काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण…

♦ पंकज नारायण

P1paintपंकज नारायण फेसबुक पर मिले। उस भीड़ में जहां लोग दिमाग़ के शोर को सुकून के साथ लाइनों में ढालते हैं और एक साझा दीवार पर चस्‍पां कर जाते हैं। पंकज की एक अदद मुस्‍कराती तस्‍वीर के साथ कुछ वाक्‍य सामने से गुज़रते हैं, तो बेचैन कर जाते हैं। बाग़-बाग़ कर जाते हैं। बदहवास कर जाते हैं। अच्‍छी राइट‍िंग और अच्‍छे कोट्स के लिए तरसाने वाले इस समय में पंकज की फेसबुकिया लाइनें जेठ में रिमझिम फुहार की तरह लगती हैं। भीगते हुए हमने मोहल्‍ला लाइव के पाठकों को भी उनकी लाइनें पढ़ाने-सुनाने की गुज़ारिश की, उन्‍होंने हां कह दिया। ये यूं ही लिखी गयी लाइनें नहीं हैं। इनके पीछे संवेदना की पवित्र नदी बह रही है, जिस पर एक पुल है – जो हमें उस बस्‍ती में ले जाता है, जहां काफ्का हैं, रिल्‍के हैं, निर्मल वर्मा हैं, वे सब हैं, जिनकी अमर पंक्तियां पीढियों को तराशती आ रही हैं : मॉडरेटर

फूलों की भाषा

कोई मुझे चुभता भी है तो उसे खुशबुओं से नहला देता हूं। अपनी आदत रही है कांटों से भी फूलों की भाषा में बात करना। लोग कहते हैं कि दुनिया में रहते हो तो इसके आईने में अपना मुंह देखना सीखो। अरे भाई, कोई मुझे बताएगा कि जिस भाषा को अपनी आत्मा मानता हूं उसे… सिर्फ अपना मुंह देखने के लिए भटकने दूं…? बिलकुल नहीं… मेरे पास एक ही भाषा है – फूलों की भाषा और उसी में बात करूंगा…

मन का गांव

मन में एक गांव है, मानता ही नहीं। अपने आप को कहीं भी बिछा देता है। लगा देता है कहीं भी अपनी चौपाल। चेहरों में काका, भइया, काकी, दादी, नानी सब ढूंढना चाहता है। ठीक उसी समय ‘शहर का दिमाग’ याद दिलाता है कि – बेटा, जब चेहरे कार के शीशे की तरह उतरते हैं और उनके पीछे से दूसरा चेहरा बोलता है तो उससे इतना आसान नहीं होता रिश्ता कायम करना। फिर भी परायेपन को जीते हुए कोई गाली भी देता है, तो अपना-सा लगता है।

असली गंगा

हमारी दादियां पहले घर में पैर पटकती रहीं और अपने मनपसंद दादाओं से नहीं मिल पायीं। उनकी पोतियां लैपटॉप पर उंगलियां पटक कर अपनी पसंद के लिए मन बनाती हैं। गंगा पानी से ज्यादा धार में रहती हैं… लेकिन हमारी आदत रही है उसकी पवित्रता बोतलों में सहेजने या कैद करने की। यह सच है कि गंगा बहती हुई ज्यादा पवित्र है, हमारी बोतलों के गंगाजल से। ज़माना आदतों के साथ बदलता है… यह ज़रूरी भी है…

धूप के टुकड़े

धूप के टुकड़े पकड़ कर एक दूसरे के चेहरे पर फेंकना, आसमान के दूसरे सिरे तक जाने के लिए दौड़ना… साथी, क्या हम फिर से उन सपनों तक नहीं पहुंच सकते, जहां लोन कन्याओं की स्कीम न पहुंच पाये। सारे बैंक खाली होने के बाद भी हमारी हथेली को वह धूप का टुकड़ा नहीं दे सकते, जिससे तुम्हारे चेहरे पर थोड़ी रौनक मल सकूं। बचपन के नासमझ सपनों ने हमें दौड़ना सिखाया… अब हमारे समझदार सपने भागना सिखा रहे हैं।

नया रास्ता

हम हवाओं पर चलना सीख रहे हैं। इसका यह मतलब नहीं कि हम उन चालू लोगों से हार गये, जो हमारे पांव के नीचे की ज़मीन भी छीन लेना चाहते हैं। हमें तो बस यह दिखाना है कि जैसे किसी प्रतिभा को एक मौका चाहिए, ठीक उसी तरह हर मौके को एक अच्छी प्रतिभा चाहिए। तो तय रहा कोई मौका हमें पैदा नहीं करेगा… हम मौके पैदा करेंगे… अपना स्पेस खुद बनाएंगे…

