कौन है ये मवालियों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर?
♦ जगदीश्वर चतुर्वेदी
औकात में रहकर बात करो
♦ आलोक तोमर
बात करो मगर औकात में रहकर बात करो : भारत के सबसे सिद्व और प्रसिद्व संपादक और उससे भी आगे शास्त्रीय संगीत से ले कर क्रिकेट तक हुनर जानने वाले प्रभाष जोशी के पीछे आज कल कुछ लफंगों की जमात पड़ गई है। खास तौर पर इंटरनेट पर जहां प्रभाष जी जाते नहीं, और नेट को समाज मानने से भी इंकार करते हैं, कई अज्ञात कुलशील वेबसाइटें और ब्लॉग भरे पड़े हैं जो प्रभाष जी को ब्राह्मणवादी, सामंती और सती प्रथा का समर्थक बता रहे हैं।
कहानी रविवार डॉट कॉम में हमारे मित्र आलोक प्रकाश पुतुल द्वारा प्रभाष जी के इंटरव्यू से शुरू हुई थी। वेबसाइट के आठ पन्नों में यह इंटरव्यू छपा है और इसके कुछ हिस्सों को लेकर भाई लोग प्रभाष जी को निपटाने की कोशिश कर रहे हैं। जिसे इंदिरा गांधी नहीं निपटा पाईं, जिसे राजीव गांधी नहीं निपटा पाए, जिस लालकृष्ण आडवाणी नहीं निपटा पाए, उसे निपटाने में लगे हैं भाई लोग और जैसे अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू दिखाने से टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ जाती है वैसे ही ये ब्लॉग वाले प्रभाष जी की वजह से लोकप्रिय और हिट हो रहे हैं।
प्रभाष जी पर इल्जाम है कि वे जातिवादी हैं और ब्राह्मणों को हमेशा उन्होंने आगे बढ़ाया। दूर नहीं जाना है। मेरा उदाहरण लीजिए। मैं ब्राह्मण नहीं हूं और अपने कुलीन राजपूत होने पर मुझे दर्प नहीं तो शर्म भी नहीं है। पंडित प्रभाष जोशी ने मुझ जैसे गांव के लड़के को छह साल में सात प्रमोशन दिए और जब बछावत वेतन आयोग आया था तो इन्हीं पदोन्नतियों की वजह से देश में सबसे ज्यादा एरियर पाने वाला पत्रकार मैं था जिससे मैंने कार खरीदी थी। प्रभाष जी ने जनसत्ता के दिल्ली संस्करण का संपादक बनवारी को बनाया जो ब्राह्मण नहीं हैं लेकिन ज्ञान और ध्यान में कई ब्राह्मणों से भारी पड़ेंगे। प्रभाष जी ने सुशील कुमार सिंह को चीफ रिपोर्टर बनाया। सुशील ब्राह्मण नहीं है। प्रभाष जी ने कुमार आनंद को चीफ रिपोर्टर बनाया, वे भी ब्राह्मण नहीं है। प्रभाष जी ने अगर मुझे नौकरी से निकाला तो पंडित हरिशंकर ब्यास को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया।
सिलिकॉन वैली में अगर ब्राह्मण छाए हुए हैं तो यह तथ्य है और किसी तथ्य को तर्क में इस्तेमाल करने में संविधान में कोई प्रतिबंध नहीं लगा हुआ है। प्रभाषजी तो इसी आनुवांशिक परंपरा के हिसाब से मुसलमानों को क्रिकेट में सबसे कौशलवादी कौम मानते हैं और अगर कहते हैं कि इनको हुनर आता था और चूंकि हिंदू धर्म में इन्हें सम्मान नहीं मिला इसलिए उनके पुरखे मुसलमान बन गए थे। अगर जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिंह राव और राजीव गांधी ब्राह्मण हैं तो इसमें प्रभाष जी का क्या कसूर है? इतिहास बदलना उनके वश का नहीं है। प्रभाष जी ने इंटरव्यू में कहा है कि सुनील गावस्कर ब्राह्मण और सचिन तेंदुलकर ब्राह्मण लेकिन इसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि अजहरुद्दीन और मोहम्मद कैफ भारतीय क्रिकेट के गौरव रहे हैं।
एक और बात उछाली जा रही है और वह है सती होने की बात। एक जमाने में देवराला सती कांड हुआ था तो बनवारी जी ने शास्त्रों का हवाला देकर एक संपादकीय लिखा था जिसमें कहा गया था कि सती होना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। वे तथ्य बता रहे थे। सती होने की वकालत नहीं कर रहे थे। इस पर बवाल मचना था सो मचा और प्रभाष जी ने हालांकि वह संपादकीय नहीं लिखा था, मगर टीम के नायक होने के नाते उसकी जिम्मेदारी स्वीकार की। रविवार के इंटरव्यू में प्रभाष जी कहते हैं कि सती अपनी परंपरा में सत्य से जुड़ी हुई चीज है। मेरा सत्य और मेरा निजत्व जो है उसका पालन करना ही सती होना है। उन्होंने कहा है कि सीता और सावित्री ने अपने पति का साथ दिया इसीलिए सबसे बड़ी सती हिंदू समाज में वे ही मानी जाती है।
अरे भाई इंटरव्यू पढ़िए तो। फालतू में प्रभाष जी को जसवंत सिंह बनाने पर तुले हुए हैं। प्रभाष जी अगर ये कहते हैं कि भारत में अगर आदिवासियों का राज होता तो महुआ शैंपियन की तरह महान शराब मानी जाती लेकिन हम तो आदिवासियों को हिकारत की नजर से देखते है इसलिए महुआ को भी हिकारत से देखते हैं। मनमोहन सिंह को खेती के पतन और उद्योग के उत्थान के लिए प्रभाष जी ने आंकड़े दे कर समझाया है और अंबानी और कलावती की तुलना की है, हे अनपढ़ मित्रों, आपकी समझ में ये नहीं आता।
आपको पता था क्या कि शक संभवत उन शक हमलावरों ने चलाया था जिन्हें विक्रमादित्य ने हराया था लेकिन शक संभवत मौजूद है और विक्रमी संभवत भी मौजूद है। यह प्रभाष जी ने बताया है। प्रभाष जी सारी विचारधाराओं को सोच समझ कर धारण करते हैं और इसीलिए संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक राष्ट्रवाद कहते हैं। इसके बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी से ले कर भैरो सिंह शेखावत तक से उनका उठना बैठना रहा है। विनाबा के भूदान आंदोलन में वे पैदल घूमे, जय प्रकाश नारायण के साथ आंदोलन में खड़े रहे और अड़े रहे। चंबल के डाकुओं के दो बार आत्म समर्पण में सूत्रधार बने और यह सिर्फ प्रभाष जी कर सकते हैं कि रामनाथ गोयनका ने दूसरे संपादकों के बराबर करने के लिए उनका वेतन बढ़ाया तो उन्होंने विरोध का पत्र लिख दिया। उन्होंने लिखा था कि मेरा काम जितने में चल जाता है मुझे उतना ही पैसा चाहिए। ये ब्लॉगिए और नेट पर बैठा अनपढ़ों का लालची गिरोह प्रभाष जी को कैसे समझेगा?
