आलोक तोमर जी, कहां से आती है यह भाषा?
आलोक तोमर प्रभाष जोशी के शिष्य भी नहीं हैं
♦ खरी बात
आलोक तोमर प्रभाष जोशी के शिष्य भी नहीं हैं। देखिए प्रभाष जोशी के इंटरव्यू के अंश, बिना काट-छांट के। पूरा इंटरव्यू आलोक तोमर की प्रिय साइट भड़ास में देख सकते हैं:
»आपने राकेश कोहरवाल और आलोक तोमर को क्यों निकाला?
प्रभाष जोशी : (दिवंगत राकेश कोहरवाल के बारे में बचते हुए) मैने कागद कारे में लिखा है उनके बारे में। जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसमें कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।
» आपने लिखा है कि महादेव चौहान, आलोक तोमर और राकेश कोहरवाल आपको अपराध बोध देते हैं। क्या है वह अपराध बोध?
प्रभाष जोशी : ये जब आये थे, तो कुछ नहीं थे। जनसत्ता में नाम कमाया था। अखबार ने उन्हें कीर्ति दी थी। इनको उठाया था। सभी के टैलेंट को जनसत्ता ने उभारा था। हिट होने के बाद इनके तौर-तरीके बदल गये। जीवन में ऐसा होता है जब आपकी प्रतिभा को एक बार निखरने का मौका मिल जाता है, तब। आपमें जो प्रतिभा है, उसे संभाल कर रोज़ तराशना और उसे रचनात्मक कार्य में लगाये रखना भी एक प्रतिभा है। वरना जिनमें अधिक प्रतिभा होती है, वो विस्फोट करके नष्ट हो जाते हैं। ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े। जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था, “हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।” जब अखबार शुरू हुआ था, तभी मैंने सबको बुला कर कहा था कि हमें मिल कर एक परिवार बनाना है और यह परिवार अख़बार बनाएगा। पांच साल तक पूरे 22 लोगों की टीम थी। इस टीम ने कैसा अखबार निकाला, आप जानते हैं।
♦ अरविंद शेष
» जो अनपढ़ हैं, वे अनपढ़ ही रहेंगे।
» बात करो मगर औकात में रह कर बात करो।
» लफंगों की जमात।
» ब्लॉगिए और नेट पर बैठा अनपढ़ों का लालची गिरोह।
» जिस समय हमारा एक्सप्रेस समूह विश्वनाथ प्रताप सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के लिए सारे घोड़े खोल चुका था, और प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस दिन उन्हें (वीपी सिंह को) लाल किले से देश को संबोधित करना था, जनसत्ता के संपादकीय पन्ने पर मैंने उन्हें जोकर लिखा था।
» अगर गालियों की भाषा मैंने या मेरे जैसे दूसरे लोगों ने लिखनी शुरू कर दी, तो आपकी बोलती बंद हो जाएगी।
तो ये हैं “वरिष्ठ पत्रकार” आलोक तोमर के पवित्र प्रवचन के कुछ अहम हिस्से, जो वे अब तक की उम्र और पत्रकारीय जीवन में अर्जित कर सके हैं। मेरे ख़याल से इससे बेहतर अगर वे कुछ करना चाहेंगे, तो यह करेंगे कि उपर्युक्त उद्धरणों में से जो आखिरी उद्धरण है, उस पर वे अमल करके “दिखा देंगे।”
तोमर साहब को जानने वाले जानते होंगे कि ऐसा उन्होंने कोई पहली बार नहीं कहा होगा। कुछ समय पहले उनकी टिप्पणी पर नज़र गयी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुझसे पंगा मत लेना।
कहां से आती है यह भाषा?
“भड़ास” (इस साइट या ब्लॉग की मूल प्रकृति को देख कर यही लगता है कि इसने बिल्कुल सही नाम रखा है अपना। और यहीं यह बता जाता है कि इस पर आयी किसी चीज़ को अगर आप गंभीरता से लेते हैं, तो यह आपकी मर्जी, हम तो बस भड़ास निकाल रहे थे) पर तोमर साहब ने बड़े गर्व से मुनादी की है कि अपने “कुलीन राजपूत” होने का मुझे दर्प नहीं, तो शर्म भी नहीं है। अब अपनी तमाम “पढ़ाई-लिखाई” के बावजूद हिंदू परंपरा की “राजपूत मानसिकता” में जीने वाले लोगों की त्रासदी और दयनीयता का आप अंदाजा लगाएं।
जिस भाषा का इस्तेमाल उन्होंने किया है, वह उसी “राजपूती” और सामंती ज़मीन पर पैदा होती है, पलती-बढ़ती है, और वैसा ही फल देती है, जैसा तोमर साहब बांच रहे हैं।
यह पढ़े-लिखे आलोक तोमर का आख़िरी निष्कर्ष है कि “जो अनपढ़ हैं, अनपढ़ ही रहेंगे”। यह कहने वाले किसी भी शख्स के बारे में क्या यह स्वीकार किया जा सकता है कि उसका मानसिक और बौद्धिक विकास “प्रॉपर” तरीके से हुआ होगा?
