“गुरु कुम्‍हार शिष कुंभ” के बाद “जस देखा तस लेखा”

किताब का कवर

Jas Dheka Tas Lekha PB

किताब का ब्‍लर्ब

बच्चों को वास्तविक रूप में शिक्षा देने और उसे एक जिम्मेदार, कर्तव्यनिष्ठ इंसान या नागरिक बनाने की चिंता में जैसे-जैसे परिवर्तन आया है, वैसे-वैसे शिक्षा-व्यवस्था का रूप भी बदला है। आज बच्चों को पढ़ाने का अर्थ डिग्री या प्रमाण-पत्र के रूप में महंगी शिक्षा खरीद कर कैरियर बनाना जैसे आम हो गया है, वैसे ही शिक्षा देनेवाली संस्था भारी बस्ते की आड़ में अपना कारोबार कर रही है। न विद्या के उस मंदिर में कोई पवित्रता रह गयी और न शिक्षक-छात्र के वे रिश्ते। सरकार तो बस बाज़ार की व्यवस्था चला रही है।

जस देखा तस लेखा शिक्षा जगत और बच्चे से जुड़ी चिंताओं का जीवंत पिटारा है। यह एक ऐसे शिक्षक की डायरी है, जो बिहार के सुदूर ग्रामीण और शहरी प्राइमरी – माध्यमिक पाठशालाओं से कॉलेज और विश्वविद्यालय तक एक अरसे से पढ़ाते आ रहे हैं। इस डायरी के पन्ने में बदहाल बिहार के बच्चे और उसके विद्या मंदिर से संबद्ध जानकारियां ऐसे कथा-तत्वों से संपृक्त हैं कि इसे उपन्यास की तरह पढ़ा जा सकता है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हरेक समझदार शिक्षक और सचेत अभिभावक के लिए यह एक ज़रूरी किताब है।

लेखक के शब्दों में, “यह किताब सिर्फ एक शिक्षक की किताब नहीं है, न ही किसी स्कूल की या कॉलेज की। मेरी इच्छा थी कि शिक्षण संस्थाओं के बहाने अपने अनुभवों और उन अनुभवों में खदबदाता हुआ एक मुकम्मल संसार को अभिव्यक्त करूं। जिस संसार में मेरे जैसे अनेक छात्रों का सृजन होता है। इसी संसार से शिक्षक, जमालपुर और चितरंजन रेल कारखाने के तकनीशियन, पदाधिकारी और कर्मचारी निकले हैं। अनेक छात्र पीछे छूट गये हैं। अब भी गांव में मौजूद हैं। खेती-बाड़ी करते हैं। हल-कुदाल चलाते हैं। बैलों को सानी-पानी देते हैं। सुबह उठकर प्रभाती गाते हैं। होली, दीपावली, छठ और दुर्गापूजा के त्योहार के अवसर पर अपने बच्चों के साथ खुश होते हैं। वैसे वहां दु:खों की कोई कमी नहीं है। हर मां-बाप की चाहत है कि उसका बेटा सरकारी नौकर हो। जहां मान्यता थी कि खेत बेचना बेटी बेचने के समान है, वहां किसान धड़ल्ले से खेत बेचकर बेटे को सरकारी नौकर बनाना चाहते हैं।”

इस पुस्‍तक की क़ीमत सजिल्‍द 400 रुपये और पेपरबैक 200 रुपये है। इसे आप अंतिका प्रकाशन, सी 56, यूजीएफ 4, शालीमार गार्डेन, एक्‍स. 2, साहिबाबाद, ग़ाज़‍ियाबाद 201005 (यूपी) के पते पर लिख कर मंगवा सकते हैं। अंतिका प्रकाशन का फोन नंबर है 0120-6475212… इस पुस्‍तक को मंगवाने के लिए antika56@gmail पर मेल भी कर सकते हैं। या नीचे कमेंट बॉक्‍स में इन किताबों के ऑर्डर दिये जा सकते हैं।

कवि परिचय

डॉ योगेंद्र
जन्म : 1 सितम्बर, 1958 को ग्राम महसोनी, जिला लखीसराय (बिहार) में। शिक्षा, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से बीए (हिंदी प्रतिष्ठा), एमए, एमएड, पीएचडी। गुरु कुम्हार शिष कुम्भ पहली चर्चित कृति। गंगा को अविरल बहने दो, ‘दूसरा भूमंडलीकरण सम्भव है, इन्द्रधनुष आदि संपादित पुस्तकें प्रकाशित। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और कई संकलनों में रचनाएं संकलित। संप्रति तेजनारायण बनैली महाविद्यालय, भागलपुर में वरिष्ठ प्राध्यापक। संपर्क, 6 ए, टीएनबी कॉलेज परिसर, भागलपुर 7 (बिहार)

(sponsored article)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *