साहि‍त्‍य लीला बंद करो राजेंद्र यादव

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

बहुत पहले एक कहानी आयी थी, शिवेंदु बाबू खामोश क्‍यों नहीं बैठते? ऐसे ही अपने जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी हैं। उनके लिखे पर कमेंट करने वालों का कारवां जम जाता है – फिर भी वे फिनिक्‍स की तरह राख के ढेर से उठ जाते हैं। अब देखिए कि देशकाल पर अपने बयान की इंटरव्‍यूनुमा सफाई में कथाकार राजेंद्र यादव ने जो कहा, जगदीश्‍वर जी ने सब लीप-पोत कर बराबर कर दिया है। आइए पढ़ते हैं : मॉडरेटर

rajendra yadavवे अपने (अ)ज्ञान पर गर्वित हैं। उन्‍हें यह भी भ्रम है साहि‍त्‍य का टोकरा उनके सि‍र पर रखा है। वे अपने को साहि‍त्‍य का ठेकेदार भी समझते हैं। उनके खि‍लाफ बोलो तो भक्‍तों की टोली टूट पड़ती है। वे बड़े हैं। महान हैं। आदरणीय हैं। साहि‍त्‍यकार सेनानी का पदक बांटते हैं। वे साहि‍त्‍य के सब कुछ हैं। वे चाहें तो आपको साहि‍त्‍यकार बना सकते हैं। चाहें साहि‍त्‍य के मैदान से खदेड़ सकते हैं।

वे साहि‍त्‍य लीला करते रहते हैं। वे साहि‍त्‍य के लीला कृष्‍ण हैं। उनके पास साहि‍त्‍य गोपों की टोली है। हिंदी साहि‍त्‍य के सभी मैदान उनके स्‍वामि‍त्‍व में हैं। उनके पास साहि‍त्‍यसेनानि‍यों की लंबी चौड़ी फौज है। वे सरस हैं। उदार हैं। लेकि‍न दुर्भाग्‍य से इति‍हास मूर्ख हैं। कल ही उन्‍होंने अपने (अ)ज्ञान का फि‍र से पि‍टारा खोला है और उसमें से जो तथ्‍य और वि‍चार व्‍यक्‍त कि‍ये हैं, वे हिंदी के लि‍ए चिंता की चीज हैं। देशकाल डाट कॉम में उन्‍होंने जो कहा है, वह हिंदी की साहि‍त्‍यि‍क पत्रकारि‍ता के संपादक की शोचनीय दशा का जीता-जागता प्रमाण है।

राजेंद्र यादव ने जाति‍ के आधार पर साहि‍त्‍य को देखने का अपना स्‍टैंड नहीं बदला है। भद्रता के नाते सि‍र्फ खेद व्‍यक्‍त कि‍या है। उनका बदला हुआ स्‍टैंड क्‍या है? यह भी बताने की ज़हमत उन्‍होंने नहीं की। राजेंद्र यादव इति‍हास और आलोचना की थ्‍योरी अथवा साहि‍त्‍यशास्‍त्र से अनभि‍ज्ञ हैं। वे जानते हैं कि‍ सृजन और कला का आधार जाति‍, नस्‍ल, रक्‍त, धर्म, जातीयता और राष्‍ट्र नहीं होता। हिंदी में जाति‍वाद सबसे प्रि‍य वि‍षय है और पापुलि‍ज्‍म बनाये रखने के लि‍ए जाति‍वाद, ब्राह्मणवाद आदि‍ का ढोल पीटने से साहि‍त्‍य की दुकानदारी वैसे ही चलती है, जैसे मायावती की चलती है। उन्‍हें मालूम ही नहीं है कि‍ साहि‍त्‍य के इति‍हास का समूचा ढांचा जाति‍ के आधार को चुनौती देता है। आज तक कभी कि‍सी ने जाति‍ को आधार बना कर हिंदी साहि‍त्‍य का इति‍हास नहीं लि‍खा, रामचंद्र शुक्‍ल के यहां लेखक के नाम के साथ जाति‍ महज गौण सूचना मात्र है।

राजेंद्र यादव ने लि‍खा, रामचंद्र शुक्ल को पढ़िए, उन्होंने तो जाति आधारित वर्णन ही किये हैं, ये कान्यकुब्ज़ हैं ये फलां हैं वगैरा वगैरा। इसी को कहते हैं शब्‍दों को पकड़ कर झूलना। शुक्‍लजी ने जाति‍ का लेखक के नाम के साथ संकेत दि‍या था, तो उसका मकसद यह नहीं था कि‍ इति‍हास को जाति‍ के आधार पर देखो। इति‍हास का आधार क्‍या है? वर्गीकरण का आधार क्‍या है? काल वि‍भाजन का आधार क्‍या है? साहि‍त्‍य को कैसे देखें? इन सबका उन्‍होंने अपने इति‍हास में यथास्‍थान ज़‍िक्र कि‍या है। उसमें जाति‍ को कहीं पर भी पैमाना नहीं बनाया है। कवि‍ता कैसे बनती है, उसका सामाजि‍क स्रोत क्‍या है, इसके बारे में शुक्‍लजी ने जाति‍, नस्‍ल, धर्म आदि‍ को आधार नहीं बनाया है। मुक्‍ति‍बोध से बड़ा ब्राह्मणवाद का आलोचक अभी हिंदी में नहीं हुआ। उन्‍होंने भी कवि‍ता के आधार के रूप में जाति‍ को आधार नहीं बनाया है बल्‍कि‍ काव्‍य के तीन क्षणों में आचार्य शुक्‍ल की धारणाओं का ही ज़‍िक्र भि‍न्‍न तरीके से कि‍या है।

