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जेएनयू का सच : होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे

27 August 2009 18 Comments

♦ मृत्युंजय प्रभाकर

jnuफूहड़ता और मजाक हमारे समय का सबसे बड़ा सत्य बन चुका है। यह सिर्फ देश के टेलीविजन चैनलों द्वारा टीआरपी और पैसा बटोरने के लिए किया गया उपक्रम मात्र नहीं है। इसके नज़ारे हमारे आस-पास हम हर दिन देख सकते हैं। जैसे किसी अच्छे-भले आदमी के लिए हमारे पास विशेषण के तौर पर “बेचारा” शब्द मात्र रह गया है वैसे ही अच्छे, नेक व जरूरी कामों के लिए भी “बेचारगी” और “लाचारगी” जैसे शब्द ही रह गये हैं। कमाल यह है कि इनकी पैकेजिंग भी इतने जबर्दस्त ढंग से की जाती है कि लगता है सच में शायद यही दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। पर हकीकत में यह मसला सबसे मुश्किल सरोकार का है, जो कहीं नहीं दिखता।

अपने प्रगतिशील मूल्यों के लिए जाने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रगतिशीलता का नकाब लगातार उतरता जा रहा है। इसे एक नहीं, कई स्तरों पर देखा जा सकता है। छात्रों की प्रवेश प्रक्रिया में आरक्षण नियमों के लागू करने की बात हो या आरक्षित पदों पर अध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया हो – विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा इस कोशिश में दिखता है कि कैसे आरक्षित पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों को आरक्षण से वंचित किया जाए। इसका नमूना पिछले और इस वर्ष आरक्षित श्रेणी की सीटें न भरने से साफ दिखता है। अपने तमाम दावों के बावजूद इस वर्ष भी प्रशासन आरक्षित सीटें नहीं भर पाया है। इससे भी विस्मयकारी तथ्य यह है कि आज तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक भी ओबीसी श्रेणी के प्राध्यापक की नियुक्ति नहीं हो पायी है। एससी/एसटी और पीएच कैटेगरी की सीटें भी खाली हैं।

विश्वविद्यालय द्वारा इस वर्ष के मई महीने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को भेजे गये सर्कुलर से यह बात सामने आती है जिसे आप निम्न टेबल में देख सकते हैं।

Details of teaching staff staff: As on 31.3.2009
jnu obc stat
(Consolidated statistical data submitted to UGC (Vide their letter No. D.O.No.F.1-10/2008 dated 19.5.2009)
by JNU duly signed by the Registrar.)

इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि अभी कुछ दिनों में विश्वविद्यालय प्राध्यापकों की बड़े पैमाने पर नियुक्ति करने जा रहा है। यह शायद दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय द्वारा की गयी सबसे बड़ी एकमुश्त बहाली हो और शायद सबसे बड़ा एकेडमिक बहाली घोटाला भी। लगभग 230 प्राध्यापकों की बहाली का रोस्टर प्रशासन द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें लगभग 80 पद असिस्टेंट प्रोफेसर और बाकी के पद एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के हैं। इनमें भी बड़ी ही धूर्ततापूर्वक प्रशासन ओबीसी आरक्षण को बेकार करने की कोशिश कर रहा है। आमतौर पर एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर से ज्यादा सीटें असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर ऑफर की जाती हैं लेकिन जेएनयू प्रशासन उल्टी चाल चल रहा है और वो अनायास नहीं सकारण है। कारण यह है कि जेएनयू प्रशासन ने सिर्फ असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर ही ओबीसी आरक्षण देने की नीति बना रखी है। अतः वह इस श्रेणी की जितनी कम सीटें ऑफर करेंगे, उन्हें ओबीसी आरक्षण उतना ही कम देना पड़ेगा। इसे आप जेएनयू एकेडमिक काउंसिल के 11.4.2007 की बैठक में हुए निर्णय में देख सकते हैं।

** The reservation for SC/ST and PH categories at the level of Professor and Associate Professor was adopted by the University. Vide E.C. resolution No.6.7 dated 11.4.2007, while for OBC the reservation is available at the level of Assistant Professor only.