ये वे लोग हैं जो लगभग बेरोजगार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं हैं क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध साक्षरों की संख्या बहुत है। मैं बहुत विनम्र हो कर कह रहा हूं कि आप प्रभाष जी की पूजा मत करिए। मैं करूंगा क्योंकि वे मेरे गुरु हैं। आप प्रभाष जी से असहमत होने के लिए आजाद हैं और मैं भी कई बार असहमत हुआ हूं। जिस समय हमारा एक्सप्रेस समूह विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सारे घोड़े खोल चुका था और प्रधानमंत्री वे बन भी गए थे तो ठीक पंद्रह अगस्त को जिस दिन उन्होंने लाल किले से देश को संबोधित करना था, जनसत्ता के संपादकीय पन्ने पर मैंने उन्हें जोकर लिखा था और वह लेख छपा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लगभग विलखते हुए फोन किया था तो प्रभाष जी ने उन्में मेरा नंबर दे दिया था कि आलोक से बात करो।
यह कलेजा प्रभाष जी जैसे संपादक का ही हो सकता है कि एक बार रामनाथ गोयनका ने सीधे मुझे किसी खबर पर सफाई देने के लिए संदेश भेज दिया तो जवाब प्रभाष जी ने दिया और जवाब यह था कि जब तक मैं संपादक हूं तब तक अपने साथियों से जवाब लेना होगा तो मैं लूंगा। यह आर एन जी का बड़प्पन था कि अगली बार उन्होंने संदेश को भेजा मगर प्रभाष जी के जरिए भेजा कि आलोक तोमर को बंबई भेज दो, बात करनी है।
आपने पंद्रह सोलह हजार का कंप्यूटर खरीद लिया, आपको हिंदी टाइपिंग आती हैं, आपने पांच सात हजार रुपए खर्च करके एक वेबसाइट भी बना ली मगर इससे आपको यह हक नहीं मिल जाता कि भारतीय पत्रकारिता के सबसे बड़े जीवित गौरव प्रभाष जी पर सवाल उठाए और इतनी पतित भाषा में उठाए। क्योंकि अगर गालियों की भाषा मैंने या मेरे जैसे प्रभाष जी के प्रशंसकों ने लिखनी शुरू कर दी तो भाई साहब आपकी बोलती बंद हो जाएगी और आपका कंप्यूटर जाम हो जाएगा। भाइयो, बात करो मगर औकात में रह कर बात करो। बात करने के लिए जरूरी मुद्दे बहुत हैं।

मैंने दंभी आलोक तोमर नहीं देखा था, बेहद विनम्र और मिलनसार आलोक तोमर देखा है, वह यह आलोक तोमर नहीं है जो मैंने अपने जेएनयू के छात्र जीवन में पढ़ते हुए देखा था, मवालियों की भाषा बोलने वाला आलोक तोमर कहां से आया? आखिर यह पत्रकार दादागिरी की भाषा क्यों बोल रहा है? मैंने ऐसी भाषा में कभी किसी पत्रकार को लिखते नहीं देखा। आलोक तोमर यह भारतेंदु, महावीरप्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, राजेंद्र यादव, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर की परंपरा वाली भाषा नहीं है। आलोक तोमर, यह बताओ, आखिरकार आदमी का इतना तेजी से पतन कैसे होता है कि वह पत्रकारिता की समस्त परंपराओं, एथिक्स, नीतियां, मानकों, संपादकीय नीति आदि सबको भूल जाए और गली के दादाओं की भाषा का इस्तेमाल करने लगे? आलोक तोमर जानते हैं, आप जो कह रहे हैं पूरे होशोहवास में कह रहे हैं? यदि ये बातें बेहोशी में भी कही गयी हैं, तब भी क्षम्य नहीं हैं। खासकर मेरे लेखन के संदर्भ में तो आपने अक्षम्य अपराध किया है। आपको लठैती कब से आ गयी? कलम का सिपाही संस्कृतिविहीन लोगों की भाषा में संबोधन कर रहा है! वह भी ऐसे लोगों से जो उससे अनेक गुना ज्यादा शिक्षित हैं। मैं खास तौर पर अपने संदर्भ में कह रहा हूं, आपने अक्षम्य अपराध किया है। यह पत्रकारिता के मानकों का भी अपमान है।
आलोक तोमर ने कहा है, “बात करो मगर औकात में रहकर बात करो।” अरे भाई आप भड़क किस बात पर रहे हैं? किसे यह धमका रहे हैं? औकात की भाषा कब से सभ्यता विमर्श की भाषा हो गयी? मैंने सबसे गंभीर ढ़ंग से प्रभाष जोशी की आलोचना लिखी है। मैं क्या हूं और कहां पढ़ाता हूं और कितना पढ़ा लिखा हूं, इसके बारे में मुझे आपको कम से कम बताने ज़रूरत नहीं है। वैसे भी आप भूल चुके हों, तो बताना ज़रूरी है। आप याद करेंगे तो ध्यान आ जाएगा और सभ्यता बची होगी, तो कभी अकेले पश्चाताप कर लेना कि जिस व्यक्ति को जेएनयू में छात्रसंघ का अध्यक्ष बनने पर हिंदी का गौरव कहा था, उसी को अब औकात बता रहे हो। आलोक तोमर मैंने गाली गलौज की भाषा में नहीं लिखा, मैंने कोई अपशब्द अथवा व्यक्तिगत बातें प्रभाष जोशी के बारे में नहीं कही, यदि कही हों तो बताएं। आपकी औकात कितनी और आपकी बुद्धि कितनी है, यह तो इस तथ्य से ही पता चल रहा है कि आपने बगैर प्रतिक्रिया पढ़े ही अपना लेख लिख मारा है। आप नहीं जानते तो जान लें, हिंदुस्तान के सबसे बेहतरीन शिक्षकों का छात्र रहा हूं। जेएनयू में मेरा शानदार छात्र जीवन रहा है। आपने मेरी हज़ारों प्रेस विज्ञप्तियां छापी हैं। फिलहाल कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हूं। मुझे कोई भी चीज़ गुरुकृपा से नहीं, अपने बल से मिली है और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आप जरा गुरुकृपा के बिना अपने पैरों से चल कर तो दिखाते?
ध्यान रहे प्रभाष जोशी के बारे में नहीं, उनके लेखन के बारे में बातें हो रही हैं। मैं आलोक तोमर के बारे में व्यक्तिगत तौर पर जितना जानता हूं, वह यह कि वह बहुत अच्छा मिलनसार पत्रकार था, दंभ और अहंकारहीन व्यक्ति था, लेकिन उपरोक्त आलेख में उसकी भाषा और तेवर देखकर मैं दंग रह गया। आखिरकार कुछ गड़बड़ हुआ है, जो इस तरह की भाषा लिखी है। मैं देख रहा हूं हमारा हिंदी प्रेस कैसे दंभी पत्रकार बना रहा है। एक अच्छा लोकतांत्रिक पत्रकार कैसे 25 सालों में दंभी हो गया। लेखन में अपराधियों की भाषा का इस्तेमाल करने लगा है। आलोक तोमर आपने जिन शब्दों का प्रयोग किया है, उनका इस्तेमाल अमूमन छुटभैये गुंडे करते हैं। क्या यह मानूं कि विगत 25 सालों में बिछुड़ने के बाद आपका भी वही स्वरूप बना है, जो किसी प्रतिष्ठानी पत्रकार का होता है। आलोक तोमर यह दंभ आपने कहां से लिया है? कम से शिक्षा दंभी नहीं बनाती।