कहां खोट रह गयी तोमर साहब? जिस स्कूल में ट्रेनिंग का दंभ दिखाते फिरते हैं आप, क्या यह उसी स्कूल की कक्षाओं में तैयार हुआ मनोविज्ञान है, जिसका आधार-सूत्र ही है कि किसी को जाति के आधार पर देखो, उसका शोषण करो, उसे अपमानित करो, उसे खारिज़ करो या उसे मार डालो?
बड़े घमंड में आप यह मुनादी करते हैं कि आपने लाल किले से संबोधन करने के दिन विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर कहा था।
क्या यही काफी नहीं है आपकी पूरी सामाजिक दृष्टि के बयान के लिए? इतने हतभागे हैं आप कि यह मुनादी करते हुए इस बात का अंदाज़ा लगा पाने में सक्षम नहीं हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। यह कहते हुए दरअसल मैं जानबूझ कर यह तथ्य अनदेखा कर रहा हूं कि आप अच्छी तरह जानते थे और जानते हैं कि आपने विश्वनाथ प्रताप सिंह को जोकर क्यों कहा होगा। आपकी पूरी मानसिक संरचना जिस नींव पर खड़ी है और जिस मिट्टी से तैयार हुई है, वहां समाज के वंचित तबकों के लिए कुछ भी किये जाने पर आपके भीतर से और निकल क्या सकता है? क्या इसी ज़हर के साथ आप “बहुत सारे ज़रूरी मुद्दे पर बात करने” का दम भर रहे हैं।
एक पत्रिका में काम करते हुए आपने डेनमार्क के एक कार्टूनिस्ट का बनाया मोहम्मद साहब का कार्टून छापने की बहादुरी दिखायी थी, क्या वह भी यह बताने के लिए काफी नहीं है कि संघी गर्भनाल से जुड़ा आपका सांप्रदायिक दिल-दिमाग़ क्या सोच सकता है?
कुछ साल पहले उसी पत्रिका में हुए एक घपले-घोटाले में आपके शामिल होने की बात लोग किया करते थे।
आपकी ट्रेजेडी यह है कि आप जिन्हें बात करने की “सलाह” दे रहे हैं, उन्हें औकात में रहने की धमकी भी दे रहे हैं। ये “लफंगों की जमात” और “नेट पर बैठे अनपढ़ों के लालची गिरोह” तो आपकी भाषा में अनपढ़ हैं और अनपढ़ ही रहेंगे! फिर बात क्या करेंगे और किससे करेंगे?
आप भी बरास्ते जनसत्ता आज अपनी मौजूदा दशा में पहुंचे हैं। आपकी ट्रेनिंग ने आपको इस हद तक लाचार बना दिया कि जिस क्रूर, अमानवीय, सामंती और संवेदनहीन जाति व्यवस्था में आप पैदा हुए, आपकी उसी “संपत्ति” में और इजाफा हुआ। मैं भी इसी जनसत्ता में हूं और देख रहा हूं कि “सती-प्रसंग” को बहुत पीछे छोड़ कर यहां तक चले आये इस अखबार में आज अंधविश्वास और यहां तक पूजा-पाठ तक की खबरों के लिए भी कोई जगह नहीं है। जगदीश्वर चतुर्वेदी या जो लोग जनसत्ता को कोसने में लगे हैं, वे अनायास ही अपनी बात को अपनी हताशा में तब्दील कर रहे हैं। जनसत्ता के सिवा स्त्रियों और दलितों के सवालों पर बात करने वाले मुख्यधारा के किसी और अखबार का नाम कोई बताये। और जब तक कोई समाज अपने वंचित तबकों के सवालों से जूझने की हिम्मत नहीं करता, मेरा मानना है कि उसका “प्रॉपर” विकास होना अभी बाकी है।
भाषा से लेकर पत्रकारिता के सरोकारों तक के मामले में मैं इसी आबो-हवा में तैयार हो रहा हूं तोमर साहब, जिसकी ज़रूरत आपको भी है। सड़ी-गली और इंसानियत को शर्मसार करने वाली परंपराओं की व्याख्या और उसके विश्लेषण में फर्क होता है। विश्लेषण हमेशा आगे जाने की राह निकालेगा, “महान” व्याख्याओं में कई बार यथास्थितिवाद को महिमामंडित करने की चालाकी भी देखी गयी है।