हैरत में डालने वाली बात यह है कि जिस बैठक में जेएनयू एकेडमिक काउंसिल यह निर्णय लेता है कि वह आगे से एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर भी एससी/एसटी और पीएच कैटेगरी के लोगों को आरक्षण देगा, उसी बैठक में वह यह निर्णय लेता है कि ओबीसी कैटेगरी के लोगों को सिर्फ असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर आरक्षण दिया जाएगा। आरक्षण को लागू करने की इस विचित्रता के पीछे के कारणों को अब आप खुद समझ सकते हैं। प्रशासन चूंकि इस बात को जानता है कि आज न कल उसे लोकतांत्रिक दबाव में सही आरक्षण को लागू करना पड़ेगा, इसी कारण वह एकमुश्त इतनी बड़ी मात्रा में पद निकाल कर अगले 10-20 सालों के लिए बहाली पर विराम लगाना चाहता है और अपने प्रिय उच्च जाति के लोगों को एकमुश्त ठूंस देना चाहता है। आपको यह जान कर भी शायद आश्चर्य हो कि जो विश्‍वविद्यालय खुद यह स्वीकार करता है कि हमने अभी तक एक भी ओबीसी कैटेगरी के व्यक्ति को अपने यहां नियुक्त नहीं किया है, वह ओबीसी सीटों का कोई बैकलॉग भी स्वीकार नहीं करता। अगर वह बैकलॉग स्वीकार करे तो आगे आने वाली बहाली की अधिकांश सीटें उसे ओबीसी कैटेगरी को देना पड़ेगा।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर इन तमाम घपलों-घोटलों के बीच विश्वविद्यालय के तमाम क्रांतिकारी छात्र संगठन क्या कर रहे हैं। एक तो सालों से इस कैंपस पर काबिज छात्र संगठनों को यह पता ही नहीं है कि जेएनयू कैंपस में एक भी ओबीसी कोटे का प्राध्यापक नियुक्त नहीं किया गया है। छात्रों को मिलनेवाले आरक्षण के सवाल पर जरूर उनके कुछ पैंप्लेट देखने को मिल जाते हैं पर ज्यादातर उसमें इस बात पर बहसबाजी होती है कि आरक्षण के मुद्दे पर किसकी समझदारी सबसे बेहतर है। छात्र संघ पर्चे निकाल कर ज्ञान दे रहा है कि प्रशासन इस-इस तरह से आरक्षण को डॉयल्यूट कर रहा है। दूसरे क्रांतिकारी छात्र संगठन इस बात पर भिड़े हैं कि यह सिर्फ भाषणबाजी है। हाल ही में स्टैंडिंग कमेटी की बैठक के पूर्व हुए प्रदर्शन में भी सारे संगठन बस एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते नज़र आये। छात्रों की गोलबंदी का आलम यह था कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मुश्किल से 30-40 छात्र प्रदर्शन में शामिल हुए। कारण इन क्रांतिकारी छात्र संगठनों की टोकन भागीदारी रही, जो यह सवाल करने पर विवश करता है कि कॉमरेड आपकी पॉलिटिक्स क्या है?

18 Comments »

  • खरी बात said:

    बेहद हिंसक और डराने वाली सूचनाएं हैं ये। न्यायपालिका, मीडिया-साहित्य और एकेडमिक कैंपस इस देश में जातिवादी घृणा के आखिरी किले हैं। लेकिन शहरीकरण और इंटरनेट के जोर पकड़ने के साथ बहुत कुछ बदल रहा है। शुभकामनाएं मृत्युंजय।

  • aam admi said:

    शाबाश मृत्युंजय. बहुत बढ़िया ढंग से खोली है पोल आपने इस तथाकथित प्रगतिशील संस्थान की. खेल जातिवाद का, पर लबादा प्रगतिशीलता का! ब्राह्मणवाद ऐसे ही काम करता है. व्यवस्था के किसी भी अंग/ इकाई को ले लीजिये, वहां ब्राह्मणवाद का ऐसा ही नाच देखने को मिलेगा- कहीं नंगा तो कहीं परदे कि ओट से. हालात और संगीन तब हो जाते है जब ब्राह्मणवाद के ‘खेल’ को समझने वाले ‘प्रबुद्ध’ लोग उसपर प्रहार करने के बजाय चुप्पी ओढ़ लेते हैं. कोई बात नहीं. समय लिखेगा उनका भी इतिहास. आप लगे रहिये. आपके जज्बे को सलाम.

