साहित्य की पतनशील धारा में गोते लगाता ज्ञानपीठ
♦ अनामदास
अनामदास की यह रिपोर्ट काफी दिनों से आकर पड़ी थी। इस बीच दूसरी बात-बहस चली, तो ये गुम ही रही। इनबॉक्स के आर्काइव से निकल आयी। बात पुरानी नहीं हुई है और मौजूं है : मॉडरेटर
जोड़-तोड़, तिकड़म और मूल्यहीनता के इस दौर में अपनी साहित्यिक गरिमा, गंभीरता और प्रतिष्ठा का मानक रहा भारतीय ज्ञानपीठ इन दिनों साहित्य की पतनशील धारा में खूब गोते लगा रहा है। इसका एक उदाहरण है 15 अगस्त 2009 को इंडिया हैबिटेट सेंटर में भारतीय ज्ञानपीठ के तत्वाधान में हुई स-रस काव्य संध्या जिसके कर्ताधर्ता थे साहित्यिक मूल्यहीनता और जुमलेबाजी में नवोन्मेष के सिद्धांतकार भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक सर्वश्री रवींद्र कालिया। ज्ञानपीठ के इतिहास में शायद पहली बार ऐसी फूहड़, गरिमाहीन, हास्यास्पद और अराजक सरस काव्यसंध्या हुई।
अब तक ज्ञानपीठ ने तमाम गंभीर और गरिमामय काव्यपाठ आयोजित किये हैं, लेकिन ऐसा सरस काव्यपाठ पहली बार आयोजित किया। सबसे पहले तो इस काव्यसंध्या में शामिल कथित कवियों की सूची देख लें, तो सारा मामला साफ हो जाएगा। ये स्वनामधन्य कवि थे – सर्वश्री अशोक चक्रधर, कन्हैया लाल नंदन, विजय किशोर मानव, शेरजंग गर्ग, बुद्धिनाथ मिश्र, बालस्वरूप राही, प्रज्ञा जैन, निशांत, उमाशंकर चौधरी, आलोक श्रीवास्तव, वाजदा खान आदि। इसके अलावा मंच की शोभा बढ़ा रहे थे यशस्वी पत्रकार और नई दुनिया के प्रधान संपादक श्री आलोक मेहता। क्या इस सरस काव्यसंध्या के कवियों की सूची भर से भारतीय ज्ञानपीठ और इसके निदेशक रवींद्र कालिया के पतनशील विचलन की सूचना नहीं मिलती? याद करें हिंदी अकादमी का विवाद और विदूषक कहे गये अशोक चक्रधर के लिए हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष के रूप में साहित्य में वैधता का संकट। इसी से जुड़ी है इस कार्यक्रम के अध्यक्ष कन्हैया लाल नंदन और नई दुनिया के संपादक अलोक मेहता की भूमिका।
ये कोई छिपा एजेंडा नहीं है – कालिया जी पुराने कांग्रेसी हैं और इतने निष्ठावान कि एक जमाने में उन्होंने खुलकर आपातकाल तक का समर्थन किया था। तब वे संजय गांधी के छुटभैये चमचे थे। दूसरे आलोक मेहता हैं, जो सुना जाता है कि कांग्रेस पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा के लिए जल्द राज्यसभा में पहुंचने वाले हैं और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए नारे लिखने वाले अशोक चक्रधर पुरस्कारस्वरूप हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष बन ही चुके हैं। रही बात नंदन जी की, तो मीडियाक्रिटी से सारी ज़िंदगी उबर नहीं पाये, अब अंतिम बखत में हिंदी अकादमी के शलाका सम्मान की आस लगाये अशोक चक्रधर के गुण गाये जा रहे हैं। इतना कि खुद अशोक चक्रधर शर्माये शर्माये घूम रहे हैं।
वैसे नंदन जी की व्यवस्था चाक चौबंद है। हिंदी अकादमी में चक्रधर का चक्कर चल ही रहा है और ज्ञानपीठ में उनके पुराने मित्र रवींद्र कालिया अपना मित्रधर्म निभाने को आकुल-व्याकुल हैं ही। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि हाल में अपने संपादकीय में अलोक मेहता ने अरुंधति राय की आंख खोलने वाली बातों पर उन्हें गरियाना शुरू किया, तो अरुंधति के मुकाबले उन्हें हिंदी में सिर्फ तीन लेखक नज़र आये, उनमें एक रवींद्र कालिया हैं। आख़िर इतना बड़ा संपादक उनकी तुलना अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त लेखिका से कर रहा है, तो कुछ तो बात होगी। बस समीकरण बन गया।
वैसे कालिया जी सत्ता समीकरण बनाने में हमेशा से उस्ताद रहे हैं। यही कारण है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति भूतपूर्व आईजी विभूतिनारायण राय भारतीय ज्ञानपीठ की निर्णायक समिति में होते हैं, तो कालिया जी की पत्नी ममता कालिया मगांअहिंविवि की अंग्रेजी पत्रिका हिंदी की संपादक। इसके पीछे इलाहाबादी कनेक्शन तो खैर है ही। यही कारण है कि मगांअहिंविवि की पत्रिकाओं के सभी संपादक या तो इलाहाबादी हैं या फिर कुलपति के जातिभाई।
बहरहाल, पहले बात स-रस काव्य संध्या और उसके निहितार्थों की। इस सरस काव्य संध्या में उपस्थित सभी श्रोताओं ने देखा कि किस तरह मंच पर उपस्थित गंभीर युवा कवियों को हिंदी अकादमी के विदूषक उपाध्यक्ष द्वारा लगातार अपमानित किया गया और लोकप्रियता को ही कविता की सफलता की शर्त बता कर उन्हें नसीहत दी गयी। इस हास्यास्पद तर्क का कोई क्या करे, जब हिंदी के वरिष्ठ कवि और ज्ञानपीठ विजेता कुंवरनारायण भी कार्यक्रम में पीछे की पंक्ति में बैठे थे। शायद वे अनजाने में या ज्ञानपीठ के लिहाज में वहां आ गये हों लेकिन जल्द ही कुंवर जी कार्यक्रम में असहज हो गये और उठकर चलते बने। यही नहीं, कवयित्री अनामिका के काव्यपाठ पर तो कन्हैयालाल नंदन कुछ इस तरह भड़के कि मंच पर उन्हें डांटने लगे। इस तरह ज्ञानपीठ ने वरिष्ठ और कनिष्ठ सभी कवियों को कार्यक्रम में अपमानित किया।









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बिलकुल मौंजू है यह आलेख.