आलोक तोमर को पत्रकारिता के इतिहास का ज्ञान कराना यहां अभीप्सित लक्ष्य नहीं है। वे ‘ज्ञानी’ पत्रकार हैं। वह मानकर चल रहे हैं प्रभाष जोशी को निबटाने के लिए उनकी हमने आलोचना लिखी है। उन्हें निबटाने के लिए नहीं, उनकी ज़ुबान पर अंकुश लगाने के लिए उनकी आलोचना की जा रही है। एक संपादक की बेलगाम ज़ुबान को साधारण पाठक ही दुरुस्त करता है। संपादक कितना ज्ञानी होता है और पाठक कितना अज्ञानी होता है, यह बात आलोक तोमर अच्छी तरह जानते हैं। इसमें किसकी सत्ता महान है, यह भी आलोक तोमर जानते हैं। पाठक लिखता नहीं है वह सिर्फ पढ़ता है। वह उतना भी नहीं लिखता जितना नेट के यूजर प्रभाष जोशी पर लिख रहे हैं। इसके बावजूद वह ज्ञानी और महान प्रभाष जोशी को दरवाजा दिखा चुका है। आज प्रभाष जोशी हैं, उनकी कलम है, उनका ज्ञान है, उनका अखबार है, उनके भक्त हैं, किंतु उनका ‘जनसत्ता’ बैठ गया है। उसे अब कोई नहीं पढ़ता। प्रभाष जोशी को निबटाने के लिए किसी नेता या अभिनेता की नहीं साधारण पाठक की जरूरत थी और हिंदी के साधारण पाठकों ने आज ‘जनसत्ता’ को जिस स्थान पर स्थापित कर दिया है, वह पर्याप्त टिप्पणी है उनके कर्मशील व्यक्तित्व पर। उनके लेखन के जादू पर।
आलोक तोमर जरा गौर करें आपने क्या लिखा है, “जिसे इंदिरा गांधी नहीं निपटा पायीं, जिसे राजीव गांधी नहीं निपटा पाये, जिसे लालकृष्ण आडवाणी नहीं निपटा पाये, उसे निपटाने में लगे हैं भाई लोग और जैसे अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू दिखाने से टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ जाती है, वैसे ही ये ब्लॉग वाले प्रभाष जी की वजह से लोकप्रिय और हिट हो रहे हैं।”
दोस्त, हिंदी के जाहिल, असभ्य, बेरोज़गार पाठक प्रभाष जोशी की कलम के दम पर चलने वाले अख़बार से कोसों दूर जा चुके हैं। यदि औकात हो तो पाठकों को ‘जनसत्ता’ के पास बुलाकर देखो। दोस्त एक बार सोच कर देखो क्या कह रहे हो? अगर प्रभाष जोशी के पास आप जैसे वकील होंगे, तो जनता की अदालत में वे मुकदमा हार चुके हैं। आपको चुनौती है कि आप आंकड़े देकर बताएं कि प्रभाष जोशी के कारण ‘जनसत्ता’ का सर्कुलेशन विगत 20 सालों में क्या रहा है? संपादक की औकात अखबार के पाठक तय करते हैं, संपादक नहीं। संपादक का रुतबा पाठकों से है, पाठक कभी संपादक की औकात देख कर अख़बार नहीं खरीदता बल्कि अख़बार देख कर पैसे फेंकता है। प्रभाष जोशी पर कभी हिंदी का पाठक पैसे फेंकता था, ‘जनसत्ता’ खरीदता था, उसमें अकेले उनका ही नहीं बाकी लोगों का भी योगदान था, बल्कि यह कहें तो ज्यादा ठीक होगा कि नौका तो अन्य लोग खींच रहे थे। किसी भी पत्रकार की औकात कितनी है, यह उसका अखबार, उसका सर्कुलेशन और आमदनी से तय होता है। संपादक कितना पेशेवर है और ‘धारण क्षमता’ रखता है, यह इस बात से तय होता है कि आखिरकार अखबार को पेशेवर (तकनीकी, संपादकीय, प्रबंधन, आमदनी आदि) रूप देने में संपादक ने कितनी मेहनत की है, इससे उसकी संपादकीय औकात का पता चलता है। आलोक तोमर बताएं क्या ‘जनसत्ता’ ने समग्रता में पेशेवर तौर पर तरक्की की है? यदि तरक्की नहीं की है तो क्यों नहीं की है? क्या प्रभाष जोशी इस संदर्भ में जिम्मेदार हैं या नहीं? आलोक तोमर नेट बेकार की चीज नहीं है। यह सबसे प्रभावशाली संचार का माध्यम है।
आलोक तोमर ने लिखा है, “अनपढ़ मित्रो, आपकी समझ में ये नहीं आता।” काश वे ऐसा न कहते, प्रभाषजी पर बहस करने वाला मैं भी हूं और दोस्त कितना पढ़ा हूं, आप अच्छी तरह जानते हैं। बाकी लोग भी शिक्षित हैं, जो बहस में लिखते रहे हैं। इसमें अनेक तो आलोक तोमर से हज़ार गुना ज़्यादा शिक्षित हैं। आलोक तोमर ने लिखा है, “ये वे लोग हैं, जो लगभग बेरोज़गार हैं और ब्लॉग और नेट पर अपनी कुंठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करते रहते हैं। नाम लेने का फायदा नहीं है क्योंकि अपने नेट के समाज में निरक्षरों और अर्ध साक्षरों की संख्या बहुत है।”
दोस्त नेट का समाज निरक्षरों का समाज नहीं है बल्कि यह कहें तो ज़्यादा बेहतर होगा नेट पर आज दुनिया के अधिकांश ज्ञानी और शिक्षित लोग लिख रहे हैं, भारत के सभी श्रेष्ठ पत्रकार लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि बेरोज़गार होना गाली नहीं है। मैं कम से रोज़गार वाला हूं और एक प्रोफेसर की पगार जानते हैं, प्रभाष जोशी की पगार से ज़्यादा होती है। मुझे पगार पढ़ाने, शोध करने, कराने के साथ बेहूदों पर अंकुश लगाने के लिए, जनता में ज्ञान प्रसार करने के लिए मिलती है। मेरे जैसे और भी कई लोग हैं जिन्होंने प्रभाष जोशी पर लिखा है।
आलोक तोमर आपको खुश होना चाहिए कि बेरोज़गार लड़के बतर्ज आपके पैसा खर्च करके नेट पत्रकारिता कर रहे हैं। बगैर किसी सेठ की गुलामी किये पत्रकारिता कर रहे हैं। इन बेरोज़गार नौजवानों का लेखन कुंठा नहीं है। कुंठा की इन्हें ज़रूरत नहीं है क्योंकि ये लोग जैसा सोचते हैं, वैसा ही लिखते हैं। हमें ऐसे ही निर्भय युवाओं की फौज चाहिए। पत्रकारिता अथवा लेखन किसी को खैरात में नहीं मिलता। पत्रकारिता किसी प्रतिष्ठानी प्रेस में काम करने मात्र से नहीं आती। यदि ऐसा होता, तो हिंदी की समूची साहित्य परंपरा बेकार हो जाएगी।
