ब्राह्मणवाद पर बोले जोशी, खबर का धंधा बनी ढाल
♦ प्रभाष जोशी
भाई अविनाश जी, एक आग्रह है – उचित समझें तो ‘पटना के पत्रकार-लेखक प्रमोद रंजन’ को लेखक प्रमोद रंजन या युवा लेखक प्रमोद रंजन कर दें। या फिर शोधार्थी। मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि कोई लेखक किसी खास शहर का कैसे हो सकता है ? क्या श्री जोशी को दिल्ली के प्रभाष जोशी लिखा जा सकता है? और पत्रकारिता मैंने छोड़ दी है। सिर्फ प्रभात खबर ही नहीं छोड़ा, इस पेशे को ही अलविदा कह दिया है। एक तो प्रभाष जोशी का अज्ञातकुलशील किसी प्रमोद रंजन को संबोधित-प्रताड़ित करता यह लेख, ऊपर से आपकी यह परिचयात्मक टिप्पणी…
जैसा आपको ठीक लगे…
सादर, प्रमोद रंजन, पटनानेट पर काफी लंबी बहस चली। तीखी, तेवर वाली बहस। लेकिन कीबोर्ड के कंगाल प्रभाष जोशी ने ब्राह्मणवाद पर जीभ तभी चलायी, जब जनसत्ता में पटना के लेखक-पत्रकार प्रमोद रंजन ने अख़बारों में फैले जातिवाद पर लेख लिखा। कान के खड़े प्रभाष जोशी ने प्रमोद रंजन पर लाठी चलाने के बहाने उनको ब्राह्मणवाद की लपटों में सुलगाने वालों की बजा कर रख दी। कह दिया कि अख़बार निकालने में सामाजिक वर्गीकरण का खयाल रखें, तब तो हो गया। आशय यह कि ब्राह्मण ही काबिल हैं अख़बार निकालने के, तो दूसरी जातियों के पत्रकारों को क्या खाकर नौकरी दें। एक बात से ज़रूर साथ हैं हम सब प्रभाष जोशी के कि ख़बरों के धंधे के मामले में उनका अभियान घोर सामाजिक है – लेकिन इस अभियान के साथ ही प्रमोद रंजन का शोध भी घनघोर सामाजिक है, जिसकी भर्त्सना करके प्रभाष जोशी नीति का साथ नहीं दे रहे। यह सब उन्होंने अपने नियमित रविवारी स्तंभ कागद कारे में आज लिखा है : मॉडरेटर

विश्वास का धंधा
♦ प्रमोद रंजन
‘कानपुर में स्व नरेंद्र मोहन (दैनिक जागरण के मालिक) के नाम पर पुल का नामाकरण उस समय हुआ जब मैं उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री था। उनके मल्टीप्लैक्स को जमीन हमारे समय में दी गयी। जागरण का जो स्कूल चलता है और उनका जहां दफ्तर है उनकी जमीनें हमारे समय में उन्हें मिलीं। लेकिन यह सब मैंने किसी अपेक्षा में नहीं अपना मित्र धर्म निभाते हुए किया। फिर भी मेरे साथ ऐसा व्यवहार (खबर के लिए पैसे की मांग) हुआ। इतनी निर्लज्जता से चलेंगे तो कैसे चलेंगे रिश्ते?’
- लालजी टंडन, लखनऊ से भाजपा के विजयी लोस प्रत्याशी
‘दैनिक जागरण के मालिक को हमने वोट देकर सांसद बनाया था। वे बताएं वोट के बदले उनने हमें कितना धन दिया था? तब खबर के लिए हम धन क्यों दें?’
- मोहन सिंह, देवरिया से सपा के पराजित लोस प्रत्याशी
‘मैंने उषा मार्टिन (प्रभात खबर को चलाने वाली कंपनी) को भी कठोतिया कोल ब्लॉक दिया। प्रभात खबर को यह बताना चाहिए कि उसकी शर्तें क्या थीं। मैंने उनसे कितने पैसे लिए?’
- मधु कोड़ा, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, चाईबासा से निर्दलीय सांसद
मीडिया पर चुनावों के दौरान पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। इस तरह के आरोप प्रायः चुनाव हार गये दल और प्रत्याशी लगाते हैं। या फिर दलित-पिछड़े नेताओं की ब्राह्मण-बनिया प्रेस से शिकायतें रही हैं। इस तरह की आपत्तियों को खिसियानी बिल्ली का प्रलाप मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन इस बार किस्सा कुछ अलग है। इस बार शिकायत उन नेताओं को भी है जो चुनाव जीत गये हैं। नाराज वे भी हैं, जो कुछ समय पहले तक इसी मीडिया के खास थे। कारण?
इसका कारण सीधा है। बनिया, ब्राह्मण पर भारी पड़ा है। जो काम रिश्तों के आधार पर होता रहा था, उसके लिए अब अचानक दाम मांगा जाने लगा है।
पुल तुम्हारे नाम किया, जमीन दी, जनता के वोट से विधान सभा में पहुंचे तो अपना वोट देकर तुम्हें राज्यसभा में भेजा। आजीवन मित्र धर्म निभाया। तब भी यह अहसानफरामोशी?