इस पैर बहस कौन करे जब सब के सब ज्ञानपीठ की रेवाडी पाने को बेचैन हैं?
ज्ञानोदय पत्रिका की अधोगति तो तब हो ही गई थी जब देवदास का मूल बंगला से अनुवाद कराया गया था और प्रेम महाविशेषांक नामक महा संकलन की योजना सामने आई थी और जिनकी बेहिसाब बिक्री भी प्रचारित की जा रही है!
jnapith के aajeewan nyasi aalok jain भी इस kavya path से behad nirash हुए हैं. unka kahna है की isase gyanpith की garima को thes लगी है. aainda ashok chakradhar और nandan जैसे हलके लोगों को मंच पे नहीं बुलाएँगे. mancheeya kaviyon से parhej किया जाना चाहिए जिनके jeewan moolya और darshan sthir नहीं rahte. पता नहीं रविन्द्र kaliya को alok जी जी की tippani kitani ras आई. iss mamle में sirf yuva kavi hare krishn upadhyay जी ने nirnay लिया और aamantrit kavi होने के bavjood sabhagar chhor के चले गए. anuj
अभी अभी पता चला है की कथाकार वंदना राग भी कालिया जी के अशोभनीय व्यहार से आहत हैं. दरअसल पिछले कई अंको से प्रेम विशेषांक के लिए दिए जा रहे विज्ञापन में उनकी कहानी के प्रकाशन की भी सूचना दी जा रही थी लेकिन अंतिम समय में उनकी कहानी अंक में न छापकर कई ऐसे लोगो की कहानी छाप दी गई जिसकी सूचना विज्ञापन में नहीं थी. सूचना के अनुसार वंदना राग ने इस सम्पादकीय तानाशाही के खिलाफ कालिया जी को एक पत्र भी लिखा है बहरहाल…
बहुत ही सटीक और विचारणीय लेख है. बात सत्य है किन्तु कटु भी.इस मंचीय उठापटक और राजनीति एवं तिगडमबाज़ी ने कविता और साहित्य का बहुत नुक्सान किया है .असुरक्षा की भावना आ गई है इन तथाकथित कविओं मे .अगर कविता और प्रतिभा आगे आ गई तो यह लोग कहाँ जायेंगे? इन्हें पूछने वाला भी नहीं मिलेगा कियोंकि इन लोगो ने किसी का भला नहीं किया .सिर्फ अपने चमचो और अपने सिवाय .साल भर मे २०० कवि सम्मलेन तो साहित्य अकादमी कराती है और यह सब अपने जान पहचान वालो को बुला लेते हैं या सिफारशी को .लेकिन यह याद रहे इनका का अंत बहुत ही दयनीय होता है . स्वार्थी लोग इतिहास के काबिल भी नहीं रहते.मेरी एक कविता इस सन्दर्भ मे …
महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता
कोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता ।
कविता शौक से भी लिखने का काम नहीं
इतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं ।
कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है,
मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविता
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहीं
नयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं ।
कभी कविता किसी अल्हड यौवन का नाज़ है
कभी दुःख से भरी ह्रदय की आवाज है
कभी धड़कन तो कभी लहू की रवानी है
कभी रोटी की , कभी भूख की कहानी है ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
कोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
मुफलिस ज़िस्म का उघडा बदन है कभी
बेकफन लाश पर चदता हुआ कफ़न है कभी ।
बेबस इंसान का भीगा हुआ नयन है कभी,
सर्दीली रात में ठिठुरता हुआ तन है कभी ।
कविता बहती हुई आंखों में चिपका पीप है ,
कविता दूर नहीं कहीं, इंसान के समीप हैं ।
महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,
कोई पेशा, कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥
कवि दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com
Ek baat aur
जब भी कोई बात डंके पे कही जाती है
न जाने क्यों ज़माने को अख़र जाती है
झूठ कहते हैं तो मुज़रिम करार देते हैं
सच कहते हैं तो बगा़वत कि बू आती है
फ़र्क कुछ भी नहीं अमीरी और ग़रीबी में
अमीरी रोती है ग़रीबी मुस्कुराती है
अम्मा ! मुझे चाँद नही बस एक रोटी चाहिऐ
बिटिया ग़रीब की रह – रहकर बुदबुदाती है
‘दीपक’ सो गई फुटपाथ पर थककर मेहनत
इधर नींद कि खा़तिर हवेली छ्टपटाती है
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