आलोक तोमर को छोड़ो, प्रभाष जोशी पर बात करो
♦ अविनाश
हमें जो तथ्य बताये गये थे और जो हमने आलोक तोमर के बारे में लिखा, आलोक जी के मुताबिक़ ज़्यादातर तथ्यहीन हैं। उन्होंने हमें फोन करके विनम्र भाव से बताया कि उन्हें जनसत्ता से डिसमिस नहीं किया गया था। बल्कि उन्होंने इस्तीफा दिया था और विदा पत्र पर प्रभाष जी ने उन्हें जनसत्ता का एसेट बताया था। न ही अपनी पुरानी कंपनी का चेक उन्होंने अपने खाते में जमा कराया था। इस बारे में नीचे कमेंट बॉक्स में भगत सिंह रावत ने एक स्पष्टीकरण भी दिया है। और भी मुद्दों पर बात हुई और उन्होंने साफ़ किया कि अब वे अपनी तरफ से इस प्रकरण में कुछ भी नहीं लिखेंगे। बहरहाल, हमारे इनबॉक्स में पड़े कुछ पुराने पत्र थे, जो इस वक्त प्रासंगिक हैं। हम यहां उन्हें सिलसिलेवार छाप रहे हैं : मॉडरेटर
from : ALOK TOMAR IN DELHI
23/04/2007
Dear Friends,
A friend forwarded the massage about me, which concerned person was so afraid to send me. Well since it is now the court case, I will not say much but Mr. Vijay Dixit is in the habit of filing bogus cases against people after deceiving them, same happened with Ambeek Khemka, who incidentally was never an employee of him, nor was I.
The sender of the mail was so scared to talk about the case against Vijay Dixit.Why? Because perhaps he has no defence. Ask Mr Hanif Qureshi, SSP Gurgaon, about the case and feel free to get the truth. I am offering my phone record to anyone who cares to show that how many times Vijay Dixit called me and I returned the calls, even after filing the charge sheet. Read the charge sheet carefully and tou will get the truth. This is another blackmailing style of a wanted man and shows his desperation. I am just enclosing one “settlement draft” sent by email by none other then Mr Vijay Dixit’s advocate. Please read on…
regards,
Alok Tomar
from : editor@seniorindia.in
23/04/2007

Dear Sir,
This has reference to the mail sent by Alok Tomar, Our Ex. Employee booked, arrested and charge sheeted by Delhi Police U / S420 / 468 / 471 / 120-B IPC.
We are nether Shocked nor surprised that Alok Tomar who was arrested by special cell of delhi police and sent to Tihar Jail, has now chosen to indulge in such nefarious activities and malign the image of our Hon. Chairman Mr. Vijay Dixit and wife Kalpana Dixit. In fact this act of Alok Tomar has only re exposed the real character or you can say the true colors of his character. We are placing here the text of the charge sheet filed against Mr Tomar by Delhi Police in a Delhi Court. The Charge sheet is self explanatory. The Case is going to open on 4th may 2007.
So far Mr Ambik Khemka is concerned, it may please be noted that he is an Ex – Employee of Senior Builders Ltd., owned by Mr. Dixit.
A Police Complaint was lodged with local Police Stations by senior Builders Ltd. against Mr. Khemka for cheating and forgery much before the said F.I.R was lodged by Mr. Khemka with Haryana Police. The matter is under investigation and sub juiced. Another case of cheating and forgery has been lodged against Mr. Khemka with Ghaziabad Police by one Mr. Biresh. The Ghaziabad Police has Filed Charge sheet in the case against Mr. Khemka in the court.
This is absolutely wrong to say that Mr. Dixit is hiding in Five Star Hotel under some one else’s name. This concocted allegation attracts legal action.
In fact Alok Tomar is spreading such canard to black mail the company because he is scared of the case.
Thanks.
Editor
Senior Media Ltd
New Delhi
हालांकि वो शीर्षक डेरोगेटरी था, बंदर के हाथ में बिहार – लेकिन तर्ज वही लेकर अगर आलोक तोमर जैसों के लिए अपराधी के हाथ में अख़बार जैसी भाषा का इस्तेमाल किया जाए, तो ये ठीक ही होगा। ये ऐसे कलंकित शख्स हैं, जिन्हें जनसत्ता से डिसमिस किया गया था। सांप्रदायिक संपादकीय व्यवहार के लिए तिहाड़ जेल का चक्कर काटने वाला और अपनी कंपनी का चेक फ़र्ज़ी तरीक़े से अपने अकाउंट में जमा करने की कारीगरी के चलते मुक़दमे के चक्कर में फंसा रहने वाला शातिर इंसान आज विचार के मैदान में ज़ोर-आज़माइश कर रहा है – यह एक प्रहसन ही है। अपनी कई रिपोर्टों के चलते जनसत्ता की साख गिराने वाला और अटल वाणी में अपनी दलाल कलम से शब्द भरने वाला यही वो पत्रकार है, जिसे वक़्त खारिज़ कर चुका है। लेकिन फिर भी जो दुर्योधन की तरह वक्त के सिरहाने बैठ कर खुद को प्रासंगिक मानने की ज़िद ठाने हुए है। बात इनकी क़तई नहीं करनी है, क्योंकि इनका वो भाव ही नहीं है।
