आलोक तोमर को छोड़ो, प्रभाष जोशी पर बात करो

♦ अविनाश

हमें जो तथ्‍य बताये गये थे और जो हमने आलोक तोमर के बारे में लिखा, आलोक जी के मुताबिक़ ज़्यादातर तथ्‍यहीन हैं। उन्होंने हमें फोन करके विनम्र भाव से बताया कि उन्‍हें जनसत्ता से डिसमिस नहीं किया गया था। बल्कि उन्‍होंने इस्‍तीफा दिया था और विदा पत्र पर प्रभाष जी ने उन्‍हें जनसत्ता का एसेट बताया था। न ही अपनी पुरानी कंपनी का चेक उन्‍होंने अपने खाते में जमा कराया था। इस बारे में नीचे कमेंट बॉक्‍स में भगत सिंह रावत ने एक स्‍पष्‍टीकरण भी दिया है। और भी मुद्दों पर बात हुई और उन्‍होंने साफ़ किया कि अब वे अपनी तरफ से इस प्रकरण में कुछ भी नहीं लिखेंगे। बहरहाल, हमारे इनबॉक्‍स में पड़े कुछ पुराने पत्र थे, जो इस वक्‍त प्रासंगिक हैं। हम यहां उन्‍हें सिलसिलेवार छाप रहे हैं : मॉडरेटर

from : ALOK TOMAR IN DELHI
23/04/2007

Dear Friends,
A friend forwarded the massage about me, which concerned person was so afraid to send me. Well since it is now the court case, I will not say much but Mr. Vijay Dixit is in the habit of filing bogus cases against people after deceiving them, same happened with Ambeek Khemka, who incidentally was never an employee of him, nor was I.

The sender of the mail was so scared to talk about the case against Vijay Dixit.Why? Because perhaps he has no defence. Ask Mr Hanif Qureshi, SSP Gurgaon, about the case and feel free to get the truth. I am offering my phone record to anyone who cares to show that how many times Vijay Dixit called me and I returned the calls, even after filing the charge sheet. Read the charge sheet carefully and tou will get the truth. This is another blackmailing style of a wanted man and shows his desperation. I am just enclosing one “settlement draft” sent by email by none other then Mr Vijay Dixit’s advocate. Please read on…

regards,
Alok Tomar

from : editor@seniorindia.in
23/04/2007

Prees

Dear Sir,
This has reference to the mail sent by Alok Tomar, Our Ex. Employee booked, arrested and charge sheeted by Delhi Police U / S420 / 468 / 471 / 120-B IPC.

We are nether Shocked nor surprised that Alok Tomar who was arrested by special cell of delhi police and sent to Tihar Jail, has now chosen to indulge in such nefarious activities and malign the image of our Hon. Chairman Mr. Vijay Dixit and wife Kalpana Dixit. In fact this act of Alok Tomar has only re exposed the real character or you can say the true colors of his character. We are placing here the text of the charge sheet filed against Mr Tomar by Delhi Police in a Delhi Court. The Charge sheet is self explanatory. The Case is going to open on 4th may 2007.

So far Mr Ambik Khemka is concerned, it may please be noted that he is an Ex – Employee of Senior Builders Ltd., owned by Mr. Dixit.

A Police Complaint was lodged with local Police Stations by senior Builders Ltd. against Mr. Khemka for cheating and forgery much before the said F.I.R was lodged by Mr. Khemka with Haryana Police. The matter is under investigation and sub juiced. Another case of cheating and forgery has been lodged against Mr. Khemka with Ghaziabad Police by one Mr. Biresh. The Ghaziabad Police has Filed Charge sheet in the case against Mr. Khemka in the court.

This is absolutely wrong to say that Mr. Dixit is hiding in Five Star Hotel under some one else’s name. This concocted allegation attracts legal action.

In fact Alok Tomar is spreading such canard to black mail the company because he is scared of the case.

