जनसत्ता के बारे में अर्धसत्यों से बचो
आलोक तोमर
वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जनसत्ता के बहाने प्रतिष्ठित पत्रकार प्रभाष जोशी के वैचारिक आग्रहों पर जो बहस चल रही है, उस पर तो नहीं लिखा है – कुछ पुरानी बातों का एक कोलाज़ बनाया है। इस राइटअप में उन्होंने पत्रकारिता में जनसत्ता के उस प्रयोग के बारे में जानकारी दी है, जो भाषाई और तेवर के स्तर पर हुए। आलोक तोमर इस पूरी बहस में एक निजी पाठ के साथ आये हैं – जो कहीं भी पुराने जनसत्ता के वैचारिक धुंध को विश्लेषित नहीं करता। विजिटर्स की जानकारी के लिए बताएं कि आलोक तोमर इन दिनों सीएनईबी न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं, जिसके मुखिया वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव हैं: मॉडरेटर
जनसत्ता के उत्थान और पतन को लेकर इन दिनों एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। जनसत्ता रॉकेट की तरह आसमान में गया था और इन दिनों भीगा हुआ पटाखा बन कर रह गया है और बहुत सारे मित्र इसका दोष प्रभाष जी पर मढ़ते हैं। तर्क के स्तर पर शायद यह कहा जा सकता है कि प्रभाष जी ने एक बड़ा प्रयोग किया था, जो सफल हुआ मगर सातत्य के अभाव में वह धीरे-धीरे छीजता गया और अंतत: असफल हो गया।
मैं जनसत्ता के आदिवासियों में से हूं, यानी उस टीम में से जिसने पहला अंक निकाला था, इसलिए कुछ बातें साझा करना चाहता हूं। जनसत्ता जिस समय सामने आया, तो प्रभाष जी का सपना था कि बोलचाल और मुहावरे की भाषा में नये तेवर वाला एक अखबार निकाला जाए। बाहर वाले नहीं जानते कि उस समय एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका प्रभाष जी को इंडियन एक्सप्रेस का प्रधान संपादक बनाना चाहते थे और प्रभाष जी ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा था कि उन्हें हिंदी में यह प्रयोग करने दिया जाए। गोयनका मान गये थे। पहले दिन जो अखबार निकला था, उसमें प्रूफ की प्रचंड अशुद्वियां थीं लेकिन लेआउट नया था, भाषा में तेवर था और खबरों में सरोकार था। इसीलिए पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। प्रभाष जी को जल्दी ही पहले पन्ने पर लिखना पड़ा कि अब हम ज्यादा नहीं छाप सकते, आप अपना अखबार मिल बांट कर पढ़िए।
फिर जनसत्ता के कई संस्करण हुए। मैं इसे प्रभाष जी के निर्णय की भूल मानूंगा कि उन्होंने स्थानीय संपादक के तौर पर आमतौर पर ऐसे लोग नियुक्त किये, जो बहुत विद्वान थे मगर अखबार सिर्फ विद्वत्ता से नहीं चलता। उसके लिए प्रभाष जोशी वाली जिद चाहिए, जो इन सब में नहीं थी। बनवारी जी लगभग संत थे और उन्हें दिल्ली का स्थानीय संपादक बना दिया गया। वे ऐसे भोले बाबा थे कि एक साथ इतने लोगों को छुट्टी दे देते थे कि डेस्क पर कोई बचता ही नहीं था और फिर खुद प्रभाष जी को मुख्य उपसंपादक की भूमिका में आना पड़ता था। ब्यूरो चीफ और राजनीतिक संपादक बनाया हरिशंकर व्यास को, जो जल्दी ही दलाली की राह पर चल निकले। बाकी सब तो छोड़िए, प्रभाष जी जानते थे कि मैं टीम को साथ ले कर चलने वाला आदमी नहीं हूं और बहुत जल्दी झगड़ा कर बैठता हूं, मगर मुझे बना दिया चीफ रिपोर्टर। हिंदी पत्रकारिता में मुझसे नालायक चीफ रिपोर्टर दूसरा नहीं मिलेगा।
जितेंद्र बजाज को चंडीगढ़ का संपादक बना कर भेजा गया। वे सर्वोदयी विचारधारा वाले और बहुत शालीन व्यक्ति थे लेकिन अखबार के तीन कॉलम के शीषर्क में छत्तीस प्वाइंट में कितने शब्द आने चाहिए, इसका उन्हें पता नहीं। चंडीगढ़ संस्करण कभी चल ही नहीं पाया क्योंकि इसके बाद ओम थानवी भी वहां पहुंचे, तो एक तो संस्करण की हालत पहले से खराब थी और दूसरे ओम थानवी अपने निजी ठाठ-बाट में ज्यादा भरोसा करते थे।
राहुल देव को पहले मुंबई संस्करण का संपादक बनाया गया और उन्होंने बहुत चैतन्य भाव से अखबार चलाया। जनसत्ता का पहला संझा संस्करण और रविवार को अच्छी-खासी पत्रिका देने की शुरुआत की। मगर जब रामनाथ गोयनका नहीं रहे तो उनके दत्तक पुत्र और असली पौत्र विवेक खेतान से विवेक गोयनका बने साहब का अखबार से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हे चौंतीस मंज़िल का एक्सप्रेस टॉवर विरासत में मिल गया था और साथ ही एक्सप्रेस समूह की परंपरा का स्वामी होने का दंभ भी उनके अंदर आ गया था। जनसत्ता अचानक एक्सप्रेस समूह का सौतेला बेटा बन गया था और आज तक बना हुआ है।
प्रभाष जी साठ साल की उम्र होते ही ज़िद कर के रिटायर हुए और कुछ दिन अच्युत्यानंद मिश्र ने अख़बार संभाला। अच्युत्यानदं जी बहुत भले इंसान हैं लेकिन वे रिश्ते निभाने और पत्रकारिता के बीच की संधि रेखा को कभी निभा नहीं पाये। अब वे अनुभव का लाभ माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के छात्रों को दे रहे है। गुरु के तौर पर काफी आदरणीय हैं।