आलोक तोमर ने लिखा है, “आपने पंद्रह सोलह हज़ार का कंप्यूटर खरीद लिया, आपको हिंदी टाइपिंग आती है, आपने पांच-सात हजार रुपये खर्च करके एक वेबसाइट भी बना ली, मगर इससे आपको यह हक नहीं मिल जाता कि भारतीय पत्रकारिता के सबसे बड़े जीवित गौरव प्रभाष जी पर सवाल उठाएं और इतनी पतित भाषा में उठाएं।” अगर इन नौजवानों ने अपनी आजीविका नेट पत्रकारिता के जरिये और अपने ही पैसे से पूरा सिस्टम बनाकर आरंभ कर दी है, तो इसमें बुरा क्या है? जिस तरह किसी सेठ की नौकरी करना बुरा नहीं है, वैसे ही नेट पर अपने दम पर पत्रकारिता करना भी बुरा नहीं है। प्रभाष जोशी ‘जीवित गौरव’ हैं। बने रहें। सिर्फ एक ही दिक्कत है, वे अपना गौरव अपने ही हाथों नष्ट कर रहे हैं। इतना खराब साक्षात्कार देने के लिए उन्हें ‘बेरोजगार’, ‘कुंठित’ ‘अनपढ़’ युवाओं ने तो प्रेरित नहीं किया था? ‘जनसत्ता’ यदि पाठक खो चुका है, तो उसमें भी इन नौजवानों का कम से कम कोई हाथ नहीं है। आलोक जी सर्वे करा लें, आपके ‘जीवित गौरव’ को प्रति सप्ताह कितने पाठक पढ़ते हैं और इन बेरोज़गार, अनपढ़ जाहिल लोगों को कितने नेट पाठक पढ़ते हैं। ध्यान रहे ये बेरोज़गार युवा और प्रभाष जोशी के बीच की जंग है और इसमें प्रभाष जोशी का भी वही हश्र होगा, जो महाभारत में भीष्म पितामह का हुआ था। वे अर्जुन के हाथों मारे गये थे और प्रभाष जोशी भी इन बेरोज़गार नौजवानों के तर्कों से ही मरेंगे। आलोक तोमर आप अपनी असल भाव-भंगिमा में मैदान में पूरे गुरुदेव के साथ आएं और जवाब दें कि आखिरकार ‘जनसत्ता’ का पतन क्यों हुआ? चाहें तो आप यह काम गाली-गलौज की भाषा में भी कर सकते हैं। यदि किसी अन्य अकादमिक मसले पर बहस करने का गुरु सहित मन है, तो बंदा अपने को इसके लिए पेश करता है और चाहेगा कि आप विषय चुनें और वही विषय चुनें जो आपके गुरुदेव का सबसे प्रिय विषय हो, (कम से कम क्रिकेट नहीं) जिस पर वे जी भर कर लिख सकें, उन्हें नेट के पन्नों पर जगह का अभाव महसूस नहीं होगा। शर्त एक ही है। आप बहस के नियम नहीं बनाएंगे। बहस स्वतंत्र होगी।
ये बातें इसलिए लिखनी पड़ रही हैं कि एक पत्रकार अपने पाजामे के बाहर चला गया है। उसे पाजामा पहनाना हमारा काम है। आलोक तोमर को खुला निमंत्रण है वे अपने गुरु के साथ नेट पर आएं और सबसे पहले ‘जनसत्ता’ की पतनगाथा के पन्ने खोलें। हम देखना चाहते हैं कि दूसरों की औकात बताने वाले की स्वयं कितनी औकात है। उनके गुरुदेव का भी ‘जनसत्ता’ के पतन पर पूरा आख्यान पढ़ना चाहेंगे। आलोक तोमर यदि ‘जनसत्ता’ का सच्चा आख्यान बताते हैं, तो कम से कम प्रभाष जोशी की एक महान पत्रकार के रूप में क्या स्थिति रह गयी है, इसका खुलासा ज़रूर हो जाएगा। आलोक तोमर जी यदि असुविधा न हो, तो प्रभाष जी के तथाकथित महान निबंधों पर ही हम लोग गंभीर मंथन कर लें और उनके नज़रिये का पोस्टमार्टम कर डालें। तय मानो दोस्त, आपकी श्रद्धा उनकी रक्षा नहीं कर पाएगी। उन्हें बेकार नौजवानों के हाथों पराजित होना ही है। अभी भी मौका है। दंभ त्याग दें। दूसरों का अपमान करना बंद कर दें। अनपढ़ को अनपढ़ कहना गाली है। शिक्षित आलोक तोमर को यह शोभा नहीं देता। कोई सभ्य पत्रकार दंभ, औकात, बेरोजगारों के प्रति घृणा, स्वाभिमानी युवाओं को प्रताड़ित करने वाली भाषा नहीं लिख सकता, यह तो संस्कृतिविहीन होने का संकेत है। यह प्रेस के लिए शर्मिंदगी की बात है कि किसी हिंदी पत्रकार ने इतनी घटिया भाषा का अपने गुरु की हिमायत में इस्तेमाल किया है।
आलोक तोमर ने लिखा है, “अगर गालियों की भाषा मैंने या मेरे जैसे प्रभाष जी के प्रशंसकों ने लिखनी शुरू कर दी, तो भाई साहब आपकी बोलती बंद हो जाएगी और आपका कंप्यूटर जाम हो जाएगा। भाइयो, बात करो मगर औकात में रह कर बात करो। बात करने के लिए ज़रूरी मुद्दे बहुत हैं।” इंतज़ार है, आपकी ‘शानदार’ पत्रकारिता के करतब देखने का। प्लीज़ आप जरूर आएं और किसी मुद्दे के साथ आएं। किसकी कितनी औकात है और किसकी कलम में दम है, यह तो नेट के पाठक ही तय करेंगे।










आलोक तोमर इतना तो जानते ही होंगे कि शिष्य के क्रियाकलापों और बोली बर्ताव से भी उसके गुरू के बारे में समझा जाता है.
आलोक जी विद्वान् तो रावन भी बहुत था . कबीर भी अनपढ़ थे .और साक्षात्कार के वो अंश न बताएं जिनके लिए प्रभाष जोशी सालों से तारीफें पा रहे हैं. आपकी पूरी भाषा फ़िल्मी और दादागिरी की है .अगर कोई २०-२५ हज़ार लगा कर साईट बनता है और उसपर आपको एतराज़ है तो आपको खुद पर भी एतराज़ होना चाहिए . प्रभाष जोशी ने तो वो भी नहीं किया . वे तो सेठों के पैसों पर पंडिताई करते आये हैं .पाठक को इस से कुछ लेना देना नहीं की उन्होंने गाँव के लढ़के के लिए क्या किया. अपनी hin-bhavna से गाँव के लढ़के खुद निपटें. ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है. अगर आपको लगता है की प्रभाष जोशी ने आपको आपकी औकात से ज्यादा दे दिया है तो जाईये वापिस कर dijiye और unse kahiye की वे इस galti के लिए आपको एक झापढ़ रसीद करें . आपभी इसी लायक हैं और आपके गुरु के लिए भी अब बस यही बाकि रह गया है. भाषा और मानसिकता की कसौटी पर तो कोई कसर छोदी नहीं है दोनों ने ..आपको तो धन्यवाद् करना चाहिए की जो काम आपको करना चाहिए था वो बेरोजगार और अनपढ़ लड़के अपना पैसा लगा कर कर रहे हैं..आपके पुरे लेख से पता लगता है की आपके और आपके गुरु के पास कहने को कुछ नहीं है.
आलोक तोमर ने ‘देशकाल डॉट कॉम’ पर मेरी उपरोक्त टिप्पणी पर आज लिखा लिखा है-
”जगदीश्वर जी का लेख मैंने नहीं पढा है. कहाँ छपा था? वैसे मैंने ने उनके बारे में कब लिखा था. रही प्रोफेसरी की पगार के आधार पर अपने को महान बताना मुझे ठीक नहीं लगता. रही शिक्षा की बात , तो जगदीश्वर जी हिन्दी स्नाकोत्तर परिक्षा में अंक कितने आये थे? मेरे ७० प्रतिशत थे और विश्वविद्यालय में सबसे ज्यादा थे. निरक्षर तो हम भी नहीं हैं.प्रोफेसर पद पर में भी पहुँच जाता…आखिर २१ साल की उम्र में डिग्री कालेज में पढा चूका हूँ. रही जनसत्ता के पतन की दास्तान, तो आपकी चिंता से सहमत हूँ मगर टेंपो और ट्रक टकरा जाएँ तो दोष प्रभाष जी का है? रामनाथ गोयनका जब तक रहे, जनसत्ता शान से चला, पर बाद के लोगों ने उसका राम नाम सत्य कर दिया”.
