मीडिया जगत में। शायद अब था कहना चाहिए, क्योंकि उस शक्स की इज्जत तो सरेआम नीलाम हो गई जब रुष्ट कर्माचारियों ने उससे बात करने से ही इनकार कर दिया और उसके खिलाफ हाय-हाय कर दी। लेकिन शायद वो व्यक्ति इसी के लिए डिज़र्व करता था। आपने उस व्यक्ति को उस को प्रोमो में यह कहते हुए देखा होगा कि “हमें जिम्मेदारी का है अहसास”. जी हां, लेकिन उसी शख्स ने ऐसा गैर जिम्मेदाराना काम किया कि सैकड़ों कर्मचारियों का भविष्य तो चौपट हुआ ही, उसकी अपनी इज्जत जो सालों की मेहनत से कमाई थी,मिट्टी में मिल गई। एक ऐसा नाम बड़े-बड़े लोग जिसका सम्मान करते हैं, उसे उसके नीचे काम करने वाला आदमी गरिया रहा है आज। क्यों हुआ, विस्तार से जानते हैं। आगे मैं इस व्यक्ति को नाटककार के नाम से बुलाउंगा, पढ़ने वक्त कन्फ्यूज़ मत होना।

तो जिस वक्त बिना सैलेरी के पत्रकार उबल रहे थे। उस वक्त हड़ताल का अंदेशा बन रहा था। फिर इस नाटककार को मौका मिला मालिक के सामने अपनी छवि बनाने का। संभवत: वह मालिक (साईभक्त)के पास गया और बोला कि मैं इन्हें संभालता हूं। ये आपसे सैलेरी नहीं मांगेंगे। मैं मामला संभाल लूंगा।

इसके बाद ये महाशय चैनल में आते हैं और सभी एचओडीज़ की आपातकालीन मीटिंग बुलाते हैं। मीटिंग 1 घंटे तक चलती है और थोड़ी देर में सभी लोग न्यूज़रूम में आ जाते हैं। ये जनाब सभी को इशारा कर अपनी ओर बुलाते हैं। सभी लोग इनका सम्मान करते थे और विश्वास करते थे। सभी उम्मीद में शामोशी के साथ इन्हें घेरकर खड़े हो गए। फिर इन्होंने क्या कहा संक्षेप में इस प्रकार है…..

“देखिए, मैं अभी हमारे सर (तारणहार साईंभक्त) के पास से आ रहा हूं। वो आपके व्यवहार से आहत हैं। कह रहे हैं कि आपने जो कल काम रोका था, उससे उन्हें अच्छा नहीं लगा। अब उन्होंने 9 करोड़ रुपये दिए हैं और अब कह रहे हैं कि वो डील बीच में छोड़कर चले जाएंगे। देखिए अब हमें समझना होगा। अगर उन्होंने डील छोड़ दी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। देखिए कोर्ट में केस चलेगा तो हमारे पोतों के टाइम केस का हल निकलेगा। हम हड़ताल नहीं कर सकते। हमारे पास कोई रास्ता नहीं। हमें भूल जाना चाहिए पिछले 2 महीने की सैलेरी को, नई शुरुआत मानकर चलना होगा। हमारे पास कोई और चारा नहीं।”

इतने में विरोध के कई स्वर निकलते हैं तो वो जनाब अपना मोबाइल निकालते कुछ करने लगते हैं। अक्सर कमज़ोर आदमी जो निगाह नहीं मिला पाते, मोबाइल को बहाना बनाते हैं। कई लोग अपनी बात कहने लगे। इतने में फिर वो जनाब कहने लगे।

“देखिए आप डिसाइड कर लीजिए अपने-अपने डिपार्टमेंट हेड्स के साथ कि क्या स्टेप उठाना है. और जल्दी बता दो” सभी की अलग अलग लॉबिंग हो गई और सभी अलग-अलग डिसकस करने लगे। हर कोई काम रोकना चाहता था। सभी ने कहा कि हम काम रोकेंगे और अपने-अफने डिपार्टमेंट हेड्स को बता दिया।