सवाल यह है कि‍ क्‍या हम भारत की वि‍गत दो हजार साल की संस्‍कृति‍, सभ्‍यता, साहि‍त्‍य, कवि‍ता, दर्शन आदि‍ की उपलब्‍धि‍यों को महज इसलि‍ए अस्‍वीकार कर दें क्‍योंकि‍ वे ब्राह्मणों के द्वारा रची गयी हैं? यदि‍ जाति‍ के आधार पर अस्‍वीकार के भाव में रहेंगे तो हमारे पास देशज सभ्‍यता के नाम पर क्‍या बचेगा? व्‍यक्‍ति‍ का जन्‍म कि‍स जाति‍ में होगा यह उसके हाथ में नहीं होता। ब्राह्मणवाद की आलोचना, जाति‍वाद की आलोचना, इन दोनों का समाज से उच्‍छेद ज़रूरी है। लेकि‍न अतीत को लेकर अवैज्ञानि‍क रवैया नहीं अपनाया जाना चाहि‍ए। यदि‍ वेद या कोई भी रचना ब्राह्मणों की है, तो वह हमारी थाती है। उसे कूड़े के ढेर पर नहीं फेंक सकते। परंपरा में बहि‍ष्‍कार के साथ प्रवेश नहीं कि‍या जा सकता, परंपरा में प्रवेश करने के लि‍ए जाति‍ के तर्क से भी कहीं नहीं पहुंचेंगे। परंपरा में जाने के लि‍ए नतमस्‍तक होकर जाने की भी ज़रूरत नहीं है।

परंपराओं में रचि‍त रचनाओं को ओढ़ने और कूड़े के ढेर पर भी फेंकने की ज़रूरत नहीं है। परंपरा को अपनी रक्षा के लि‍ए, वैधता के लि‍ए तर्क अथवा हि‍मायत की भी ज़रूरत नहीं है। इति‍हास में जो चीज़ें हैं, वे हमारी हि‍मायत और तर्कशास्‍त्र के बावजूद हैं और रहेंगी। वे पढ़ने और आलोचनात्‍मक वि‍श्‍लेषण की मांग करती हैं। फलत: मूल्‍यांकन और पुनर्मल्‍यांकन की ज़रूरत पड़ती है। बार-बार व्‍याख्‍या की नये सामयि‍क संदर्भ में ज़रूरत पड़ती है। राजेंद्र यादव नहीं जानते कि रचना का अर्थ रचना के अंदर नहीं उसके बाहर होता है, समाज में होता है, पाठक में होता है। वर्तमान में होता है। भरत के अनुसार रस सहृदय में होता है। रचना का अर्थ यदि‍ पाठ के भीतर होता तो एक ही रचना की वि‍भि‍न्‍न कि‍स्‍म की व्‍याख्‍याएं न होतीं। व्‍याख्‍याओं में परि‍वर्तन न आया होता। राजेंद्र यादव जवाब दें – रचनाकार कि‍न चीजों पर लि‍खता है? क्‍या वह जि‍न चीजों पर सहमत होता है, उन पर लि‍खता है अथवा जि‍न चीजों को अस्‍वीकार करता है, असहमत होता है, उन पर लि‍खता है। ‍रचनाकार उन वि‍षयों और वि‍चारों पर लि‍खता है जि‍न्‍हें वह अस्‍वीकार करता है। जि‍न्‍हें वह स्‍वीकार करता है उन पर नहीं लि‍खता।

लेखन की बुनि‍याद असहमति‍ है। राजेंद्र यादव कि‍सी प्रमुख ब्राह्मण कवि‍ की रचना का उल्‍लेख करें, जि‍सने ब्राह्मणवाद की हि‍मायत की हो? साहि‍त्‍य या कला में दाखि‍ल होते ही जाति‍, नस्‍ल, धर्म आदि‍ सभी कि‍स्‍म की पहचान या अस्‍मि‍ताएं साहि‍त्‍य की वि‍राट अस्‍मि‍ता में वि‍लीन हो जाति‍ हैं। साहि‍त्‍य और कला में आने के बाद वि‍षयवस्‍तु, चरि‍त्र, व्‍यक्‍ति‍त्‍व, व्‍यवस्‍था अपना रूपांतरण कर लेती है। अब सृजन है, सृजन में सेक्‍स, कामोत्तेजना, जाति‍, लिंग आदि‍ की पहचान साहि‍त्‍य या कला की पहचान में वि‍लीन हो जाती है। लि‍खने के पहले वि‍षय की जो भी अवस्‍था हो, लि‍खने के बाद वह पूरी तरह बदल जाता है। लि‍खे हुए का अर्थ पढ़ते समय बदल जाता है। क्‍योंकि‍ अर्थ पाठ में नहीं पाठ के बाहर पाठक में होता है। सवाल पुराना है। जबाव दो राजेंद्र यादव अर्थ कहां होता है? वरना साहि‍त्‍य लीला बंद करो।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *