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काग़ज़ पर काफ़्का… फेसबुक पर पंकज नारायण…

31 August 2009 17 Comments

♦ पंकज नारायण

P1paintपंकज नारायण फेसबुक पर मिले। उस भीड़ में जहां लोग दिमाग़ के शोर को सुकून के साथ लाइनों में ढालते हैं और एक साझा दीवार पर चस्‍पां कर जाते हैं। पंकज की एक अदद मुस्‍कराती तस्‍वीर के साथ कुछ वाक्‍य सामने से गुज़रते हैं, तो बेचैन कर जाते हैं। बाग़-बाग़ कर जाते हैं। बदहवास कर जाते हैं। अच्‍छी राइट‍िंग और अच्‍छे कोट्स के लिए तरसाने वाले इस समय में पंकज की फेसबुकिया लाइनें जेठ में रिमझिम फुहार की तरह लगती हैं। भीगते हुए हमने मोहल्‍ला लाइव के पाठकों को भी उनकी लाइनें पढ़ाने-सुनाने की गुज़ारिश की, उन्‍होंने हां कह दिया। ये यूं ही लिखी गयी लाइनें नहीं हैं। इनके पीछे संवेदना की पवित्र नदी बह रही है, जिस पर एक पुल है – जो हमें उस बस्‍ती में ले जाता है, जहां काफ्का हैं, रिल्‍के हैं, निर्मल वर्मा हैं, वे सब हैं, जिनकी अमर पंक्तियां पीढियों को तराशती आ रही हैं : मॉडरेटर

फूलों की भाषा

कोई मुझे चुभता भी है तो उसे खुशबुओं से नहला देता हूं। अपनी आदत रही है कांटों से भी फूलों की भाषा में बात करना। लोग कहते हैं कि दुनिया में रहते हो तो इसके आईने में अपना मुंह देखना सीखो। अरे भाई, कोई मुझे बताएगा कि जिस भाषा को अपनी आत्मा मानता हूं उसे… सिर्फ अपना मुंह देखने के लिए भटकने दूं…? बिलकुल नहीं… मेरे पास एक ही भाषा है – फूलों की भाषा और उसी में बात करूंगा…

मन का गांव

मन में एक गांव है, मानता ही नहीं। अपने आप को कहीं भी बिछा देता है। लगा देता है कहीं भी अपनी चौपाल। चेहरों में काका, भइया, काकी, दादी, नानी सब ढूंढना चाहता है। ठीक उसी समय ‘शहर का दिमाग’ याद दिलाता है कि – बेटा, जब चेहरे कार के शीशे की तरह उतरते हैं और उनके पीछे से दूसरा चेहरा बोलता है तो उससे इतना आसान नहीं होता रिश्ता कायम करना। फिर भी परायेपन को जीते हुए कोई गाली भी देता है, तो अपना-सा लगता है।

असली गंगा

हमारी दादियां पहले घर में पैर पटकती रहीं और अपने मनपसंद दादाओं से नहीं मिल पायीं। उनकी पोतियां लैपटॉप पर उंगलियां पटक कर अपनी पसंद के लिए मन बनाती हैं। गंगा पानी से ज्यादा धार में रहती हैं… लेकिन हमारी आदत रही है उसकी पवित्रता बोतलों में सहेजने या कैद करने की। यह सच है कि गंगा बहती हुई ज्यादा पवित्र है, हमारी बोतलों के गंगाजल से। ज़माना आदतों के साथ बदलता है… यह ज़रूरी भी है…

धूप के टुकड़े

धूप के टुकड़े पकड़ कर एक दूसरे के चेहरे पर फेंकना, आसमान के दूसरे सिरे तक जाने के लिए दौड़ना… साथी, क्या हम फिर से उन सपनों तक नहीं पहुंच सकते, जहां लोन कन्याओं की स्कीम न पहुंच पाये। सारे बैंक खाली होने के बाद भी हमारी हथेली को वह धूप का टुकड़ा नहीं दे सकते, जिससे तुम्हारे चेहरे पर थोड़ी रौनक मल सकूं। बचपन के नासमझ सपनों ने हमें दौड़ना सिखाया… अब हमारे समझदार सपने भागना सिखा रहे हैं।

