जनसत्ता के बारे में अर्धसत्यों से बचो

आलोक तोमर

at1वरिष्‍ठ पत्रकार आलोक तोमर ने जनसत्ता के बहाने प्रतिष्ठित पत्रकार प्रभाष जोशी के वैचारिक आग्रहों पर जो बहस चल रही है, उस पर तो नहीं लिखा है – कुछ पुरानी बातों का एक कोलाज़ बनाया है। इस राइटअप में उन्‍होंने पत्रकारिता में जनसत्ता के उस प्रयोग के बारे में जानकारी दी है, जो भाषाई और तेवर के स्‍तर पर हुए। आलोक तोमर इस पूरी बहस में एक निजी पाठ के साथ आये हैं – जो कहीं भी पुराने जनसत्ता के वैचारिक धुंध को विश्‍लेषित नहीं करता। विजिटर्स की जानकारी के लिए बताएं कि आलोक तोमर इन दिनों सीएनईबी न्‍यूज़ चैनल से जुड़े हैं, जिसके मुखिया वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल देव हैं: मॉडरेटर

जनसत्ता के उत्थान और पतन को लेकर इन दिनों एक बड़ी बहस छिड़ी हुई है। जनसत्ता रॉकेट की तरह आसमान में गया था और इन दिनों भीगा हुआ पटाखा बन कर रह गया है और बहुत सारे मित्र इसका दोष प्रभाष जी पर मढ़ते हैं। तर्क के स्तर पर शायद यह कहा जा सकता है कि प्रभाष जी ने एक बड़ा प्रयोग किया था, जो सफल हुआ मगर सातत्य के अभाव में वह धीरे-धीरे छीजता गया और अंतत: असफल हो गया।

मैं जनसत्ता के आदिवासियों में से हूं, यानी उस टीम में से जिसने पहला अंक निकाला था, इसलिए कुछ बातें साझा करना चाहता हूं। जनसत्ता जिस समय सामने आया, तो प्रभाष जी का सपना था कि बोलचाल और मुहावरे की भाषा में नये तेवर वाला एक अखबार निकाला जाए। बाहर वाले नहीं जानते कि उस समय एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका प्रभाष जी को इंडियन एक्सप्रेस का प्रधान संपादक बनाना चाहते थे और प्रभाष जी ने विनम्रता लेकिन दृढ़ता से कहा था कि उन्हें हिंदी में यह प्रयोग करने दिया जाए। गोयनका मान गये थे। पहले दिन जो अखबार निकला था, उसमें प्रूफ की प्रचंड अशुद्वियां थीं लेकिन लेआउट नया था, भाषा में तेवर था और खबरों में सरोकार था। इसीलिए पाठकों ने हाथों-हाथ लिया। प्रभाष जी को जल्दी ही पहले पन्ने पर लिखना पड़ा कि अब हम ज्यादा नहीं छाप सकते, आप अपना अखबार मिल बांट कर पढ़िए।

फिर जनसत्ता के कई संस्करण हुए। मैं इसे प्रभाष जी के निर्णय की भूल मानूंगा कि उन्होंने स्थानीय संपादक के तौर पर आमतौर पर ऐसे लोग नियुक्त किये, जो बहुत विद्वान थे मगर अखबार सिर्फ विद्वत्ता से नहीं चलता। उसके लिए प्रभाष जोशी वाली जिद चाहिए, जो इन सब में नहीं थी। बनवारी जी लगभग संत थे और उन्हें दिल्ली का स्थानीय संपादक बना दिया गया। वे ऐसे भोले बाबा थे कि एक साथ इतने लोगों को छुट्टी दे देते थे कि डेस्क पर कोई बचता ही नहीं था और फिर खुद प्रभाष जी को मुख्य उपसंपादक की भूमिका में आना पड़ता था। ब्यूरो चीफ और राजनीतिक संपादक बनाया हरिशंकर व्‍यास को, जो जल्दी ही दलाली की राह पर चल निकले। बाकी सब तो छोड़िए, प्रभाष जी जानते थे कि मैं टीम को साथ ले कर चलने वाला आदमी नहीं हूं और बहुत जल्दी झगड़ा कर बैठता हूं, मगर मुझे बना दिया चीफ रिपोर्टर। हिंदी पत्रकारिता में मुझसे नालायक चीफ रिपोर्टर दूसरा नहीं मिलेगा।

