Articles Archive for September 2009
ख़बर भी नज़र भी, मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत »
ओमप्रकाश तिवारी ♦ सवाल स्टोरी की विश्वसनीयता पर नहीं है बल्कि इस समय पर है। इस समय में व्याप्त प्रकाशकों के मनमाने आचरण पर है कि आख़िर वे कौन से कारण हैं कि पिछले तीन वर्षों से यह खेल ज्ञानपीठ में चल रहा है और आज तक एक भी लेखक (ज्ञानपीठ का) इसके खिलाफ़ नहीं बोल सका। और आज जो बोल भी पा रहा है, उसे नाम छुपाना पड़ रहा है। मैं लेखक नहीं हूं लेखकों की इस स्थिति से हमारी सहानुभूति है। आप ने रॉयल्टी स्टेटमेंट्स की जो छाया प्रतियां लगायी है, उसे देख कर निश्चित तौर पर रवींद्र कालिया जी और ज्ञानपीठ दोनों शक़ के घेरे में हैं। ज्ञानपीठ को अपने संस्थान के गुडविल की खातिर या तो इस मसले पर अपनी सफाई देनी चाहिए।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला लाइव »
डेस्क ♦ कल एक साथी ने कहा कि मोहल्ला लाइव पुलिस का दलाल हो गया है। वे हंस कर टालना चाह रहे थे, लेकिन मामला गंभीर था। संदर्भ आप समझ रहे हैं। छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के लिए बंगाल पुलिस का पत्रकार बनने का स्वांग। हमने सिर्फ यही सवाल उठाया कि बंगाल पुलिस ने अगर पत्रकार बन कर अपने लक्ष्य में कामयाबी पा ली, तो पत्रकारों को मिर्ची क्यों लग गयी? बहुत सारे मौक़ों पर बर्बर और शातिर जैसी संज्ञाओं से पुलिस को नहलाने वाले मीडिया को अगर पुलिस ने दुलत्ती दी है, तो अपनी चारित्रिक विशेषताओं का ही एक नमूना दिखाया है। ऐसा तो है नहीं कि पुलिस इस प्रकरण में ही साज़िश कर रही हो और बाक़ी तमाम पिछले कारनामों में पवित्रता से काम करती रही हो?
मोहल्ला रांची, समाचार, स्मृति »
डेस्क ♦ भोपाल से उज्जैन के रास्ते में खजूरी के पास एक दुर्घटना में कल हिंदुस्तान टाइम्स रांची के प्रभारी अक्षय कुमार की मृत्यु हो गयी। इस हादसे में उनकी पत्नी अनिता और उनके मित्र उमेश सिंह का भी निधन हो गया। दुर्घटना में उमेश सिंह की पत्नी अभिलाषा सिंह और पुत्र सुभांकित घायल हो गये। उनका उपचार एक निजी अस्पताल में चल रहा है। डॉक्टरों के मुताबिक दोनों ख़तरे से बाहर हैं। अक्षय कुमार और उनके मित्र उमेश सिंह रांची के रहने वाले थे। मध्यप्रदेश शासन ने उनके पार्थिव शरीर को रांची भिजवाने की व्यवस्था की। भोपाल के पत्रकारों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
असहमति, ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मोहल्ला भोपाल, शब्द संगत »
काशीनाथ ♦ प्रलेस किसी एक की जागीर तो नहीं है कि जो हो रहा है देखो सुनो और चुप रहो। न जाने कितने नौजवानों और कितनी ही पीढ़ी ने इसको खड़ा करने में अपना योगदान दिया है। जो सत्ता के दलाल और सुविधाभोगियों के आगे डर से बाहर चले जाएं और इनको छुट्टा सांड की तरह उत्पात मचाने के लिए छोड़ दें, ऐसा भी नहीं होगा। जब जागे तब सबेरा की तर्ज पर अब जरूरी है की एक बार कचरा साफ़ कर ही लिया जाए। समय भी सही है। देश भर में दीपावली के समय घरों घर सफाई होगी। लगे हाथ हम भी प्रलेस के घर में सफाई पुताई कर लें और प्रेमचंद की आत्मा को शांति दें। आमीन।
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एक लेखक ♦ रवींद्र कालिया ने तीन साल पूर्व भारतीय ज्ञानपीठ में आते ही न सिर्फ स्टॉक स्टेटमेंट को महज सेल्स स्टेटमेंट में बदल दिया बल्कि अपने उक्त संपादकीय में लेखकों के लिए घड़ियाली आंसू बहाते हुए अप्रत्यक्ष रूप से अपने संस्थान को भी शंका के घेरे में ला दिया। पूर्व में लेखकों को दी जाती रही सूचनाओं को पहले तो रोक देना और फिर अपने संपादकीय में अपने ही संस्थान को कठघरे में खड़ा कर देना कि वे लेखकों को उनकी किताबों की प्रकाशित प्रतियों के बारे में नहीं बताते एक दुतरफा खेल और दोहरी साजिश है, जिसे एक ही थाली में खाने और छेद करने के पारंपरिक मुहावरे से भी जोड़ कर देखा जा सकता है।