नया रास्ता

हम हवाओं पर चलना सीख रहे हैं। इसका यह मतलब नहीं कि हम उन चालू लोगों से हार गये, जो हमारे पांव के नीचे की ज़मीन भी छीन लेना चाहते हैं। हमें तो बस यह दिखाना है कि जैसे किसी प्रतिभा को एक मौका चाहिए, ठीक उसी तरह हर मौके को एक अच्छी प्रतिभा चाहिए। तो तय रहा कोई मौका हमें पैदा नहीं करेगा… हम मौके पैदा करेंगे… अपना स्पेस खुद बनाएंगे…

देखने का स्टाइल

किसी आदमी को ऐसे देखता हूं जैसे कोई हार्डवेयर इंजीनियर कंप्‍यूटर को देखता है। औरत को ऐसे देखता हूं जैसे वह दिखना चाहती है। बच्चे को कुछ इस तरह जैसे सुबह जल्दी उठकर चिड़िया प्रकृति को देखती है और निकल पड़ती है उससे अपना रिश्ता पक्का करने… और हर बूढ़ा आदमी मुझे उस घोंसले की तरह दिखता है, जिसमें शाम ढलते ही थके-हारे परिंदे लौटते हैं…

एक कदम और

बार-बार हारना भी तब तक जीत है, जब तक एक बार हम हार मान न लें। एक बार फिर से उठने की ज़िद, एक कदम और चलने का साहस और बार-बार हौसलों को समटने का जुनून… यही सब तो है जो हर बार आंखों को एक साफ आवाज़ देता है – जीत अभी बाकी है मेरे दोस्त… हर हार के बाद… हर जीत के बाद… एक कदम और…

फिर ज़‍िंदगी

ज़रूरी नहीं कि जीने के लिए ज़िदगी को गिरवी रख दिया जाए। उदास मौसम के लिए हंसी को नीलाम कर दिया जाए। जब हम जानते हैं कि ख़तरनाक होता है सपनों का मर जाना। जब हमें मालूम है कि ज़‍िंदगी के टुकड़ों को चुनने के लिए लड़ने के अलावा कोई उपाय नहीं है… तो चलिए दोनों हाथ उठा कर सूरज से नज़रें मिला लें… कहीं से तो शुरू करना पड़ेगा न…

नींद का धोखा

कल रात मुझे फिर नींद नहीं आयी। इस नींद ने मुझे कई रात धोखा दिया… लेकिन मैंने रातों को कभी धोखा नहीं दिया और खूब सपने देखे… जागते रहने के सपने… आज फिर वही इरादा है… रात फिर मुझे नहीं सोने देगी… अच्छा है…

कृष्णाष्‍टमी पर

बेचारा नफरत छोटी उमर लेकर आता है, कुछ ही दिनों में ख़त्म हो जाता है और प्यार सदियों तक ज़िंदा रहता है। इसे नया-ताज़ा बनाये रखने के लिए ज़रूरी है इसके होने का उत्सव मनाना। और इसीलिए तमाम राधाओं, मीराओं, कृष्णों और गोपियों को मेरी ओर से कृष्ण जन्माष्‍टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। अपने होने का जश्न मनाते हुए…

दुनिया देखने की तैयारी

अपना चेहरा शीशे में देखते हुए कितना साफ होता है हमारा मन। उस समय हम दुनिया के सबसे खूबसूरत इंसान के सामने होते हैं। उसी साफ मन से हर चेहरे में इक आईना देखें तो एक दिन में ढेर सारे खूबसूरत इंसानों से हमारा मिलना होगा। हर दूसरे चेहरे को हम ऐसे देख पाएंगे, जैसे पहली बार दुनिया देख रहे हों। दुनिया में न जाने कितने चेहरे देखे, अब बारी है एक-एक चेहरे में दुनिया देखने की। पूरे होशो-हवास से पहली बार दुनिया देखने की तैयारी में…