अरविन्द भाई, आपने एक सही व्यक्ति के लिए सही शव्द का इस्तेमाल किया है. बड़ी निराशा होती है, इसे पढ़कर और जानकर की आलोक तोमर के कद का कोई व्यक्ति ऐसी ओछी बातें कर रहा है. बहरहाल, आप तो लगे रहो…
जो आदमी हर मर्ज की दवा जाति को ही समझता हो, जातिवाद के धंधे में ही गले-गले तक डूबा हो उसका क्या शेष कुछ बचा रह गया है क्या? ऐसे रंगे सियारों को कम से कम प्रभाष जोशी और आलोक तोमर जैसे सम्मानित और विद्वान पत्रकार की आलोचना करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। नफरत और जहरबुझी भाषा से इस कथित लेखक की मंशा समझी जा सकती है।
चार्वाक सत्य स्पष्ट करें कि क्या ये वही चार्वाक सत्य हैं जिन्होंने इस समूचे बहस की शुरुआत की थी…
असली चार्वाक सत्य को जनतंत्र डॉट कॉम में पढ़िए। ऊपर कमेंट करने वाला फर्जी है। अफसोस है कि ये बताना पड़ रहा है। चार्वाक चापलूसी नहीं करता। ऊपर का कमेंट तो किसी चेले का है।
समाजिक मनोविज्ञान को ध्यान में रख कर किया गया अच्छा विश्लेषण है। करीब-करीब गुमनाम से हो चुके पत्रकार अब ब्लाग के माध्यम से चर्चा में आना चाहते हैं। मुझे नहीं लगता कि नई पीढ़ी के पत्रकारों में इन महाशय को ज्यादा लोग जानते होंगे।
बिल्कुल सच लिखा है आपने। बधाई
अरविंद आलोक तोमर के बारे में आपका ये बचकाना लेख गवाह है कि लेखक जो कहना चाह रहा है वो आपको एकदम अंदर तक हिला गया है। भाईसाहब लगता है भाषा के संस्कार आपके पास नहीं हैं। आलोक तोमर जैसा भाषा का प्रवाह, लय, शब्द चयन और इस सबसे ऊपर मारक क्षमता यानी कि पंच लाने में आप जैसे सौ पत्रकारों को सौ जन्म लगेंगे। मैं कक्षा 12वीं से आलोक तोमर की भाषा का कायल हूं। कमलेश्वर और उदयन शर्मा जिन आलोक तोमर के कहने के अंदाज के गुणगान करके चले गए उनके बारे में आपका ये छिछला लेख पढ़कर सभ्य पत्रकारों और सरोकार की पत्रकारिता खुद को काफी लज्जित महसूस कर रही है। अरविंद आपने राही मासूम रजा को पढ़ा है, नहीं। काशीनाथ सिंह को पढ़ा है नहीं। आपने हरिशंकर परसाई को भी नहीं पढ़ा है। दरअसल आप जैसे लोगों के लिए कार्टून जैसी कलात्मक चीज का भी कोई मतलब नहीं हो सकता। आपकी बुद्धि कार्यक्रम आयोजित और समारोह संपन्न जैसे शीर्षक ही समझ सकती है। इसमें आपकी कोई गलती नहीं है, भाषा के संस्कार आपके पास नहीं हैं। आपके भाषाई संस्कार गाय के निबंध से ऊपर के कतई नहीं कहे जा सकते। आप जैसे लोग होंगे तो गीतकार इश्क कमीना नहीं लिख पाएगा। आपके लेख में चाट्टुकारिता की बू आ रही है। ऐसा लगता है कि किसी गिरोहबाज पत्रकार के कहने पर आपने ये लेख लिखा है। आपको शब्दों के मायने जरूर मालूम हो सकते हैं लेकिन अर्थ की गहराई और व्यंजना की समझ नहीं है। मायनों की खूबसूरती समझने का प्रयास कीजिए और चौथी छाप समझ के दायरे से निकलिए।
मैं दावे से कह सकता हूँ ये मनीष आलोक तोमर स्वयं है…व्यक्ति चाहे दो कौडी का हो उसकी भाषा में कुछ तो है जो छुपा नहीं रहता…शर्म नहीं आती अपने बारे में लिखते हुए??
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