मोहल्ला दिल्ली, समाचार »
टीम ब्लागवाणी ♦ ब्लागवाणी को बंद करने की सोचना भी हमारी गलती थी। आपकी प्रतिक्रिया देख कर लगता है कि यह फिनोमिना हमारी सोच से भी बड़ी हो गयी थी। पिछले 24 घंटो में हमें अनगिनत SMS, ई-मेल और फोन आये। यह देख कर लगता है कि ब्लागवाणी शुरू करने का फैसला तो हमारे हाथ में था, लेकिन बंद करने का फैसला अकेले हमारे हाथ में नहीं है। यह फैसला दबाव में ही लिया गया था। लेकिन यह दबाव आर्थिक या काम के बोझ का नहीं था। हम तो हतप्रभ रह गये थे कि ब्लागवाणी की व्यवस्था बनाये रखने के लिये किये गये उपायों पर भी कई पक्षधरता के आरोप लगाये जा रहे थे। यही शायद असहनीय बन गया।
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला लाइव »
डेस्क ♦ अभी जब लालगढ़ में छत्रधर महतो गिरफ़्तार हुए, तो बिरादराना अस्मिता के हिमायती पत्रकारों की एक बड़ी फौज कलम लेकर उठ खड़ी हुई। “बंगाल पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया” और “पुलिस के धोखे से पत्रकारों की जान ख़तरे में, मीडिया ख़ामोश” जैसे नारों के साथ वर्चुअल पन्ने रंगे गये। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस ने क्या ग़लत किया? जिसे वह पकड़ना चाहती है, उस तक पहुंचने के लिए उसने वही हथकंडे अपनाये, जिसका चलन पहले भी रहा है। वह आम आदमी के वेश में भी आरोपियों को पकड़ती रही है, तब तो किसी मीडिया वाले ने ये सवाल खड़ा नहीं किया कि पुलिस का ये तरीक़ा आम आदमी के भरोसे से खिलवाड़ है?
मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली, समाचार »
डेस्क ♦ दिल्ली से दोबारा शुरू हुआ साप्ताहिक अख़बार चौथी दुनिया अपनी दूसरी यात्रा में कोई असर नहीं छोड़ पा रहा है। बल्कि पाठकों की ओर से खारिज़ कर दिये जाने के बाद इसके प्रबंधन ने नयी रणनीतियों पर काम करना शुरू कर दिया है। अब चौथी दुनिया का जो अंक आपके सामने होगा, वो सिर्फ 16 पृष्ठों का होगा और इसके लिए महज पांच रुपये चुकाने होंगे। हालांकि 16 पृष्ठों के लिहाज़ से ये मूल्य भी ज़्यादा हैं, क्योंकि इससे कम कीमत में दैनिक अख़बार 20 से 24 पन्ने देते हैं। इससे पहले चौथी दुनिया 20 पन्ने का था और हर पन्ने की कीमत थी एक रुपये। यानी चौथी दुनिया का एक अंक पढ़ने के लिए आपको 20 रुपये हॉकर को देने होते थे।
मोहल्ला दिल्ली, समाचार, स्मृति »
टीम ब्लॉगवाणी ♦ ऐसा नहीं है कि हम सोचते नहीं हैं, या हमारी विचारधारा नहीं है। हमने कभी भी उनको अपने काम पर हावी नहीं होने दिया। ब्लागवाणी इसका सबूत कैसे दे? क्यों दे? ब्लागवाणी चलाना हमारी मजबूरी कभी न थी बल्कि इस पर कार्य करना नित्य एक खुशी थी। पिछले दो सालों में बहुत से नये अनुभव हुए, मित्र भी मिले। उन सबको सहेज लिया है, लेकिन अब शायद आगे चलने का वक्त है। तो फिर अब हम कुछ ऐसा करना चाहेंगे जिससे फिर से हमें मानसिक और आत्मिक शांति मिले। इन दो सालों में आप सबका हार्दिक सहयोग मिला, इसके लिए बहुत आभार। अब ब्लागवाणी को पीछे छोड़ कर आगे जाने का समय आ गया है। विदा दीजिए ब्लागवाणी को।
नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला मुंबई »
डॉ प्रवीण तिवारी ♦ क्या आज का टीवी ‘चालू’ हो गया है और ज़बरदस्ती इस पर कार्यक्रमों को खींच कर दर्शकों को बुद्धू बनाया जाता है? इस विषय पर बात करने के लिए मेरे साथ सीआईडी के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर बीपी सिंह ख़ुद मौजूद थे। सिंह साहब के मुताबिक टीवी को चालू टीवी कहने के बजाय इसे आज के प्रतिस्पर्धा के दौर की मजबूरी कहा जाना चाहिए। कोई कार्यक्रम जब चल पड़ता है, तो उसे अचानक बंद करना या तय समय सीमा में बांधना मुमकिन नहीं होता, क्योंकि उससे चैनल की टीआरपी और सैंकड़ों लोगों का रोज़गार जुड़ा होता है। हां ये बात सही है कि ये मजबूरी ज़्यादातर कार्यक्रमों की गुणवत्ता को बर्बाद करती है और आख़िरकार इन्हें बंद करना पड़ता है।