देखने का स्टाइल

किसी आदमी को ऐसे देखता हूं जैसे कोई हार्डवेयर इंजीनियर कंप्‍यूटर को देखता है। औरत को ऐसे देखता हूं जैसे वह दिखना चाहती है। बच्चे को कुछ इस तरह जैसे सुबह जल्दी उठकर चिड़िया प्रकृति को देखती है और निकल पड़ती है उससे अपना रिश्ता पक्का करने… और हर बूढ़ा आदमी मुझे उस घोंसले की तरह दिखता है, जिसमें शाम ढलते ही थके-हारे परिंदे लौटते हैं…

एक कदम और

बार-बार हारना भी तब तक जीत है, जब तक एक बार हम हार मान न लें। एक बार फिर से उठने की ज़िद, एक कदम और चलने का साहस और बार-बार हौसलों को समटने का जुनून… यही सब तो है जो हर बार आंखों को एक साफ आवाज़ देता है – जीत अभी बाकी है मेरे दोस्त… हर हार के बाद… हर जीत के बाद… एक कदम और…

फिर ज़‍िंदगी

ज़रूरी नहीं कि जीने के लिए ज़िदगी को गिरवी रख दिया जाए। उदास मौसम के लिए हंसी को नीलाम कर दिया जाए। जब हम जानते हैं कि ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना। जब हमें मालूम है कि ज़‍िंदगी के टुकड़ों को चुनने के लिए लड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं है… तो चलिए दोनों हाथ उठा कर सूरज से नज़रें मिला लें… कहीं से तो शुरू करना पड़ेगा न…

नींद का धोखा

कल रात मुझे फिर नींद नहीं आयी। इस नींद ने मुझे कई रात धोखा दिया… लेकिन मैंने रातों को कभी धोखा नहीं दिया और खूब सपने देखे… जागते रहने के सपने… आज फिर वही इरादा है… रात फिर मुझे नहीं सोने देगी… अच्छा है…

कृष्णाष्‍टमी पर

बेचारा नफरत छोटी उमर लेकर आता है, कुछ ही दिनों में ख़त्म हो जाता है और प्यार सदियों तक ज़िंदा रहता है। इसे नया-ताज़ा बनाये रखने के लिए ज़रूरी है इसके होने का उत्सव मनाना। और इसीलिए तमाम राधाओं, मीराओं, कृष्णों और गोपियों को मेरी ओर से कृष्ण जन्माष्‍टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। अपने होने का जश्न मनाते हुए…

दुनिया देखने की तैयारी

अपना चेहरा शीशे में देखते हुए कितना साफ होता है हमारा मन। उस समय हम दुनिया के सबसे खूबसूरत इंसान के सामने होते हैं। उसी साफ मन से हर चेहरे में इक आईना देखें तो एक दिन में ढेर सारे खूबसूरत इंसानों से हमारा मिलना होगा। हर दूसरे चेहरे को हम ऐसे देख पाएंगे, जैसे पहली बार दुनिया देख रहे हों। दुनिया में न जाने कितने चेहरे देखे, अब बारी है एक-एक चेहरे में दुनिया देखने की। पूरे होशो-हवास से पहली बार दुनिया देखने की तैयारी में…

एक प्यारी दोस्त

मेरे बचपन की प्यारी दोस्त गरीबी। अभी भी समय-समय पर साथ रहने आ जाती है। मैं उसे भी पूरा प्यार देता हूं। जब मेरे पास से जाने लगती है तब उसे डांटता हूं – देखो, मेरे पास आ कर रहने लगती हो तो कोई बात नहीं। मेरे दोस्तों के घर मत जाना वरना टांगें तोड़ दूंगा। फिर वह मेरी अमीरी पर मुस्कुराती है… वैसे मेरी यह दोस्त सबके पास जाती है, लेकिन टिकती उसी के पास है, जो इससे नफरत करता है…

अपनी दुकान

कुछ लोगों ने मुझे नफ़रत देने की कोशिश की। उन्‍हें 30 प्रतिशत अतिरिक्त प्यार मिला। कुछ लोगों ने मुझे प्यार दिया। उन्हे 100 प्रतिशत अतिरिक्त प्यार मिला। नफरत करने वालों ने अपनी चीज़ वापस मांगी। कहां से देता मैं… मेरे स्टॉक में तो सिर्फ प्यार भरा है। इस तर…ह मेरा स्वभाव मेरी समझदारी से हमेशा जीतता रहा। एक ही एक्सचेंज आफर है मेरे पास – प्यार के बदले प्यार… नफरत के बदले भी प्यार। सौदा मंजूर है तो ठीक वरना दूसरी दुकान देखो…