वास्तव में यह पहली बार नहीं था जब चुनाव के दौरान अखबारों ने पैसा लेकर खबर छापी हो। पहले यह पैसा पत्रकारों की जेब में जाता था। अखबारों के प्रबंधन ने धीरे-धीरे इसे संस्थागत रूप देना शुरू किया। ज्ञात तथ्यों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में वर्ष 1997 के विधानसभा चुनाव से इसकी शुरुआत हिंदी के दो प्रमुख मीडिया समूहों ने की थी। उस चुनाव में 25 हजार रुपये का पैकेज प्रत्याशी के लिए तय किया गया था, जिसमें एक सप्ताह की दौरा-रिपोर्टिंग, तीन अलग-अलग दिन विज्ञापन के साथ मतदान वाले दिन प्रत्याशी का इंटरव्यू प्रकाशित करने का वादा शामिल था। उसके बाद के सालों में हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, राजस्थान आदि में चुनावों के दौरान यह संस्थागत भ्रष्टाचार पैर पसारता गया। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राजनैतिक रूप से सचेत राज्यों में अखबारों को इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रखना पड़ा।
संस्थागत रूप (जिसमें पैसा सीधे प्रबंधन को जाता है) से उत्तरप्रदेश में अखबारों ने पहली बार उगाही वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में की। वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में उगाही की यह प्रणाली बिहार पहुंची।
इस चुनाव में बिहार-झारखंड में हिंदुस्तान ने ‘बिकी हुई’ खबरों के नीचे ‘एचटी मीडिया इनिशिएटिव’ लिखा तो प्रभात खबर ने ‘पीके मीडिया इनिशिएटिव’। दैनिक जागरण ने बिकी हुई खबरों का फांट कुछ बदल दिया। (अस्पष्ट अर्थ वाले इन शब्दों अथवा बदले हुए फॉन्ट से पता नहीं वे पाठकों को धोखा देना चाहते थे या खुद को?)। इस सीधी वसूली पर कुछ प्रमुख नेताओं ने जब पैसे वसूलने वाले समाचार पत्रों के मालिकों से संपर्क किया तो उनका उत्तर था -जब हमारा संवाददाता उपहार या पैसे लेकर खबरें लिखता है तो हम (मालिक) ही सीधे धन क्यों नहीं ले सकते?
बिहार में बबेला
खबरों के लिए धन की इस संस्थागत उगाही पर बबेला बिहार से शुरू हुआ। इस जागरूकता के लिए बिहार की तारीफ की जानी चाहिए। यद्यपि इस पर संदेह के पर्याप्त कारण भी मौजूद हैं।
तथ्य यह है कि बिहार में दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, प्रभात खबर आदि के पत्रकारों द्वारा चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर वसूली के किस्से आम रहे हैं। झारखंड में तो अखबार चुनावों के दौरान अपना पुराना हिसाब भी चुकता करते रहे हैं। लेकिन ऊंचे तबके (ऊंची जाति/ऊंची शिक्षा/संपादकों से मित्र धर्म का निर्वाह करने वाले) राजनेताओं से अदना पत्रकार मोल-भाव की हिमाकत नहीं करते। इस कोटि के नेताओं का मीडिया मैनेजमेंट वरिष्ठ पत्रकार, स्थानीय संपादक आदि करते हैं जबकि मीडिया के उपहास, उपेक्षा और भेदभाव की पीड़ा पिछड़े राजनेताओं (नीची जाति/ कम शिक्षित/ गंवई) के हिस्से में रहती है।
लेकिन इस बार? अखबार मालिकों ने तो सब धान साढ़े बाइस पसेरी कर डाला। टके सेर भाजी, टके सेर खाजा!
विरोध का धंधा
इस अंधेर को प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश ने ‘खबरों का धंधा’ कहा तो जनसत्ता के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी ने ‘खबरों के पैकेज का काला धंधा’। जबकि प्रभात खबर भी इस मामले में शामिल था।
प्रभाष जोशी ने बांका जाकर जदयू के बागी, लोकसभा के निर्दलीय प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के पक्ष में आयोजित जनसभा को संबोधित किया था। उनके साथ प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश भी थे। बाद में श्री जोशी ने अपने लेख में दिग्विजय सिंह का ‘मीडिया प्रबंधन’ कर रहे एक पत्रकार की डायरी के हवाले से इस चुनाव में मीडिया के ‘पैकेज के काले धंधे की’ कठोर भर्त्सना की। जोशी का यह लेखकीय साहस प्रशंसनीय है किंतु उनके लेख में विस्तार से उद्धृत की गयी पत्रकार की डायरी कुछ ज्यादा भेदक प्रसंगों को भी सामने लाती है। श्री जोशी ने इस डायरी के हवाले से सिर्फ पैसों के लेन-देन की निंदा की। अन्य तथ्यों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया।
श्री जोशी द्वारा कोट की गयी डायरी का अंश -
‘20 अप्रैल, 2009: आज एक प्रमुख दैनिक के स्थानीय प्रतिनिधि अपने विज्ञापन इंचार्ज के साथ आये। संवाददाता कह रहे थे – मैंने खबर भेजी थी, पर वहां एक जाति विशेष के संपादक हैं। छापेंगे नहीं। यानी पैकेज के बिना अखबार में खिड़की-दरवाजे नहीं खुलेंगे।’
‘21 अप्रैल, 2009: एक पत्रकार ने अपने स्थानीय संपादक को बताया कि उसकी खबरें छपनी क्यों जरूरी हैं। स्थानीय संपादक एक जाति विशेष का था और एक दबंग उम्मीदवार भी संपादक की जाति का था। इस पत्रकार ने संपादक को समझाया कि हमने उससे डील की तो जाति समीकरण बिगड़ सकता है। दूसरे उम्मीदवार जो मंत्री हैं, उनके बारे में कहा कि वे सरकारी विज्ञापन दिलवाते रहेंगे। उनसे क्या लेन-देन करना। दिल्ली में खूब पहचान रखनेवाले एक उम्मीदवार के बारे में कहा कि जब उनसे मिलने गया, तो वे फोन पर… (अखबार के मालिक से) बात कर रहे थे। उनसे क्या पैकेज लिया जाए।’
जाति, पद और परिचय पर आधारित पत्रकारिता का फर्रुखाबादी खेल उपरोक्त उद्धरणों में स्पष्ट है, जिसे पत्रकारिता पर जारी बहस के दौरान नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। पत्रकारिता का यह पतन वैश्विक मंदी के कारण वर्ष 2009 में अचानक घटित होने वाली घटना नहीं है। जातिजीवी संपादक व पत्रकार इसे वर्षों इस ओर धकेलते रहे हैं। वस्तुतः पैकेज ने जातिजीवी संपादकों की मुट्ठी में कैद अखबारों के खिड़की-दरवाज़े सभी जाति के धनकुबेरों के लिए खोल दिये हैं। इसमें संदेह नहीं कि अखबारों का चुनावी पैकेज बेचना बुरा है। लेकिन अधिक बुरा है पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह।