थोड़ी देर में सभी फिर इकट्ठा हुए। महाबॉस ने कहा कि भई सभी डिपार्टमेंट अनकंडिशनल सपोर्ट दे रहे हैं कि हम बिना शर्त काम करने को तैयार हैं। सभी ने अपने डिपार्मेंट हेड की सरफ देखा हैरान हो कर । सभी की निगाहें नीची थी और शख्त काले तवे की तरह थी। ये सुनकर सभी परेशान हो गए कि किसने कहा ऐसा।

अनकंडीशनल का मतलब है कि सैलेरी दो या न दो, हम काम करते रहेंगे। सभी एचओडीज़ ने इस घटना से अपना सम्मान खो दिया।

इसके बाद वह महाबॉस कहने लगे कि तारणहार हमारी नैया को मंझधार में छोड़कर मुंबई जा रहे हैं। मैं उन्हें रोकने जा रहा हूं। और उनसे माफी मांगूंगा। लोगों ने पूछा कि माफी क्यों? तो महाबॉस बोले कि अगर उनको हमारे व्यवहार (तनख्वाह मांगने) से बुरा लगा हो तो मैं सबकी तरफ से माफी मांगूंगा। इसके बाद वो महाबॉस कुछ एचओडीज़ को लेकर गाड़ी में निकल गया।

सभी को पता था कि वो थोड़ी देर बाद आएगा और क्या कहेगा। तो 1 आध घंटे बाद वो वापस आया और बोला कि हमारे मनाने पर तारणहार मान गए हैं। वो मुंबई नहीं जाएंगे। चलिए आप अपना काम कीजिए।

इस तरह से सभी को पता चल गया कि क्या नाटक खेला गया है। अरे कोई 9 करोड़ इन्वेस्टमेंट करने के बाद बीच में डील क्यों छोड़ेगा? और अगर उसने मन बना लिया छोड़ने का तो किसी के मनाने पर थोड़े ही रुकेगा? वो चैनल खरीद रहा है भैय्या, रेहड़ी से टमाटर औऱ भिण्डी नहीं। इस तरह से तभी से धीरे-धीरे बगावत के स्वर उठने वाले थे। और इसीलिए इस बार कर्मचारियों ने बिना बॉसेज़ को बताए हड़ताल कर दी।

अगली पोस्ट में पढ़िए कि किस तरह महाबॉस और बाकी एचओडीज़ की और भद्द पिटी और बावजूद इसके इन लोगों को शर्म नहीं आई और ओछी हरकतों में जुटे रहे।

भड़ास निकालना बंद करो, मीडियामार्ग पर चलो

जो पोर्टल खुद को भारतीय मीडिया की खबरों का सबसे बड़ा मंच कहाता है उसकी औकात क्या है जानिए। एक ऐसा पोर्टल जो खुद को पत्रकारों का हितैषी और उनकी आवाज कहाता है, पत्राकारों का दुशमन है। डेढ साल पहले ये पोर्टल चला था, उसी वक्त VOI शुरू हुआ था। इस चैलन के हालात दिन ब दिन खराब होते गए। इस चैलन की खबरों को प्रकाशिथ कर करके वह पोर्टल नंबर वन गया। ये खबरें सच्ची भी थी और झूठी भी।

कुछ लोग इल्जाम लगाते हैं कि उस पोर्टल ने ही वीओआई की छवि धूमिल की। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। वीओआई के अंदरूनी हालात खराब थे। और उस पोर्टल ने सिर्फ वही हालात सामने रखे, इसमें कोई गलती नहीं। वो अच्छा काम था, अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी को है और इसी आधार पर मीडिया काम करता है।

उस चैनल के हालात दिन ब दिन खराब होते गए। और वो पोर्टल चमकता रहा। ठीक है, चलाने वाले की अपनी मेहनत भाई। फिर एक दिन उस चैनल को संभालने के लिए एक नया बंदा आया। टीकाधारी और खुद को साईं बाबा का परमभक्त कहाने वाला। न्यूज़रूम में आरती की थाली घूमने लगी। पुजारी रखा गया। सारा न्यूजरूम साईमय हो गया कि चलो अब तो भला होगा।