राहुल देव अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों पर अधिकार रखते हैं और मेरे जीवन का एक मूल मंत्र उन्होंने ही दिया है और वह यह है कि लोग लोगों के बारे में जानना, पढ़ना और देखना चाहते है। लेकिन हर महाप्रयोग को अपना बार-बार अविष्कार करना पड़ता है, जो जनसत्ता ने दुर्भाग्य से नहीं किया। उसके साथ वही हुआ, जो दिनमान के साथ हुआ था। अपने अतीत के गौरव के टीले पर बैठ कर इसके सारे साथी बांसुरी बजाते रहे और आज भी बजा रहे हैं और यह भी ध्यान नहीं रखते कि कितने बेसुरे हो रहे हैं।
जनसत्ता कितना बड़ा प्रयोग था कि यह इसी बात से जाहिर है कि इसने पूरी भारतीय पत्रकारिता की भाषा और व्याकरण बदल डाला। यह प्रभाष जी का सपना था, जो पूरा हुआ और जैसे ही प्रभाष जी ने हाथ हटाया, टूट गया। अब जो चल रहा है, वह मूल जनसत्ता की एक फूहड़ फिल्मी पैरोडी है – जिसे पढ़ने वाले इतने कम हैं कि बताने में भी शर्म आती है। भाषा नाम की समाचार एजेंसी बंद हो जाए तो जनसत्ता को अपने पन्ने खाली कर के छोड़ने पड़ेंगे। जमाना हो गया, जब जनसत्ता ने कोई खोजी रिपोर्ट छापी है। प्रभाष जी के जमाने में खोज खबर और खास खबर नाम के दो पन्ने सप्ताह में छपते थे।
हां, प्रभाष जी का कसूर है। यह कसूर उस व्यक्ति का है, जो देश में कांग्रेस विरोधी और बिना भाजपा के बनने वाली एक सर्व निरपेक्ष सरकार का सपना देखना चाहता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे राजीव गांधी के चारण ने बोफोर्स के बहाने बगावत की तो एक्सप्रेस समूह को लगा कि एक और मसीहा मिल गया है। प्रभाष जी एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गये और उनका ज़्यादातर वक्त देवीलाल और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ बीतने लगा। कभी वे चंद्रशेखर को मना रहे हैं, कभी अटल बिहारी वाजपेयी जी से कह रहे हैं कि धारा 370 वगैरह छोड़ कर पहले कांग्रेस की सरकार गिराओ। कभी बंगलौर में हैं, कभी बंबई में तो कभी चंडीगढ़ में। इसके बावजूद जब परम पाखंडी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी, तो भाजपा और वामपंथियों की बैसाखियों पर ही बनी। एक तथाकथित गैर कांग्रेसी सरकार का उदय हुआ, जिसमें सारे भूतपूर्व कांग्रेसी बड़े पदों पर बैठे थे और जनसत्ता का अस्त आरंभ हो गया।
जनसत्ता के साथ एक्सप्रेस समूह के प्रबंधकों का जो रवैया है, वह शर्मनाक है। जनसत्ता एक्सप्रेस बिल्डिंग की शानदार इमारत से निकलता रहा मगर सौतेले बेटे जनसत्ता को नोएडा में पटक दिया गया। ओम थानवी ने दिल्ली की एक अभिजन कॉलोनी में मकान लिया जबकि प्रभाष जी सारा जीवन जमुना पार रहते रहे और आज भी रहते हैं। जनसत्ता के पतन का इतिहास लिखने वाले प्रभाष जी को माफ नहीं करना चाहते, मगर अगर वे ऐसा चाहते हैं तो उनकी मर्जी। न प्रभाष जी को इससे कोई फर्क पड़ता है और न मुझे। मेरी तो एक छोटी-सी प्रार्थना है कि सामने आ कर जनसत्ता जैसा एक और प्रयोग कर के दिखाये और तब जा कर पुराने जनसत्ता की आलोचना करे। मेरी आलोचना करने से आपको कुछ नसीब नहीं होने वाला।
निवेदन एक और है। प्रभाष जी से मेरे रिश्तों के बारे में सवाल उठाने वाले पहले ज़रा इतिहास जान लें। मैं जुलाई 1983 में पत्रकारिता के सबसे छोटे पद प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर भर्ती हुआ था। रिपोर्टर बना, चीफ रिपोर्टर बना, प्रिसिंपल कोरस्पोंडेंट बना, ब्यूरो में अकेला था इसलिए ब्यूरो चीफ बना, रोविंग यानी घुमंतू रिपोर्टर बना, मुंबई में जनसत्ता का प्रभारी बना और फिर लौट कर दिल्ली में सहायक संपादक के पद पर काम किया। इसके बाद नौकरी से निकाल दिया गया। प्रभाष जी के जिस इंटरव्यू का हवाला दे कर लोग कहते हैं कि मुझे लतियाया गया था, उसमें भी उन्होंने कहा है कि कंप्यूटर आलोक का था, यह नहीं कहा कि मैंने कोई गड़बड़ी की है। आज तक मुझे टाइपिंग नहीं आती तो तब क्या आती होगी? इसलिए मुद्दे को मुद्दा रहने दो और जो बात करनी है वो करो।

वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जनसत्ता के बहाने प्रतिष्ठित पत्रकार प्रभाष जोशी के वैचारिक आग्रहों पर जो बहस चल रही है, उस पर तो नहीं लिखा है – कुछ पुरानी बातों का एक कोलाज़ बनाया है। इस राइटअप में उन्होंने पत्रकारिता में जनसत्ता के उस प्रयोग के बारे में जानकारी दी है, जो भाषाई और तेवर के स्तर पर हुए। आलोक तोमर इस पूरी बहस में एक निजी पाठ के साथ आये हैं – जो कहीं भी पुराने जनसत्ता के वैचारिक धुंध को विश्लेषित नहीं करता। विजिटर्स की जानकारी के लिए बताएं कि आलोक तोमर इन दिनों सीएनईबी न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं, जिसके मुखिया वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव हैं: मॉडरेटर







प्रभाष जोशी ने शायद १९९८ में जनसत्ता की रेगुलर नौकरी छोड़ी होगी उस समय कितने सर्कूलेशन के साथ अगले संपादक को जनसत्ता सौंप कर गए थे वो। आलोक जी, पुराने जख्म मत कुरेदिए अभी प्रभाष जोशी ने जाति और सती पर जो उच्च विचार रखे हैं, उन्हीं पर बात कीजिए। आपकी इन मसलों पर कोई राय है भी या नहीं?