एक प्यारी दोस्त

मेरे बचपन की प्यारी दोस्त गरीबी। अभी भी समय-समय पर साथ रहने आ जाती है। मैं उसे भी पूरा प्यार देता हूं। जब मेरे पास से जाने लगती है तब उसे डांटता हूं – देखो, मेरे पास आ कर रहने लगती हो तो कोई बात नहीं। मेरे दोस्तों के घर मत जाना वरना टांगें तोड़ दूंगा। फिर वह मेरी अमीरी पर मुस्कुराती है… वैसे मेरी यह दोस्त सबके पास जाती है, लेकिन टिकती उसी के पास है, जो इससे नफरत करता है…

अपनी दुकान

कुछ लोगों ने मुझे नफ़रत देने की कोशिश की। उन्‍हें 30 प्रतिशत अतिरिक्त प्यार मिला। कुछ लोगों ने मुझे प्यार दिया। उन्हे 100 प्रतिशत अतिरिक्त प्यार मिला। नफरत करने वालों ने अपनी चीज़ वापस मांगी। कहां से देता मैं… मेरे स्टॉक में तो सिर्फ प्यार भरा है। इस तर…ह मेरा स्वभाव मेरी समझदारी से हमेशा जीतता रहा। एक ही एक्सचेंज आफर है मेरे पास – प्यार के बदले प्यार… नफरत के बदले भी प्यार। सौदा मंजूर है तो ठीक वरना दूसरी दुकान देखो…

मूड ऑफ

आज कुछ कहने का मन नहीं हो रहा। ऐसा जब-जब होता है तो लगता है अपनी ही ऊंचाइयों से फिसल कर धड़ाम से नीचे आ गया और अपने लिए धरती ढूढ़ रहा हूं। आसान नहीं होता अपनी खामोशियों की ऊंची दीवारों में कैद हो जाना। कुछ बोलूं न बोलूं आंखों से साफ आवाज़ निकलती है…

मेरी ताकत

मेरे पास दो ताकत है। पहली कि मैं शेर के मुंह से मांस की बोटी निकाल सकता हूं और दूसरी ताकत कि मैं शाकाहारी हूं।

प्राथनाओं की दुनिया

आंखें जब साफ आवाज़ में बात करती हैं, तब आदमी कितना मासूम दिखता है। कुछ आंखों की साफ आवाज़ों से मैंने अपनी दोनों मुट्ठियां भरी। पहली खोली तो एक चेहरा निकला। दूसरी खोली तो रौनक। दोनों हथलियों को मिला कर, इसे प्रार्थना का नाम दिया… और प्रार्थनाओं ने मुझे… रौनक भरे चेहरों से सजी इक मासूम दुनिया दी, इसीलिए ज़्यादा समझदार नहीं होना चाहता। ज़्यादा समझदारी मासूमियत को निगल जाती है…

अनकहा

आदमी जितना कहता है, उससे ज्यादा नहीं कहता है। अनकहा जब आपके अंदर तोड़-फोड़ मचाने लगे तो आपकी चुप्पी को भी एक रचनात्मक स्पेस की ज़रूरत पड़ती है, जहां वह साफ चेहरे की तरह दिखे।

ताजमहल देख कर लौटने के बाद

मुहब्बत की जुबां सदियों तक बात करती है… पिछली सदी की खूबसूरत याद को दोनों हथेली पर रख कर अपनी आंखों में नूर भर लेने की ख्वाहिश बचपन से थी, इसीलिए पिछले रविवार ताजमहल देखने गया। सोचा था शाहजहां के इतिहास से थोड़ी रौनक अपनी आंखों के लिए चुरा लूंगा… लेकिन सुंदर नक्काशियों से निकले अजनबी हाथों ने मुझे चोरी करते पकड़ लिया। कहने लगे यह हमारी मुहब्बत है, किसी बादशाह की शान नहीं कि सदियां बदलते ही तुम लपक लोगे..