व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो…
चुनावों के दौरान खबरों की बिक्री पिछले लगभग एक दशक से चल रही है। इसने अखबारों की विश्वसनीयता गिरायी है। लेकिन पैसा लेकर छापी गयी खबर की बदौलत शायद ही किसी प्रत्याशी की जीत हुई हो। उत्तरप्रदेश में वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में तीन समाचार पत्रों ने सरेआम धन लेकर खबर छापने का अभियान चलाया था और करोड़ों रुपये की अवैध उगाही की थी। समाचार पत्रों के जरिये अपनी छवि सुधारने वाले राजनीतिक दलों ने इन समाचार पत्रों को विज्ञापन देकर भी पैसा पानी की तरह बहाया। परंतु इनके चुनावी सर्वेक्षण व आकर्षक समाचार भी मतदाताओं का रुझान नहीं बदल सके और विज्ञापन पर सबसे कम धन खर्च करने वाली बहुजन समाज पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया। अखबारों की विश्वसनीयता की हालत यह हो गयी कि प्रत्याशी अब पक्ष में खबर छापने के बजाय कोई खबर न छापने के लिए पैसे देने लगे हैं। बदनामी इतनी हो चुकी है कि पक्ष में खबर छपने पर मतदाताओं द्वारा ‘उलटा मतलब’ निकाले जाने की आशंका रहती है।
पत्रकारिता के मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित, पिछड़ों की राजनैतिक ताकतों, वाम आंदोलनों तथा प्रतिरोध की उन शक्तियों को भी हुआ है, जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और बुरी तरह दिग्भ्रमित भी किया है। लेकिन मीडिया की गिरती विश्वसनीयता पर जाहिर की जा रही चिंता का कारण यह नहीं है। उन्हें चिंता है कि – ‘यदि मीडिया की ताकत ही नहीं रहेगी तो कोई अख़बार मालिक किसी सरकार को किसी तरह प्रभावित नहीं कर सकेगा। फिर उसे अखबार निकालने का क्या फायदा मिलेगा? यदि साख नष्ट हो गयी तो कौन सा सत्ताधारी नेता, अफसर या फिर व्यापारी मीडिया की परवाह करेगा? इसलिए व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो यह अखबार के संचालकों के हक में है कि छोटे-मोटे आर्थिक लाभ के लिए पैकेज पत्रकारिता को बढ़ावा न दें।’
व्यावहारिकता का यह तकाज़ा पूंजीवाद से मनुहार करता है कि वह ब्राह्मणवाद से गठजोड़ बनाये रखे। कौड़ी-दो-कौड़ी के लिए इस गठबंधन को नष्ट न करे। सलाह स्पष्ट है अगर हम पहले की तरह गलबहियां डाल चलते रहें तो ज़्यादा फायदे में रहेंगे। सरकार, अफसर, व्यापार सब रहेंगे हमारी मुट्ठी में। अभी लोकतंत्र की तूती बोल रही है। इसलिए वह क्षद्म बनाये रखना ज़रूरी है, जिससे बहुसंख्यक आबादी का विश्वास हम पर बना रहे। मीडिया की ‘विश्वसनीयता’ बनाये रखना इनके लिए ‘समय का तकाजा’ है।
चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है। क्योंकि इससे मूल्यों में ऐसे भयावह क्षरण से नुकसान दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की उन शक्तियों का भी हुआ है जो इसके प्रगतिशील तबके से नैतिक और वैचारिक समर्थन की उम्मीद करते हैं। मीडिया के ब्राह्मणवादी पूंजीवाद ने इन्हें उपेक्षित, अपमानित और दिग्भ्रमित भी किया है।
प्रमोद रंजन का यह भी निष्कर्ष है कि काले धन से खबरों के पैकेज बेचने-खरीदने से कुछ नहीं होता क्योंकि वोट देने वाली जनता समझ गयी है कि इन अखबारों की कोई विश्वसनीयता नहीं है। काले धन से इन अखबारों में खबरें छपवाने वाले अक्सर हार जाते हैं। लेकिन जो लोग जाति धर्म और मित्र धर्म निबाहते हुए विश्वास का धंधा कर रहे हैं वे ज्यादा बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि वे दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों को अपमानित, उपेक्षित और दिग्भ्रमित करते हैं।
अब पैकेज के काले धंधे को इनने बुरा मान लिया है, इसलिए इसे अपना समर्थन मान कर मुझे संतोष कर लेना चाहिए। लेकिन इससे भी बुरा इनने पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म को बताया है। और उदाहरण के नाम पर प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश और पत्रकार-लेखक सुरेंद्र किशोर की टिप्पणी को उद्धृत किया है। हरिवंश कोई पैंतीस साल से मेरे मित्र हैं और सुरेंद्र किशोर ने जनसत्ता की शुरुआत से रिटायर होने तक एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार की तरह काम किया है। इसलिए आइए पहले पत्रकारिता में जाति और मित्र धर्म और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद को लें।
हरिवंश जेपी आंदोलन से कुछ पहले से मेरे मित्र हैं। बांका उनका मेरे साथ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। बीसियों सभाओं-सम्मेलनों, आंदोलनों और संघर्षों में वे मेरे साथ गये हैं। उनकी सोहबत मुझे प्रिय और महत्त्वपूर्ण लगती है। जो वरिष्ठ पत्रकार दिग्विजय सिंह का मीडिया प्रबंधन कर रहे थे, वे हम दोनों के मित्र हैं। उनने डायरी भी लिखी है, यह मुझे दिल्ली में पता चला जब मैं अपने अभियान के लिए सामग्री और सबूत जुटा रहा था। बांका अकेली जगह नहीं थी, जहां मैं इस चुनाव के दौरान गया। हिंदी इलाके के हर राज्य में पत्रकारों से बात करके मैंने सामग्री ली। हरिवंश अपना लेख खबरों का धंधा पहले छब्बीस मार्च को ही लिख चुके थे, जिसकी आखिरी लाइन थी – विज्ञापन और खबरें दो चीजें हैं। जिन चीजों के साथ स्पांसर्ड, प्रायोजित, पीके मार्केटिंग मीडिया इनिशियेटिव लिखा होगा वे विज्ञापन होंगे। हम खबर की शकल में विज्ञापन नहीं छापेंगे। हरिवंश ने यह एक लेख ही नहीं, दो और लेख, एक पाठक का पत्र भी पहले पेज पर छापा। उनने चुनाव कवरेज की अपनी आचार संहिता भी खूब बड़ी छापी। इसमें नाम-पता देकर पाठकों से कहा कि इसका उल्लंघन हो रहा हो तो तत्काल शिकायत कीजिए। चुनाव के बाद 11 मई को उनने फिर खबरों का धंधा-2 फिर पाठकों के द्वार शीर्षक से लेख लिखा, जिसमें एक पाठक की शिकायत को अपने पूरे कवरेज और आचरण से जांचा। किसी भी हिंदी अखबार ने न ऐसा अभियान चलाया न पाठकों के सामने ऐसी जवाबदेही दिखायी।