मूड ऑफ

आज कुछ कहने का मन नहीं हो रहा। ऐसा जब-जब होता है तो लगता है अपनी ही ऊंचाइयों से फिसल कर धड़ाम से नीचे आ गया और अपने लिए धरती ढूढ़ रहा हूं। आसान नहीं होता अपनी खामोशियों की ऊंची दीवारों में कैद हो जाना। कुछ बोलूं न बोलूं आंखों से साफ आवाज़ निकलती है…

मेरी ताकत

मेरे पास दो ताकत है। पहली कि मैं शेर के मुंह से मांस की बोटी निकाल सकता हूं और दूसरी ताकत कि मैं शाकाहारी हूं।

प्राथनाओं की दुनिया

आंखें जब साफ आवाज़ में बात करती हैं, तब आदमी कितना मासूम दिखता है। कुछ आंखों की साफ आवाज़ों से मैंने अपनी दोनों मुट्ठियां भरी। पहली खोली तो एक चेहरा निकला। दूसरी खोली तो रौनक। दोनों हथलियों को मिला कर, इसे प्रार्थना का नाम दिया… और प्रार्थनाओं ने मुझे… रौनक भरे चेहरों से सजी इक मासूम दुनिया दी, इसीलिए ज़्यादा समझदार नहीं होना चाहता। ज़्यादा समझदारी मासूमियत को निगल जाती है…

अनकहा

आदमी जितना कहता है, उससे ज्यादा नहीं कहता है। अनकहा जब आपके अंदर तोड़-फोड़ मचाने लगे तो आपकी चुप्पी को भी एक रचनात्मक स्पेस की ज़रूरत पड़ती है, जहां वह साफ चेहरे की तरह दिखे।

ताजमहल देख कर लौटने के बाद

मुहब्बत की जुबां सदियों तक बात करती है… पिछली सदी की खूबसूरत याद को दोनों हथेली पर रख कर अपनी आंखों में नूर भर लेने की ख्वाहिश बचपन से थी, इसीलिए पिछले रविवार ताजमहल देखने गया। सोचा था शाहजहां के इतिहास से थोड़ी रौनक अपनी आंखों के लिए चुरा लूंगा… लेकिन सुंदर नक्काशियों से निकले अजनबी हाथों ने मुझे चोरी करते पकड़ लिया। कहने लगे यह हमारी मुहब्बत है, किसी बादशाह की शान नहीं कि सदियां बदलते ही तुम लपक लोगे..

कंधों का इस्तेमाल

कुछ लोग कंधों का इस्तेमाल सीढ़‍ियों की तरह करते हैं, यह जानते हुए कि कंधों पर हाथ रखा जाना चाहिए, पैर नहीं। एक दिन वही मज़बूत कंधा जब झुक जाता है, तो उंचाइयों से लुढ़कना समझ में आता है। दावे से कह सकता हूं, दावे से कह सकता हूं कि कंधे जब अवसरवाद की भेंट चढ़ते हैं, तो सीढ़‍ियां बन जाते हैं और जब उमर भर एक-दूसरे का साथ देते हैं, तो एक और एक ग्यारह होता है। आपको मज़ा आएगा, किसी झुके हुए कंधे पर हाथ रख कर यह गणित समझने की कोशिश करते हुए…

लोहा गायब… केवल धार

कुछ लोगों ने अपनी धार तेज़ करना शुरु किया। इतनी धार लगायी कि बस धार ही रह गयी, लोहा ख़त्म हो गया। अब अपनी केवल धार लेकर एक-दूसरे से ही लोहा ले रहे हैं…

अपने एक खास दोस्त के लिए

यह आवाज़ जो तुम्‍हें साफ-साफ सुनाई दे रही है, इसे तुम्हारे शोर पर अपनी खामोशियों को रगड़-रगड़ कर मैंने पैदा किया है। अब मैं इसे पाल-पोसकर बड़ा करना चाहता हूं… क्या तुम मेरा साथ दोगे… शायद नहीं क्योंकि इसी शोर ने तुम्‍हें पैदा किया है… लेकिन याद रखना दोस्त खामोशी भी कभी-कभी शोर को निगल जाती है…

मदर्स डे पर

अपने होने के आगे फुल स्टॉप, कॉमा या प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने से पहले तुम्हारी याद आती है मां। सोचता हूं कि मेरा होना तुम्हारी आंखों के किस सपने की हकीकत है। नौ महीने में सोचा गया कौन सा वाक्य हूं मैं। मां कभी मेरी कविता में आओ। शायद वहीं भूल आयी हो अपना आंचल, जिससे अकसर लिपटा रहता हूं। सच कहूं आज मदर्स डे नहीं भी होता तो तुम्हारी बहुत याद आती…

