ब्राह्मणवाद पर बोले जोशी, खबर का धंधा बनी ढाल

♦ प्रभाष जोशी

भाई अविनाश जी, एक आग्रह है – उचित समझें तो ‘पटना के पत्रकार-लेखक प्रमोद रंजन’ को लेखक प्रमोद रंजन या युवा लेखक प्रमोद रंजन कर दें। या फिर शोधार्थी। मैं यह अच्‍छी तरह जानता हूं कि आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि कोई लेखक किसी खास शहर का कैसे हो सकता है ? क्‍या श्री जोशी को दिल्‍ली के प्रभाष जोशी लिखा जा सकता है? और पत्रकारिता मैंने छोड़ दी है। सिर्फ प्रभात खबर ही नहीं छोड़ा, इस पेशे को ही अलविदा कह दिया है। एक तो प्रभाष जोशी का अज्ञातकुलशील किसी प्रमोद रंजन को संबोधित-प्रताड़‍ित करता यह लेख, ऊपर से आपकी यह परिचयात्‍मक टिप्‍पणी…
जैसा आपको ठीक लगे…
सादर, प्रमोद रंजन, पटना

नेट पर काफी लंबी बहस चली। तीखी, तेवर वाली बहस। लेकिन कीबोर्ड के कंगाल प्रभाष जोशी ने ब्राह्मणवाद पर जीभ तभी चलायी, जब जनसत्ता में पटना के लेखक-पत्रकार प्रमोद रंजन ने अख़बारों में फैले जातिवाद पर लेख लिखा। कान के खड़े प्रभाष जोशी ने प्रमोद रंजन पर लाठी चलाने के बहाने उनको ब्राह्मणवाद की लपटों में सुलगाने वालों की बजा कर रख दी। कह दिया कि अख़बार निकालने में सामाजिक वर्गीकरण का खयाल रखें, तब तो हो गया। आशय यह कि ब्राह्मण ही काबिल हैं अख़बार निकालने के, तो दूसरी जातियों के पत्रकारों को क्‍या खाकर नौकरी दें। एक बात से ज़रूर साथ हैं हम सब प्रभाष जोशी के कि ख़बरों के धंधे के मामले में उनका अभियान घोर सामाजिक है – लेकिन इस अभियान के साथ ही प्रमोद रंजन का शोध भी घनघोर सामाजिक है, जिसकी भर्त्‍सना करके प्रभाष जोशी नीति का साथ नहीं दे रहे। यह सब उन्‍होंने अपने नियमित रविवारी स्‍तंभ कागद कारे में आज लिखा है : मॉडरेटर

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और ये रहा प्रमोद रंजन का वो लेख, जिस पर प्रभाष जोशी बिफर पड़े। बिना किसी काट-छांट के मोहल्‍ला लाइव के पाठकों के लिए पेश है…

विश्‍वास का धंधा

♦ प्रमोद रंजन

‘कानपुर में स्व नरेंद्र मोहन (दैनिक जागरण के मालिक) के नाम पर पुल का नामाकरण उस समय हुआ जब मैं उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री था। उनके मल्टीप्लैक्स को जमीन हमारे समय में दी गयी। जागरण का जो स्कूल चलता है और उनका जहां दफ्तर है उनकी जमीनें हमारे समय में उन्हें मिलीं। लेकिन यह सब मैंने किसी अपेक्षा में नहीं अपना मित्र धर्म निभाते हुए किया। फिर भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार (खबर के लिए पैसे की मांग) हुआ। इतनी निर्लज्जता से चलेंगे तो कैसे चलेंगे रिश्‍ते?’
– लालजी टंडन, लखनऊ से भाजपा के विजयी लोस प्रत्याशी

‘दैनिक जागरण के मालिक को हमने वोट देकर सांसद बनाया था। वे बताएं वोट के बदले उनने हमें कितना धन दिया था? तब खबर के लिए हम धन क्यों दें?’
– मोहन सिंह, देवरिया से सपा के पराजित लोस प्रत्याशी

‘मैंने उषा मार्टिन (प्रभात खबर को चलाने वाली कंपनी) को भी कठोतिया कोल ब्लॉक दिया। प्रभात खबर को यह बताना चाहिए कि उसकी शर्तें क्या थीं। मैंने उनसे कितने पैसे लिए?’
– मधु कोड़ा, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, चाईबासा से निर्दलीय सांसद