वरना तो ब्लू स्टार के समय के सिख विरोधी जनसत्ता की फाइलें खुलेंगी, ८८-९० के मुसलमान विरोधी जनसत्ता की फाइलें खुलेंगी, दलित-पिछड़ा-ठाकुर विरोधी जनसत्ता की फाइलें खुलेंगी और स्त्री विरोधी जनसत्ता का भी हिसाब-किताब होगा, राजेंद्र माथुर से लड़ने और सर्कूलेशन बढ़ाने के लिए प्रभाष जोशी का जनसत्ता जिस अतिवाद पर चल रहा था, वो कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है। पाठको ने जनसत्ता का संपादकीय अतिवाद भी देखा और उसकी छटा और आभा का अंत भी और ये सब प्रभाष जोशी के समय में ही हो गया था। राहुल देव और ओम थानवी तो बाद में पिक्चर में आए। यहां किसी की दिलचस्पी लगभग २० साल पहले ही पतन की ओर कदम बढ़ा चुके जनसत्ता का इतिहास जानने में नहीं है, आप ये इतिहास बता ही क्यों रहे हैं।
प्रभाष जोशी के जाने के बाद ही जनसत्ता में छप पाया ऐसा संपादकीय:
चीख और कालिख
मध्यप्रदेश के पटना तमोली नामक गांव में अपने पति की चिता पर कूदी या धकेली गयी गुट्टूबाई के जीवन का दुखद अंत इक्कीसवीं सदी के भारत में मौजूद मध्यकालीन बर्बरता की कहानी कहता है। इस जघन्य घटना के बाद यह आशंका भी होती है कि धर्म को एक उन्माद में बदल डालने वाले इस घोर हिंदुत्ववादी दौर में कहीं इस सती के पीछे-पीछे मंदिर और मेले का विद्रूप कर्मकांड शुरू न हो जाए। अगर उस स्त्री ने किसी बदहवासी में यह फ़ैसला किया हो तब भी यह निंदनीय है कि इसे रोकने की जगह वहां इकट्ठा लोग – जिनमें उसके कोख-जाये भी शामिल थे – एक तरह से इसका समर्थन करते रहे। ऐसी ख़बरें भी आयी हैं कि एक पुलिस अधिकारी ने उसे बचाने की कोशिश की और गांव वालों ने पथराव कर उसे घायल कर दिया। यह और भी चिंता और शर्म की बात है। इससे भी ज्यादा शर्मिंदा करने वाली शंका यह है कि कुछ लोगों ने उसे चिता पर धकेल दिया था।
पति के साथ जला दी जाने वाली ऐसी औरतों की कथाएं बीते समय में और सुनने में आयी हैं। इन अवसरों पर वह कर्मकांडी दृश्य नहीं बन पाया, जो करीब डेढ़ दशक पहले दिवराला में रूपकंवर के जल मरने पर पैदा किया गया था। लेकिन इससे सिर्फ इतना भर निष्कर्ष निकल सकता है कि स्त्रियों को जला डालने और फिर उनको आभामंडित करने वाली अमानुषिक सती प्रथा के समर्थक अगर शर्मिंदा नहीं तो डरे हुए ज़रूर हैं। डेढ़ दशक पहले जली रूपकंवर या इस सप्ताह जल कर मरी गुट्टूबाई की स्थिति और नियति में बुनियादी फर्क नहीं है। हमारे समाज में लड़कियों का जीवन अब भी ईश्वर जैसे किसी पति की एकनिष्ठ प्रतीक्षा का दूसरा नाम है। विवाह के बाद यह प्रतीक्षा ऐसी ठोस आर्थिक-सामाजिक निर्भरता में बदल जाती है जिसके कारण पति के न रहने पर स्त्री को अपना जीवन व्यर्थ ही नहीं, अभिशप्त भी लगने लगता है। ऐसी स्त्रियां पूरी तरह दूसरों पर आश्रित, चलती-फिरती लाश जैसी हो जाती हैं। जो यह लाश होने से इनकार करती हैं और जीवन को जीवन की तरह जीने का जतन करना चाहती हैं, उन्हें अक्सर संदेह और हिकारत की नज़र से देखा जाता है।
यानी एक तरह से यह सतीत्व भारत में स्त्री की अमानुषिक स्थिति के बेहद क्रूर चरम की तरह आता है – उस छल के जघन्य प्रमाण की तरह, जिसमें यातना और अत्याचार को स्त्री के लिए गौरव के क्षण में बदला जाता है। स्त्रियों के इस तरह जल मरने में वह क्रूर विडंबना है, जिसका वास्ता उस सामाजिक संरचना से है, जिसमें थोड़ी-बहुत हेरफेर और उदारता तो हमें स्वीकार्य है, मगर ऐसा मूलभूत बदलाव नहीं, जिससे पुरुष वर्चस्व की ज़ंजीरें टूटती हों। निश्चय ही बीते कुछ वर्षों में भारत के नागर समाज में स्त्री की स्थिति में कुछ फर्क आये हैं, लेकिन इस बदलाव से वह विशाल ग्रामीण भारत अब तक अछूता है, जिसमें दिवराला और पटना तमोली जैसे हादसे घटते हैं। लेकिन इस समाज से और उसके ज़रूरी सवालों से हमारी बेख़बरी का भी क्या ऐसी हत्याओं में हाथ नहीं है? आधुनिक भारत के इतने सारे नक्शे बनाने-सजाने के बाद भी अगर एक मध्ययुगीन भारत बचा हुआ है, जिसमें अमानवीय प्रथाएं अट्टहास करती हैं और जलती हुई स्त्रियों की चीख़ें धूप और अगरबत्ती और मंत्रोच्चार में दबा दी जाती हैं, तो इसके शर्म की कुछ कालिख हमारे माथे पर भी है।
(जनसत्ता: 8 अगस्त, 2002)
अंतत: नेट लेखकों की आलोचना काम आयी और आलोक तोमर को गुरूभक्ति को त्यागकर यथार्थ ढंग से अपनी बात कहनी पड रही है। वे अपने स्वाभाविक स्वर में बोल रहे हैं,बगैर गुस्से के और झापड मारे बोल रहे हैं,इसके लिए वे साधुवाद के हकदार हैं, हम यही चाहते थे कि वे विनम्रता से बातें करें, गुस्से में नहीं। उनका जनसत्ता और प्रभाष जोशी के बारे में इसबार का पक्ष अनेक मिथों को नष्ट करता है जो स्वयं गुस्से में आलोक तोमर ने बनाए थे। एक पत्रकार भक्त नहीं हो सकता। आलोक तोमर का यह लेख नेट संवाद का अच्छा लक्षण है। दिक्कत यही है कि हमारे आलोक तोमर अभी प्रेस मानसिकता में बंधे हैं। वे जानते नहीं हैं कि नेट ने क्या बदल डाला। हिंदी लेखकों ,पत्रकारों,प्रभाष जोशी के भक्तों को यह तथ्य बार-बार बताने की जरूरत है कि दुनिया बदल गयी है,यह प्रेस की दुनिया,मिजाज,लेखन, तेवर, परंपरा आदि से पूरी तरह भिन्न दुनिया है।