कंधों का इस्तेमाल

कुछ लोग कंधों का इस्तेमाल सीढ़‍ियों की तरह करते हैं, यह जानते हुए कि कंधों पर हाथ रखा जाना चाहिए, पैर नहीं। एक दिन वही मज़बूत कंधा जब झुक जाता है, तो उंचाइयों से लुढ़कना समझ में आता है। दावे से कह सकता हूं, दावे से कह सकता हूं कि कंधे जब अवसरवाद की भेंट चढ़ते हैं, तो सीढ़‍ियां बन जाते हैं और जब उमर भर एक-दूसरे का साथ देते हैं, तो एक और एक ग्यारह होता है। आपको मज़ा आएगा, किसी झुके हुए कंधे पर हाथ रख कर यह गणित समझने की कोशिश करते हुए…

लोहा गायब… केवल धार

कुछ लोगों ने अपनी धार तेज़ करना शुरु किया। इतनी धार लगायी कि बस धार ही रह गयी, लोहा ख़त्म हो गया। अब अपनी केवल धार लेकर एक-दूसरे से ही लोहा ले रहे हैं…

अपने एक खास दोस्त के लिए

यह आवाज़ जो तुम्‍हें साफ-साफ सुनाई दे रही है, इसे तुम्हारे शोर पर अपनी खामोशियों को रगड़-रगड़ कर मैंने पैदा किया है। अब मैं इसे पाल-पोसकर बड़ा करना चाहता हूं… क्या तुम मेरा साथ दोगे… शायद नहीं क्योंकि इसी शोर ने तुम्‍हें पैदा किया है… लेकिन याद रखना दोस्त खामोशी भी कभी-कभी शोर को निगल जाती है…

मदर्स डे पर

अपने होने के आगे फुल स्टॉप, कॉमा या प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने से पहले तुम्हारी याद आती है मां। सोचता हूं कि मेरा होना तुम्हारी आंखों के किस सपने की हकीकत है। नौ महीने में सोचा गया कौन सा वाक्य हूं मैं। मां कभी मेरी कविता में आओ। शायद वहीं भूल आयी हो अपना आंचल, जिससे अकसर लिपटा रहता हूं। सच कहूं आज मदर्स डे नहीं भी होता तो तुम्हारी बहुत याद आती…

एक बूढ़े आदमी का इंटरव्यू

मैंने अपनी ज़िंदगी का ब्रेकिंग न्यूज़ ढूंढ रहे एक बूढ़े आदमी का इंटरव्यू लिया। उनका कहना था – बेचैनी भाग रही है मेरे पीछे डिस्कवरी चैनल के शेर की तरह और रिमोट से खेलते हुए लगातार बड़े हो रहे हैं। कुछ बच्चे तो इतने बड़े हो गये कि भूल गये कि कितने नंबर पर आता है कौन सा चैनल… और मेरे अपने बच्चे तो रिमोट से खेलते ही नहीं, रिमोट उनसे खेलता है। वे तो बस बदल जाते हैं चैनलों की तरह…

समय की आवाज़

अपनी आवाज़ पहन कर निकलता है समय। हमें दिखाई नहीं देता, लेकिन इसे एकांत में सुन सकते हैं हम। और एक बात कहूं – समय-समय पर समय बन कर समय जिसको मारता है, एक दिन वही समय पर समय को ललकारता है।

दिल्ली की गर्मी में

मौसम इतना गरम हो चुका है कि मेरे ठंढ़े दिमाग का सारा बर्फ पिघल कर आंखों में आने लगा है। इससे पहले कि मेरा गीला चेहरा पन्नों पर उतर आये, मैं अपने हवादार जंगल में सुस्‍ता रहा हूं। उसी जंगल से एक शेर निकला है। इसे अपने दोस्तों के हवाले करता करता हूं -

अपनी ख्वाहिशों को संभाले हुए।
तेरी ज़‍िंदगी के हवाले हुए।
दिल की बस्ती में थोड़ी जगह चाहिए,
हम परिंदे हैं घर से निकाले हुए।

एक सवाल

धीरे-धीरे खिसकते दिमाग़ों को देख कर लगता है, तापमान सचमुच ज़्यादा है। गरम होते आदमियों और ठंढे होते इंसानों में गांधी और माओ को ठीक-ठीक बांटने निकले अक्लमंदों से एक सवाल तो पूछना ही चाहिए कि कोई भी सोच आतंक बनने से पहले किन रास्तों से गुज़रती है। समझना तो यह भी पड़ेगा कि युद्ध और शांति के बीच कौन सी उंगलियां फंसी हैं…