जितेंद्र बजाज को चंडीगढ़ का संपादक बना कर भेजा गया। वे सर्वोदयी विचारधारा वाले और बहुत शालीन व्यक्ति थे लेकिन अखबार के तीन कॉलम के शीषर्क में छत्तीस प्वाइंट में कितने शब्द आने चाहिए, इसका उन्‍हें पता नहीं। चंडीगढ़ संस्करण कभी चल ही नहीं पाया क्योंकि इसके बाद ओम थानवी भी वहां पहुंचे, तो एक तो संस्करण की हालत पहले से खराब थी और दूसरे ओम थानवी अपने निजी ठाठ-बाट में ज्यादा भरोसा करते थे।

राहुल देव को पहले मुंबई संस्करण का संपादक बनाया गया और उन्होंने बहुत चैतन्य भाव से अखबार चलाया। जनसत्ता का पहला संझा संस्करण और रविवार को अच्छी-खासी पत्रिका देने की शुरुआत की। मगर जब रामनाथ गोयनका नहीं रहे तो उनके दत्तक पुत्र और असली पौत्र विवेक खेतान से विवेक गोयनका बने साहब का अखबार से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हे चौंतीस मंज़‍िल का एक्सप्रेस टॉवर विरासत में मिल गया था और साथ ही एक्सप्रेस समूह की परंपरा का स्वामी होने का दंभ भी उनके अंदर आ गया था। जनसत्ता अचानक एक्सप्रेस समूह का सौतेला बेटा बन गया था और आज तक बना हुआ है।

प्रभाष जी साठ साल की उम्र होते ही ज़‍िद कर के रिटायर हुए और कुछ दिन अच्युत्यानंद मिश्र ने अख़बार संभाला। अच्युत्यानदं जी बहुत भले इंसान हैं लेकिन वे रिश्ते निभाने और पत्रकारिता के बीच की संधि रेखा को कभी निभा नहीं पाये। अब वे अनुभव का लाभ माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के छात्रों को दे रहे है। गुरु के तौर पर काफी आदरणीय हैं।

राहुल देव अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों पर अधिकार रखते हैं और मेरे जीवन का एक मूल मंत्र उन्होंने ही दिया है और वह यह है कि लोग लोगों के बारे में जानना, पढ़ना और देखना चाहते है। लेकिन हर महाप्रयोग को अपना बार-बार अविष्कार करना पड़ता है, जो जनसत्ता ने दुर्भाग्य से नहीं किया। उसके साथ वही हुआ, जो दिनमान के साथ हुआ था। अपने अतीत के गौरव के टीले पर बैठ कर इसके सारे साथी बांसुरी बजाते रहे और आज भी बजा रहे हैं और यह भी ध्यान नहीं रखते कि कितने बेसुरे हो रहे हैं।

जनसत्ता कितना बड़ा प्रयोग था कि यह इसी बात से जाहिर है कि इसने पूरी भारतीय पत्रकारिता की भाषा और व्याकरण बदल डाला। यह प्रभाष जी का सपना था, जो पूरा हुआ और जैसे ही प्रभाष जी ने हाथ हटाया, टूट गया। अब जो चल रहा है, वह मूल जनसत्ता की एक फूहड़ फिल्मी पैरोडी है – जिसे पढ़ने वाले इतने कम हैं कि बताने में भी शर्म आती है। भाषा नाम की समाचार एजेंसी बंद हो जाए तो जनसत्ता को अपने पन्ने खाली कर के छोड़ने पड़ेंगे। जमाना हो गया, जब जनसत्ता ने कोई खोजी रिपोर्ट छापी है। प्रभाष जी के जमाने में खोज खबर और खास खबर नाम के दो पन्ने सप्ताह में छपते थे।

हां, प्रभाष जी का कसूर है। यह कसूर उस व्यक्ति का है, जो देश में कांग्रेस विरोधी और बिना भाजपा के बनने वाली एक सर्व निरपेक्ष सरकार का सपना देखना चाहता था। विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे राजीव गांधी के चारण ने बोफोर्स के बहाने बगावत की तो एक्सप्रेस समूह को लगा कि एक और मसीहा मिल गया है। प्रभाष जी एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गये और उनका ज़्यादातर वक्त देवीलाल और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ बीतने लगा। कभी वे चंद्रशेखर को मना रहे हैं, कभी अटल बिहारी वाजपेयी जी से कह रहे हैं कि धारा 370 वगैरह छोड़ कर पहले कांग्रेस की सरकार गिराओ। कभी बंगलौर में हैं, कभी बंबई में तो कभी चंडीगढ़ में। इसके बावजूद जब परम पाखंडी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी, तो भाजपा और वामपंथियों की बैसाखियों पर ही बनी। एक तथाकथित गैर कांग्रेसी सरकार का उदय हुआ, जिसमें सारे भूतपूर्व कांग्रेसी बड़े पदों पर बैठे थे और जनसत्ता का अस्त आरंभ हो गया।

जनसत्ता के साथ एक्सप्रेस समूह के प्रबंधकों का जो रवैया है, वह शर्मनाक है। जनसत्ता एक्सप्रेस बिल्डिंग की शानदार इमारत से निकलता रहा मगर सौतेले बेटे जनसत्ता को नोएडा में पटक दिया गया। ओम थानवी ने दिल्ली की एक अभिजन कॉलोनी में मकान लिया जबकि प्रभाष जी सारा जीवन जमुना पार रहते रहे और आज भी रहते हैं। जनसत्ता के पतन का इतिहास लिखने वाले प्रभाष जी को माफ नहीं करना चाहते, मगर अगर वे ऐसा चाहते हैं तो उनकी मर्जी। न प्रभाष जी को इससे कोई फर्क पड़ता है और न मुझे। मेरी तो एक छोटी-सी प्रार्थना है कि सामने आ कर जनसत्ता जैसा एक और प्रयोग कर के दिखाये और तब जा कर पुराने जनसत्ता की आलोचना करे। मेरी आलोचना करने से आपको कुछ नसीब नहीं होने वाला।

निवेदन एक और है। प्रभाष जी से मेरे रिश्तों के बारे में सवाल उठाने वाले पहले ज़रा इतिहास जान लें। मैं जुलाई 1983 में पत्रकारिता के सबसे छोटे पद प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर भर्ती हुआ था। रिपोर्टर बना, चीफ रिपोर्टर बना, प्रिसिंपल कोरस्पोंडेंट बना, ब्यूरो में अकेला था इसलिए ब्यूरो चीफ बना, रोविंग यानी घुमंतू रिपोर्टर बना, मुंबई में जनसत्ता का प्रभारी बना और फिर लौट कर दिल्ली में सहायक संपादक के पद पर काम किया। इसके बाद नौकरी से निकाल दिया गया। प्रभाष जी के जिस इंटरव्यू का हवाला दे कर लोग कहते हैं कि मुझे लतियाया गया था, उसमें भी उन्होंने कहा है कि कंप्यूटर आलोक का था, यह नहीं कहा कि मैंने कोई गड़बड़ी की है। आज तक मुझे टाइपिंग नहीं आती तो तब क्या आती होगी? इसलिए मुद्दे को मुद्दा रहने दो और जो बात करनी है वो करो।

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