प्रभाष जोशी के साक्षात्कार पर चली बहस सामान्य बहस नहीं है यह हिंदी के सोए हुए अथवा विकास की दौड में पिछड़ गए लेखकों को सम्बोधित बहस है। प्रभाषपंथी इस बहस में गाली के अलावा कुछ नहीं बोल रहे,वे जानते नहीं हैं कि वे साइबर स्पेस में हैं और इसमें प्रेस युग की सामंती हेकडी नहीं चलती। साइबर स्पेस में चल रही मौजूदा बहस में कुछ यूजर ऐसे हैं जो मुहल्ले की भाषा में,तू -तडाक की भाषा में अभिव्यक्त कर रहे हैं।इनके जबाव में भी कुछ लोग हैं जो वैसी ही भाषा में बोल रहे हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जो चुपचाप बैठकर पढ रहे हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो अपने चेलों से खबर मंगा रहे हैं,प्रिट मंगा रहे हैं और पढ रहे हैं,जैसे प्रभाष जोशी।
प्रभाष जोशी-राजेन्द्र यादव जैसे लोग परंपरावादी हैं,कम्प्यूटर से अपरिचित हैं, वे यह सोचते हैं कि उनकी सरस्वती को इंटरनेट भ्रष्ट कर देगा। इंटरनेट पर घूम -घूमकर गाली देने वाले,नेटलेखकों को गरियाने वाले जानते नहीं हैं कि नेट लेखन के लिए साहित्यिक और प्रेस के अतीत से मुक्त होकर सोचना परमावश्यक है। नेट रीडिंग और नेट लेखन में साहित्यिक अतीत और प्रेस अतीत की यादें और धारणाएं पग-पग पर बाधाएं खड़ी करती हैं। नेट लेखन शुद्ध लेखन है यह ऐसा लेखन है जिसने ‘साहित्य’ और प्रेस की परंपरागत धारणाओं,विधाओं ,आलोचना, साहित्य के इतिहास,प्रेस लेखन आदि सबको लेखन में रूपान्तरित कर दिया है। अब सारी दुनिया में सिर्फ लेखन है और कुछ नहीं लेखन ही सत्य है। लेखक,आलोचना, महानता, विद्वता,विधाएं आदि की स्वतंत्र सत्ता का अंत हो चुका है। अब सिर्फ लेखन बचा है । सब कुछ लेखन में समाहित हो चुका है। नेट का जगत खुला जगत है। साहित्य और प्रेस के बंद संसार से यह पूरी तरह भिन्न है। प्रभाषपंथी गुस्सैल दोस्त माफ करें उन्हें चाहे जितनी तकलीफ हो उन्हें नेट के खुलेपन को झेलना पड़ेगा,नेट का खुलापन अभिव्यक्ति की आजादी का चरर्मोत्कर्ष है।नेट में लिखे हुए को देखकर लेखक के विजन का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें भागीदारी के लिए उत्तेजना और गाली गलौज की भाषा की नहीं गंभीरता, निर्भीकता और तत्क्षण बुद्धि की जरूरत होती है। नेट लेखन में अपना विजन महसूस करने के साथ अन्य के विजन को भी महसूस करते हैं, गंभीरता से लेते हैं। नेट मूलत: प्रदर्शन की जगह है। यह बातचीत का आरामदायक स्थान नहीं है। हमारे पाठक तत्काल जिस स्थान पर टिप्पणी लिख रहे हैं उसे कम्प्यूटर सिद्धान्तकारों ने ‘हॉस्पीटल’ की संज्ञा दी है। वेब का पाठक जब भी लौटकर यहां पर आता है तो मूलत: ‘हास्पीटल’ में ही लौटकर आता है। हमें देखना होगा कि वह कितनी बार लौटता है उसका बार-बार लौटना नेट के पाठ की पुष्टि है।
वेब लेखक साधारण लेखक नहीं है। वह परंपरागत लेखक से बुनियादी तौर पर भिन्न है। यह आत्मसजग ,आलोचनात्मक और विचारक लेखक है। इसके पास प्रसिद्धि है,सूचनाएं हैं। आत्माभिव्यक्ति है। लेखन के साथ उसका परिवार,दोस्तों आदि से संबंध भी बना रहता है। वेब लेखक की प्रतिष्ठा,संपर्क और शिरकत में निरंतर वृद्धि होती है। जो लोग सामाजिक परिवर्तन करना चाहते हैं तो उन्हें वेबसाइट बनानी होंगी। वेबसाइट को पढ़ना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते तो सामाजिक परिवर्तन, न्याय, और सामाजिक सुधार आदि संभव नहीं है। इसके लिए हमें राजनीतिक वेबसाइट बनानी होंगी। जो लोग वेब पर मिलेंगे उनके बीच गहरे संबंध होंगे। वे स्वतंत्रचेता विचारक होंगे। उनमें सामुदायिकता की भावना ज्यादा होगी। पुरानी तर्क प्रणाली में तर्क बदलने की गुंजाइश नहीं है। जबकि नेट में तर्क परिवर्तन की पर्याप्त संभावनाएं हैं। यह परंपरागत पाठ से भिन्न पाठ है। लिंक के कनेक्शन पर आधारित है।इसके कारण उसका सूचना आधार विकासशील है। उसमें निरंतर वृध्दि होती रहती है।वह यूजर के चारों ओर माहौल बनाए रखता है। प्रभाषपंथी इस बात से दुखी हैं कि उनके बारे में अनाप-शनाप लिखा जा रहा है। ये नादान दोस्त हैं जानते ही नहीं हैं कि इंटरनेट में कोई चौकीदार नहीं होता, कोई छलनी नहीं होती । इंटरनेट छलनी को अपदस्थ कर देता है। चयन में इस्तेमाल होने वाली सेंसरशिप को खत्म कर देता है। वह आधिकारिक तौर पर चीजों की छानबीन नहीं करता। इंटरनेट यह मानकर चलता है कि शिक्षित समाज में छलनी की जरूरत नहीं होती।