मीडिया पर चुनावों के दौरान पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। इस तरह के आरोप प्रायः चुनाव हार गये दल और प्रत्याशी लगाते हैं। या फिर दलित-पिछड़े नेताओं की ब्राह्मण-बनिया प्रेस से शिकायतें रही हैं। इस तरह की आपत्तियों को खिसियानी बिल्ली का प्रलाप मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन इस बार किस्सा कुछ अलग है। इस बार शिकायत उन नेताओं को भी है जो चुनाव जीत गये हैं। नाराज वे भी हैं, जो कुछ समय पहले तक इसी मीडिया के खास थे। कारण?

इसका कारण सीधा है। बनिया, ब्राह्मण पर भारी पड़ा है। जो काम रिश्‍तों के आधार पर होता रहा था, उसके लिए अब अचानक दाम मांगा जाने लगा है।

पुल तुम्हारे नाम किया, जमीन दी, जनता के वोट से विधान सभा में पहुंचे तो अपना वोट देकर तुम्हें राज्यसभा में भेजा। आजीवन मित्र धर्म निभाया। तब भी यह अहसानफरामोशी?

वास्तव में यह पहली बार नहीं था जब चुनाव के दौरान अखबारों ने पैसा लेकर खबर छापी हो। पहले यह पैसा पत्रकारों की जेब में जाता था। अखबारों के प्रबंधन ने धीरे-धीरे इसे संस्थागत रूप देना शुरू किया। ज्ञात तथ्यों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्ष 1997 के विधानसभा चुनाव से इसकी शुरुआत हिंदी के दो प्रमुख मीडिया समूहों ने की थी। उस चुनाव में 25 हजार रुपये का पैकेज प्रत्याशी के लिए तय किया गया था, जिसमें एक सप्ताह की दौरा-रिपोर्टिंग, तीन अलग-अलग दिन विज्ञापन के साथ मतदान वाले दिन प्रत्याशी का इंटरव्यू प्रकाशित करने का वादा शामिल था। उसके बाद के सालों में हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, राजस्थान आदि में चुनावों के दौरान यह संस्थागत भ्रष्‍टाचार पैर पसारता गया। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राजनैतिक रूप से सचेत राज्यों में अखबारों को इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ा।

संस्थागत रूप (जिसमें पैसा सीधे प्रबंधन को जाता है) से उत्तरप्रदेश में अखबारों ने पहली बार उगाही वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में की। वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में उगाही की यह प्रणाली बिहार पहुंची।

इस चुनाव में बिहार-झारखंड में हिंदुस्तान ने ‘बिकी हुई’ खबरों के नीचे ‘एचटी मीडिया इनिशिएटिव’ लिखा तो प्रभात खबर ने ‘पीके मीडिया इनिशिएटिव’। दैनिक जागरण ने बिकी हुई खबरों का फांट कुछ बदल दिया। (अस्पष्‍ट अर्थ वाले इन शब्दों अथवा बदले हुए फॉन्‍ट से पता नहीं वे पाठकों को धोखा देना चाहते थे या खुद को?)। इस सीधी वसूली पर कुछ प्रमुख नेताओं ने जब पैसे वसूलने वाले समाचार पत्रों के मालिकों से संपर्क किया तो उनका उत्तर था -जब हमारा संवाददाता उपहार या पैसे लेकर खबरें लिखता है तो हम (मालिक) ही सीधे धन क्यों नहीं ले सकते?

बिहार में बबेला

खबरों के लिए धन की इस संस्थागत उगाही पर बबेला बिहार से शुरू हुआ। इस जागरूकता के लिए बिहार की तारीफ की जानी चाहिए। यद्यपि इस पर संदेह के पर्याप्त कारण भी मौजूद हैं।
तथ्य यह है कि बिहार में दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि के पत्रकारों द्वारा चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर वसूली के किस्से आम रहे हैं। झारखंड में तो अखबार चुनावों के दौरान अपना पुराना हिसाब भी चुकता करते रहे हैं। लेकिन ऊंचे तबके (ऊंची जाति/ऊंची शिक्षा/संपादकों से मित्र धर्म का निर्वाह करने वाले) राजनेताओं से अदना पत्रकार मोल-भाव की हिमाकत नहीं करते। इस कोटि के नेताओं का मीडिया मैनेजमेंट वरिष्‍ठ पत्रकार, स्थानीय संपादक आदि करते हैं जबकि मीडिया के उपहास, उपेक्षा और भेदभाव की पीड़ा पिछड़े राजनेताओं (नीची जाति/ कम शिक्षित/ गंवई) के हिस्से में रहती है।

लेकिन इस बार? अखबार मालिकों ने तो सब धान साढ़े बाइस पसेरी कर डाला। टके सेर भाजी, टके सेर खाजा!