  • शशि सिंह said:

    भई, लाल कमीज पहनने से कोई सफेद धोती पहना थोड़े न भूल जायेगा।

  • गेंदालाल said:

    लाल लंगोटी वाले बजरंग बली के बारे में क्या खयाल है, शस्य श्यामला शशि शेर जी…

  • Pankaj Parashar said:

    बाकी सेंटर्स और स्कूल की सूचनाओं से फिलवक्त मैं अपडेट नहीं हूं, क्योंकि कैंपस गए हुए महीनों गुजर जाते हैं। पर भारतीय भाषा केंद्र से तो वाकिफ हूं. सूची में दिखाया गया है कि अनुसूचित जाति से एक भी एसोशिएट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि पी-एच.डी में मेरे शोध निर्देशक रहे डॉ.गोबिंद प्रसाद अनुसूचित जाति से हैं और वे बाकायदा रीडर हैं। दूसरी ओर सूची में दिखाया गया है कि एक भी ओबीसी असिस्टेंट प्रोफेसर नहीं हैं, जबकि रूसी केंद्र में हमारे एक साथी हैं। मेरा ख्याल है कि ऐसे नाम और भी कई हैं जो सूची की त्रुटियों को साफ-साफ उजागर करते हैं।

    हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो।

  • mrityunjay prabhakar said:

    पंकज भाई,

    आप जिसे तकनिकी प्रॉब्लम बता रहे हैं दरअसल वोह उनकी योग्यता है की वे जनरल वाली सीट पर चुनकर आये हैं. अब कोई बताये की जो जनरल की सीट पर चुनकर आया हो बिना किसी रिज़र्वेशन के वोह ओ बी सी या किसी और कातेगोरी में कैसे गिना जायेगा. दरअसल यही वोह मानसिकता है जो कहती है की तुम हमारी बराबरी कभी नहीं कर सकते. भले ही योग्यता में हमसे कम्पीट कर लो पर रहोगे हमसे निचे ही.
    और इससे जुडी दूसरी बात यह की ऐसे लोग भी उँगलियों पर गिने जा सकते हैं
    इनकी संख्या भी ४-५ से ज्यादा नहीं है

    और मुद्दे से भटकना नहीं चाहिए
    यहाँ बात ओ बी सी और दुसरे आरक्षणों को ठीक से लागु करने की हो रही है
    जिसने यही सवर्ण मानसिकता लगातार रोडे अटकाने के नए नए तरीके गढ़ रही है
    अगली पोस्ट में इसे और भी खोलने की कोशिश करूँगा की
    कैसे होता हैं गरीब पिछडे जमात से आये लोगों के सपनों का खून
    देश के सबसे प्रगतिशील और बौधिक समाज मने जाने वाले जेएनयू में

  • शशि सिंह said:

    ख़्याल क्या है….!!! बोलो बोलो बजरंग बली की जय!!!

    और हां, गेंदा भाई/बहन… मेरे माता-पिता ने मेरा नाम शशि सिंह रखा है शशि शेर नहीं। उम्मीद है अगली बार संबोधन में इस बात का ध्यान रखेंगे। वैसे आपका नाम मुझे बेहद भाया…

  • SHAMBHU said:

    जिस देश में जाति के नाम पर हजारों साल तक लोगों का शोषण हुआ हो… वो खून पी चुके घड़ियाल क्या इतनी आशानी से जाति का दंभ भरना और गैर जाति का शोषण करना छोड़ देंगे… लेकिन जेएनयू में भी ऐसे हालात हैं…जानकर हार्दिक दुख हुआ… लेकिन क्या करें… जिस देश में हर डाल पर उल्लू कुंडली मारकर बैठा हो वहां अगर आप हंस की आशा तो नहीं कर सकते ना…

  • गेंदालाल said:

    क्या करूं, शशि शेर भाई। सिंह में दीर्घ ई लगा कर उसे सींग तो नहीं कर सकता। दरअसल, सिंह का मतलब मैं और कुछ और समझ ही नहीं पाता। गेंदा नाम से तो यह जाहिर होता ही होगा कि मैं पूरा का पूरा गेंद ही होऊंगा, और गेंद बेचारा कभी इधर तो कभी उधर। वह भी पद से।
    मेरा भी नाम पिता ने गेंदा ही रखा था। उसके बाद अगर मैंने उसे लाल कर लिया तो उसका भी क्या करूं। लाल का मतलब ज्यादा से ज्यादा लहू या रेड लगा पाता हूं।

  • शशि सिंह said:

    गेंदा जी,

    अपने नाम का मतलब आप चाहें जो लगायें या समझे या फिर नया ही रख लें, आपकी इच्छा। लेकिन कृपया मेरे नाम के साथ कोई छेड़छाड़ न करें। निवेदन है मेरा।

    धन्यवाद!

  • abhishek raushan said:

    Mritunjay जी,

    लगे रहे अपने मुहीम में ,akadmik जगत में ओबी सी
    की halat का संकेत है .
    abhishek

  • jhola said:

    गजब है यार! मोका मिलते ही वामपंथ को गरियाने लगते हो. पता नहीं हो तो ये जान लीजिये जे.एन.यु. का प्रशाशन परगतिशील नहीं है, वीसी, रेक्टर सरकारी आदमी है. दुसरे लोग संघी. इसके बावजूद जितना हो सकता है, उससे ज्यादा यहाँ के प्रगतिशील विद्यार्थी, अध्यापक और कर्मचारी कोशिश करते है, और नतीजा सामने भी आता है. आप लोगो की तरह सिर्फ की बोर्ड पर उंगलिया घिसने से कुछ नहीं होता.

  • Pankaj Parashar said:

    मृत्युंजय,

    कल लिखी मेरी प्रतिक्रिया की अंतिम पंक्तियां हैं-
    हां, एक तकनीकी बात यह हो सकती है कि इन लोगों को सामान्य कोटे से बहाल किया गया हो।

    मैंने यह अनभिज्ञता जाहिर की, कि हो सकता है उनकी नियुक्ति सामान्य श्रेणी में हुई हो, जिसकी कोई सूचना मुझे नहीं है. इसमें न तो किसी कथित प्राब्लम शब्द का जिक्र कहीं है और न मेरे चेतन या अवचेतन में वह बातें हैं, जो व्याख्या की पोलिमिक्स के तहत आप कह रहे हैं। मनचाही व्याख्या और अनचाही सलाह से बचना चाहिए.
    इस संदर्भ में अनायास मनमानी व्याख्या का विरोध करती सूसन सौंटेग की 1966 में प्रकाशित पुस्तक Against Interpretation and Other Essays. की याद आ गई। खुदा खैर करे.

  • aam admi said:

    अविनाश जी,

    शिक्षा के क्षेत्र में जो घपला और सामाजिक असंतुलन की बेईमानी है, वह मेरे जानते ” हिंदी वाला फेमेनिज़्म से क्यों डरता है” और ” बिन्देश्वर पाठक को पुरस्कार मिलने” से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और जरुरी मुद्दा है. मृत्युंजय ने एक सही मसला उठाया है. इसे इग्नोर करना अनुचित ही नहीं बल्कि अपराध है. इससे बचिए.

  • sandeep said:

    जेएनयू की दशा देश के अन्य vishwavidhylayo से अलग से थोड़े ही है आखिर जेएनयू को ही इतना सीरियसली क्यों ले रहे है BHU इलाहाबाद उनिवर्सिटी जामिया वर्धा मैं भी तो ये खेल चल; रहा है जुगाड़ से लोग विसी प्रोफ़ेसर लेक्टरार बन रहे है जात से ज्यादा पैसे का खेल है आम आदमी बेहाल है उसके लिए तो प्राईमरी की मास्टरी भी मुहाल है इन्हें ब्रह्मणवादी नही पूजीवादी मानना चाहिए ब्रह्मण वादी कह कर आप सब लोग बहस को जाति के स्तर पर लाकर खडा कर देते है और कही न कही ख़त्म होती इस विचारधारा को जिन्दा करने के लिए मरे जा रहे लोगो के एजेंडे को मजबूत करते है
    जाति का झंडा फहराने वालो को हर समस्या की जड़ जाति मैं ही दिखाई देती है सरकार की आलोचना करने का साहस केवल रिजर्वेशन तक करने वालो को जाति उद्धार का स्वप्न भूल जाना चाहिए क्योकि अब ब्रह्मणवाद नहीं पूंजीवाद समाज को घेर रहा है जिसमे सभी जाति के भर्स्ट लोग है वो भी जिन्होंने रिजर्वेशन का फायदा ब्रह्मणवाद को गरिया कर लिया है और अपनी जाति को फायदे के लिए ही इस्तेमाल करता है जो ब्राम्हणवाद करता है
    मै अपनी सामान्य जानकारी के साथ टिप्पणी दे रहा हूँ क्योकि मुझे लगता है की जात की बात वो करता है जो या तो जात से फायदा लेना चाहता है या फिर पैसे से भरा पूरा है सच्चे मन से जो भी समाज को सुधरने की कोसिस करना चाहता है उसे नेट की दुनिया से निकल कर बाजारभाव पता करना चाहिये और फिर गरीब की क्रय छमता के बारे मैं सोचना चाहिए सायद उसमे भी कोई ओबीसी एसटी निकल आये तब आपकी चिंता वाजिब है आखिर