सामान्य तौर पर लोग इतने जागरूक होते हैं कि वे गुणवत्तामूलक और अन्य सामग्री में फर्क कर लेते हैं। छलनी की जरूरत पूर्व शिक्षित संस्कृति के युग में होती है। प्रभाषपंथी भूल गए हैं कि आज हम मध्यकाल से आगे आ चुके हैं। शिक्षित समाज में अबाधित सूचना प्रसार सामान्य और अनिवार्य जरूरत है। इसमें कुछ खतरे भी हैं। किंतु यदि हम स्व-प्रशासन की दिशा में आगे जाएंगे तो जोखिम तो उठाना होगा। इसके लाभ बहुत हैं। यहीं पर एक पुराना सवाल पैदा होता है कि सेंसरशिप को सेंसर कौन करेगा ? उल्लेखनीय है कि प्रत्येक यूजर अपने तरीके से छानता है।चयन करता है।अत: शुरू से छानकर देना सही नहीं होगा।हम यह कैसे तय करेंगे कि पाठक क्या चाहता है। पाठक क्या चाहता है इसे पाठक ही तय करेगा अन्य कोई तय नहीं कर सकता। आज का दौर समस्या केन्द्रित अध्ययन का दौर है। यह परीक्षा का दौर नहीं है। आज हमारे बच्चों के पास भी आलोचनात्मक विवेक है। यह ऐसा दौर है जिसे मीडिया के संदर्भ केसहारे पढ़ा नहीं जा सकता। इसे वेब के सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए।वेब के जरिए लाखों-करोडों चैनलों ने हमला बोला हुआ है। यह वेब का हमला है। इसकी छानबीन संभव नहीं है। इसकी छानबीन का कोई तरीका भी नहीं है। यह पूर्णत: अराजक अवस्था है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से लेखन ,रीडिंग और वाचन की तुलना में टाइपिंग अस्वाभाविक और घातक गतिविधि है। कम्प्यूटर क्रांति ने इसे चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया है। लिखने से क्या लाभ होता है यह सब जानते हैं।वाचन से इंटरनेट पाठ की ओर संक्रमण मानवीय प्रगति का चरमोत्कर्ष है।यह अभिजात्य संप्रसार से व्यक्तिगत सृजन और स्वायत्तता (इंटरनेट) का विकास है। यह संपादक ,लेखक और बुद्धिजीवी की परंपरागत सत्ता के अंत की सूचना है।
पता नहीं समकालीन किस अख़बार और अपनी किस अपेक्षा की श्रेष्ठता में गाफ़िल आप लोग जनसत्ता की पतनगाथा सुना रहे हैं…मैं तो उसके गौरवशाली अतीत में इस दुनिया में ही नहीं था.और अभी इस दुख में हूँ कि यहाँ तमिलनाडु में एक ही कामचलाऊ हिंदी अख़बार है.राजस्थान पत्रिका.सारे श्रेष्ठ अख़बारों को नेट पर ही देखकर एक ही बात सोचता हूँ काश! जनसत्ता जैसा कोई पेपर पढने को मिल पाता.आलोक तोमर जी, जैसे आप प्रभाष जी के प्रति कृतज्ञता महसूस करते हैं वैसे ही जनसत्ता से निकाले जाने की बिल्कुल इंसानी शिकायत भी तो दिल में रखते होंगे..भक्ति तो बेशक मध्यकालीन आचरण ही है पर आलोचना के सामने भी तो आदर्श होना चाहिए…
आलोक तोमर दमदार आदमी हैं और उनकी बातों में दम है।
अभी दिलीप मंडल ने प्रभाष जोशी-राजेंद्र यादव की ‘साठोत्तरी पीढी़’ के जातिवादी ‘माइंडसेट’ पर जो शानदार पोस्ट लगाई है, उसके बाद ऐसे ‘जलेबी-वादी’ (डाग-सर्किलिंग) बेहद लंबी और अपचनीय, अपठनीय टिप्पणियां बहस को पटरी से उतारने का ही काम कर रही हैं। बात ब्राह्मणवाद और जातिवाद के हिंदी में वर्चस्व और जकड़बंदी पर चल रही थी, जनसत्ता के सर्कुलेशन के गिरने-उठने पर नहीं। माफ़ करें जगदीश्वर जी और आलोक तोमर जी, आपकी जुगलबंदी हमारी समझ में अच्छी तरह से आ रही है।
वाकई आलोक तोमर की कलम धारदार है। देखिए न, उन्होंने एक-एक कर के हर किसी को कमजोर साबित कर दिया। बनवारी अच्छे इंसान हैं, लेकिन नेतृत्व क्षमता नहीं। व्यास दलाली पर उतर गए फिर भी ब्यूरो चीफ बनाए गए। जितेंद्र बजाज संपादक बने, लेकिन संपादक की काबिलियत उनमें नहीं थी। अच्युत्यानदं जी बहुत भले इंसान हैं लेकिन वे रिश्ते निभाने और पत्रकारिता के बीच की संधि रेखा को कभी निभा नहीं पाये। मतलब एक संपादक के लिए ज़रूरी गुण उनमें भी नहीं था। खुद आलोक तोमर झगड़ने वाले इंसान थे लेकिन चीफ रिपोर्टर बने और एक जगह के प्रभारी भी। मतलब कमाल की टीम बनाई थी प्रभाष जी ने। सारे भक्त चुन कर बिठा दिए थे। एक से बढ़ कर नगीने चुने थे उन्होंने। अब समझ में आ रहा है कि जनसत्ता का इतनी जल्दी कल्याण क्यों हो गया।
आलोक तोमर के इस लेख को पढ़ने से लगता है कि एक संस्थान को चलाने के लिए जो दूरदर्शिता चाहिए वो प्रभाष जोशी में नहीं थी। ऊपर से घोर साम्प्रदायिक और जातिवादी। बावजूद इसके वो महान हैं। दरअसल महान प्रभाष जोशी नहीं हैं बल्कि आलोक तोमर जैसे उनके तमाम शिष्य हैं।
आप आलोक तोमर को इतनी गंभीरता से रहे हैं, जिसे न प्रभाषजी ने भरोसे का समझा न हिंदी समुदाय ने ही? प्रभाषजी ने अपने उस मशहूर साक्षात्कार में कहा है: “जहां तक आलोक की बात है, एक आर्टिकल था, गिरिराज किशोर का था। लेख छपने के लिए पूरी तरह तैयार था। उसने कंप्यूटर पर सब उल्टा-पुल्टा कर दिया था। वह कंप्यूटर आलोक का था। उसे जाना पड़ा।….ऐसे कई लोग थे जो जनसत्ता से जाने के बाद फिर कभी नहीं बढ़े। जब मेरी पांच किताबों का एक साथ विमोचन था, तब अमर-उजाला के समूह संपादक (अब ग्रुप प्रेसीडेंट, न्यूज) शशि शेखर ने कहा था ‘हम जनसत्ता में आलोक तोमर का नाम सुनते थे। अब वो कहां हैं, किसी को नहीं पता।”….