हम प्रभाष जोशी पर ही बात करें। प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता के देवता क्यों हैं? वे 92 के बाद भारत की अधिसंख्य जनता के पक्ष की ऐसी मुखर आवाज़ रहे, जो इस देश को कट्टरता की गर्त में जाते नहीं देखना चाहता। लोग कुछ भी कहें, हम किसी अंतर्कथा में नहीं जाना चाहते कि छह दिसंबर 1992 के बाद ही प्रभाष जोशी की आत्मा कैसे पलटी। उस एक हादसे के लिए उन्होंने संघ और बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया था, लगभग चीख़ कर, लिहाज़ा वे देवता बनाये गये। इस बनने में उनके वे अवदान भी गिने जा सकते हैं, जो उन्होंने भाषा में देसी खुशबू मिलाने के स्तर पर किये और देश के ज़्यादातर मानवाधिकार आंदोलनों में अपनी सहभागिता दिखा कर किये। हालांकि…
प्रभाष जोशी देवता नहीं हैं। वे एक चतुर सुजान हैं, जो जानता है कि कब क्या करने से लाभ की गठरी सरक कर उनके पास आएगी। वे अपनी जन-छवि बनाने के लिए आंदोलनों का इस्तेमाल करते हैं और कांग्रेस की कतार में खड़े होने के लिए भाजपा-आरएसएस पर कठोर कागद कारे लिखते हैं। 84 के जून में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जब सेना के जवानों ने स्वर्ण मंदिर पर कब्जा कर लिया था, तो इन्हीं प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में अपने लिखे संपादकीय का हेडिंग लगाया था – सत श्री अकाल, जनरल दयाल। यह उस सांप्रदायिक और ज़हरीले संपादक का कारनामा था, जिस संपादक को आज सिद्ध और प्रसिद्ध बताया जा रहा है। जिन अभियान के लिए आज कांग्रेस माफी मांगती फिरती है, उसी अभियान के दौरान दिये गये इस संपादकीय हेडिंग के लिए क्या प्रभाष जोशी ने कभी माफ़ी मांगी? क्यों भई, आप देवता हैं क्या? अगर आपको उस शीर्षक पर गर्व है, तो आपको तो सज़ा होनी चाहिए।
प्रभाष जोशी को सज़ा इसलिए भी होनी चाहिए कि वे अख़बारों से ख़बरों के काले धंधे में जवाब तलब करने की नैतिकता बघारने के शोरगुल में अपने धतकर्मों का हिसाब भूल रहे हैं। पिछले जन्मदिन पर ही उनके चहेते टीवी पत्रकार हेमंत शर्मा ने उन्हें करीब पांच लाख की कार भेंट की। आपने उससे क्यों नहीं पूछा कि भई, ये इतना महंगा गिफ्ट क्यों? आप मायावती के जन्मदिन पर चंदा वसूली को जनविरोधी हरकत बताते हैं और अपने जन्मदिन पर इतना महंगा तोहफा लेने से कतराते तक नहीं हैं? आपने उससे क्यों नहीं पूछा कि हेमंत तुम्हारे पास पांच लाख रुपये कहां से आये? जहां से भी आये, अगर वो धन काला है, तो उसे मेरी सफेद कमीज़ पर क्यों उंड़ेल रहे हो? नहीं, आप नहीं पूछेंगे – क्योंकि आप पूछना नहीं चाहते। हेमंत से ऐसा सवाल पूछने में आपका लाभ नहीं है।
रामबहादुर राय तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि से आते हैं। सादगी पसंद इंसान हैं। आपका उनके प्रति स्नेह एक ईमानदार शख्सियत को चाहने की श्रेणी में हम रख सकते हैं, लेकिन उनके वैचारिक संगठनों में आपकी आवाजाही को हम किस नज़रिये से देखें? आपका वसुंधरा के मेवाड़ ट्रस्ट में आना-जाना क्यों है, जो कि घोषित तौर पर एक दक्षिणपंथी ट्रस्ट है? आपके जन्मदिन पर गोविंदाचार्य क्यों बुलाये जाते हैं?
बहुत बातें हैं प्रभाष जी, जो आपसे बार-बार पूछे जाते हैं और आप हर बार चुप लगा जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे ख़बरों के धंधे में आपके जवाब तलब करने पर आरोपी अख़बार ख़ामोश रह जाते हैं। आपको इससे दुखी नहीं होना चाहिए, क्योंकि आपका आचरण भी इन अख़बारों से अलग नहीं है।
क्या पटना के बुद्धिजीवी गूंगे बहरे हैं?
अब एक दूसरी सूचना पर आते हैं कि कैसे पत्रकारिता के इस देवता की वामपंथ के सक्रिय कार्यकर्ता, नेता, बुद्धिजीवी इन दिनों आरती उतार रहे हैं। इन दिनों प्रभाष जोशी नंदीग्राम पर किताब लिखने वाले लेखक पुष्पराज की ब्रांडिंग में लगे हुए हैं। पिछले दिनों दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में उन्होंने इस किताब का लोकार्पण किया। कल पटना में भी उन्होंने इसी किताब का लोकार्पण किया। इन दिनों चलन ये है कि एक किताब कई-कई बार लोकार्पित की जाती है और प्रभाष जोशियों को कई-कई बार भाषण देने का मौक़ा मिल जाता है। पटना में लगभग सभी को पता है कि प्रभाष जोशी ने अपनी ब्राह्मण वाणी से इन दिनों कैसा कमाल किया हुआ है और धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बन रही सती-प्रथा को उन्होंने कैसे ऑक्सीजन दे दिया है – इसके बावजूद किसी ने उनसे कोई सवाल नहीं किया। बल्कि जो एक सीपीएम के सिंपैथाइज़र ने पार्टी की लाइन के विपरीत लोकार्पण समारोह के लिए पोस्टर बनाने में मदद की और सीपीएम समर्थित जनवादी लेखक संघ के सदस्य-कवि आलोकधन्वा ने प्रभाष जोशी के साथ मंच शेयर किया। मंच पर सीपीआई के नेता और नामवर जी के प्रिय आलोचक खगेंद्र ठाकुर भी मौजूद थे। लोग तब भी खामोश रहे, जब प्रभाष जोशी ने अपने लंबे वक्तव्य का उत्तरार्द्ध कुछ इस तरह किया कि मैं प्रभाष जोशी, सतीप्रथा समर्थक, अपनी बात समाप्त कर रहा हूं।
ऐसे में हम सवाल करें तो क्या ग़लत होगा कि क्या पटना के बुद्धिजीवी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गूंगे और बहरे हैं?