सच का सामना

बचपन में एक दोस्त मिला झूठ। इसने मम्मी, पापा और स्कूल में टीचर से हमें बचाया। आगे चल कर सबको प्रभावित करने से लेकर बॉस से बचाने तक में यह अपना पक्का साथी बन गया। बचने की आदत ने कमज़ोर बना दिया। एक दिन ऐसा आया, जब यह दोस्त मुझे नहीं बचा पाया। तब किसी ने हौले से कांधे पर हाथ रख कर कहा – दोस्त मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं सच हूं। भांड़ में जाए बचपन का दोस्त… अब तो मुझे असली दोस्त का ही साथ चाहिए।

खबर – चार लड़कों ने एक लड़की को ज़िंदा जलाया

पहले ख़बरों में आयी एक लड़की, फिर मेरे सपने में। चार लड़के उसे छेड़ रहे थे… केरोसिन छिड़क कर उसे जला रहे थे। अंदर तक झुलस जाने के बाद रात भर सोचता रहा कि सदियों की गांठें ढीली करने में और कितनी उंगलियां टूटेंगी। मां-बहन के मुहावरों से निकल कर लड़कियां जब सड़कों पर होती हैं तो कुछ आंखों में घास उग आते हैं। तब कितना बदल जाता है हरियाली का मतलब। कहां है… नैतिकता के ठेकेदारों की किताबों के फटे पन्ने…

हाथ की लकीरें

अपने लिए कुछ पंक्तियां लिखी थीं, जो आज तक हर कदम पर मेरे साथ चल रही हैं – जब भी / हाथों की लकीरें / देने लगे तुम्हें चुनौती / मुट्ठी बांध के आगे बढ़ो / क्योंकि / मुट्ठी के कसने से ही / लकीरें बदलती हैं। इन मुट्ठियों को तबसे कस रहा हूं, जबसे लकीरों को गिरफ्त में लेने का हौसला हुआ। कभी- कभी कसी हुई मुट्ठी खोल कर देखता हूं, तो पसीने से तर-बतर हज़ारों-लाखों चेहरे दिखाई देते हैं, जो अपनी मुट्ठियां कस रहे हैं।

और अंत में

मुझे तलाश है उन शब्दों की जो दिमाग में एक नयी सुबह खोल दे और दिल को एक ख़ूबसूरत शाम दे, जिससे मैं अकेले में बात कर सकूं…एक गहरा कुआं खोदने की ताकत रखने वाले शब्दों की खोज में हूं क्योंकि बोर हो गया हूं सूखती हुई आंखों और सख्त हो चुके दिलों से…

पंकज नारायण के बारे में और अधिक जानकारी इस लिंक के ज़रिये मिल सकती है : एक लड़का प्रेमाकुल सा

17 Comments »

  • गिरीन्द्र said:

    फेसबुक पर पंकज के जबरदस्त मुरीदों में एक हूं, उनकी पंक्तियों को पढ़े बिना हमेशा अपना फेसबुक एकाउंट अधूरा लगता है।

  • Tejendra Sharma said:

    पंकज की बहुत सी विशेष पंक्तियों का पहला पाठक मैं ही होता हूं। मुझे इस बात का गर्व है कि युवा पीढ़ी हिन्दी के प्रति इतनी समर्पित है। पंकज की भाषा एक नदी के कलकल करते पानी का सा आभास देती है। हिन्दी गद्य को भविष्य में इस युवा पत्रकार से बहुत सी आशाएं हैं। कथा यू.के. की ओर से पंकज को शुभकामनाएं।

  • madhavi shree said:

    बहुत अच्छा ,बिलकुल संगीत- माय – पंकज की पोस्ट पढ़ कर ऐसा लगता है की उनेह उन पत्रकारों को ट्रेनिंग देनी चाहिए जो बेचारे माइक पकड़ कर “आपको कैसा लग रहा है “…., आप क्या सोचते है….यही कहते रहे है बस …..

  • Jolly Uncle said:

    Kabhi ro ke muskraye, kabi muskra ke roe
    Tumari yaad jab bhi ayi, ushe bhula k roe,
    Ek तुमारा hi nam tha, jise hazar bar likha,
    Jitna likh k kush hue, usse jiyada mita k रोए.

    Dear Pankaj Sahib, Aap ki kalam se nikla hua ek-ek moti kohinoor hai.