विरोध का धंधा

इस अंधेर को प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने ‘खबरों का धंधा’ कहा तो जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी ने ‘खबरों के पैकेज का काला धंधा’। जबकि प्रभात खबर भी इस मामले में शामिल था।

प्रभाष जोशी ने बांका जाकर जदयू के बागी, लोकसभा के निर्दलीय प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के पक्ष में आयोजित जनसभा को संबोधित किया था। उनके साथ प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश भी थे। बाद में श्री जोशी ने अपने लेख में दिग्विजय सिंह का ‘मीडिया प्रबंधन’ कर रहे एक पत्रकार की डायरी के हवाले से इस चुनाव में मीडिया के ‘पैकेज के काले धंधे की’ कठोर भर्त्‍सना की। जोशी का यह लेखकीय साहस प्रशंसनीय है किंतु उनके लेख में विस्तार से उद्धृत की गयी पत्रकार की डायरी कुछ ज्यादा भेदक प्रसंगों को भी सामने लाती है। श्री जोशी ने इस डायरी के हवाले से सिर्फ पैसों के लेन-देन की निंदा की। अन्य तथ्यों पर उन्होंने कोई ध्‍यान नहीं दिया।

श्री जोशी द्वारा कोट की गयी डायरी का अंश –

‘20 अप्रैल, 2009: आज एक प्रमुख दैनिक के स्थानीय प्रतिनिधि अपने विज्ञापन इंचार्ज के साथ आये। संवाददाता कह रहे थे – मैंने खबर भेजी थी, पर वहां एक जाति विशेष के संपादक हैं। छापेंगे नहीं। यानी पैकेज के बिना अखबार में खिड़की-दरवाजे नहीं खुलेंगे।’

‘21 अप्रैल, 2009: एक पत्रकार ने अपने स्थानीय संपादक को बताया कि उसकी खबरें छपनी क्यों जरूरी हैं। स्थानीय संपादक एक जाति विशेष का था और एक दबंग उम्मीदवार भी संपादक की जाति का था। इस पत्रकार ने संपादक को समझाया कि हमने उससे डील की तो जाति समीकरण बिगड़ सकता है। दूसरे उम्मीदवार जो मंत्री हैं, उनके बारे में कहा कि वे सरकारी विज्ञापन दिलवाते रहेंगे। उनसे क्या लेन-देन करना। दिल्ली में खूब पहचान रखनेवाले एक उम्मीदवार के बारे में कहा कि जब उनसे मिलने गया, तो वे फोन पर… (अखबार के मालिक से) बात कर रहे थे। उनसे क्या पैकेज लिया जाए।’

जाति, पद और परिचय पर आधारित पत्रकारिता का फर्रुखाबादी खेल उपरोक्त उद्धरणों में स्पष्‍ट है, जिसे पत्रकारिता पर जारी बहस के दौरान नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। पत्रकारिता का यह पतन वैश्विक मंदी के कारण वर्ष 2009 में अचानक घटित होने वाली घटना नहीं है। जातिजीवी संपादक व पत्रकार इसे वर्षों इस ओर धकेलते रहे हैं। वस्तुतः पैकेज ने जातिजीवी संपादकों की मुट्ठी में कैद अखबारों के खिड़की-दरवाज़े सभी जाति के धनकुबेरों के लिए खोल दिये हैं। इसमें संदेह नहीं कि अखबारों का चुनावी पैकेज बेचना बुरा है। लेकिन अधिक बुरा है पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह।