पढ़िए वरिष्ठ टीवी पत्रकार रघुवीर रिछारिया की टिप्पणी जो रविवार और जनतंत्र पर आई है। इसमें उन्होंने एक पुराने मामले से पर्दा उठाया है:
साथियों,
रविवार.कॉम में सती प्रथा, सिलकॉन वैली में ब्राह्मण श्रेष्ठता और तेंदुलकर चालीसा का बखान करने वाले प्रभाष जोशी जी के इंटरव्यू को पढ़कर हैरानी हो रही है। उससे ज्यादा परेशानी प्रभाष जी के शिष्यों की अतिवादी प्रतिक्रिया को लेकर। आलोक तोमर जिस तरह से प्रभाष जोशी का बचाव कर रहे हैं (या कहें बचाव के जाल में उन्हें फंसा रहे हैं), उससे हिंदी के इन स्वनामधन्य पत्रकारों के बुद्धि, विवेक पर तरस आता है।
सवाल नं.- 1 जब हम गीता, भागवत, रामचरित मानस, कुरान, बाइबिल में लिखे/छपे तथ्यों, उनके लेखकों पर बहस कर सकते हैं- तो प्रभाष जोशी के सती प्रथा और ब्राह्मणवाद को महिमामंडित करने वाले पोंगापंथी तथ्यों पर क्यों नहीं। ये तो उसी तरह है जैसे जिन्ना पर किताब लिखने वाले जसवंत को बिना पढ़े, सोचे समझे उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। क्या प्रभाष जोशी के लिखे, कहे पर बहस से बचने वाले ऐसा ही नहीं कर रहे हैं।
2- वरिष्ठ पत्रकार और प्रभाष जी के प्रबुद्ध शिष्य आलोक तोमर कह रहे हैं कि प्रभाष जी की मुखालिफत करने लोग वे हैं–जिन्हें जनसत्ता में नौकरी नहीं मिली या जिनके लेख जनसत्ता में नहीं लिखे। तो मेरे भाई आलोक जी, ये तो पता कर लीजिए रविवार.कॉम में जोशी जी का इंटरव्यू करने वाले आलोक प्रकाश पुतुल या जनतंत्र.कॉम चलाने वाले समरेंद्र सिंह ने कब प्रभाष जी से नौकरी मांगी। मेरी जानकारी में कभी नहीं..क्योंकि मैं इन दोनों लोगों को जानता हूं..आलोक ने छत्तीसगढ़ में रहकर देशबंधु औऱ बीबीसी के जरिए जो काम किया है-वो देश के किसी चर्चित पत्रकार के काम से कम नहीं है।
3- तीसरी बात-प्रभाष जी, अपने शिष्यों के बीच हिंदी पत्रकारिता के युगपुरुष कहे जाते हैं-उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ बिगुल बजाने वाले संपादक का खिताब हासिल है( जो शायद उन्हें नहीं बल्कि स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका जी को मिलना चाहिए)-लेकिन सत्ता से करीबी गांठने में इन महानुभाव के चर्चे बहुत कम हुए हैं। बात चल ही पड़ी है तो मैं प्रभाष जी के साथ घटित अपना एक निजी अनुभव (जो शायद उन्हें याद न हो) बांटना चाहता हूं.। 1996 में हम भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से बीजेएमसी कर रहे थे-विवि के महानिदेशक श्री अऱविंद चतुर्वेदी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हुआ-मुद्दे कई थे (पत्रकारिता विवि की मनमाने ढंग से फ्रेंचाइजी बांटी जा रही थी, जिनमें पत्रकारिता कोर्स नहीं कंप्यूटर की डिग्री/डिप्लोमा बंटते थे, ऑडियो-वीडियो लैब के लिए आई भारी भरकम रकम कहां गई थी–ये चतुर्वेदी जी को छोड़कर किसी को मालूम नहीं था। वगैरह..वगैरह…). अरविंद चतुर्वेदी भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. श्री शंकरदयाल शर्मा के सगे साढ़ू थे-उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता था। प्रभाष जोशी जी और श्री अजीत भट्टाचार्जी विवि के सलाहकार मंडल में थे-छात्रों से समझौता कराने आए-और उन्होंने हमें ऐसा प्रस्ताव दिया कि हम आंदोलन बंद कर दें। बीजेएमसी के छात्रों ने हाथ जोड़ लिए। एक संपादक जो इमर्जेंसी के दौरान सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ दम भरता रहा हो…वो इमर्जेंसी के 21 साल बाद ही सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसे लोटने लगेगा-ऐसा हम लोगों ने सोचा भी नहीं था।
- उम्र और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करना हमें बचपन से सिखाया गया है। वो हम लोग करत रहेंगे-लेकिन प्रभाष जी के विचारों पर शुरू हुई बहस ऐसे कैसे थम सकती है।
सादर
रघुवीर रिछारिया
प्रभाष जोशी का आतंक सिर्फ इसलिए है कि वो कई पुरस्कार समितियों में है, इंटरव्यू बोर्ड में बैठते हैं, खेल खेलने और बिगाड़ने में सक्षम हैं, वरना प्रतिभा का कोई विस्फोट नहीं है उनमें। रविवार के ही इंटरव्यू में फैक्ट की ऐसी आधा दर्जन गलतियां हैं, जिनके लिए किसी ट्रेनी पत्रकार को टेस्ट में फेल कर दिया जाए।
खेल करने के उनके हुनर के कारण वामपंथी साहित्यकार पत्रकार उनके तलवे चाटते हैं। पटना में भी यही हुआ है। और आज के पटना में 20-30 साल पुराने वाला दम भी कहां है। चाटुकारों की राजधानी है 2009 का पटना।