आलोक तोमर जी ,आप ‘ईमानदार’ हैं,यह बात कम से कम कहनी पड रही है, प्रभाष जोशी पर जितनी भी बहस हुई उसमें सबसे ज्यादा गंभीर बहस मैंने चलाई है,मेरा अनुमान सही था आपने अपना लेख बिना पढे लिख मारा। यह टिप्पणी भी बिना पढे ही पचा गए, सचमुच में मजेदार आदमी हैं,गुरू को भी पचा गए और दोस्तों के लिखे को भी हजम कर गए।
आलोक तोमर जी आपने लिखा है ”जगदीश्वर जी का लेख मैंने नहीं पढा है. कहाँ छपा था? ” मैं पता बताने की मूर्खता नहीं करूंगा,आप जानते हैं,नहीं जानते हैं तो जानें और अपने गुरू की रक्षा में जितनी रसद हो खर्च कर दें, कम पडे तो हमसे बोलिएगा, प्रभाष जोशी की हजार गलतियों के बावजूद हम उनके साथ हैं,लेकिन आलोचनात्मक विवेक को ताक पर रखकर नहीं। पगार,शिक्षा,औकात या सामाजिक हैसियत वाली बात इसलिए आयी थी क्योंकि आपने पत्रकारिता के उसूलों के बाहर जाकर लिखा था,मैंने आपसे आपके अंक नहीं पूछे थे मैंने प्रभाषजोशी के खिलाफ लिखी गयी अपनी आलोचना पर जबाव मांगा है, मैं जानता हूं आप पढे लिखे आदमी हैं किंतु गुरूभक्ति में अपने आलोचनात्मक विवेक से विश्वासघात कर रहे हैं। सत्य को देखकर भी अनदेखा कर रहे हैं। एक पत्रकार सत्य से आंखें नहीं चुराता, सत्य को देखे बगैर नहीं लिखता,आपने ठीक मेरा लिखा देखे बगैर किसी के कहने पर सीधे अपना लेख लिख मारा और आप यह भूल गए कि यह प्रेस का दौर नहीं है,इंटरनेट का दौर है, प्रेस के दौर में अखबार भी आपका था,लेखन भी आपका था,जैसा चाहे लिखते रहो किसी का जबाव नहीं छापना था,लेकिन इंटरनेट के दौर में प्रेस से लेकर नेट तक पत्रकार जो कुछ भी लिख रहा है,उसकी गहरी छानबीन चल रही है। प्रभाष जोशी के अब दिन लद गए हैं,अब उनके लिखे पर रोज आलोचनाएं छपेंगी और वे रोज तर्कहीन साबित किए जाएंगे। आप उनके साक्षात्कार पर लिखी मेरी टिप्पणियों पर खुलकर लिखें,आप बडे पत्रकार हैं, आपको नेट मालिक और नेट पत्रकार जानते हैं, आप जितना चाहेंगे स्पेस मिलेगा यदि कोई स्पेस नहीं देगा तो मैं दूंगा इस अनपढ का भी नेट पर ब्लाग है,वहां जितना चाहेगे आपको लिखने दूंगा। कृपया बहस के मैदान में आएं,अपने गुरूदेव से भी कहें कि वे भी अपने समूचे तर्कशास्त्र और मीडियाशास्त्र को लेकर मैदान में आएं हम वादा करते हैं, आप लोगों के प्रति जो सम्मान और प्यार है,उसे रत्तीभर कम नहीं होने देंगे। वैसे ही आप लोगों की खबर लेंगे,जैसे किसी दोस्त की खबर ली जाती है। यह भी वायदा करते हैं अपनी बातों की पुष्टि के लिए किसी घटिया तर्कशास्त्र और ग्रंथ का सहारा नहीं लेंगे। हम सिर्फ मीडियाशास्त्र और भारतीय इतिहास और परंपरा के बारे में प्रभाष जोशी के विवादास्पद साक्षात्कार के बारे में ही विवाद करेंगे और फिर अनुरोध है अब तक जो लिखा है, उसे खोजें और पढें,गुरूदेव को भी पढाएं, जरूरी हो तो लाइब्रेरी भी जा सकते हैं, गुरूदेव की मदद के लिए,लेकिन लौटकर नेट पर गुरू सहित जरूर आएं, यह नेट है और ज्ञान का सागर है, यह प्रेस का दफतर नहीं है, जिसमें कोई लाईब्रेरी नहीं होती, आपको हम वे सारे संदर्भ नेट पर ही उपलब्ध कराएंगे जो प्रभाष जोशी और आपकी भाषा और मान्यताओं के संदर्भ में प्रथम कोटि के विश्व विख्यात लोगों के हैं। भारत के इतिहास और परंपरा के बारे में भी हम सिर्फ वही सामग्री मुहैयया कराएंगे जो प्रथम कोटि के इतिहासकारों की है, उसके बाद ही तय करना कि प्रभाष जोशी के लिखे को कहां रखें, दोस्त वायदा है अपमानजनक नहीं सम्मानजनक शास्त्रार्थ होगा,ऐसा शास्त्रार्थ होगा जिसे नेट यूजर पढकर स्वास्थ्यलाभ करेंगे। आपको भी अपनी गलती का अहसास कराने के लिए यह बेहद जरूरी है, क्योंकि आपने अभी तक अपनी गलती नहीं मानी है, आपने बगैर पढे बगैर नाम के मेरे बारे में जो बातें कही हैं,एक अच्छे पत्रकार को उसके लिए माफी मांगनी चाहिए वरना साक्षात्कार पर शास्त्रार्थ के लिए तैयार रहना चाहिए ,मैं आपका इंतजार कर रहा हूं कि आप अपनी पोजीशन साफ करें माफी मांगे या शास्त्रार्थ करें, यह मामला व्यक्तिगत की हदें पार गया है, आप जैसे लोग प्रभाष जोशी की छवि को इस हद तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं, बेहतर यही होता आप हम लोगों की आपत्तियों पर उनका एक साक्षात्कार लेते और जहां पर आपने अपने गुरूज्ञान का परिचय दिया है, वहां पर ही छाप देते, प्रभाष जोशी नेट पर नहीं जाते हैं, लेकिन आप तो जाते हैं, आप किसी घटिया से मसले पर किसी साखरहित नेता के दरवाजे आए दिन खबर लेने चले जाते हैं लेकिन जब आपके गुरू पर आलोचनाएं लिखी जा रही हैं, तो अपने गुरू के दरवाजे जाकर उनकी राय को एकत्रित करके हमें बताने की भी जरूरत नहीं समझी आपको गाली और अपमान की भाषा में लिखने के लिए समय मिल गया किंतु हमारे लिखे को पढने और उस पर सोचने का समय नहीं मिला, यह कैसे हो सकता है आपको गुस्सा बगैर पढे ही आ गया और आपने अनाप शनाप लिख डाला ,क्या आपकी पत्रकारिता की इस शैली पर पुलित्जर पुरस्कार दिलवाने की मांग करें ? मैंने अपनी पगार की बात इसलिए उठायी थी क्योंकि आपने बडे ही घटिया ढंग से बेरोजगार नौजवानों का अपमान किया हमारा भी अपमान किया ,जरा अपना लिखा गौर से पढें और सोचें आपको प्रायश्चित स्वरूप क्या करना चाहिए ? आलोक तोमर ने लिखा है ” जगदीश्वर जी हिन्दी स्नाकोत्तर परिक्षा में अंक कितने आये थे? मेरे ७० प्रतिशत थे और विश्वविद्यालय में सबसे ज्यादा थे. निरक्षर तो हम भी नहीं हैं.प्रोफेसर पद पर में भी पहुँच जाता…आखिर २१ साल की उम्र में डिग्री कालेज में पढा चूका हूँ. रही जनसत्ता के पतन की दास्तान, तो आपकी चिंता से सहमत हूँ मगर टेंपो और ट्रक टकरा जाएँ तो दोष प्रभाष जी का है? रामनाथ गोयनका जब तक रहे, जनसत्ता शान से चला, पर बाद के लोगों ने उसका राम नाम सत्य कर दिया।” आलोक तोमर मुश्किल अंकों में है तो यह जान लो प्रभाष जोशी के बारे में जिन लोगों ने भी लिखा है, उनमें कई के बारे में मैं जानता हूं उनके अंक आपसे ज्यादा हैं और तर्क भी वैज्ञानिक हैं, आपके अंक भी कम है तर्क भी अवैज्ञानिक हैं। अखबार की ‘धारण क्षमता’ किसमें होती है ? अखबार को कौन धारण करता है ?कौन चलाता है ? मालिक या संपादक और पत्रकार ? गोयनकाजी कैसे थे क्या थे,यह यहां विवेचन का विषय नहीं है। आप स्वयं लिख चुके हैं,जनसत्ता अखबार में प्रभाष जोशी सर्वाधिकार सम्पन्न थे, सवाल यही है कि सर्वाधिकार सम्पन्न होने बावजूद,प्रभाष जोशी के धांसू लेखन के बावजूद प्रतिभाशाली पत्रकार उनसे अलग क्यों हो गए अथवा निकाल दिए गए अथवा अखबार का भटटा क्यों बैठ गया ? आलोक तोमर अखबार के बैठ जाने पर मात्र दो पंक्तियां और जिन शुभ चिंतकों ने आलोचना लिखी उन पर पूरा लेख वह भी धमकी और अपमानभरी मर्दवादी मवालियों की भाषा में। बंधु यह संतुलित लेखन नहीं है, कम से जनसत्ता के पतन के बारे में और उसमें संपादक और सर्वाधिकार सम्पन्न व्यक्ति के कार्यकलाप और धारण क्षमता के बारे में आपको मेरे सवालों के जबाव देने ही होंगे। हम चाहते हैं खुलकर बहस हो,दोस्ताना वातावरण है स्वस्थ बहस हो, व्यक्तिगत आपेक्ष किए बगैर बहस हो, आप कम से कम नेट भोगी पत्रकार हैं आप किनाराकशी नहीं कर सकते, इंतजार है,जबाव दें, और असभ्य भाषा के प्रयोग के बारे में प्रायश्चित करें।
चतुर्वेदी जी की मुश्किल यह है कि वे कहना कुछ चाहते हैं और कहने कुछ और लगते हैं। आलोक तोमर ने जिस भाषा में बात की है, उसकी कुंठाओं का जवाब देने के बजाए वे जनसत्ता का भाग्य तय करने में लगे है। चतुर्वेदी जी, तोमर साहब को जनसत्ता से उनके गुरु ने ही निकाल दिया था। वह भी संपादकीय बेईमानी के कारण। जनसत्ता तब क्या था और अब क्या है, यह कृपया देखें और तब कुछ राय जाहिर करें।
आपके हिसाब से ज्यादा पाठक और सर्कुलेशन ही किसी अखबार की लोकप्रियता का आखिरी आधार है। इस फार्मूले पर तो गुजरात की नरेंद्र मोदी की सरकार को सबसे ज्यादा अंक देना चाहिए। देश की अल्पसंख्यक आबादी को बहुसंख्यकों के सामने क्या आत्महत्या कर लेना चाहिए, यह बताएं आप। सीमित संसाधनों में अगर पत्रकारिता करने की गुंजाईश कहीं बची दिख रही है, तो वह कहीं और भी है, यह भी पड़ताल करने की कोशिश करें। पत्रकारिता को जिन सरोकारों की बदौलत जिंदा रहना है, उसका निर्वाह करते हुए जनसत्ता अगर अपनी टीआरपी को लेकर ज्यादा फिक्रमंद नहीं है तो इसका अफसोस यहां काम करने वालों को नहीं है। कुबेर ही बनना होगा तो लाख रुपए की नौकरी के लिए बहुत ज्यादा “समझौता” करने की जरूरत नहीं पड़ेगी आज के बाजारू मीडिया माहौल में।
आलोक तोमर की कुंठा उनके पूर्वजों से चलते हुए उनकी मजबूरी बनी हुई है तो इसमें उनकी संस्कृति का दोष है। आज अगर वे गुंडों की तरह खुद को पेश करने की कोशिश करने में लगे हैं, तो इसे उनकी मूल संरचना मान लेना चाहिए और डरना चाहिए। और जो लोग इनसे ताकतवर हैं उन्हें इस तरह के शख्स को दया का पात्र मान कर उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए। ऐसे लोगों को मरने तक बुद्धि नहीं आती।
लम्बे समय से मोहल्ला पर प्रभाष विमर्श देख रहा हूँ. ना जाने क्यों कोलेज के दिनों में सुनी हुई एक कहानी बहुत याद आ रही है….आप से साझा करता हूँ.