    Jolly Uncle

  • Rakesh Srivastava said:

    पंकज की फेस बुकिया लाईनें पढ़ीं । आश्चर्य और आनन्द से ऐसा भर उठा कि काफी समय तक तो कुछ कहने या सोचने को शब्द नहीं मिलें । गद्य में उच्च कोटि कि कविता का ऐसा आनन्द विरले मिलता है। वाकई पंकज फूलों की भाषा में लिखते हैं । पंकज इस करके कमाल के हैं कि आज के मसल देने वाले समय में वह फूलों की भाषा में अपने समय के बड़े सत्य कह जाते हैं । उन्हें अपने फूलों को सहेजना और उसे अपनी ‘दो ताकत’ बनाना आता है । समकालीन जटिल समय इसलिए जटिल है कि उसने सरलता और मासूमियत से मूंह मोड़ लिया है ।
    पंकज कि इन पंक्तियों में प्रामाणिक जीवन संघर्ष है । समय के साथ पकी हुई संवेदनाएं हैं जो सतत उर्ध्वगामी हैं। पंकज की संवेदनाओं में स्पष्ट और सुथरा जीवन दर्शन है, जो बौद्धिक विमर्शो से नहीं आया है, बल्कि छोटे बड़े जीवनानुभवों को कुन्दन में परिवर्तित करने की प्रतिभा से आया है । पंकज के शब्द कहीं भी आडम्बर, बहानेबाजी, घमंड या चालाकी नहीं करते । पंकज के शब्द उनके पास ऐसे हथियार है जो अंतः चेतना को चलायमान रखते हैं, और जिसके बल पर वह अपने आस पास और अपने समय को, अपनी लकीरों को गिरफ्त में लेने का हौसला रखते हैं । पंकज की ये पंक्तियां जिन्दगी के टुकड़ों को चुनने के लिए लड़ते हुए निकली है, जिसमें लड़ाई, लड़ाई के लिए नहीं है, बस जिन्दगी के लिए है।
    पंकज की प्रतिभा विलक्षण है और मैं उनमें एक बड़ा लेखक देखता हूं।

  • gopal agarwal said:

    After going through the matter on the site it is very refreshing to know the depth in the contents. I have known pankajji as person now to know him, as a thinker is very good. Expression is always difficult, but his convictions are apparent, my sincere good wishes

  • सुयश सुप्रभ said:

    अच्छे लेखक की यह खूबी होती है कि वह न केवल आपके दिल की बात को आपसे बेहतर तरीके से अभिव्यक्‍त करता है बल्कि वह आपको अपनी संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर सोचने के लिए प्रेरित करता है। पंकज भाई की अभिव्यक्‍ति दिल और दिमाग दोनों को सुकून देती है।

  • Ashok Kumar said:

    एक कमाल का लेखक… एक कमाल का वक्ता… एक कमाल का आदमी… पंकज जी से मुझे मिलने का मौका मिलता रहता है… जो लोग मिलते है ओ लोग जानते है की मैंने क्या कहा है… एक दुबले- पतले आदमी के अन्दर एक साथ बहुत आदमी रहते है… मोहल्ला पर पहली बार आया… बार- बार आऊंगा…उनकी ये पंक्तिया मुझे बार-बार उनकी ओर खिचती है…
    कभी- कभी कसी हुई मुट्ठी खोल कर देखता हूं, तो पसीने से तर-बतर हज़ारों-लाखों चेहरे दिखाई देते हैं, जो अपनी मुट्ठियां कस रहे हैं।

    क्या लाइन है यार…लिखते रहो पंकज भाई ढेर सारा सम्मान और पयार.