अविनाश जी ने सही जगह बहस को लाकर खडा किया है। प्रभाष जोशी के संपादकत्व में ‘जनसत्ता’ में किस तरह की अ-धर्मनिरपेक्ष पत्रकारिता हो रही थी,उसके संदर्भ में प्रभाष जोशी के भक्तों के लिए यही सुझाव दूंगा कि वे सिर्फ राममंदिर आंदोलन के दौर के जनसत्ता को देखें,कम समय हो तो ‘टाइम्स सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज’ के द्वारा उस दौर के कवरेज के बारे में तैयार की गयी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट ही पढ़ लें, यह रिपोर्ट प्रसिद्ध पत्रकार मुकुल शर्मा ने तैयार की थी, जो इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन की भारत शाखा के प्रधान हैं।’टाइम्स सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज’ की रिपोर्ट के अनुसार ‘जनसत्ता’ अखबार ने जो उन दिनों दस पन्ने का निकलता था। लिखा है ” दस पेज के इस अखबार में 20 अक्टबर से 3 नवंबर तक कोई दिन ऐसा नहीं रहा,जिस दिन रथयात्रा अयोध्या प्रकरण पर 15 से कम आइटम प्रकाशित हुए हों। किसी -किसी रोज तो यह संख्या 24-25 तक पहुंच गई है। ” इसी प्रसंग में ‘जनसत्ता’ की तथाकथित स्वस्थ और धर्मनिरपेक्ष पत्रकारिता की भाषा की एक ही मिसाल काफी है। ‘जनसत्ता’ ने (३ नवंबर 1990 ) प्रथम पृष्ठ पर छह कॉलम की रिपोर्ट छापी। लिखा ” अयोध्या की सड़कें,मंदिर और छावनियां आज कारसेवकों के खून से रंग गईं।अर्द्धसैनिक बलों की फायरिंग से अनगिनत लोग मरे और बहुत सारे घायल हुए।” यहां पर जो घायल हुए उनकी संख्या बताने की बजाय ‘बहुत सारे’ कहा गया लेकिन मरने वाले उनसे भी ज्यादा थे। उन्हें गिना नहीं जा सकता था। ‘अनगिनत’ थे। प्रभाष जोशी के संपादकत्व में ‘जनसत्ता’ ने संघ की खुलकर सेवा की है,समूचा अखबार यही काम करता था। इसका एक ही उदाहरण काफी है। 27 अक्टूबर के जनसत्ता में निजी संवाददाता की एक रिपोर्ट छपी है।इस रिपोर्ट में लिखा है ” भारत के प्रतिनिधि राम और हमलावर बाबर के समर्थकों के बीच संघर्ष लंबा चलेगा।” क्या यह पंक्तियां संघ पक्षधरता के प्रमाण के रूप में काफी नहीं हैं ? संघ के भोंपू की तरह ‘जनसत्ता’ उस समय कैसे काम कर रहा था इसके अनगिनत उदाहरण उस समय के अखबार में भरे पडे हैं। कहीं पर भी प्रभाष जोशी के धर्मनिरपेक्ष विवेक को इस प्रसंग में संपादकीय दायित्व का पालन करते नहीं देखा गया, बल्कि उनके संपादनकाल में संघ के मुखर प्रचारक के रूप में ‘जनसत्ता’ का कवरेज आता रहा। संपादक महोदय ने तथ्य ,सत्य और झूठ में भी अंतर करने की कोशिश नहीं की।
श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा (देखिए देशकाल डॉट कॉम पर राजेंद्र यादव की खबर)। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा (देखिए रविवार डॉट कॉम पर प्रभाष जोशी का इंटरव्यू)। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े कहे जाने वाले लोग जब इस तरह अश्लीलता फैलाएं और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।
मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये हमारे ये दोनों बुजुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि मेल आईडी तो हैं पर मेल का प्रिटआउट मंगाकर पढ़ते हैं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। जाहिर है वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते होंगे। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेश यही हाल होगा। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों के प्रोफाइल सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?
फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और भी ज्यादा फर्क पड़ता है क्योंकि ये अपने धंधे में चोटी के माने जाते हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बात चिंताजनक है कि भारत में संवाद से जुड़े दो बड़े लोगो का दुनिया और भारत में सबसे तेजी से बढ़ते संचार माध्यम (देखिए फिक्की और केपीएमजी की भारत में मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री पर रिपोर्ट) से कोई वास्ता नहीं है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं।
ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं जो उनके चेलों के अलावा हर किसी को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।
बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते है। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं है। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग http://www.zmag.org/blog/noamchomsky पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है (http://en.wordpress.com/tag/francis-fukuyama/)। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गई है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10-15 रुपए में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते, इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट हैं। ये आश्चर्यजनक है कि दुनिया के सबसे तेजी से उभरते संचार माध्यम से उनका परिचय ही नहीं है।
वो ये बात भी भूल जाते हैं कि भारत में इतने हमलावर आए हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कहकर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।
प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नई पीढ़ी की हंसी की आवाज सुनाई दे रही है? पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।
प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ग्रामीण ब्राह्मण परिवार मं हुआ होता तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। और राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गए?