Thanks.
Editor
Senior Media Ltd
New Delhi

avinash article frontहालांकि वो शीर्षक डेरोगेटरी था, बंदर के हाथ में बिहार – लेकिन तर्ज वही लेकर अगर आलोक तोमर जैसों के लिए अपराधी के हाथ में अख़बार जैसी भाषा का इस्‍तेमाल किया जाए, तो ये ठीक ही होगा। ये ऐसे कलंकित शख्‍स हैं, जिन्‍हें जनसत्ता से डिसमिस किया गया था। सांप्रदायिक संपादकीय व्‍यवहार के लिए तिहाड़ जेल का चक्‍कर काटने वाला और अपनी कंपनी का चेक फ़र्ज़ी तरीक़े से अपने अकाउंट में जमा करने की कारीगरी के चलते मुक़दमे के चक्‍कर में फंसा रहने वाला शातिर इंसान आज विचार के मैदान में ज़ोर-आज़माइश कर रहा है – यह एक प्रहसन ही है। अपनी कई रिपोर्टों के चलते जनसत्ता की साख गिराने वाला और अटल वाणी में अपनी दलाल कलम से शब्‍द भरने वाला यही वो पत्रकार है, जिसे वक्‍़त खारिज़ कर चुका है। लेकिन फिर भी जो दुर्योधन की तरह वक्‍त के सिरहाने बैठ कर खुद को प्रासंगिक मानने की ज़‍िद ठाने हुए है। बात इनकी क़तई नहीं करनी है, क्‍योंकि इनका वो भाव ही नहीं है।

हम प्रभाष जोशी पर ही बात करें। प्रभाष जोशी हिंदी पत्रकारिता के देवता क्‍यों हैं? वे 92 के बाद भारत की अधिसंख्‍य जनता के पक्ष की ऐसी मुखर आवाज़ रहे, जो इस देश को कट्टरता की गर्त में जाते नहीं देखना चाहता। लोग कुछ भी कहें, हम किसी अंतर्कथा में नहीं जाना चाहते कि छह दिसंबर 1992 के बाद ही प्रभाष जोशी की आत्‍मा कैसे पलटी। उस एक हादसे के लिए उन्‍होंने संघ और बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया था, लगभग चीख़ कर, लिहाज़ा वे देवता बनाये गये। इस बनने में उनके वे अवदान भी गिने जा सकते हैं, जो उन्‍होंने भाषा में देसी खुशबू मिलाने के स्‍तर पर किये और देश के ज़्यादातर मानवाधिकार आंदोलनों में अपनी सहभागिता दिखा कर किये। हालांकि…

प्रभाष जोशी देवता नहीं हैं। वे एक चतुर सुजान हैं, जो जानता है कि कब क्‍या करने से लाभ की गठरी सरक कर उनके पास आएगी। वे अपनी जन-छवि बनाने के लिए आंदोलनों का इस्‍तेमाल करते हैं और कांग्रेस की कतार में खड़े होने के लिए भाजपा-आरएसएस पर कठोर कागद कारे लिखते हैं। 84 के जून में ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार के दौरान जब सेना के जवानों ने स्‍वर्ण मंदिर पर कब्‍जा कर लिया था, तो इन्‍हीं प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में अपने लिखे संपादकीय का हेडिंग लगाया था – सत श्री अकाल, जनरल दयाल। यह उस सांप्रदायिक और ज़हरीले संपादक का कारनामा था, जिस संपादक को आज सिद्ध और प्रसिद्ध बताया जा रहा है। जिन अभियान के लिए आज कांग्रेस माफी मांगती फिरती है, उसी अभ‍ियान के दौरान दिये गये इस संपादकीय हेडिंग के लिए क्‍या प्रभाष जोशी ने कभी माफ़ी मांगी? क्‍यों भई, आप देवता हैं क्‍या? अगर आपको उस शीर्षक पर गर्व है, तो आपको तो सज़ा होनी चाहिए।