तभी एक उस कुख्यात पोर्टल को चलाने वाला शख्स चैनल में आया और नए डायरेक्टर का इंटरव्यू लेकर चला गया। उस वक्त कथित तौर पर 15,000 रुपये का चेक उस पोर्टल चलाने वाले को उस साईं भक्त ने दिया। अगले दिन उस पोर्टल में साईं भक्त का इंटरव्यू छपा था। उसे पढ़ा तो चैनलकर्मियों में नया उत्साह आया। उसमें साईंभक्त को तारणहार के रूप में दिखाया गया था। साईंभक्त ने कहा था कि उसे साईं बाबा ने भेजा है। उसने पुराने मालिकों को अनाड़ी करार दिया। और कहा कि चैनल कैसे चलाना है उसे मालूम है। फिर उसने आकर डील की बातें की और तनख्वाह देने के वादे किए। उसने यहां तक कहा कि दसंबर की सैलेरी भी मिलेगी। सब एक महीने के अंदर। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। तनख्वाह तो आई नहीं, बल्कि चैनल के बॉस लोगों ने एक अनकंडिशनल नाटक खेल दिया। (उस नाटक के बारे में अगली पोस्ट में जानकारी दी जाएगी).

इस बीच चैनल के हालात खराह होते गए। कर्मचारी बिना तनख्वाह के काम कर रहे थे। साही उम्मींदें टूट चुकी थी। सीनियर सम्मान खो चुके थे। सांकेतिक हड़ताल के बाद जून की आधी तनख्वाह आ गई। उसके बाद फिर काम में लग गए। लेकिन फिर दोबारा तय समय पर सैलेरी का दूसरा हिस्सा नहीं आया तो सभी ने स्वत: ही काम करना बंद कर दिया।

इस दौरान तक कई लोगों ने उस पोर्टल चलाने वाले को अपनी व्यथा से अवगत कराया, इस उम्मीद से कि वो कुछ प्रकाशित करके उनका पक्ष लेगा। लेकिन वो कहता रहा कि “आपके यहां तो चीज़ें सही हो रही हैं न”. इस पूरे दौरान वीओआई के कर्मचारियों की एक बात इसने बाहर नहीं निकाली। क्यों? क्या वो इंटरव्यू के 15,000 के चेक के बोझ तले दब गया था?

और उस बंदे का गिरापन देखो, जब चैनल में अभी हड़ताल हुई तो उसने खबर छाप दी। और वो भी कैसे? कर्मचारियों के पक्ष में नहीं, तारणहार, उद्धारकर्ता के पक्ष में। झूठे वादे करने वाले व्यक्ति की नेकनीयती की दुहाई दी जा रही है और हड़ताल टूटने की नकली खबर दी जा रही है।

पूरी तरह से मालिक और एक व्यक्ति (जो अपना सम्मान खो चुका है) से बात करने के आधार पर हड़ताल टूटने की नकली खबरें प्रकाशित की जा रही हैं।

इस हरामीपने के बीच एक ब्लॉग है जो पत्रकारों के साथ रहा, मीडियामार्ग . मीडियामार्ग ने संघर्षरत पत्रकार साथियों का पक्ष लिया और चैनल की हकीकत सामने रखी।

अच्छी बात है कि मीडिया मार्ग ने इस ब्लॉग को पैसे कमाने के लिए नहीं खोला, वरना दूसरी तरफ कुख्यात पोर्टल चलाने वाला था पैसा कमाने के चक्कर में अंधा हो गया है। भटक गया है।

क्या अपना हक मांगना गलत है?