तो श्रीमान प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,
बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं। “ वो वहां काबिज इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई लिखाई को लेकर चेतना अलग अलग जातियों और समूहों में अलग-अलग समय में आई। सामाजिक ढांचे की वजह से शिक्षा संसार में कई समूहों के लिए प्रवेश ही वर्जित था। कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गए। कोई भी बन सकता है।
किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता या जातीय विशिष्टता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं, हंसी के पात्र बनेंगे।
तो क्या प्रभाष जोशी के बहाने शुरू हुई इस बहस को हिंदी मीडिया, अकादमिक जगत, साहित्य और संस्कृति, इन सबसे संबंधित राष्ट्रीय और अन्य संस्थानों में काबिज कट्टर ब्राह्मणवादी जातिवादी ‘न्यूक्लियर सेंटर’ को असली फोकस में नहीं लाना चाहिए? और क्या इसमें वामपंथी लेखक संगठनों के ज़रिये समूचे जन-प्रतिरोध आंदोलनों को सबोटाज करने वाली ‘धुरी’ को बेनकाब नहीं करना चाहिए? शैलेश मटियानी, राजेंद्र यादव और उदय प्रकाश पर एक साथ टूट पड़ने वाले ‘जातिवादी-ब्राह्मणवादी-क्रांतिकारी’ इस समय अपनी मांद में कहां घुसे हुए हैं? निंदा-भर्त्सना प्रस्ताव और हस्ताक्षर अभियान कहां हैं? आखिर जब ‘जनसत्ता’ में सती प्रथा, आपरेशन ब्लू स्टार और कारसेवा के दिनों में यह सब हो रहा था, तो हिंदी कविता के वामपंथी ‘कल्ट-व्यक्तित्व’ वहीं बैठे मोटी तन्ख्वाहें डकार रहे थे और अपने ‘पुरस्कारों’ की जुगाड़बाजी में मुब्तिला थे। यह ‘अर्जुन सिंह युग’ के पहले का काला अध्याय था। उसके बाद तो पतन और पाप के दूसरे-तीसरे अध्याय की शुरुआत होती है।
अविनाश के ज़रिये सामने आये ये ऐसे सवाल है जिनके जवाब में हिंदी भाषा के जन-प्रतिरोध आंदोलनों की दिशा तय होनी है। वर्ना मान कर चलिए, इसे मैं स्टैंप पेपर पर लिख कर देता हूं, कि जलेस, जसम और प्रलेस छ्द्म वामपंथी-जुगाड़ू जातिवादी पंडों और उनके चेलों के दलाल संगठन बन कर रह जाएंगे।
अविनाश मेरी जान …..आपको क्या वाकई किसी को अपराधी और कलंकित कहने का हक है…..इमानदारी सोच कर जवाब दीजियेगा….क्यूंकि सच तो वो सारे मेरे अनुज बता ही चुके हैं जो भोपाल में आपके छात्र थे और जिनके कमरों पर आप रात को देर तक बैठ कर शराब पिया करते थे…..नकार दीजिये कि ये आपको बदनाम करने की साजिश है…और वैसे भी आपको आज तक सारा नाम इस बदनामी ने ही तो दिया है……क्या शानदार गुरु है शिष्यों के कमरों पर बैठ कर देर रात तक शराब के नशे में झूमता है…..
और उसके बाद जो आपने किया उसे भी आप कलंक तो नहीं ही मानते होंगे…..क्यों बलात्कार का आरोप कहाँ कलंक होता है…कलंक तो नौकरी से निकाला जाना भर है….
मेरा बहुत बड़ा सवाल है कि ज्यादा बुरा क्या है…..जुबां का बुरा होना या दुराचारी होना…..
अविनाश सवाल आपके लिए है…हिम्मत हो तो जवाब दें मेरे पास पूरे तर्क हैं…..
और हाँ ये जो बात बोल रही है…इसे बोलने का हक नहीं है …आगे इसकी भी असलियत खोलने का इरादा है….
क्यों न प्रभाष जी से ही पूछा जाये कि वो ब्राह्मणवाद किसे समझते हैं!
अविनाश जी, नमस्ते. आप इस युग के एक पत्रकार से जो सवाल कर रहे हैं, बिलकुल बेमानी है. हर कोई हम्माम में नंगा है. आप अलोक भाई के बारे में एक तरफ तो कह रहे हैं की छोडो आलोक तोमर को और दूसरी ओर उन्हें अच्छी-अच्छी गालियाँ भी दे रहे हैं. क्या यह विरोधाभास नहीं है. श्रीमान यह युग ही विरोधाभासी युग है, इस युग में आदमी जो दीखता है वैसा होता नहीं है. इसके न तो आप ही अपवाद हैं और न ही मैं.एक बात और प्रभाषजी न तो किसी संगठन से जुड़े हुए हैं न ही किसी के सदस्य ही हैं. मित्रता किसी से भी हो सकती है और न चाहते हुए भी आदमी कभी-कभी किसी कार्यक्रम में चला जाता है. आप शायद अपने को असाम्प्रदायिक सिद्ध करना चाहते हैं. इसके पीछे आपकी क्या मंशा है आप ही जाने. ब्रह्मण भारत की सबसे बुद्धिजीवी जाती रही है इसीलिए जहाँ भी बुद्धि का प्रयोग होता है वहां उनका वर्चास्वा है आप जैसे लोग जैसे-जैसे इस क्षेत्र में बढ़ेंगे यह वर्चास्वा टूटता जायेगा लेकिन इसके लिए आपको भी कहीं-न-कहीं जातिवादी बनाना परेगा, यह भी ध्यान में रखियेगा की भविष्य में कुछ ऐसे ही आरोप आप पर न लगाने लगे. धन्यवाद्.
गौर करें श्री ब्रज किशोर सिंह के विचार :
”ब्रह्मण भारत की सबसे बुद्धिजीवी जाती रही है इसीलिए जहाँ भी बुद्धि का प्रयोग होता है वहां उनका वर्चास्वा है ”
क्या ऐसा नहीं लगता कि शताब्दियों की वर्णाश्रम व्यवस्था ने अपने इतने ‘क्लोन’ पैदा कर डाले हैं कि हिंदी को ‘हिंदू’ से अब अलग करना मुश्किल है। क्रिकेट में भी ‘बुद्धि’ का प्रयोग होता है और ‘कविता’ में भी। इसलिए चुप रहो! यह मनु महराज का अघोषित संविधान है, जिसे आज़ाद हिंदुस्तान में, वास्तविक संविधान को रिप्लेस करके पूरी आज़ादी के साथ लागू कर दिया गया है।
बहस में बहुत सारे आयाम जुड़ गए हैं. दिलचस्प होती जा रही है. ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण की सीमा से बाहर आकर पत्रकारिता के मूल्यों पर बहस लाने के लिए इन नौजवानों को धन्यवाद्. किसी आलेख में एक चूक हो गयी है. किसी ने लिख दिया है कि ” 84 के दंगों में जब सेना के जवानों ने स्वर्ण मंदिर पर धावा बोल दिया था,”. यह सच नहीं है. दंगों में नहीं, सेना के जवानों ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान, जून ८४ में, स्वर्ण मंदिर में प्रवेश किया था और दंगे नवम्बर ८४ में हुए थे. . जनसत्ता की वह हेड लाइन भी जून में ही लगी थी.
जिसका भी आलेख हो , अगर सुधार लें तो उचित रहेगा. बाकी तो मामला सही चल रहा है. .निजी हमलों से हट कर बहस मुद्दों की ओर चल पडी है.
शुक्रिया शेष नारायण जी, हमारी ग़लती का एहसास कराने के लिए। अभी दुरुस्त करता हूं।
भाई अविनाश जी आप हैं कौन? कहीं आप भोपाल वाले अविनाश दास तो नहीं हैं.. अगर आप वहीं हैं तो आपके लेख पर.. टिप्पणी करने का कोई औचित्य नहीं बनता.. क्योंकि किसी बलात्.. के आरोपी से बढ़िया किसी फ्रॉड(आपकी भाषा में) की लेखनी ही सही है..
बंधु अजीत जी, शायद आप झूठ के झंझावात में घुट रही सच की सिसकी भी सुनना नहीं चाहते। आप कोई टिप्पणी न ही करें, तो अच्छा, क्योंकि आपके लिए तथ्य से ज़्यादा मायने साज़िश और अफवाह रखते हैं।
अजीत जी
ये वही अविनाश दास हैं, आपने ठीक पकड़ा… जब पैदा हुए होंगे तो प्रभाष जी के दर्शन हो जाएं उसके लिये तरसते होंगे…. आज गाली दे रहे हैं….. पत्रकारिता की बड़ी हस्ती के बहाने अपने को भी भी प्रसिद्ध करने चले हैं, कोई एक लेख लिखते-लिखवाते हैं और फिर बेनामी कमेंट्स लिख – लिख कर पत्रकारिता, नेट की दुनिया…. औऱ नेट पर हिंदी के भविष्य को चौपट कर रहे हैं… और हां ये वही आलोक तोमर हैं जिन्होंने कौन बनेगा करोड़पति को अपने सधे हुए डायलॉग और स्क्रिप्ट से संवारा और अविनाश दिन दिन भर फोन लगाते रहते थे (जैसा उनके मित्रों का कहना है) । और मैं कहता हूं कि अगर मर्द हैं तो कमेंट लिखनेवालों के नाम पते तो उजागर करें…..अपने गिरेबान में झांको .. और किसी की बुराई करने से पहले उसके लायक तो बनो…
अजीत और विनोद जी , आप शायद समझने में गलती कर रहे हैं, नेट पर लेखन ही महत्वपूर्ण है। नेट पर व्यक्ितगत बातें अर्थहीन हैं ।
जगदीश्वर चतुर्वेदी,
‘आप शायद समझने में गलती कर रहे हैं, नेट पर लेखन ही महत्वपूर्ण है। नेट पर व्यक्ितगत बातें अर्थहीन हैं ।’
तिहाड़ जेल से लेकर तमाम जेलों में ढेरों बलात्कारी अविनाश की तरह चालाक न हुए तो अंदर बंद हैं…..उनसे भी लिखवाइए ना चिकनी-चुपड़ी ज्ञानभरी बातें….हम आरती उतार-उतारकर पढ़ेंगे….बेहद बकवास लिखा है आपने कि घर में मुंह काला करते रहो और ब्लॉग पर राम-राम जपते रहो…धन्य हो ब्लॉग के बाबाओं…..अपने खोल से बाहर झांकिए बंधु…दुनिया बहुत कुछ कर रही है गाली-गलौज के सिवा भी…..
आदरणीय अविनाश जी,
चलिए मान लेता हूं.. आपके विचार सही हैं.. आपकी टिप्पणी को पढ़कर लगता है कि.. निजी जिंदगी में बेहद भावुक इंसान होंगे.. साथ ही अपने साथ हुए वाकए से दुखी लगते हैं.. लेकिन मुझे महसूस हो रहा है कि.. आप अपने दुख से दुखी हैं.. लेकिन दूसरे के दुख पर बहस कर ज्यादा सुखी हैं.. आपने कई अखबारों की कतरनें पोस्ट की हैं.. और किसी को खलनायक साबित कर दिया है.. लेकिन महोदय अपने इस मिशन में पाठकों को इस बात की भी.. जानकारी तो दीजिए.. कि आलोक जी के मामले में इस समय तक हुआ क्या है.. क्या आपने इस बारे में.. कुछ जानकारी हासिल करने की जहमत उठाई.. या बस लगे पोस्ट करने और सुर्खियां बटोरने.. बंधु हमें ये भी बताने का कष्ट करें कि आपके तथ्यों का आधारपुरुष ये दीक्षित है कौन.. करता क्या है.. कहां पर खबरों की इमारत बनाता है.. उसका चैनल कहां है.. ऑफ एयर है या सरकारी रिकार्ड में ऑन एयर.. उसने किस गीता पर हाथ रख कर कसम खाई है कि वो जो कहता है.. सच कहता है.. और आप उसके हैं कौन.. बंधु आप बहुत दुखी लगते हैं उसके कष्टों से.. खैर छोड़िए.. मैं भी तीन-चीर साल से.. मीडिया को देखने समझने की कोशिश कर रहा हूं.. कभी-कभी आपके ‘तेजस्वी’ ब्लॉग पर भी आ जाता हूं.. लेकिन क्या करुं.. कभी उसमें तेजस्व दिखता ही नहीं.. जब भी देखता हू.. तो वही बातें दिखती हैं.. जो सामाजिक क्रान्ति और सामन्तवाद के कथित पुरोधा बोलते हैं.. मसलन.. ब्राह्मणवाद.. गैर ब्राह्मणवाद.. दलित पिछड़े और हां मीडिया का स्त्रीवाद.. महोदय विषय और भी हैं.. उन पर बहस कीजिए.. विचार भी आएंगे.. और सदविचार भी.. और टिप्पणियों का जंमावड़ा भी.. जिसके लिए ज्यादातर ब्लॉगर भूखे होते हैं..