    जब जेएनयू एक मॉडल है देश के बाकी हिस्से मे हाल क्या होगा

  • Mrityunjay Prabhakar said:

    Sandeep भाई,

    आपकी baton से ही शुरू की जाये. आपने कहा की सिर्फ jnu ही क्यूँ. मैंने कब कहा की सिर्फ jnu में ऐसा हो रहा है. मेरे hath बहुत मुश्किल से jnu का यह data लगा जो उसने ugc को bheja था.
    तो
    मैं यह sarvjanik कर रहा हूँ
    अब मैं akela sare देश के universities का data कहाँ से khojta firunga
    जो लोग wahan हैं उनको चाहिए की wahan का data nikalen
    waise अपने ant में सही ही लिखा है की जब model mane जाने वाले jnu का यह हल है तो baki का क्या होगा
    dusri बात punjiwad और brahmanvad की
    मुझे समझ में नहीं ata बात जब brahmanvad की हो रही है तो usme wo सब shamil हैं जो ऐसा vyavahar करते हैं
    इसका मतलब सिर्फ brahmanon से nahio है
    और mirchi भी उन्हें ही lagati है जो brahmanvad करते हैं
    और usmen visvash करते हैं

    जहाँ तक punjivad का sawal है
    भाई मेरे punjivad हमेशा pratispardhi vyavstha khada करता jisme
    जो सबसे saksham है उसे age badne का mauka मिलता है
    यहाँ जो jativad और भाई-bhatijavad है उसका punjivad से कुछ लेना dena नहीं है
    दोनों को uljhane की कोशिश न करें

    dusri बात आप हमें nich जाती kahahr hazaron salon तक
    dabate raho तो ठीक है
    अब जब हम कहते हैं की जाती के nam पर हमें dabaya गया
    और अब usse nikalne के लिए reservation चाहिए
    तो हम jativadi हो जाते हैं

    यह जाती vyavastha भाई मेरे मैंने तो नहीं banai
    यह wahi लोग हैं जो आज
    हमारे लिए मिली seat भी खा जाना चाहते हैं
    अपनी जाती के लोगों के लिए reserve कर लेना चाहते हैं

    अभी जो universities में seat increase हुई है वोह obc के nam पर हुई है
    sarkar ने extra paisa reservation ठीक से lagu करने के लिए दिया है
    पर reservation की seat पर general walon को bahal किया जा रहा है

    ये कौन सा vad है भाई
    अगर brahamnvad नहीं है
    मैं फिर कह रहा हूँ की यह brahmanvad है जो देश के sansadhanon पर agadon का ही kabja barkarar rakhna चाहता है

    और chot हमेशा सही जगह karni चाहिए
    isliye brahmanvad बार-बार लिख रहा hun

  • danish said:

    lekin mritunjay ji,aap to campus k kisi bhi sangharsh ya agitaion me nahi dikhai dete ho,aapko apni job se kahan fursat hai?na to aap lal jhande me ho na aap khakhi nikkar pahante ho,siway keyboard par type karne k alawa aapne is mudde par kya kara hai?ho sakta hai raat ko natak mandali me baith kar kuch gyaan baant diya hoga,yaa phir campus ke kisi neta k saath bahas karli hogi,iske alawa kisi ngo wale se baat kari hogi.
    bahar baith kar,job kate hue reservation k upar bahas karna koi badi baat nahi hai,shayad aapko pata hoga ki ad.bloc me kaise log baithe hain,kya sochte hain,phir bhi aap union k kisi bhi sangharsh me shamil nahi hote hai?koi sarthak pryas nahi karte hain(jo jnu ki parampra hai). aap comrade se puchte hain unki palitics k bare me,me aap se puchta hun aapki ngo wali politics k bare me?

  • danish said:

    singhdanish1@yahoo.com

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