आज वीओआई की हडताल चौथे दिन में प्रवेश कर गई है। ऑफिस में काम नहीं हो रहा, बारी-बारी से लोग आ रहे हैं और जा रहे हैं। किसी तरह बगरला कर पुराने रनडाउन चलाकर टेप पर रिकॉर्ड किया गया और उस टेप को सीधे ही अपलिंकिंग वाली जगह भेज दिया गया। चैनल वहीं से ऑन एयर किया जा रहा है।

अगर वीओआई के कर्मचारी हड़ताल पर हैं तो क्या गलत कर रहे हैं? उन्होंने कोई अनुचित मांग तो नहीं की। उन्होंने सुविधाओं या वेतन की वृद्धि की मांग नहीं की। वो तो सिर्फ अपना मेहनताना मांग रहे हैं। जिस पर उनका अधिकार है। अरे कोई काम क्यों करता है? रोज़ी-रोटी के लिए न? और तीन महीने दिन रात एक करने के बाद भी आपको एक चवन्नी न मिले तो कैसा लगेगा।

हम सभी मानव हैं और सभी एक जैसे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि हम संतोष कर सकते हैं। कम में गुजारा कर सकते हैं लेकिन अपने बच्चों के लिए समझौता कैसे करें हम। हम तो भूखे पेट सो सकते हैं लेकिन अब हमसे बच्चों की भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी। गले तक कर्ज में डूब गए हैं। ऐसे दिन कभी नहीं देखे। और तो और घरवाले सोचते हैं कि कहीं उनका बच्चा किसी दुर्व्यसन का शिकार होकर पैसा तो नहीं उड़ाने लगा जो घर पैसा नहीं भेज रहा। घर का किराया नहीं दिया, बच्चों की फीस नहीं दी। लोन के नोटिस आ रहे हैं। किश्त डिले हो गई। हाल बुरा है, ऐसे में तमाम झूठे वादों, आश्वासनों के बाद हमारे पास एक ही रास्ता बचा था और वो था हड़ताल। सांकेतिक कार्य बहिष्कार के बाद भी वो लोग नहीं माने।

हड़ताल कर रहे लोग कहते हैं कि हम तो बुरे फंसे हैं। मालिक का ही पता नहीं। अगर नए मालिक और स्वयंभू तारणहार के पास चैनल चलाने का माद्दा नहीं था तो क्यों खरीदा? एक कुख्यात पोर्टल पर तो उसका इंटरव्यू छपा था जिसमें उसने कहा था कि पुराने मालिक को चैनल नहीं चलाने आता। और पैसा बैकअप में लेकर चलना पडता है। ऐसे में खुद वही गलती क्यों की तारणहार ने।

इस कठिन दौर में कोई वीओआई कर्मियों के साथ नहीं। वो अपना संघर्ष खुद कर रहे हैं और ये सही भी है। हर किसी को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी चाहिए। अब लड़ाई निर्याणक दौर में है। उम्मीद है कि जल्दी ही वो अपने मकसद में कामयाब होंगे

SATURDAY, AUGUST 22, 2009

पत्रकार साथियों से एक अपील

तुम्हारे भाई कठिनाई में हैं और तुम हंस रहे हो? शर्म आनी चाहिए तुम्हें। अंतत: वही हुआ न जिसकी तुम कई माह से प्रतीत्क्षा कर रहे थे। अपने आकलन को फलीभूत होता हुआ देखना तुम्हारे लिए निस्संदेह बहुत आनंददायक होगा, लेकिन ज़रा सोचो इस घटना ने कितनों के जीवन बर्बाद कर दिए। सिर्फ उन लोगों के नहीं जो वॉयस ऑफ इंडिया में काम कर रहे थे। बल्कि उनके साथ उनके परिजनों, बाल-बच्चों का भविष्य भी अधर में लटक गया है। ठीक है, तुम्हारी अपनी विवशताएं हैं और उन्हें समझा जा सकता है। लेकिन ऐसे दौर में कम से कम उन लोगों का मज़ाक तो मत उडाओ। जिस जगह वीओआई के कर्मचारी आज हैं, उस जगह तुम भी तो हो सकते थे। उनके साथ कदम से कदम मिलाकर खड़े नहीं हो सकते तो कम से कम उनपर हंसो तो मत…।

और हां ध्यान रहे, प्रख्यात विचार शिव खेड़ा की एक लाइन ध्यान में रखना: अगर तुम्हारे पड़ोसी पर अत्याचार हो रहा है और ऐसे में तुम्हें नींद आ जाती हो तो सावधान! अगला नम्बर आपका हो सकता है।

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