एक शेर की मांद के बाहर रोज शाम एक चूहा आता और उसे खूब गलियां सुनाता. कहता अबे ओ शेर निकल बाहर दम है तो, साले मारे डर के कहाँ घुसा है बाहर आ तेरी तो ….
जाहिर है शेरनी को समूचा प्रकरण बहुत नागवार गुज़रता था सो एक दिन बर्दाश्त न होने पर मारे गुस्से के वह मांद से बाहर कूद ही गयी. चूहे ने जैसे ही उसे आते देखा वह भागा और एक पेड़ की संकरी दो डालों के बीच से निकल भगा क्रोध में अंधी शेरनी उन डालों के बीच जाके फंस गयी. चूहे ने पीछे से आकर उसका शील भंग कर दिया.
उदास और हताश शेरनी वापस घर आयी तो शेर ने पूछा आगई शीलभंग करवा के. अब चौंकने की बारी शेरनी की थी. उसने पूछा तुम्हें पहले से पता था ??
तो शेर ने कहा कुछ मत पूछो मेरे साथ एसा तीन बार हो चुका है
“आपको भी अपनी गलती का अहसास कराने के लिए यह बेहद जरूरी है, क्योंकि आपने अभी तक अपनी गलती नहीं मानी है, आपने बगैर पढे बगैर नाम के मेरे बारे में जो बातें कही हैं,एक अच्छे पत्रकार को उसके लिए माफी मांगनी चाहिए वरना साक्षात्कार पर शास्त्रार्थ के लिए तैयार रहना चाहिए ,मैं आपका इंतजार कर रहा हूं कि आप अपनी पोजीशन साफ करें माफी मांगे या शास्त्रार्थ करें, यह मामला व्यक्तिगत की हदें पार गया है, आप जैसे लोग प्रभाष जोशी की छवि को इस हद तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार हैं, बेहतर यही होता आप हम लोगों की आपत्तियों पर उनका एक साक्षात्कार लेते और जहां पर आपने अपने गुरूज्ञान का परिचय दिया है, वहां पर ही छाप देते, प्रभाष जोशी नेट पर नहीं जाते हैं, लेकिन आप तो जाते हैं, आप किसी घटिया से मसले पर किसी साखरहित नेता के दरवाजे आए दिन खबर लेने चले जाते हैं लेकिन जब आपके गुरू पर आलोचनाएं लिखी जा रही हैं, तो अपने गुरू के दरवाजे जाकर उनकी राय को एकत्रित करके हमें बताने की भी जरूरत नहीं समझी आपको गाली और अपमान की भाषा में लिखने के लिए समय मिल गया किंतु हमारे लिखे को पढने और उस पर सोचने का समय नहीं मिला, यह कैसे हो सकता है आपको गुस्सा बगैर पढे ही आ गया और आपने अनाप शनाप लिख डाला ,क्या आपकी पत्रकारिता की इस शैली पर पुलित्जर पुरस्कार दिलवाने की मांग करें ?” (240 शब्द)
इतने लंबे वाक्य नेट में नहीं चलते। छोटे वाक्य लिखें। एक वाक्य में एक ही बात कहें। कुछेक वाक्यों के बाद पैराग्राफ जरूर बनाएं। वरना 100 में एक आदमी भी नहीं पढ़ सकता। मॉडरेटर लेखों को तो ठीक कर सकता है कमेंट ठीक करना उसके लिए मुमकिन नहीं। छोटा लिखें। कई लेख बनाएं। अंग्रेजी में देखें नेट पर किस तरह लिखा जा रहा है। ये सिर्फ चतुर्वेदी जी के लिए नहीं सभी के लिए है।
जगदीश्वर जी,
पांडित्य प्रदर्शन की दिक्कत यह है कि वह मूल मुद्दों से भटकने और भटकाने की स्थितियां तैयार करने लग जाता है. यहाँ बात प्रभाष जोशी की ब्राह्मणवादी सोच और आलोक तोमर की दंभ और कुतर्कों से भरी भाषा पर ही केन्द्रित रहनी चाहिए. बहस को वैयक्तिक बनाना, अंक और पगार पूछना- गिनना और जनसत्ता को बीच में घसीटना बहस को असली बिंदु से भटकाने की महीन (ब्राह्मणवादी) कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है.
एक बात और. सीमित ही सही लेकिन सार्थक बहस के लिए जनसत्ता अगर आज भी स्पेस निकाल पा रहा है इस बाजारवादी दौर में, तो इसकी सराहना की जानी चाहिए.
प्रभाष जी की आलोचना से या आलोक तोमर की आलोचना से कुछ हासिल नहीं होनेवाला है. इससे हिंदी समाज का क्या भला हो रहा है? इस तरह आरोप-प्रत्यारोप से पाठकों का क्या लेना-देना है? बहस को एक मुकाम पर पहुंचाकर, अगली यात्रा पर निकल जाना चाहिए.
आलोक तोमर जैसे लोगों के साथ दिक्कत है कि वो दूसरे के हिस्से की बहस को भी अपने पाले में लाकर कब्जाने का काम करते हैं। प्रभाषजी के प्रतिरोध में भी उन्होंने वही काम किया है। हम देखिए न,इसमें उनकी क्या भूमिका है,कायदे से बातों और विमर्श को तो समझ नहीं पा रहे हैं,उल्टे व्यक्तिगत हमले किए जा रहे हैं औऱ हम हैं कि उन्हें तूल दिए जा रहे हैं। हम इस पूरी बहस में मुद्दे से भटक रहे हैं। हमें फिर से मुद्दे पर लौटना है और प्रभाष जोशी से फिर सवाल करने हैं कि आपने जो कुछ भी कहा है,उसे कहना कहा तक सही है और अवधारणा पर एकाधिकार जमाने से रोकना है। आलोक तोमर पर फोकस होकर ज्यादा बात करने का कोई मतलब नहीं है जो व्यक्ति छात्र जीवन की उपलब्धियों और आत्म-मुग्धता से उपर नहीं उठ पाया हो।
“पंडित प्रभाष जोशी ने मुझ जैसे गांव के लड़के को छह साल में सात प्रमोशन दिए”। आलोक तोमर की ये बात कुछ हजम नहीं हुई।
सब एडिटर-सीनियर सब-चीफ सब-न्यूज एडिटर-एसिस्टेंट एडिटर-एडिटर-चीफ एडिटर
रिपोर्टर- सीनियर रिपोर्टर-चीफ रिपोर्टर-स्पेशल कॉरेस्पॉन्डेंट-ब्यूरो चीफ-एडिटर-चीफ एडिटर
यही क्रम होता होगा। आलोक तोमर निकाले जाते समय चीफ एडिटर होंगे!