लेकिन नयनसुख प्रमोद रंजन को न यह दिखा और न इस पर उनने विश्वास किया। क्यों? (यह बताऊंगा तो बहस पटरी से उतर जाएगी) अभी यही कि प्रथम प्रवक्ता के सोलह जुलाई के अंक में उस पत्रिका के झारखंड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है प्रभात खबर में भी खबरें उसी की ज्यादा छपीं जिसने विज्ञापन ज्यादा दिया। वहां अघोषित नियम बनाया गया कि जो पैसा देगा उसको कवरेज मिलेगा। प्रमोद रंजन को ये दो लाइनें प्रभात खबर के तीन महीने के कवरेज अभियान और पाठकों से खुली जवाबदेही को सिरे से खारिज करती क्यों लगती हैं। इसका भी जवाब दूंगा तो दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की बड़ी क्षति होगी। इसलिए फिलहाल सिर्फ मित्र धर्म पर।
प्रथम प्रवक्ता का वह अंक जिसे प्रमोद रंजन ने मेरे निर्देशन में निकला कहा है उसकी पैकेज वाली सारी सामग्री राम बहादुर राय ने मेरे पास भेजी। उसी के आधार पर इस पत्रिका में मैंने लेख लिखा और उस पूरी सामग्री को मैंने संपादित किया। झारखंड ब्यूरो की रपट की वे दो लाइनें मेरी जानकारी और लिखे के विरुद्ध थीं। उनको न तो सबूत और पदार्थ के साथ पुष्ट किया गया था, न उनका विश्लेषण। मैं जो प्रमोद रंजन के कहे मित्र धर्म निबाहता हूं – मैंने ही वे लाइनें संपादित करके बाहर क्यों नहीं कीं? क्योंकि मैं स्वभाव से संवाददाता पर भरोसा और अपने से भिन्न राय की कदर करता हूं। और मेरा मित्र धर्म तो ठीक है, प्रथम प्रवक्ता के संपादक राम बहादुर राय तो हरिवंश के और भी गहरे और पुराने मित्र हैं। अपनी पत्रिका में उनने ये दो लाइनें क्यों जाने दीं? मित्र धर्म क्यों नहीं निभाया?
यह तो खुली प्रमोद रंजन के मित्र धर्म के आरोप से तात्कालिक संदर्भ की पोल। यह भी झूठ है कि सभी अखबार मीडिया इनिशिएटिव लिख रहे थे। मैंने इन अखबारों की जो प्रतियां प्रेस परिषद को जांच के लिए दी हैं उनमें कुछ भी नहीं लिखा है। और ऐसे इनिशिएटिव के बारे में क्या सोचता हूं, वह भी एक लेख में लिख चुका हूं। मैंने एक नहीं चार लेख लिखे हैं। पर छोड़िए तात्कालिक संदर्भ। मैं लगभग पचास साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। कम से कम पांच प्रधानमंत्री मेरे बड़े मित्र थे। चंद्रशेखर सबसे बड़े और पुराने, फिर अटल बिहारी वाजपेयी, फिर नरसिंह राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह। इनके खिलाफ मैंने क्या-क्या और क्या नहीं लिखा है। दर्जन भर मुख्यमंत्रियों से मेरी बड़ी मित्रता रही। उन पर जो लिखा, वह भी सब छपा है। अपनी रतौंध दूर करना चाहें तो पच्चीस साल की जनसत्ता की फाइलें दफ्तर में मौजूद हैं। और यह भी ख्याल रखें कि अखबार मित्र की प्रशंसा और आलोचना के लिए ही नहीं होते। उनका एक व्यापक सामाजिक धर्म भी होता है। वह दलित-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों का भी आकलन मांगता है और जिसकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। लेकिन वह भी बाद में।
अभी अपन ब्राह्मणवाद देख लें। जनसत्ता की पहली टीम में एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे क्योंकि अच्छेलाल प्रजापति भी उसी प्रक्रिया से जनसत्ता में आये थे, जिससे बाकी थे।
जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया। सिवाय बनवारी के मैं किसी को भी पहले से जानता नहीं था। बहुत सी अर्जियां आयी थीं। उनमें सैकड़ों छांटी गयीं। कई दिनों तक लिखित परीक्षाएं चलीं – घंटों लंबी। वे बाहर के जानकारों से जंचवायी गयीं। उसके अनुसार बनी मेरिट लिस्ट के प्रत्याशियों को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया। इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।
हम चुनाव नहीं लड़ रहे थे, जो जाति के वोटों का ख्याल रखते। मंत्रिमंडल नहीं बना रहे थे जो सबको प्रतिनिधित्व देते। हम नया अखबार निकालने की ऐसी टीम बना रहे थे – जो हलकी हो, फुर्ती से लग और बदल सकती हो और अपने भविष्य के साथ अखबार बना सकती हो। कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।
जिस भाषा में से जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे वैसे ही तो रखे जाएंगे। महिला है इसलिए रख लो तो अखबार की टीम कैसे बनेगी? एक्सप्रेस की सब महिलाओं में राधिका राय खास थीं। उन्हें रात की शिफ्ट और अखबार निकालना पसंद था। मैंने संपादक और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन हैं। उनके यहां भी हिंदी में कम और अंग्रेजी में ज्यादा महिलाएं हैं।
मीडिया से दलित-पिछड़ों, वाम आंदोलनों आदि के सरोकार बाहर हुए तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वहां घनघोर बाजारवाद और ब्राह्मणवादी पूंजीवाद आ गया है। चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं। और नंदीग्राम और सिंगूर के बाद वामपंथी किस नैतिक और वैचारिक समर्थन के हकदार हैं?
दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों के सरोकारों की दुहाई देकर खबरों के बेचने के काले धंधे को माफ करना चाहते हो? देखते नहीं कि यह बनिये की ब्राह्मण पर जातिवादी विजय भर नहीं है जिस पर प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं। यह भ्रष्ट राजनेताओं और पत्रकारिता को काली कमाई का धंधा बनाने वाले मीडिया मालिकों की मिलीभगत है। सबसे ज्यादा यह भ्रष्ट राजनेताओं के हित में है कि मीडिया अपनी तटस्थता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता के बजाय दो नंबर की कमाई की रक्षा करे। पैसा फेंक खबर छपवा। ऐसा मीडिया लोकतंत्र को बचा नहीं सकेगा। दलित-पिछड़ों और वाम आंदोलनों की जरखरीद लोकतंत्र में कोई पूछ होगी?
यह समझ न आता हो तो अब आओ! कहो कि यह ब्राह्मणवादी प्रभाष जोशी – सती समर्थक, दलित, पिछड़ा, महिला और मुसलमान विरोधी है। अपन इसका भी जवाब देंगे। लेकिन खबरों को बेचने के काले धंधे को रोकने के पुण्य कार्य में फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!









संघ लोक सेवा आयोग से भी कठिन परीक्षा थी तो हरिशंकर व्यास, सतीश झा, आलोक तोमर, राकेश कोहरवाल, महादेव चौहान जैसे दर्ज़नों को कैसे लिया जिनके काम से आप खुद इतने आहत हुए कि उन्हें सड़क पर जनसत्ता से निकाल ही दिया?
जैसे लोग समाज से आयेंगे वैसे ही रखे जायेंगे कहने के क्या मायने हैं? जनसत्ता के लिए समाज ने ब्राह्मण ही भेजे और आपके चहेते हरिवंश के लिए राजपूत? सीएसडीएस के एक सर्वे के अनुसार प्रभात खबर में टॉप के पाँचों पदों पर राजपूत तैनात हैं जनसत्ता में उतने राजपूत नहीं हैं और न प्रभात खबर में उतने ब्राह्मण, तो समाज दोषी कैसे हो गया?
भाई,
ये की बोर्ड से kangal, jeebh chalana और aashay nikalana आपकी maansikata का sabut है. भाई mujhey jahaj udana नहीं आता अब मई es देश के pioltes के लिए kangal हुआ ना. आप vicharon से ashamat हो या ghrina kartey हो. pehley ये tay करो. ये bimari है gussa नहीं. eska elaaz खुद talasho.
प्रभाष जोशी ने हमेशा की तरह तथ्यों के मामले में फिर लापरवाही दिखाई है या फिर वो पढ़ते नहीं हैं सिर्फ प्रवचन देते हैं। उन्होंने लिखा है-
“वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं।”
अब प्रभाष जोशी को कोई ये बताए कि नीतीश कुमार पर न तो वंशवाद का आरोप हैं, न वो कांग्रेस समर्थक हैं और अगर सीबीआई के पास उनका कोई कंकाल है तो प्रभाष जोशी इतना बड़ा राज सीने में दबाए क्यों बैठे हैं। या हरिवंश ही चारा घोटाले के बाद एक और घोटाले से पर्दा क्यों नहीं उठा देते।
प्रभाष जोशी जैसों को ज्यादा पढ़ना और कम लिखना चाहिए। और अच्छे सब एडिटर की तरह अपने लिखे को कम से कम एक बार पढ़ जरूर लेना चाहिए। ये लेखकीय डिसेंट्री का अच्छा इलाज है। वरना फिर कभी लिख देंगे कि सिलिकॉन वैली की हर कंपनी का चेयरमैन या वाइस चेयरमैन या प्रेसिडेंट ब्राह्मण है और जब लोगों को पता चलेगा कि इन पदों पर कोई भारतीय तक नहीं है तो थू-थू होगी। या फिर कभी लिख देंगे कि क्रिकेट इतिहास के महानतम ओपनर सारस्वत ब्राह्मण सुनील गावसकर और पता चलेगा कि गावसकर तो दसवें नंबर पर भी नहीं आते। ऐसे अपनी फजीहत मत करो जोशी जी।
याशवेंद्र जी, पायलटगीरी तो चालकों की चीज़ है – कीबोर्ड तो पढ़ने-लिखने वालों का प्रासंगिक हथियार। वैसे मैंने जो इंट्रो लिखा, वह बेहद ग़ुस्से में है – और आप कह सकते हैं कि मैंने प्रभाष जी के मुहावरों के समानांतर कुछ गढ़ने की कोशिश की। वो भी हड़बड़ी में। यह इस माध्यम की सीमा है मेरे भाई। क्या कीजिएगा। बुरा लगा हो तो माफ़ कीजिएगा। काटूंगा या हटाऊंगा तो बिल्कुल ही नहीं।
आप लोग तो जोशी जी-जोशी जी किए जा रहे हैं और ये हैं कि
“प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं…
एक प्रमोद रंजन…
नयनसुख प्रमोद रंजन…
एक अनु आनंद…
एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे”
के अलावा किसी भाषा में बात ही नहीं करते। ये अहंकार इनमें में कहां से आया?
प्रभाष जोशी जी का पहला उद्धरण देखिये :
”जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया।”
(अब जातिवाद के जितने भी आरोप खुद संघ लोक सेवा आयोग पर लग रहे हैं, उन पर मट्ठा डालिए. सबसे पहले स्वीकार कर लीजिये कि पी सी एस और यु पी एस सी पूरी तरह ‘जातिनिरपेक्ष’ हैं)
…लेकिन अब ‘जनसत्ता की ब्राह्मण सत्ता’ के सख्त और वस्तुपरक चयन का अगला उद्धरण देखिये :
”इंटरव्यू के लिए भारतीय संचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।”
(अब आप जिन जिन संस्थानों के नाम ऊपर गिनाए गए हैं, उन पर पूर्ण आस्था रखिये. लेकिन ठहरिये उस चयन प्रकृया के असली खिलाड़ी के चहरे से नकाब ‘तुरंता’ और ‘गल-गद भावुकता’ (जो प्रभाष जी की ताकत और कमजोरी दोनों है) से लिखी गयी उनकी लेखनी से खिसक गया है :
”कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।”
(अब अगली एक बानगी और ..)