व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो…

चुनावों के दौरान खबरों की बिक्री पिछले लगभग एक दशक से चल रही है। इसने अखबारों की विश्‍वसनीयता गिरायी है। लेकिन पैसा लेकर छापी गयी खबर की बदौलत शायद ही किसी प्रत्याशी की जीत हुई हो। उत्तरप्रदेश में वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में तीन समाचार पत्रों ने सरेआम धन लेकर खबर छापने का अभियान चलाया था और करोड़ों रुपये की अवैध उगाही की थी। समाचार पत्रों के जरिये अपनी छवि सुधारने वाले राजनीतिक दलों ने इन समाचार पत्रों को विज्ञापन देकर भी पैसा पानी की तरह बहाया। परंतु इनके चुनावी सर्वेक्षण व आकर्षक समाचार भी मतदाताओं का रुझान नहीं बदल सके और विज्ञापन पर सबसे कम धन खर्च करने वाली बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया। अखबारों की विश्‍वसनीयता की हालत यह हो गयी कि प्रत्याशी अब पक्ष में खबर छापने के बजाय कोई खबर न छापने के लिए पैसे देने लगे हैं। बदनामी इतनी हो चुकी है कि पक्ष में खबर छपने पर मतदाताओं द्वारा ‘उलटा मतलब’ निकाले जाने की आशंका रहती है।

पत्रकारिता के मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित, पिछड़ों की राजनैतिक ताकतों, वाम आंदोलनों तथा प्रतिरोध की उन शक्तियों को भी हुआ है, जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और बुरी तरह दिग्भ्रमित भी किया है। लेकिन मीडिया की गिरती विश्‍वसनीयता पर जाहिर की जा रही चिंता का कारण यह नहीं है। उन्हें चिंता है कि – ‘यदि मीडिया की ताकत ही नहीं रहेगी तो कोई अख़बार मालिक किसी सरकार को किसी तरह प्रभावित नहीं कर सकेगा। फिर उसे अखबार निकालने का क्या फायदा मिलेगा? यदि साख नष्‍ट हो गयी तो कौन सा सत्ताधारी नेता, अफसर या फिर व्यापारी मीडिया की परवाह करेगा? इसलिए व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह अखबार के संचालकों के हक में है कि छोटे-मोटे आर्थिक लाभ के लिए पैकेज पत्रकारिता को बढ़ावा न दें।’

व्यावहारिकता का यह तकाज़ा पूंजीवाद से मनुहार करता है कि वह ब्राह्मणवाद से गठजोड़ बनाये रखे। कौड़ी-दो-कौड़ी के लिए इस गठबंधन को नष्‍ट न करे। सलाह स्पष्‍ट है अगर हम पहले की तरह गलबहियां डाल चलते रहें तो ज़्यादा फायदे में रहेंगे। सरकार, अफसर, व्यापार सब रहेंगे हमारी मुट्ठी में। अभी लोकतंत्र की तूती बोल रही है। इसलिए वह क्षद्म बनाये रखना ज़रूरी है, जिससे बहुसंख्यक आबादी का विश्‍वास हम पर बना रहे। मीडिया की ‘विश्‍वसनीयता’ बनाये रखना इनके लिए ‘समय का तकाजा’ है।

चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है। क्योंकि इससे मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की उन शक्तियों का भी हुआ है जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित भी किया है।

प्रमोद रंजन का यह भी निष्कर्ष है कि काले धन से खबरों के पैकेज बेचने-खरीदने से कुछ नहीं होता क्योंकि वोट देने वाली जनता समझ गयी है कि इन अखबारों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। काले धन से इन अखबारों में खबरें छपवाने वाले अक्सर हार जाते हैं। लेकिन जो लोग जाति धर्म और मित्र धर्म निबाहते हुए विश्वास का धंधा कर रहे हैं वे ज्यादा बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि वे दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों को अपमानित, उपेक्षित और दिग्भ्रमित करते हैं।

अब पैकेज के काले धंधे को इनने बुरा मान लिया है, इसलिए इसे अपना समर्थन मान कर मुझे संतोष कर लेना चाहिए। लेकिन इससे भी बुरा इनने पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म को बताया है। और उदाहरण के नाम पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश और पत्रकार-लेखक सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी को उद्धृत किया है। हरिवंश कोई पैंतीस साल से मेरे मित्र हैं और सुरेंद्र किशोर ने जनसत्ता की शुरुआत से रिटायर होने तक एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार की तरह काम किया है। इसलिए आइए पहले पत्रकारिता में जाति और मित्र धर्म और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद को लें।