आलोक तोमर का कोई चरित्र नहीं है और ऐसे लोग हिंदी में भरे पड़े हैं] राहुल देव की नौकरी कर रहे हैं तो उनके गुण गा रहे हैं और ओम थानवी को नाकारा बता रहे हैं! उन्हें क्या पता नहीं है की राहुल देव और अच्युतानंद मिश्र को जनसत्ता सौपने में प्रभाषजी का कोई रोल नहीं था – जबकि ओम थानवी प्रभाष जोशी की सलाह पर चंडीगढ़ से दिल्ली बुलाए गए? जनसत्ता आज प्रबंधन की उपेक्षा का शिकार है और प्रभाषजी पर तो रामनाथ गोयनका का विशेष वरदहस्त था परन्तु अगर प्रतिकूल हालातों में भी ओम थानवी जनसत्ता की गंभीर स्पेस बनाए हुए हैं तो इसमें उन्हें कोसने की ज़रुरत है? लगता है आलोक तोमर थानवीजी से कोई खुन्नस निकाल रहे हैं या फिर बहस को जानबूझ कर दूसरी दिशा में गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं]
आलोक तोमर ने क्या लिखा इसपर बहस होती है तो ये लिखे हुए को सार्थक बनाता है मगर आलोक तोमर ने किस ढंग से लिखा है इसपर कोई बहस करता है तो यह बहस करने वाले का दम्भीपना ही होगा…क्योंकि आलोक तोमर जैसे तेवर कम ही देखने को मिलते है…वे जिस ढंग से लिखते हैं वह बेजोड़ है…मैं जगदीश्वर चतुर्वेदी जी से भी थोडा असहमत हूँ…आलोक तोमर हमेशा ही यथार्थ ढंग से स्वाभाविक शैली में ही लिखते रहें है…जहाँ जिस प्रकार के तेवर होने चाहिए वैसे ही पाए जाते है आलोक जी के लेखन में…अब अगर कोई फर्क दिख रहा है तो यह फर्क है पाठक के नजरिये का…तोमर जी के तेवर में फर्क आया है इसका फैसला भी जगदीश्वर जी खुद ही कर रहें है और नेट लेखकों की आलोचना को इसका श्रेय देकर नेट लेखकों की महत्ता स्थापित करने की चेष्टा कर रहें हैं बेवजह…जगदीश्वर जी अक्सर नेट लेखन का महिमा मंडन करने की फिराक में दिखाई पड़ते हैं जल्दबाजी के साथ…भाई नेट भी एक माध्यम है अपनी बात कहने का, इसे सहज ही माना जाना चाहिए…आप नेट पर लिखने वालों व प्रिंट पर लिखने वालों के बीच खाई क्यों खोद रहें है, उनके बीच खामख्वाह प्रतिद्वंदिता क्यों पैदा कर रहें हैं…कृपया अन्यथा न ले…
इसी पेज पर एक ताजा खबर और है इलाहाबाद विश्वविद्यालय की…हर बात पर लट्ठ लेकर पीछे पड़ जाने वाले नेट लेखकों के पास इस पर लिखने को कुछ नहीं हैं क्या…
अगर तोमर साहब और चतुर्वेदी जी को समझना हो तो दो फिल्मों को याद करना ज़रूरी है। पहली है १९९८ में बनी जिम डोनोवन द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘प्रोवोकेट्योर’ (भड़काने वाला)। तोमर साहब वही हैं। प्रभाष जोशी के फ़ाशीवादी ब्राह्मणवादी सोच पर नेट पर बहस चलाने वाले लोगों को अपनी गब्बर सिंह-गुलशन ग्रोवर मार्का डायलाग से भड़का कर फोकस अपनी ओर कर लिया। दूसरी बड़ी मशहूर फिल्म है १९४२ में हिचकाक के निर्देशन में बनी ‘साबेट्यूर’ (बहकाने-भटकाने वाला) चतुर्वेदी जी वही हैं। आप लोग मासूमियत और ईमानदारी से जातिवाद पर बहस कर रहे हैं और ये दोनों पूरी चालाकी और होशियारी से, दिल्ली जाती गाड़ी की स्टेयरिंग घुमा कर उसे झुमरी तलैया ले जा रहे हैं। राजनीति में भी कुछ लोगों की ‘न्यूसेंस वैल्यू’ होती है और उन्हें जान बूझ कर वहां रखा जाता है। जैसे जनता पार्टी के शासकाल में राज नारायण की थी। पार्टी को तोड़-ताड़ कर उसका पटरा बिठाने में उनकी कमाल की ‘अदाकारी’ रही। कांग्रेस के समय के.के. तिवारी को याद करें या सुब्रह्मण्यम स्वामी नाम के ‘कैरेक्टर’ को।
आप लोगों के भोलेपन पर तरस आता है यारो। क्रीज़ पर खड़े हुए आप चारों ओर झाड़ू की तरह बल्ला घुमा रहे हो, बिना देखे कि बालर किधर है? बाल किधर से आ रही है? मैच किसके खिलाफ़ हो रहा है? बस अपनी पीठ ठोक रहे हो कि ‘वाह ! क्या जमा कर मारा ! धो डाला !’
असली धुलाई किसकी हो रही है ये ऊपर के दोनों ‘धोबी’( इसे जाति नहीं मानें, चाहें तो ‘ड्राईक्लीनर’ कह लें) जानते हैं…….या फिर हमारे जैसे दर्शक, जो अब पटरी से उतार दी गयी बहस पर ताली बजाना भी भूल चुके हैं। अफ़सोस, दिलीप मंडल और अविना्श के शानदार आलेख धो डाले गये।
लगे रहो मुन्ना भाइयो ! लगे रहो ! टाइमपास मूंगफली की तरह।
हम जनसत्ता पर नहीं प्रभाष जोशी की जातीय स्थापनाओं पर बात करना चाहते हैं लेकिन लगता है प्रभाष जोशी ने तोमर और चतुर्वेदी के इस काम के लिए लगा रखा है कि उनके कुकर्मी विचारों पर बात ही न हो। पता किया जाना चाहिए कि कहीं जोशी जी ही तो चतुर्वेदी के नाम से नहीं लिख रहे हैं। तोमर और चतुर्वेदी बातचीत को उस पिच पर ले जाते हैं जहां मैच हो ही नहीं रहा है। चतुर्वेदी की मार ज्यादा घातक है, जातिवाद इसी बारीक तरीके से ऑपरेट करता है। तोमर तो हमेशा से नॉनसीरयस है। कैटस्कैन एक्सरे से पूर सहमति है।
कैटस्कैन एक्सरे और शंबूक जी,आप दोनों के चुटीले भाव ने जो सुख दिया है वह पूरी बहस ने नहीं दिया,काश हमें भी ऐसा लिखना आता,आप दोनों सचमुच प्रशंसा के लायक हैं, मैं प्रभाष जोशी का नहीं आप दोनों का दोस्त हूं। आप ऐसे ही लिखें मुझे बेहद अच्छा लगा है,यही शैली आपके नेट की जान है।
आलोकहीन तोमर…ये तुम्हारी कोई दुखती रग है या कुंठा… जनसत्ता अगर कोई नहीं पढता, वो भींगा पटाखा, फ़िल्मी पैरोडी आदि बन चुका है तो उसमें प्रभाष जोशी स्वयं और चतुरसुजान अशोक वाजपेयी, डॉ कृष्ण कुमार, प्रयाग शुक्ल, विनोद कुमार शुक्ल, ध्रुव शुक्ल, बनवारी, राजकिशोर, वेदप्रताप वैदिक, सुरेन्द्र किशोर, साजिद रशीद, मंज़ूर एहतेशाम, मुशर्रफ आलम ज़ौकी, डॉ सुधीर चन्द्र, सुरेन्द्र मोहन, केदारनाथ सिंह, विजयमोहन सिंह, विजयबहादुर सिंह, पंकज सिंह, निर्मला जैन, नन्दकिशोर आचार्य, मंगलेश डबराल, ऋतुराज, अपूर्वानंद, कैलाश वाजपेयी, अनामिका, अलका सरावगी , गगन गिल, गीतांजलिश्री, राजेश जोशी, चंद्रकांत देवताले, , सुधीश पचौरी, अजय तिवारी…. इत्यादि सब क्यों लिखते हैं???