अजीत
agar ye (sati wala)sampadkiye Banvari ne likha tha to Prabhash Joshi ke nam se kaise chala gaya? Iska ek matlab yeh bhi hota hai ki Prabhash Joshi ek laparwah sampadak the. Iska dusra matlab hota hai ki hindi akhbaroN me apne nam se dusroN ka likha chhap lene jaisi ghatiya parmparayeN chalti haiN jiska ek gandhiwadi sampadak ne na to kabhi virodh kiya na hi unhehn rokne-badalne ki koi koshish ki. Iska teesra matlab yeh bhi nikalta hai ki Banwari aur anya logoN ne kai aise bhi sampadkiye likhe honge jinka labh unheN milne ki bajaye Prbhash joshi ko mila hoga.
ab ye sach to Banwari hi bata sakte haiN ki unheN apne kiye ki saza mil rahi hai ya we bali ka bakra bane hain !!??
बहस को लाइन पर लाने की कोशिश के लिए धन्यवाद। लेकिन आपने पटना में प्रभाष जोशी के वक्तव्य की जो खबर दी है वो खतरनाक है। मुझे तो चंद्रकांत देवताले की मशहूर कविता लकड़बघ्घा हँस रहा है साक्षात चरितार्थ होती दिख रही है।
पुनीत जी, सचमुच दुनिया बहुत कुछ कर रही है, आपको और हमको भी बहुत कुछ करना है, आप बेवजह खफा हैं,कैदियों को सामान्य सुविधाएं नहीं हैं उन्हें नेट लेखन की सुविधा कहां से मिलेगी। पुनीत जी आपने लिखा है ” बेहद बकवास लिखा है आपने कि घर में मुंह काला करते रहो और ब्लॉग पर राम-राम जपते रहो”,दोस्त इतना खराब अर्थ भी मत लगाओ,ज्ञान में गुस्सा करना ठीक नहीं लगता। थोड़ा गुस्सा थूककर बातें करो। आपका तेवर अच्छा है बातें भी अच्छी करो पढने में अच्छा लगेगा।प्रशंसा करने के जिए नहीं कह रहा हूं। बहस का स्तर हम अपने आप बनाएंगे।बहस को अगर व्यक्ितगत करना चाहते हैं तो उसे व्यक्ितगत संचार तक सीमित रखो।व्यक्तिगत संचार के सभी सूत्र और कनेक्शन आपके पास हैं। आप खुशी से उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। कम से कम सार्वजनिक तौर पर प्रभाष जोशी के बारे में उन्हीं बातों तक सीमित रखो जिन्हें उन्होंने अपने विवादास्पद साक्षात्कार में उठाया है। दोस्त यह निम्नमध्यवर्गीय बीमारी है जब तर्क करते हुए निरस्त्र हो जाते हैं तो व्यक्ितगत नैतिक हमले करना शुरू कर देते हैं। यह एचआईवी से भी भयानक सामाजिक सांस्कृतिक बीमारी है,हिन्दी के बुद्धिजीवियों में ज्यादा पायी जाती है। हिन्दी में इसका अभी तक इलाज नहीं खोज पाए हैं संस्कृतिसेवी लोग। हिन्दी में मुक्तिबोध अकेले ऐसे लेखक थे जिन्होंने इस बीमारी का कठोर निदान किया था बाकी हम सब लोग तो बाबा रामदेव के सहारे इसका निदान करना चाहते हैं। दूसरी बात यह कि प्रभाष जोशी ने अपने साक्षात्कार में जिस नजरिए का परिचय दिया है और आप जिस लहजे में बोल रहे हैं उन दोनों में एक साम्य है वह यह कि आप व्यक्ित को मनुष्य के रूप में नहीं किसी और रूप में देखते हैं ? प्रभाषजी के बारे में आलोचना लिखने वाले क्या हैं,क्या खाते हैं,नैतिक तौरपर कैसे हैं, दक्षिण की तरफ पैर करके सोते हैं अथवा पश्चिम की तरफ। उनका कम्प्यूटर किस दिशा में रखा है और प्रभाष जोशी की कलम किस दिशा में रखी है। इन सब बातों का आज के जमाने में कोई अर्थ नहीं है। जो लिखा है उस पर बातें करो। यह साधारण सी बात जब समझ में नहीं आ रही है तो बाकी बातें तो कितनी समझ में आएंगी कहना मुश्किल है ? ये बातें मैं आपसे प्यार के नाते कह रहा हूं। जोश को तर्क से जोडो दुनिया बदलेगी, जोश को वैज्ञानिक समझ से जोडो जीवन भी बदलेगा। जोश को यदि गुस्से से जोडोगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा,जो हाथ में है वह भी चला जाएगा। गुस्सा करने से गांठ की विवेक रूपी पूंजी भी चली जाती है। यह उपदेश नहीं है आजमाया हुआ सामाजिक तजुर्बा है आपके काम आ सकता है इसीलिए बता रहा हूं।
आप तो मोहल्लालाइव पर प्रवचन ही शुरू कर दीजिए….मुझे तो जो चाहे समझा दीजिए गुरुजी…..एक यही बाकी रह गया है यहां पर सार्थक लेख के नाम पर…..मेरा कहना ये है कि मोहल्लालाइव में जब ऐसे दिग्गजों की टोली बैठी है तो सिर्फ छीछीलेदर ही क्यों करती है…प्रभाष जोशी जो करना था कर गए, अब अपना समय उनको कैरेक्टर सर्टिफिकेट बांटने में क्सों व्यर्थ कर रहे हैं…..जब आप लोगों को उनके बारे में पता ही है तो जानकारी अपने पास रखिए…..यहां लिख देने से उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला….कुछ अच्छे कामों में मन लगाइए चतुर्वेदी जी एंड सन्स….न ये उपदेश है न आज़माया हुआ तजुर्बा, ये अब तक नहीं सठियाए दिमाग की सलाह है…जो माने उसका भी भला, जो न मानें उसका भी….अब मेरी तरफ से कोई शिकायत-पत्र नहीं….जितना कहना था कह लिया…कीचड़ में मुंह मारता रहूंगा तो खुद भी गंदा हो जाऊंगा….इतना पानी कहां है मुंह धोने को…..आप गरियाते रहिए जिसको चाहे…धन्यवाद
aur agar aapne wo sampadkiye likha hi nahin tha to bees sal bad ‘mera mul jhagda’ kahte huye ‘safai’ kyoN !!??? aur ‘safai’ bhi aisi ki jisme aapke asli vichar chhalak-chhalak ja rahe hain.