इसलिए कृपया आलोक तोमर पर बात न करें। बातचीत को जोशी जी पर लाएं। उनके बारे में नहीं, उनके खतरनाक विचारों के बारे में।
आलोक तोमर प्रभाष जोशी के शिष्य भी नहीं हैं। देखिए प्रभाष जोशी के इंटरव्यू के अंश, बिना काट-छांट के। पूरा इंटरव्यू आलोक तोमर की प्रिय साइट भड़ास में देख सकते हैं:
सवाल-आपने राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को क्यों निकाला?
प्रभाष जोशी–(दिवंगत राकेश कोहरवाल के बारे में बचते हुए) मैने कागद कारे में लिखा है उनके बारे में। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसमें कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।”
सवाल-आपने लिखा है कि महादेव चौहान, आलोक तोमर और राकेश कोहरवाल आपको अपराध बोध देते हैं। क्या है वह अपराध बोध?
प्रभाष जोशी–”ये जब आए थे तो कुछ नहीं थे। जनसत्ता में नाम कमाया था। अखबार ने उन्हें कीर्ति दी थी। इनको उठाया था। सभी के टैलेंट को जनसत्ता ने उभारा था। हिट होने के बाद इनके तौर-तरीके बदल गए, जीवन में ऐसा होता है जब आपकी प्रतिभा को एक बार निखरने का मौका मिल जाता है, तब। आपमें जो प्रतिभा है उसे संभाल कर रोज तराशना और उसे रचनात्मक कार्य में लगाए रखना भी एक प्रतिभा है, वरना जिनमें अधिक प्रतिभा होती है वो विस्फोट करके नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े। जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था ‘हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।’ जब अखबार शुरू हुआ था तभी मैने सबको बुला कर कहा था कि हमें मिलकर एक परिवार बनाना है और यह परिवार अखबार बनाएगा। पांच साल तक पूरे 22 लोगों की टीम थी। इस टीम ने कैसा अखबार निकाला, आप जानते हैं।”
इसलिए आपलोग आलोक तोमर को माफ करें। चतुर्वेदी जी अगर आलोक ने आपको नहीं पढ़ा तो आसमान नहीं फट गया। वो अपनी बात कहने के लिए आपको पढ़ें, ये कैसे जरूरी हो गया। प्रभाष जोशी के विचारों के आसपास बातचीत चले तो बेहतर है।
भैया, आप लोग जिस http://www.raviwar.com में छपी टिप्पणी को लेकर इतनी बहस कर रहे हैं, उसकी सच्चाई जानने की कोशिश की है आपलोगों ने ? क्या यह बातचीत रिकार्डेड है ? अगर हां, तो सबसे पहले उसकी रिकार्डिंग का पता लगाया जाए, उसमें कहीं तथ्यों का हेरफेर तो नहीं है ?
क्या आप लोग जानते है की प्रभाष joshi कौन है? आलोक तोमर कौन है? एक की भी औकात है वहाः तक पहुचने की ? पेपर का sarkuleshion एडिटर नहीं, मार्केटिंग वालो का कम है. कोई दूसरा jansatta क्यों नहीं बन पाया? क्योकि प्रभाष joshi जैसा एडिटर नहीं था इंडिया में.
आलोक तोमर को १९८४ के दंगो के समय पदों और फिर कुछ बोलो. वो एक जेम है.हिरा .
सब निकम्मे है. चाँद पर थूकने की तुम्हारी पुराणी आदत है.
who’s is ths f*** jagadeesh chatarvedi??? whts the heading he gave?? is he a prof? my god…we wil snd ths 2 VC of his versity..nd your lady presidnt…he shld be fined 4 ths…we wil approach ur pres soon…k mr. chatarvedi
जगदीश्वर जी आप साधारण पाठक हैं? आपका नाम,योग्यताएँ और पद तो बड़े असाधारण हैं.यह कैसा प्रशिक्षण है जिसमें इंसान छल के लिए अथवा नीचा दिखाने के लिए विनम्र होता है?और हाँ,आपके नाम का कोई अर्थ हो तो वह कितना ब्राह्मणवादी है? इसमें आपका कितना दोष है?प्रोफेसरों से पूछने में हमेशा डर ही लगता रहा है पर हिम्मत करूँ.आप बताएँगे जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक चंद्रगुप्त में चाणक्य की इन बातों का क्या अर्थ है?-ब्राह्मण न किसी के राज्य में रहता है न किसी के अन्न से पलता है.वह स्वराज्य में विचरता है और अमृत होकर जीता है.यह तुम्हारा मिथ्या गर्व है.ब्राह्मण सब कुछ सामर्थ्य होने पर भी स्वेच्छा से इन माया स्तूपों को ठुकरा देता है.प्रकृति के कल्याण के लिए ज्ञान का दान देता है. क्या जयशंकर प्रसाद भी ब्राह्मणवादी थे? क्या सचमुच वक़्त ऐसा आ गया है कि करियरिस्ट विमर्शों के आगे किसी कल्पनाशील बात को ग़लत ही समझा जाएगा? जनसत्ता के बारे में आपने ऐसा कहकर अपनी सीमाएँ ही उजागर कीं.जनसत्ता बड़ी इज़्जत से पढा जाता है.जिन्हे यह रोज़ नही मिल पाता वे इसके रविवारीय को ही बाक़ी अख़बारों के महीनेभर का साहित्य समझें.प्रभाष जोषी जी को ग़लत समझा जा रहा है.आरक्षण के सवाल पर आप ही बताइए एक सवर्ण जो मज़दूरी करके पढाई करता है फिर अच्छी आर्थिक स्थितिवाले,रसूखदार कम योग्य दलित से छोटे पद पर काम करता है तो यह कोई विसंगति नही है?क्या यह बात कहने का मायावती ने ही ठेका लिया है?क्या आपका बेटा या बेटी भी दलितों के सदियों पुराने अब तक ज़ारी उत्पीड़न के दोषी हैं?यदि हाँ तो आप उन्हें पालने के दोषी हैं.कुछ भी सीख देने से पहले डूब मरिए.क्या ब्राह्मणों का इतिहास सिर्फ शोषण का ही इतिहास है?उन्होंने ज्ञान विज्ञान को आगे ले जाने में कोई योगदान नहीं दिया?..मैंने तो सुना है कबीर के गुरू अंबेडकर के शिक्षक भी ब्राहमण थे.धन्य है आपका आत्मविश्वास.मूर्ख कहने की आपकी लगन तो अभूतपूर्व है.अब ख़ुद से पूछिए ऐसा करके आप अमर हुए या नहीं?….
शशिभूषण जी, ‘जनसत्ता’ अखबार की महत्ता और सत्ता विवाद का विषय नहीं है, एक खास संदर्भ में बहस चल रही है,बहस ब्राह्मणवाद पर भी नहीं चल रही,बहस प्रभाष जोशी के विवादास्पद साक्षात्कार पर चल रही है,’जनसत्ता’ बेहतर अखबार है, लेकिन कवरेज और अंतर्वस्तु पर जरा गौर करें ?