ये अनामदास कोई जनसत्ता का आदमी मालूम पड़ता है!
अनामदेव जी,जिन लेखकों के आपने नाम दिए हैं वे अपने विचारों की अभिव्यक्ित के लिए लिखते हैं, जनसत्ता का स्वरूप एक लघु पत्रिका के संस्करण जैसा होता जा रहा है,कृपया अखबार की नजर से जनसत्ता को देखेंगे तो आलोक तोमर की बात का मर्म समझ में आ जाएगा। महज शब्दों को लेकर झूलने से कोई फायदा नहीं है। जनसत्ता आज भी कारपोरेट घराने का अखबार है और बडा अखबार है, हो सकता है कल कोई जादू हो और यह अखबार पहले से भी ज्यादा तेज गति से दौडने लगे,इसे कोई विदेशी कंपनी खरीद ले और सारा कामकाज पेशेवर ढंग से होने लगे,लेकिन यह संभावना ही है ,लेकिन कभी भी साकार हो सकती है,आज की तिथि में वास्तविकता यह है कि जनसत्ता ने अपने को साहित्य की लघु पत्रिका जैसा बना लिया है, जनसत्ता के पतन से सभी पत्रकार दुखी हैं,जनसत्ता की मौजूदा दशा किसी भी रूप में स्वीकार करने लायक नहीं है,इसके लिए व्यक्ितगत दोषारोपण करने की नहीं हिंदी प्रेस में पेशेवर रवैयये के अभाव को बुनियादी रूप में जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, अभी जो जनसत्ता के संपादक हैं या जो लोग पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं,निश्चित रूप से वे बधाई के पात्र हैं कि इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी वे अखबार निकाल रहे हैं,लेकिन इससे क्या होगा ? क्या अखबार बचेगा ? किसी अखबार के पास शानदार लेखक हैं,जैसाकि जनसत्ता के साथ हैं,लेकिन अखबार गैर पेशेवर तरीके से निकल रहा है और जनसत्ता की यही बुनियादी असफलता है प्रतिष्ठानी प्रेस का अखबार होने के नाते।प्रतिष्ठानी प्रेस के कायदे,तरीके,तकनीक,प्रबंधन, पत्रकारिता का कौशल,पूंजी निवेश आदि सबमें जनसत्ता पिछड गया है,बेहतर यही होगा उसे कोई देशी विदेशी मीडिया कंपनी आकर खरीद ले तो कम से कम अखबार की तरह चलेगा तो सही।जनसत्ता को लेखकों के साथ पूंजी,तकनीक और प्रबंधन के आधुनिक मार्ग पर लाने वाले लोगों की जरूरत है,सिर्फ लेखकों की लंबी सूची अखबार को डुबो देगी।
हां हरीश भाई, अनामदेव पक्का जनसत्ता की ब्राह्मणसत्ता का कोई ‘मुंह-ढांकू’ एजेंट है। कैट्स्कैन एक्सरे का ‘दाती गुरुमंत्र’ सिग्नल मार रहा है कि उसका नाम आखीर में लिखा हुआ है…। …अजय तिवारी। पक्का यार …हंड्रेड वन पर्सेंट पक्का !
जनसत्ता की रोटी नहीं खाता, पर उसे बिना नागा पढता हूँ साहिबेआली जबसे निकला, तब से हर संपादक के दौर की अच्छी बुरी भी सब गिना सकता हूँ… प्रभाष जोशीजी ने जनसत्ता जैसा नायाब पत्र निकाल कर इतिहास बना दिया परन्तु राजनेताओं के इर्दगिर्द घूमते रहे कभी वीपी सिंह कभी चन्द्रशेखर देवीलाल या दिग्विजय सिंह और इसका प्रभाव भी बहुत दिखा..राहुल देव और मिश्र संघ के थे पर अखबार को संघ की छाया थोडा ही दूर रखा पर उसकी धार ख़त्म कर दी…ओम थानवी ने डूबते जनसत्ता को बचा तो लिया और रंगीन और १२-१४ पन्ने कर अखबार बंद होने की अफवाहें ख़त्म करवा दी …उनमें राजनितिक संतुलन भी है… पर अखबार साहित्य कला से भर डाला है ..