”मैंने (संपादक) और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन हैं।”
(यह तथ्य बड़ी ‘चतुराई’ से प्रभाष जी ने छिपा लिया कि राधिका ‘राय’ प्रणव ‘राय’ से विवाह के बाद हुई हैं और एन डी टी वी की ‘मालकिन’ भी इसीलिए बनी हैं. लेकिन ब्राह्मणवाद और जातिवाद के इस ‘गाडफादर’ की असली ताकत का भेद तो तभी चल जाता है जब ” मैंने’ और ‘रामनाथ गोयनका’ ने तय किया था …..कि…’देश की पहली महिला समाचार संपादिका’ …! वाह! गज़ब की ताकत ….शोभना भरतिया ने यहीं से ‘गुरु मंत्र’ लिया और ‘सख्त और वस्तुपरक’ चयन प्रक्रिया के अंतर्गत मृणाल पांडे को हिंदुस्तान में देशी पत्रकारिता का ‘पहली महिला सम्पादक ‘ बना दिया और फिर मृणाल जी ने भी ‘संघ लोक सेवा आयोग’ से भी सख्त और वस्तुपरक चयन प्रक्रिया में सिर्फ ब्राह्मणों और ऊपर से सिर्फ पहाडी ब्राह्मणों को ही प्रतिभा और योग्यता में अव्वल पाया.)
इसके बाद और ‘धारण क्षमता’ ‘पाचन क्षमता’ ‘ब्रह्म से संवाद’ वगैरह के पीछे सक्रिय दिमागी बनावट के डी एन ए को जानने में कोई क़सर रह जाती है क्या ? सबूत के तौर पर ये हिस्से देख लें :
” चौधरी चरण सिंह से लेकर मायावती तक ने दलित-पिछड़ों के हितों को अपनी सत्ता और धन-लालसा में कैसे बरबाद किया है, पूरा देश जानता है। वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं।”
बाकी बचे उदगार ये हैं :
”यह समझ न आता हो तो अब आओ! कहो कि यह ब्राह्मणवादी प्रभाष जोशी – सती समर्थक, दलित, पिछड़ा, महिला और मुसलमान विरोधी है।”
”फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!”
हम कहां टिकेंगे गुरु जी..! हम तो वैसे ही सड़क पर आप की महानता के नमूने बने खड़े हैं….!
आपने ब्राह्मण राधिका रॉय को रामनाथ गोयनका से पैरवी करके इंडियन एक्सप्रेस में समाचार संपादक बनवाया। राधिका राय ने आपकी ब्राह्मण बेटी को एनडीटीवी में नौकरी दे दी और अक्षम होने के बावजूद प्रमोशन भी। इसे कहते हैं टेलेंट का असली खेल। आप एनडीटीवी के कार्यक्रमों में नहीं दिखेंगे तो कोई और दिखेगा?
ऐसे चलता है ब्राह्मणवादी तंत्र। कुछ कुछ बात समझ में आने लगी है कि आप मीडिया में छाए हुए कैसे और क्यों हैं। जनसत्ता की आपकी टीम में हर तीन में दो लोग ब्राह्मण थे, ऐसा आपके लोग खुद कहते हैं। वैसे डूबा आपका राज भी और डूब रहा है एनडीटीवी भी।
लगता है जोशीजी ने प्रमोद रंजन का अपना ही पाठ कर डाला है वरना रंजन ने जोशीजी की तारीफ़ की है, बस साथ में यह ज़रूर जोड़ दिया है कि जाति और संपर्कों का भी अलग भ्रष्टाचार है. क्यों जोशीजी यह बात नहीं मान रहे? युवतर लेखक को इस तरह दुतकारना, ललकारना बड़प्पन नहीं जोशीजी! क्या वह कहना चाहते हैं कि जातिगत गठजोड़ की बात उठाना पैसे के भ्रष्टाचार से ध्यान हटाने की कोई साजिश है? शायद जोशीजी को लगता है कि पत्रकारिता में भ्रष्टाचार की बात दुनिया में पहली बार उन्होंने ही उठाई है, यह रंजन भंजन कहाँ से आ कूदा! रंजन ने हवाले देकर बताया है कि पैसे का उपयोग पहले से होता आया है. पैसा हर जगह काम करे न करे जातिवाद और सम्पर्कवाद कई जगह कर जाता है. इसमें ग़लत या ऐसा क्या है कि जोशीजी भड़क उठें, बच्चे-फच्चर पर उतर आयें. स्पष्ट है कि वह नहीं चाहते कोई उनके अलावा इस मामले में बोले लिखे. यह पत्रकारिता में नेतागिरी है और दादागिरी भी. काश कोई जोशीजी को राजनीति में इसका मौका दे देता!
‘मैंने उषा मार्टिन (प्रभात खबर को चलाने वाली कंपनी) को भी कठोतिया कोल ब्लॉक दिया। प्रभात खबर को यह बताना चाहिए कि उसकी शर्तें क्या थीं। मैंने उनसे कितने पैसे लिए?’
- मधु कोड़ा, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, चाईबासा से निर्दलीय सांसद
प्रमोद रंजन ने अपने लेख में ये क्या लिखा है। कहीं इसी वजह से नाराज नहीं है जोशी जी। उनके प्रिय हरिवंश के बारे में कहा जाएगा तो गुस्सा तो आएगा ही।
Priya श्री Prabhash (Brahman) Joshi जी,
apke hisab से इस dunia में budhi का काम सिर्फ brahman करते हैं . baki dunia में brahman कितने और कौन हैं यह भी शायद आप ही jante होंगे की dunia भर में gyan के kshetra में jinka nam है. सो samajsastra और samajvigyan के gyata हैं jiase marx, engles, hegel, fraud, derrida, और भी बहुत sare inmen कौन कौन brahman हैं. यह भी आप sabit कर denge akhir अब तक harek jitne वाले को raja और kshtriya का samman तो आप देते ही रहे. यही dhandha रहा apka. जो kshtriya देश पर hamala करने वाले harek akramankarion के haton harte रहे. parajit होते रहे. chaje हूँ hon या shak या kushan या moughal या british. आप batayen inse harne वाले कौन थे. apke hisab से भी shudra, garib और pichde तोपर होंगे नहीं kyunki ladne का theka तो आप लोगों ने ही kshtriyon को दे rakha था. पर सबसे harte रहे. जो chandragupta maurya जैसे ikka-dukka लोग jite wo भी dasi के garbh से nikala और dasiyan तो brahman kulsheel होने से rahin. waise भी आपके ही vidhan से dasiyan क्या raniyan तक आपकी devvani sanskrit bolne से pratibandhit rahin. shudron, pichdon को भी कहाँ padhne- लिखने का adhikar दिया आपने. आपने gyan prapt करनेन् के सबसें बड़े hatiyar भाषा का patent हमेशा अपने पास rakha और इस तरह gyan का patent भी karva लिया .