  • shambhu nath said:

    जिनकी लेखनी में जादू हो॥ तो वह इंसान कमाल का ही होता। जैसे पंकज भाई जी है जब वे लिखते है जो उनके हर एक शव्दों में तारे टिमटिमाते दिखाई देते है॥ उनके हर एक शव्द में अनमोल हीरा जादा हुआ होता है॥ उनकी रचना पंधने के बाद यही कहने को दिल कहता है की क्या लिखा है, बन्दे ने॥ लिखते रहो bहैया॥

  • Kiran said:

    बहुत ही दिलचस्प………..एक लड़का प्रेमाकुल सा जो एक गहरा कुँआ खोदने की ताक़त रखने वाले शब्दों के ज़रिये दिमाग को एक नयी सुबह और दिल को एक नयी शाम देता है…

    खूबसूरत लेखनी….अति सुंदर

  • Anshu Mala said:

    पंकज भाई को सदर नमस्कार !
    भाई मै आपकी लेखनी की मुरीद हो चुकी हूँ, मुझे साहित्य का बिलकुल ज्ञान नहीं है. बस आपकी पंग्तियाँ मेरे दिल की गहराइयों में उतर जाती अहि ओउर आनंद की लहर सरे जहाँ में नज़र आती है.
    में समझ नहीं पा रही मुझे क्या करना चाहिए ………………..
    आपका अभिनन्दन , आपको धन्यवाद , या फिर अपने भाग्य पे नाज………
    जो आपने मुझे अपने भाई होने का गौरव प्रदान किया है.
    सदर धन्यवाद
    अंशु

  • Nirmal vaid said:

    कमाल है आज मुझे अति प्रसंता हो रही है की पंकज का फेस बुक पर लिखा हुआ मुहौल्ला लाइव पर संपादित हो प्राकशित हुआ है. पंकज ने मेरे सामने हे लिखना शरू किया था. उसके लेखन मैं बहुत गहराई है, बहुत कम समय मै पंकज के पाठको के संख्या बढ़ती जा रही है. काफी लोग पंकज का इंतजार करते है. पंकज मेरे छोटे भाई की तरह है, मेरे शुभ कामनाए हमेशा उसके साथ है. आज भे पंकज ने फेस बुक पैर कमल किय हुआ है. वो पंक्तिया है ……….

    रेगिस्तान का तपता संघर्ष उन्हें आंख नहीं दिखा सकता। उनकी नमी हमेशा बरकरार रहती है। असफलता की तेज़ धूप भी जब उन्हें सेकती है तो उनमें हरी-भरी फसल उगती है। वो ठंढे दिमाग से हौसलों को गरम करते हैं। बात उनलोगों की हो रही है जो पानी का सही इस्तेमाल जानते …हैं और हर परिस्थिति में अपनी आंखों में थोड़ा सा पानी बचा कर रखते हैं… पंकज

  • Om said:

    बहुत ही रोचक हैं पंकज जी के लेख! हमको बहुत अछे लगे! थान्यावाद!

  • javed said:

    great

  • हरि जोशी said:

    पंकज को फेसबुक पर चार लाइनों में पढ़ना एक अनुभव है। चार लाइना चार या चालीस घंटे भी पीछा नहीं छोड़तीं…और यहां तो एक साथ पढ़ने में मुझे कई दिन आना पड़ा…जैसे गीता को एक बार पढ़कर आप उसे बार-बार पढ़ते हैं और फिर अर्थ निकालने और तलाशने की कोशिश करते हैं….जैसे आप कबीर को ए‍क दिन में पढ़कर नहीं समझ सकते; कुछ वैसा ही पंकज के साथ है….लगता है कि कुछ दिन और आना पड़ेगा।

  • afaque salani said:

    पंकज,
    सहज और सरल दिखने वाला नौजवान है मगर शबदो से खेलना और सजाना उसकी आदत है जब अपनी बात रखता है तो एक सोच दे जाता है फेसबुक पर उसकी लिखी बाते एक बरेकिंग न्यूज़ की तरह है जिसका सब को इंतजार रहता है पंकज मेरा छोटा भाई है मोहल्ला लाइव में पढ़ा अच्छा लगा भाई पंकज लिकते रहो

  • Apoorva said:

    main pankaj ji ko kafi samay se pad rahi hun aur unki panktiyon mein apne aap ko jeeta dekh rahi hun. unke is jeewant lekhan mein apni aap ko jite dekhna ek bahaut hi khubsurat ehsaas hai. pankaj ji ek bahaut hi ache lekhak aur usse bhi ache insaan hain, inke bare mein zyada kya kahun yeh to nhi janti par inke aur inki lekhan ke bina zindgi adhuri si lagti hai.

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