परन्तु बात इतनी ही थी कि आलोक तोमर क्या चीज़ है?? एक दल्लाल किस्म का भाषाई बाजीगर.. उसे इतनी इम्पोर्टेंस क्यों दे रहे हैं…वो अपनी मौत मर चुका और उसे लगता है बाकी सब भी ख़त्म हो गया जनसत्ता भी… यारों वो असली बहस से ध्यान हटाने कि सफल साजिश कर गया है…
जगदीश्वरजी, आलोक तोमर का “मर्म” आपने खूब समझा दिया और जनसत्ता विदेशी मीडिया कब्जे में ले इस सुझाव का मर्म भी समझ आ गया.. जगत ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है…आपके पास समय तो खूब है.. परन्तु यह समझने का विवेक नहीं कि कल जिस तोमर को गरिया रहे थे वो आज मर्मभेदी कैसे हो गया? जनसत्ता शक नहीं कि लघु पत्रिका या साहित्यिक पत्रिका बन गया है, कम से कम रविवार के दिनों को, पर उसे विदेशी मीडिया कंपनी क्या बना डालेगी सोचा है? बहस और बकवास में थोडा तो फर्क रखो मित्र! और ये भी याद रखो कि बहस का मुद्दा क्या था…
अनामदेवजी, जो बात आलोक तोमर से कही थी वही आपके लिए भी है, तर्क,विवेक और सहिष्णुता के साथ संवाद करें,आप अच्छे पाठक और लेखक हैं,अधीर होने से कुछ भी नहीं होगा, आपने धैर्य और आलोचना दोनों का असर देख लिया है, आलोक तोमर ठीक से बातें कर रहे हैं, उन्ासे और आपसे कोई व्यक्तिगत झगड़ा नहीं है। आप भी दोस्त हैं ।आपका मन नहीं जीतेंगे तो नेट लेखन का लाभ ही क्या ? मैंने आपसे जो कुछ कहा है वह बकबास नहीं है,यह जनसत्ता का भविष्य बता रहा हूं, उसी दिशा में एक्सप्रेस ग्रुप जा रहा है,देख सको तो देख लो, मैं उदाहरण देकर आपका समय बर्बाद नहीं करना चाहता ,आप गंभीर पाठक हैं थोड़ा समय इधर उधर नेट पर दें,सारी सूचनाएं पा जाएंगे। राष्ट्रभक्त अखबारों को हाल के वर्षों में ही बिकते देखा है, संसद में जो संपादक प्रेस में विदेशी पूंजी निवेश के खिलाफ चीख-चीखकर विरोध कर रहा था,विरोध में संपादकीय लिख रहा था, प्रेस में विदेशी पूंजी निवेश का कानून पास होते ही सबसे पहले बाजार में बिकने चला आया,उसी पंक्ति में एक्सप्रेस ग्रुप भी खडा है। जरा गौर से चीजों को सतर्क पाठक की तरह देखें।मेरी इस बात को कहने यह अर्थ नहीं है कि ओम थानवी अथवा अन्य जनसत्ता कर्मी या एक्सप्रेस ग्रुप के कर्मी राष्ट्रभक्त नहीं है, बंधु यह पेशे की मजबूरियां हैं, मीडिया के धंधे में यह सब होता है आप बेहद खफा हो रहे हैं। दूसरी बात आलोचना और गरियाने में अंतर होता है। आलोक तोमर गलती करेंगे तो बाद में आलोचना की जाएगी,लेकिन जो बात उन्होंने कही है वह सच है, मैं फिर दोहरा रहा हूं, आप जैसे पाठकों के लिए ही मैंने इसी पन्ने पर विस्तार से टिप्पणी लिखी थी, कृपया ध्यान से पढ़ें, काम आएगी,बकबास लगे तो इस्तेमाल मत करना। हम लगातार कोशिश कर रहे हैं कि मुद्दे पर बहस हो ,साथ ही नेट पर लिखना,पढना ,संवाद करना भी सीखें,उसके तरीके भी सीखें,नियम भी जानें,थ्योरी भी जानें,और घूम फिरकर उसके चारों ओर बहस चल रही है,जनसत्ता का प्रसंग प्रभाष जोशी के महान व्यक्तित्व और उनके अधर्मनिरपेक्ष संपादन के संदर्भ में उठा था,जनसत्ता क्या है और किस रास्ते होते हुए आज की बदहाली तक पहुंचा है यह हमारी ही मांग थी जिसको अंतत: आलोक तोमर ने बड़े ही संतुलन के साथ पेश किया है,आप कुछ देर के लिए आलोक तोमर को नहीं उनके लिखे को पढें,आप बार-बार व्यक्ितयों की जिंदगी में लौटकर जा रहे हैं ,यहीं पर सारी मुश्किलें छिपी हैं,आपसे अनुरोध है कृपया लिखे हुए शब्दों को पढें और उस पर ही प्रतिक्रिया दें,प्रतिक्रिया शालीन हो अथवा आप जैसी चाहें दें, यह आपके स्वभाव और मिजाज पर निर्भर करता है। आप किंतु बने रहें।
मृत हो चुके अलोक तोमर को जिस अंतरजाल की संजीवनी से चंद साँसे मिली हैं पर अपने पुराने दलाली प्रथा का विवेचना और उसका हितैषी साबित करना संग ही दलाली प्रथा के अगुआ और इनकी आकाओं का वर्णन सराहनीय है.
पत्रकारिता के गर्त में जाने के ये ही कारण रहे हैं. और तोमर जी दलालों के साथ दलाली प्रथा के पक्ष में बहस सिर्फ अपने इन मृत पत्रकारों को वापस लाने के लिए कर रहे हैं, हिन्ढी अखबार के पाठक और पत्रकारिता को करीब से जानने वाले इन सभी घटनाक्रम से वाकिफ हैं और हिन्दी पत्रकारिता के नासूर जनसत्ता को नकारने के गवाह भी, हमने और सभी ने देखा है कि जनसत्ता जनता को सत्ता तक तो नहीं पहुंचा पाया हाँ जनसत्ता के पत्रकार जरूर सत्ता की दलाली करते रहे.
आलोक तोमर को गालियाँ दे कर या उनको मुर्दा बता कर आप ज़िंदा हो जाओगे दोस्त? अगर हो पाओ तो मुबारक . वैसे एक शेर अलोक जी के सम्मान में आपके लिए अर्ज़ है—
उसकी बर्बादी पे तरस खाने वालो, मुझे माफ़ करो
वो अभी ज़िंदा हैं, और तुमसे जियादा जिंदा.
आलोक जी की तरह एक वाक्य तो लिख कर दिखाओ अनाम और कबीर ”दासो”. वे अकेले पत्रकार हैं जो बगैर दलाली किये दक्षिण दिल्ली में रहते है, लम्बी गाडी में डीवीडी प्लेयर लगाकर घुमते हैं और हर साल विदेश जाते हैं. वे सीरियल लिखते हैं और उनके एक लेख का औसतन भुगतान २००० रुपये है.
भगतजी, यह भी तो बता दो कि आपराधिक पत्रकारिता के लिए वे तिहाड़ जेल में सजा काटते हैं, जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं, किसी के लेख में ख्रुराफात करने कि वजह से नौकरी से हाथ धोते हैं, शराब पीकर झगडे करते हैं, नशे में गाडी टकरा कर पत्नी के बत्तीस टाँके लगवाते हैं, जया भादुडी से शादी के सपने देखते हैं, प्रभाष जोशी की वकालत के नाम पर उन्ही को काटने का काम करते हैं, नूरा से दोस्ती गांठते हैं और दुबई जाकर दाऊद से मिलते हैं, उस नरसंहारी से गिफ्ट लेकर खुश होते हैं, देश में लोगों को धमकियाँ देते हैं, जातिवादी होकर क्षत्रिय आचरण दिखाते हुए बदला लेने की बातें करते हैं, चंद्रास्वामी की सेवा करते हैं और वहां से भी मेवा पाते हैं, माधवराव सिंधिया से लेकर अर्जुन सिंह तक सब से फायदा उठाते हैं….. ‘भगतजी’ ये सब बताने के बाद कहिये कि तोमर साउथ दिल्ली में रहते हैं और लम्बी डीवीडी प्लेयर वाली गाडी रखते हैं तो सबको आसानी से समझ में आ जाएगा कि आप क्या कहने चाहते हैं!
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