पर isse अपने कौन सा gyan viksit किया
ऐसा क्या लिखा jisse dunia age badhi
sabhyata age badhi
paschim की tulna में एक भी vicharak दिखा दें आप
jinke gyan से dunia एक inch भी age badhi
तो gyan का patent ved-puran जैसे उल-julul chizon में khapakar jaya किया
और देश को hazaron साल पीछे कर दिया
और अब भी आप यही चाहते हो
कुछ भी हो satta या satta sutra आपके hath में रहे
सो अभी भी अपने biradar walon को ही ghusaye जा rhae हो
vidwan banaye जा रहे हो
यह tumahare mishra, jha, tripathi ही तो हैं जो
pidit लोगों से camera पर sawal puchate firte हैं
‘कैसा mehsoos कर रहे है आप’
कितने gyani हैं
और हर akhbar में baithkar goti bithane वाले लोग
यह भी aphi के kul वाले हैं
अगर खबर bechakr paisa lane का dhandha कौन चला रहा है
inki packaging कौन कर रहा hai
aphi के samaj और kul वाले तो कर रहे हैं
auron को तो ghusne ही कहाँ दिया
तो इतने बड़े dharak
palak सब
apke vansh वाले
khabaron का
dhandha कर रहे हैं
और आप malik पर pile pade हो
pilo अच्छा कम है
usme हमारा samarthan भी है
पर अपनी galtiyan भी dekho
प्रभाष जोशी के इस अश्लील लेख पर कुछ भी कहने से पहले प्रभाष जोशी और उसके चेला मण्डल ये जान ले कि जो बूढ़ा नौजवानों को वाजिब इज्जत नहीं देता वो ये भूल जाए कि नौजवान उस बूढ़े गिद्ध को दिखावटी इज्जतअदायगी करेंगे। चेला लोग जाकर अपने गुरू को समझाओ की इस उम्र में पहलवानों वाली भाषा लिखना बंद करे। ऐसा करके वो अपना बुढ़ापा खराब कर रहा है। किसी टुटपूंजिए गुण्डे की तरह धमकी भरी भाषा लिखने वाले किसी बूढ़े पर सिर्फ तरस भर खाया जा सकता है।
ये प्रभाष जोशी हमें अपने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री मित्रों की धौंस देता है। पत्रकार गैलरी का दुरूपयोग करके सत्ताधारियों से कैसी मित्रता बनती है इसे कौन नहीं जानता। नेताओं से भीतरखाने सांठगांठ करके उनके खिलाफ विरोध के मंच को चालाकी से कब्जा कर लेने को ये वीरगाथा की तरह सुनाते हैं। इनके समकालीन पत्रकारों में रत्तीभर नैतिकता बची है तो वो हमें इसकी असलियत से वाकिफ कराए।
आज सुबह जनसत्ता पढ़ा तो सन्न रह गया था। पहला सवाल यही नाच रहा था कि ये प्रमोद रंजन है कौन जिसकी छाती पर यह खिसिआया बूढ़ा चढ़ बैठा है। एक नौजवान को धमकाने और अपमानित करने के लिए इसने खबर के बेचने के धंधे को ओट बनाया है। हम भी काले धंधे की खिलाफ मुहीम में इसके साथ हैं। जरा हम भी तो देखें कि ये इस नूरा-कुश्ती के आखिर में कौन सा जाली दाँव चलता है। हमें इसके इस सरकारी मुहीम के हश्र का इंतजार रहेगा।
प्रमोद रंजन जो भी हैं उनसे अपील है कि वो इसे जवाब जरूर दें। यदि प्रभाष जोशी उन्हंे या उनके परिवार के किसी भी सदस्य को किसी भी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से क्षति पहुँचाने की कोशिश करे तो वो इस तरह के कुत्सित प्रयासों को सार्वजनिक करके उसके असल चेहरे को सरेबाजार बेनकाब करें।
वैसे इसने डर के मारे इंटरनेट वालों का अपने लेख में कोई जिक्र नहीं किया है। जानता था कि यहाँ अगिया-बैताल लेखक हैं। जो इनकी गीदड़ भभकी से डरने वाले नहीं हैं। धुलाई कर देंगे। मैं ज्यादा नहीं लिख रहा हूँ। गुरू-चेला मण्डल से गाल-बात तो अब होती ही रहेगी। सो, शेष फिर कभी….