हरिवंश जेपी आंदोलन से कुछ पहले से मेरे मित्र हैं। बांका उनका मेरे साथ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। बीसियों सभाओं-सम्मेलनों, आंदोलनों और संघर्षों में वे मेरे साथ गये हैं। उनकी सोहबत मुझे प्रिय और महत्त्वपूर्ण लगती है। जो वरिष्ठ पत्रकार दिग्विजय सिंह का मीडिया प्रबंधन कर रहे थे, वे हम दोनों के मित्र हैं। उनने डायरी भी लिखी है, यह मुझे दिल्ली में पता चला जब मैं अपने अभियान के लिए सामग्री और सबूत जुटा रहा था। बांका अकेली जगह नहीं थी, जहां मैं इस चुनाव के दौरान गया। हिंदी इलाके के हर राज्य में पत्रकारों से बात करके मैंने सामग्री ली। हरिवंश अपना लेख खबरों का धंधा पहले छब्बीस मार्च को ही लिख चुके थे, जिसकी आखिरी लाइन थी – विज्ञापन और खबरें दो चीजें हैं। जिन चीजों के साथ स्पांसर्ड, प्रायोजित, पीके मार्केटिंग मीडिया इनिशियेटिव लिखा होगा वे विज्ञापन होंगे। हम खबर की शकल में विज्ञापन नहीं छापेंगे। हरिवंश ने यह एक लेख ही नहीं, दो और लेख, एक पाठक का पत्र भी पहले पेज पर छापा। उनने चुनाव कवरेज की अपनी आचार संहिता भी खूब बड़ी छापी। इसमें नाम-पता देकर पाठकों से कहा कि इसका उल्लंघन हो रहा हो तो तत्काल शिकायत कीजिए। चुनाव के बाद 11 मई को उनने फिर खबरों का धंधा-2 फिर पाठकों के द्वार शीर्षक से लेख लिखा, जिसमें एक पाठक की शिकायत को अपने पूरे कवरेज और आचरण से जांचा। किसी भी हिंदी अखबार ने न ऐसा अभियान चलाया न पाठकों के सामने ऐसी जवाबदेही दिखायी।

लेकिन नयनसुख प्रमोद रंजन को न यह दिखा और न इस पर उनने विश्वास किया। क्यों? (यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी) अभी यही कि प्रथम प्रवक्ता के सोलह जुलाई के अंक में उस पत्रिका के झारखंड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है प्रभात खबर में भी खबरें उसी की ज्यादा छपीं जिसने विज्ञापन ज्यादा दिया। वहां अघोषित नियम बनाया गया कि जो पैसा देगा उसको कवरेज मिलेगा। प्रमोद रंजन को ये दो लाइनें प्रभात खबर के तीन महीने के कवरेज अभियान और पाठकों से खुली जवाबदेही को सिरे से खारिज करती क्यों लगती हैं। इसका भी जवाब दूंगा तो दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की बड़ी क्षति होगी। इसलिए फिलहाल सिर्फ मित्र धर्म पर।

प्रथम प्रवक्ता का वह अंक जिसे प्रमोद रंजन ने मेरे निर्देशन में निकला कहा है उसकी पैकेज वाली सारी सामग्री राम बहादुर राय ने मेरे पास भेजी। उसी के आधार पर इस पत्रिका में मैंने लेख लिखा और उस पूरी सामग्री को मैंने संपादित किया। झारखंड ब्यूरो की रपट की वे दो लाइनें मेरी जानकारी और लिखे के विरुद्ध थीं। उनको न तो सबूत और पदार्थ के साथ पुष्ट किया गया था, न उनका विश्लेषण। मैं जो प्रमोद रंजन के कहे मित्र धर्म निबाहता हूं – मैंने ही वे लाइनें संपादित करके बाहर क्यों नहीं कीं? क्योंकि मैं स्वभाव से संवाददाता पर भरोसा और अपने से भिन्न राय की कदर करता हूं। और मेरा मित्र धर्म तो ठीक है, प्रथम प्रवक्ता के संपादक राम बहादुर राय तो हरिवंश के और भी गहरे और पुराने मित्र हैं। अपनी पत्रिका में उनने ये दो लाइनें क्यों जाने दीं? मित्र धर्म क्यों नहीं निभाया?