प्रभाष जोशी को सज़ा इसलिए भी होनी चाहिए कि वे अख़बारों से ख़बरों के काले धंधे में जवाब तलब करने की नैतिकता बघारने के शोरगुल में अपने धतकर्मों का हिसाब भूल रहे हैं। पिछले जन्‍मदिन पर ही उनके चहेते टीवी पत्रकार हेमंत शर्मा ने उन्‍हें करीब पांच लाख की कार भेंट की। आपने उससे क्‍यों नहीं पूछा कि भई, ये इतना महंगा गिफ्ट क्‍यों? आप मायावती के जन्‍मदिन पर चंदा वसूली को जनविरोधी हरकत बताते हैं और अपने जन्‍मदिन पर इतना महंगा तोहफा लेने से कतराते तक नहीं हैं? आपने उससे क्‍यों नहीं पूछा कि हेमंत तुम्‍हारे पास पांच लाख रुपये कहां से आये? जहां से भी आये, अगर वो धन काला है, तो उसे मेरी सफेद कमीज़ पर क्‍यों उंड़ेल रहे हो? नहीं, आप नहीं पूछेंगे – क्‍योंकि आप पूछना नहीं चाहते। हेमंत से ऐसा सवाल पूछने में आपका लाभ नहीं है।

रामबहादुर राय तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्‍ठभूमि से आते हैं। सादगी पसंद इंसान हैं। आपका उनके प्रति स्‍नेह एक ईमानदार शख्सियत को चाहने की श्रेणी में हम रख सकते हैं, लेकिन उनके वैचारिक संगठनों में आपकी आवाजाही को हम किस नज़रिये से देखें? आपका वसुंधरा के मेवाड़ ट्रस्‍ट में आना-जाना क्‍यों है, जो कि घोषित तौर पर एक दक्षिणपंथी ट्रस्‍ट है? आपके जन्‍मदिन पर गोविंदाचार्य क्‍यों बुलाये जाते हैं?

बहुत बातें हैं प्रभाष जी, जो आपसे बार-बार पूछे जाते हैं और आप हर बार चुप लगा जाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे ख़बरों के धंधे में आपके जवाब तलब करने पर आरोपी अख़बार ख़ामोश रह जाते हैं। आपको इससे दुखी नहीं होना चाहिए, क्‍योंकि आपका आचरण भी इन अख़बारों से अलग नहीं है।

क्‍या पटना के बुद्धिजीवी गूंगे बहरे हैं?

nandigram diaryअब एक दूसरी सूचना पर आते हैं कि कैसे पत्रकारिता के इस देवता की वामपंथ के सक्रिय कार्यकर्ता, नेता, बुद्धिजीवी इन दिनों आरती उतार रहे हैं। इन दिनों प्रभाष जोशी नंदीग्राम पर किताब लिखने वाले लेखक पुष्‍पराज की ब्रांडिंग में लगे हुए हैं। पिछले दिनों दिल्‍ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में उन्‍होंने इस किताब का लोकार्पण किया। कल पटना में भी उन्‍होंने इसी किताब का लोकार्पण किया। इन दिनों चलन ये है कि एक किताब कई-कई बार लोक‍ार्पित की जाती है और प्रभाष जोशियों को कई-कई बार भाषण देने का मौक़ा मिल जाता है। पटना में लगभग सभी को पता है कि प्रभाष जोशी ने अपनी ब्राह्मण वाणी से इन दिनों कैसा कमाल किया हुआ है और धीरे-धीरे इतिहास का हिस्‍सा बन रही सती-प्रथा को उन्‍होंने कैसे ऑक्‍सीजन दे दिया है – इसके बावजूद किसी ने उनसे कोई सवाल नहीं किया। बल्कि जो एक सीपीएम के सिंपैथाइज़र ने पार्टी की लाइन के विपरीत लोकार्पण समारोह के लिए पोस्‍टर बनाने में मदद की और सीपीएम समर्थित जनवादी लेखक संघ के सदस्‍य-कवि आलोकधन्‍वा ने प्रभाष जोशी के साथ मंच शेयर किया। मंच पर सीपीआई के नेता और नामवर जी के प्रिय आलोचक खगेंद्र ठाकुर भी मौजूद थे। लोग तब भी खामोश रहे, जब प्रभाष जोशी ने अपने लंबे वक्‍तव्‍य का उत्तरार्द्ध कुछ इस तरह किया कि मैं प्रभाष जोशी, सतीप्रथा समर्थक, अपनी बात समाप्‍त कर रहा हूं।

ऐसे में हम सवाल करें तो क्‍या ग़लत होगा कि क्‍या पटना के बुद्धिजीवी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गूंगे और बहरे हैं?

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