जगदीश्वर जी, मुझे लगता है प्रभाष जोषी के साक्षात्कार को विवादास्पद बनाकर कुछ अलभ्य जैसा हासिल कर लेने की अंधी दौड़ में आपका भी योगदान है.प्रभाष जी ने ब्राह्मणों के संबंध में एक कल्पनाशील बात कह दी और दक्षिण भारत के उदाहरण से आरक्षण के संबंध में दुखती रग पर हाथ रख दिया तो उनकी नीयत पर सवाल खड़ा कर दिया गया.मानवता विरोधी तो कहा ही,बंधुओं ने मूर्ख कहने की अशिष्टता भी कर डाली. रही बात जनसत्ता की तो कवरेज के आधार पर कितना तय करेंगें? यहाँ तमिलनाडु में भी जहाँ हिंदी लगभग नही है सरस सलिल नामक पत्रिका मिलती है तो क्या इसी से पत्रकारिता की अमूल्य निधि हो जाएगी?..अच्छी चीज़ें कम ही होती हैं…जनसत्ता ही है जिसने आज भी व्यावसायिक सफलता के लिए सबसे कम समझौते किए हैं. यह गिनाने का वक़्त नही है यह.पर दूसरों की बातें आपको विषयांतर लगती हैं तो लगे रहिए…वैसे मैंने वह साक्षात्कार पढने के बाद ही आपके उद्यम को समझा….
मैं पटना जैसे छोटे शहर में पत्रकार हूँ और प्रभाष जोशी जैसे कद्दावर पत्रकार जिन्होंने इसे एक नई परिभाषा दी है के बारें में टिपण्णी करूँ तो यह मेरे हिमाकत ही कही जायेगी. मैंने भी आलोक तोमर जी का भड़ास पर दिया गया इंटरव्यू पढ़ा है और उसमें उन्होंने जहाँ तक मैं समझता हूँ ऐसा कुछ भी नहीं कहा है जिससे प्रभाषजी की मानहानि होती हो. उनका बेलाग कहना की उन्होंने किस तरह से किसी अखबार के मालिक को पीटा बड़े ही साहस की बात है और ऐसा वही कह सकता है जिसमे कबीर की तरह सब कुछ को छोड़ कर चलने का साहस हो. पालतू कुत्ता भी होता है और हाथी भी. कुत्ता मालिक के आगे-पीछे दुम हिलाता चलता है और हाथी बहुत मनाने पर ही भोजन करता. इसी तरह पत्रकारों में भी तरह-तरह के लोग हैं. कुछ जन्मजात चापलूस हैं. जिन्हें आलोकजी की बातें अच्छी नहीं लगी वे उसी श्रेणी के हैं. अगर कोइ यह मानता है की किसी को गुरु बनाने के लिए परिचित होना आवश्यक है तो उसे एकलव्य की कथा का स्मरण करना चाहिए. प्रभाषजी किसी की जागीर नहीं हैं जो कोइ उनके बारे में बात करने वालों का निर्धारण करे. कोइ भी उनके बारे में बातें कर सकता है. अब आलोकजी की कितनी बातें सच हैं, ये तो प्रभाष जी ही बता सकते हैं. आलोकजी एक साहसी और स्वाभिमानी व्यक्ति हैं इस नाते मैं उनका सम्मान करता हूँ. जहां तक आलोकजी को बदास का प्रिय होने की बात है तो मैं अपने पत्रकार बंधुओं से निवेदन करूंगा की इस सम्बन्ध को जातीय चश्मे से न देखें.
यह बहुत ही दुखद है कि एक बहस को इस तरह व्यक्तिगत बना दिया गया. जगदीश्वर चतुर्वेदी समेत तमाम लोग सती के प्रसंग में प्रभाष जोशी के वक्तव्य के सन्दर्भ में अपना विरोध दर्ज कर रहे थे. ऐसा करना बिल्कुल ठीक है. प्रभाष जोशी गांधी जी हों तो भी इस विचार का विरोध होना चाहिए. आपको याद होगा कि गांधी के एक वक्तव्य – भूकंप हमारे पापों का फल है- के आने के बाद टैगोर ने गांधी का विरोध किया था. तब क्या गांधी के समर्थक – नेहरू-पटेल आदि क्या टैगोर को औकात बताने के लिए कूद पडे थे? और फिर प्रभाष जोशी अगर ब्लाग पर नहीं आते तो इसके क्या? तोमर जी को मैं बहुत अच्छा पत्रकार मानता रहा हूं. अब अचानक वे धमकाने पर उतर आयेंगे इसकी उम्मीद कतई नहीं थी. शायद वे समझते हैं कि ब्लाग पर इस तरह की लठैती वाली भाषा बोलने से उनका कोई नुकसान नहीं होगा. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रभाष जोशी पटना में अपने भाषण का समापन इस बात से करते हैं कि मैं प्रभाष जोशी, सती का समर्थक … यह हिन्दी समाज का दिवालियापन है. हम अंग्रेजों से कुछ सीख सकते हैं. डीन जोंस एक प्रतिष्ठित क्रिकेट खिलाडी और कमेंटेटर थे. एक बार एक एक खिलाडी को टेरोरिस्ट बोल गये. वह दक्षिण अफ्रीकी खिलाडी मुसलमान था और इस कमेंट का विरोध हुआ. उसके बाद डीन जोंस के माफी मांगने के बाद भी उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया, अनुबंध का नवीकरण नहीं हुआ. ये कमेंट मामूली नहीं हैं मान्यवर. आप सती को परंपरा का अंग उन्नसवीं सदी में नहीं कह रहे हैं आज कह रहे हैं जब सारी दुनिया को इस जघन्य प्रथा की असलियत पता चल चुकी है. बचपन में सुना हुआ एक प्रसंग याद आता है. सुनता था कि जब पुल बनता है तो नरबलि न दी जाये तो पुल टूट जाता है. हर पुल बनने के बाद बच्चे की बलि दी ही जाती है. लोग कहते थे कि यह तो हमारी परंपरा है. बाल मन में मेरे स्वप्न में वे बच्चे दिखाई देते थे, उनकी चीख सुनाई देती थी. बस्तर में राजा जब जंगल से गुजरता था तो दस बीस आदिवासियों को मार कर फेंक दिये जाने की प्रथा थी ताकि बाघों से भरे जंगल में बाघ का पेट भरा रहे और राजा पर बाघ आक्रमण न करे. यह भी परंपरा थी. कहिए कि इस तरह का जघन्य अपराध भी परंपरा में है. समरथ को नहीं दोष गुसाईं एक समय लिखा गया है. अब युग बीत गया है. अब ज्यादा धमकाइयेगा और धौंस दिखाईयेगा और कुलीन राजपूती शान बघारियेगा तो हास्यास्पद हो जाइयेगा. गर्व करना है अपने कुलीन राजपूत होने पर तो घर में करिए. हिन्दी के लोकतांत्रिक संसार में इस तरह की अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग करने के जुर्म में जनता आपको माफ कर देगी इसमें संदेह है.
आप आलोक तोमर को इतनी गंभीरता से रहे हैं, जिसे न प्रभाषजी ने भरोसे का समझा न हिंदी समुदाय ने ही? प्रभाषजी ने अपने उस मशहूर साक्षात्कार में कहा है: “जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसने कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।….ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े। जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था ‘हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।”….
आलोक तोमर का कोई चरित्र नहीं है और ऐसे लोग हिंदी में भरे पड़े हैं] राहुल देव की नौकरी कर रहे हैं तो उनके गुण गा रहे हैं और ओम थानवी को नाकारा बता रहे हैं! उन्हें क्या पता नहीं है की राहुल देव और अच्युतानंद मिश्र को जनसत्ता सौपने में प्रभाषजी का कोई रोल नहीं था – जबकि ओम थानवी प्रभाष जोशी की सलाह पर चंडीगढ़ से दिल्ली बुलाए गए? जनसत्ता आज प्रबंधन की उपेक्षा का शिकार है और प्रभाषजी पर तो रामनाथ गोयनका का विशेष वरदहस्त था परन्तु अगर प्रतिकूल हालातों में भी ओम थानवी जनसत्ता की गंभीर स्पेस बनाए हुए हैं तो इसमें उन्हें कोसने की ज़रुरत है? लगता है आलोक तोमर थानवीजी से कोई खुन्नस निकाल रहे हैं या फिर बहस को जानबूझ कर दूसरी दिशा में गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं]
बडे बडे विद्वान तुम्हारी ……..
jhaar रहे हो ज्ञान तुम्हारी…..
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