यह तो खुली प्रमोद रंजन के मित्र धर्म के आरोप से तात्कालिक संदर्भ की पोल। यह भी झूठ है कि सभी अखबार मीडिया इनिशिएटिव लिख रहे थे। मैंने इन अखबारों की जो प्रतियां प्रेस परिषद को जांच के लिए दी हैं उनमें कुछ भी नहीं लिखा है। और ऐसे इनिशिएटिव के बारे में क्या सोचता हूं, वह भी एक लेख में लिख चुका हूं। मैंने एक नहीं चार लेख लिखे हैं। पर छोड़िए तात्कालिक संदर्भ। मैं लगभग पचास साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। कम से कम पांच प्रधानमंत्री मेरे बड़े मित्र थे। चंद्रशेखर सबसे बड़े और पुराने, फिर अटल बिहारी वाजपेयी, फिर नरसिंह राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनके खिलाफ मैंने क्या-क्या और क्या नहीं लिखा है। दर्जन भर मुख्यमंत्रियों से मेरी बड़ी मित्रता रही। उन पर जो लिखा, वह भी सब छपा है। अपनी रतौंध दूर करना चाहें तो पच्चीस साल की जनसत्ता की फाइलें दफ्तर में मौजूद हैं। और यह भी ख्याल रखें कि अखबार मित्र की प्रशंसा और आलोचना के लिए ही नहीं होते। उनका एक व्यापक सामाजिक धर्म भी होता है। वह दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों का भी आकलन मांगता है और जिसकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। लेकिन वह भी बाद में।

अभी अपन ब्राह्मणवाद देख लें। जनसत्ता की पहली टीम में एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे क्योंकि अच्छेलाल प्रजापति भी उसी प्रक्रिया से जनसत्ता में आये थे, जिससे बाकी थे।

जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया। सिवाय बनवारी के मैं किसी को भी पहले से जानता नहीं था। बहुत सी अर्जियां आयी थीं। उनमें सैकड़ों छांटी गयीं। कई दिनों तक लिखित परीक्षाएं चलीं – घंटों लंबी। वे बाहर के जानकारों से जंचवायी गयीं। उसके अनुसार बनी मेरिट लिस्ट के प्रत्याशियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।

हम चुनाव नहीं लड़ रहे थे, जो जाति के वोटों का ख्याल रखते। मंत्रिमंडल नहीं बना रहे थे जो सबको प्रतिनिधित्व देते। हम नया अखबार निकालने की ऐसी टीम बना रहे थे – जो हलकी हो, फुर्ती से लग और बदल सकती हो और अपने भविष्य के साथ अखबार बना सकती हो। कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।

जिस भाषा में से जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे वैसे ही तो रखे जाएंगे। महिला है इसलिए रख लो तो अखबार की टीम कैसे बनेगी? एक्सप्रेस की सब महिलाओं में राधिका राय खास थीं। उन्हें रात की शिफ्ट और अखबार निकालना पसंद था। मैंने संपादक और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन हैं। उनके यहां भी हिंदी में कम और अंग्रेजी में ज्यादा महिलाएं हैं।

मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारवाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है। चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं। और नंदीग्राम और सिंगूर के बाद वामपंथी किस नैतिक और वैचारिक समर्थन के हकदार हैं?

दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों के सरोकारों की दुहाई देकर खबरों के बेचने के काले धंधे को माफ करना चाहते हो? देखते नहीं कि यह बनिये की ब्राह्मण पर जातिवादी विजय भर नहीं है जिस पर प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं। यह भ्रष्ट राजनेताओं और पत्रकारिता को काली कमाई का धंधा बनाने वाले मीडिया मालिकों की मिलीभगत है। सबसे ज्यादा यह भ्रष्ट राजनेताओं के हित में है कि मीडिया अपनी तटस्थता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता के बजाय दो नंबर की कमाई की रक्षा करे। पैसा फेंक खबर छपवा। ऐसा मीडिया लोकतंत्र को बचा नहीं सकेगा। दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की जरखरीद लोकतंत्र में कोई पूछ होगी?

यह समझ न आता हो तो अब आओ! कहो कि यह ब्राह्मणवादी प्रभाष जोशी – सती समर्थक, दलित, पिछड़ा, महिला और मुसलमान विरोधी है। अपन इसका भी जवाब देंगे। लेकिन खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!

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