एक बूढ़े आदमी का इंटरव्यू

मैंने अपनी ज़िंदगी का ब्रेकिंग न्यूज़ ढूंढ रहे एक बूढ़े आदमी का इंटरव्यू लिया। उनका कहना था – बेचैनी भाग रही है मेरे पीछे डिस्कवरी चैनल के शेर की तरह और रिमोट से खेलते हुए लगातार बड़े हो रहे हैं। कुछ बच्चे तो इतने बड़े हो गये कि भूल गये कि कितने नंबर पर आता है कौन सा चैनल… और मेरे अपने बच्चे तो रिमोट से खेलते ही नहीं, रिमोट उनसे खेलता है। वे तो बस बदल जाते हैं चैनलों की तरह…

समय की आवाज़

अपनी आवाज़ पहन कर निकलता है समय। हमें दिखाई नहीं देता, लेकिन इसे एकांत में सुन सकते हैं हम। और एक बात कहूं – समय-समय पर समय बन कर समय जिसको मारता है, एक दिन वही समय पर समय को ललकारता है।

दिल्ली की गर्मी में

मौसम इतना गरम हो चुका है कि मेरे ठंढ़े दिमाग का सारा बर्फ पिघल कर आंखों में आने लगा है। इससे पहले कि मेरा गीला चेहरा पन्नों पर उतर आये, मैं अपने हवादार जंगल में सुस्‍ता रहा हूं। उसी जंगल से एक शेर निकला है। इसे अपने दोस्तों के हवाले करता करता हूं –

अपनी ख्वाहिशों को संभाले हुए।
तेरी ज़‍िंदगी के हवाले हुए।
दिल की बस्ती में थोड़ी जगह चाहिए,
हम परिंदे हैं घर से निकाले हुए।

एक सवाल

धीरे-धीरे खिसकते दिमाग़ों को देख कर लगता है, तापमान सचमुच ज़्यादा है। गरम होते आदमियों और ठंढे होते इंसानों में गांधी और माओ को ठीक-ठीक बांटने निकले अक्लमंदों से एक सवाल तो पूछना ही चाहिए कि कोई भी सोच आतंक बनने से पहले किन रास्तों से गुज़रती है। समझना तो यह भी पड़ेगा कि युद्ध और शांति के बीच कौन सी उंगलियां फंसी हैं…

सच का सामना

बचपन में एक दोस्त मिला झूठ। इसने मम्मी, पापा और स्कूल में टीचर से हमें बचाया। आगे चल कर सबको प्रभावित करने से लेकर बॉस से बचाने तक में यह अपना पक्का साथी बन गया। बचने की आदत ने कमज़ोर बना दिया। एक दिन ऐसा आया, जब यह दोस्त मुझे नहीं बचा पाया। तब किसी ने हौले से कांधे पर हाथ रख कर कहा – दोस्त मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं सच हूं। भांड़ में जाए बचपन का दोस्त… अब तो मुझे असली दोस्त का ही साथ चाहिए।

खबर – चार लड़कों ने एक लड़की को ज़िंदा जलाया

पहले ख़बरों में आयी एक लड़की, फिर मेरे सपने में। चार लड़के उसे छेड़ रहे थे… केरोसिन छिड़क कर उसे जला रहे थे। अंदर तक झुलस जाने के बाद रात भर सोचता रहा कि सदियों की गांठें ढीली करने में और कितनी उंगलियां टूटेंगी। मां-बहन के मुहावरों से निकल कर लड़कियां जब सड़कों पर होती हैं तो कुछ आंखों में घास उग आते हैं। तब कितना बदल जाता है हरियाली का मतलब। कहां है… नैतिकता के ठेकेदारों की किताबों के फटे पन्ने…

हाथ की लकीरें

अपने लिए कुछ पंक्तियां लिखी थीं, जो आज तक हर कदम पर मेरे साथ चल रही हैं – जब भी / हाथों की लकीरें / देने लगे तुम्हें चुनौती / मुट्ठी बांध के आगे बढ़ो / क्योंकि / मुट्ठी के कसने से ही / लकीरें बदलती हैं। इन मुट्ठियों को तबसे कस रहा हूं, जबसे लकीरों को गिरफ्त में लेने का हौसला हुआ। कभी- कभी कसी हुई मुट्ठी खोल कर देखता हूं, तो पसीने से तर-बतर हज़ारों-लाखों चेहरे दिखाई देते हैं, जो अपनी मुट्ठियां कस रहे हैं।

और अंत में

मुझे तलाश है उन शब्दों की जो दिमाग में एक नयी सुबह खोल दे और दिल को एक ख़ूबसूरत शाम दे, जिससे मैं अकेले में बात कर सकूं…एक गहरा कुआं खोदने की ताकत रखने वाले शब्दों की खोज में हूं क्योंकि बोर हो गया हूं सूखती हुई आंखों और सख्त हो चुके दिलों से…

पंकज नारायण के बारे में और अधिक जानकारी इस लिंक के ज़रिये मिल सकती है : एक लड़का प्रेमाकुल सा

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