भाई मजा आ गया पुनीत…ये जगदीश्वर जी नाम का लेखक कुछ ज्यादा ही छनक-छनक करता है…सबको मुर्ख और खुद को दुनिया का सबसे बुद्धिमान आदमी समझता है…जब देखो तब भाषण…सही कहा तुमने ये कीचड़ ही है…और सच पूछो तो जगदीश्वर जैसे लोगो ने ही नेट को अपने दिमाग का कचरा उडेलने का स्थान बना दिया है…
कितना रोचक है भाई कि कोई आलोक तोमर के पक्ष में भी खड़ा हो सकता है! परन्तु किसी से भी उन सवालों आरोपण के जवाब नहीं आ रहे हैं जो अविनाश ने उठाये हैंI आलोक तोमर से भी नहीं पांच लाख की कार गंभीर आरोप हैI शर्मा ने बाबरी विध्वंस की जो रिपोर्टिंग की थी उसे फिर से पढ़ लें तो कार और कार सेवक दोनों समझ में आ जायेंगे आपकोI प्रभाष जोशी ने हाल ही में अपने चेलों से मिले उपहारों पर कागद कारे कालम में इतना लम्बा चौडा लिखा था उसमें कार का उल्लेख क्यों नहीं किया? बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी…
धन्यवाद संतकुमार जी,
ये और इनके जैसे कई स्वनामधन्य चतुर्वेदी जी मोहल्ला के हर लेख में चेहरा बदल-बदल कर मिल जाएंगे…..ब्लॉग जगत को इनसे सावधान रहने की ज़रूरत है,,,,,,,,
अरे भाई जगदीश्वर चतुर्वेदी के पास कुछ काम नहीं है क्या? खुद को प्रोफ़ेसर बताने वाले ये छात्रों को क्या पढ़ाते होंगे, जब दिन भर नेट से ही चिपके रहते हैं। इतना बड़ा लिक्खाड़ मैंने नहीं देखा। कमेंट पर भी कमेंट इस तरह से करते हैं, मानों कोई शोध ग्रंथ लिख रहे हों। इस वायरस को ब्लॉगिंग से हटाइए प्लीज़।
अरे ये वही जगदीश्वर चतुर्वेदी तो नहीं जो पत्रकारिता पर बड़े-बड़े पोथे लिखे हैं। सुधा सिंह के साथ भी एक-दो कि़ताबें संपादित की हैं! जानता हूं इन्हें… डीयू के एम.ए (हिंदी) के पत्रकारिता वाले सिलेबस में ये रिकमंडेड हैं। बहुत बकवास लिखते हैं… कोई नहीं, कोई नहीं… चलेगा यहां भी।
जगदीश्वर अझेल हैं। क्या बोलकर शुरू करता है और क्या बोलकर खत्म करता है, उसे खुद भी नहीं मालूम। इसने २४० वर्ड का एक सैंटेंस नेट पर लिखा था, वर्ल्ड रिकॉर्ड होगा। स्टूडेंट्स को कैसी भाषा पढ़ाता होगा पता नहीं। नामवर की कृपा से नौकरी मिली होगी, उन्हीं के गाता है।
आवाराभाई और कुंदन जी,यह बायरस जाने वाला नहीं है। नेट पर जो सचमुच में ‘अझेल’ हैं।उनकी दवा ‘अझेल’ ही है। किसी का कृपापात्र नहीं हूं। आपने सिर्फ कृपापात्र देखे हैं,कृपापात्र गूंगे,बहरे और लिखने में असशक्त होते हैं। हिंदी में भरे पडे हैं। अब थोडा बरस दूसरों को भी देखो और आनंद लो, आपने सही पहचाना है, मैं करूं क्या नाम वही है जो आपने पहचाना है,काम भी वही है जो आपने पहचाना है, फर्क एक है मैंने किताबें लिखी हैं, पोथे वाला कोई और होगा,मेरे पास नेट पर बैठने का पूरा समय होता है। क्योंकि आप जैसे अच्छे लोगों से संवाद जो करना होता है,कक्षा के समय नेट पर नही कक्षा में होता हूं।
लगता है इन प्रोफ़ेसर के मुकाबले सुधीश पचौरी को ब्लांगिंग पर लाना ही होगा (वो भी ‘लिखनेÓ के लिए लिखते हैं) कोई माई का लाल है जो समझे इनके लिखे का। मत हटिए महराज!!! चिपके रहिए वायरस बनकर लेकिन बड़े शक्तिशाली एंटीवायरस आ गए हैं बाज़ार में… समझे रहिएगा!!! ….
रही बात कृपापात्र की तो यह शब्द आपकी डिक्शनरी में होगा। तेल लेने गया कृपाकर्ता और कृपापात्र।
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