रंगनाथ जी, प्रभाष जोशी की पोल तो उस पत्र ने खोल दी है जो प्रमोद रंजन जी ने ओम थानवी को लिखा है। जनतंत्र डॉट कॉम पर यह छपा हुआ है। यहां देखें- http://janatantra.com/2009/09/06/pramod-ranjan-on-news-for-sale/ इसमें साफ तौर पर जिक्र है कि वह लेख खबरों का धंधा की मुहिम को आगे बढाने के लिए लिखा गया है। लेकिन बूढे प्रभाष जोशी को इससे क्या मतलब, उन्हें तो अपनी जातिवादी मुहिम आगे बढानी है।
जिस लेख विश्वास का धंधा की चर्चा यहां हो रही है, उसके साथ दिये गये फुट नोटस भी बहुत ज्ञानवर्द्धक और प्रभात खबर की असलियत खोल देने वाले हैं। उनमें जिक्र है कि कैसे हरिवंश ने मधु कोडा को ब्लैकमेल करने के लिए लोकसभा चुनाव के दौरान चाइबासा में उनके खिलाफ झूठी खबरें छपवायीं और बाद में उषा मार्टिन को कोल फील्ड देने का दबाव बनाने लगे। उन फुट नोटसों को जनतंत्र पर पढ लेना मेरी समझ में एक बहस को ठीक दिशा में चलाने के लिए जरूरी है।
दैनिक हिंदुस्तान में २९ अप्रैल को ये छपा था:-
पिछले चुनाव में एनडीए उम्मीदवार के रूप में 4669 के मामूली अंतर से हारने वाले दिग्विजय सिंह टिकट के प्रति पूरे आश्वस्त थे और क्षेत्र में काफी सक्रिय भी। लेकिन अंतिम समय में जदयू ने उनका टिकट काट दिया तो वे निर्दलीय खड़े हो गए है। वे अपनी लड़ाई को बांका के सम्मान की लड़ाई से जोड़ रहे हैं। वे आहत शेर की तरह कहते हैं उनके साथ नहीं बल्कि बांका के साथ अन्याय हुआ है। उन्हें भरोसा है इसलिए न्याय के लिए वे जनता की अदालत में आए हैं। वे जीतेंगे तो बांका के विकास के अधूरे सपने को पूरा करेंगे। रेल राज्य मंत्री रहते उन्होंने बांका के विकास के लिए कई बड़े काम किए थे और विकास पुरूष की छवि बनाई थी। (रेल के इसी विकास की नाव पर जयप्रकाश भी उन्हें चुनौती दे रहे हैं)। जदयू के प्रति उनकी नाराजगी का आलम यह है कि वे कुछ उधार नहीं रखना चाहते थे सो उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया। पार्टी छोड़ने के बाद भी जदयू कार्यकर्ताओं का बड़ा तबका उनके साथ दिख रहा है। चंद्रशेखर के अनुयायी रहे दिग्विजय अब समाजवादी जॉर्ज फर्नाडीज के नजदीकी हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी उनके नामांकन में मौजूद थे।
प्रभाष जो
शी, ‘ईमानदार’ हैं। कारपोरेट घरानों के कलमघिस्सु हैं। उन्होंने ‘सच’ कहा है,उसे गंभीरता से लेना चाहिए। पहला सच ,प्रेस (संपादकों,पत्रकारों और प्रेस मालिकों) और राजनेताओं गहरा याराना होता है, उनका भी कितने ही प्रधानमंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के साथ याराना था। धन्य है दोस्ती और पेशे की ईमानदारी। कम से कम अखबार वालों के साथ राजनेता कभी ज्ञान,सलाह और समझ पाने के लिए दोस्ती नहीं करते, प्रचार पाने के लिए दोस्ती करते हैं। स्वयं प्रभाष जोशी यह काम करते रहे हैं,यह तथ्य भी वे लिख चुके हैं। दिक्कत यह है कि जोशीजी पेशेवर मीडिया वाले नहीं हैं,सामंती मीडिया वाले हैं। जोशीजी अपने मालिकों को ‘जनसंपर्क’ एजेंसी खोलने का सुझाव दे ही सकते थे,ऐसी ही एजेंसियां वे सब काम करती हैं, जिनको वे करते रहे हैं अथवा उनके करीबी दोस्त पत्रकार करते रहे हैं। हिंदी प्रेस में यदि इस बार खबरों के लिए लेन-देन हुआ है तो यह कोई नयी बात नहीं है,यह तो बारह महिने चलता रहता है,जोशी जी भी जानते हैं कि किस तरह चलता है यह धंधा। समस्या लेन देन में नहीं है। हम निंदा करेंगे,वे तब भी लेंगे। यह निंदा की समस्या नहीं है। यह चुनाव की समस्या भी नहीं है। यह कारपोरेट प्रेस की दैनन्दिन समस्या है। हमारे सामने प्रभाष जोशी चाहे जितना सौगंध खाएं, कितना ही अपने को सत्यवादी बताएं, कौन नहीं जानता कि प्रत्येक संपादक अपने मालिक के लिए ‘जनसंपर्क’ का काम करता है,पूंजीपतियों के लिए ‘जनसंपर्क’ नहीं करेगा,तो उसे कोई नौकरी पर भी रखने वाला नहीं है, रिटायर्ड होने के बाद भी जब पगार मिलती है तो उसका लक्ष्य लेखन नहीं कुछ और है। प्रभाष जोशी की मुश्किल यह है कि करना चाहते हैं कारपोरेट प्रेस का धंधा, लेकिन सामंती खोल और मूल्यों के आवरण को बनाए रखकर। वे जानते हैं क्या कर रहे हैं लेकिन दावा ‘सत्य’ की रक्षा का कर रहे हैं,’खबर’ की रक्षा का कर रहे हैं। उन्हें इस आवरण को फेंक देना चाहिए। इससे अन्य संपादक भी प्रेरणा लेंगे,कारपोरेट प्रेस के पेशेवर नियमों के तहत प्रभाष जोशी को परखना चाहिए, जातिवाद इसका एक बडा हिस्सा है। अब जोशी जी यह न समझाएं कि जाति हिस्सा नहीं है। सिर्फ पेशेवर तरीकों के आधार पर चयन किया था,हम प्रभाष जोशी और उनके भक्तों से यही कहना चाहते हैं कि प्रभाष जोशी कारपोरेट घराने का पत्रकार है ,जनता के हितों को लेकर लडने वाला पत्रकार नहीं है। जनता के हितों को लेकर लडने वाले पत्रकार को प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री से दोस्ती गांठने की जरूरत नहीं पडती। प्रभाष जोशी कम से कम एक भी ऐसा रहस्योदघाटन बताएं जो कभी उन्होंने अपने दोस्त प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , अथवा अपने कारपोरेट आकाओं (जो उनके दोस्त थे या हैं ) के बारे में किया हो, कौन नहीं जानता चन्द्रशेखर जब प्रधानमंत्री बने थे तो प्रधानमंत्री कार्यालय में बैठकर सीधे सौदे पटते थे,प्रधानमंत्री कार्यालय में ही रकम सरेआम ली जाती थी। जोशी जी उन व्यक्तियों को भी जानते हैं जरा सुविधा के लिए स्वयं ही सत्य बोल दें तो पता चल जाएगा कि खबर पर्दा कौन डालता रहा है, ,भारत के इतिहास में प्रधानमंत्री के रूप में चन्द्रशेखर सबसे भ्रष्ट थे। किसी भी कांग्रेसी नेता से इस तथ्य की आसानी से पुष्टि हो सकती है। लेकिन ‘ईमानदारी’ और ‘सत्य’ के लिए आग उगलने वाले प्रभाष जोशी को चन्द्रशेखर के कार्यालय का भ्रष्टाचार नजर ही नहीं आया। बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो मिलाय। कारपोरेट घरानों की राजनेताओं के साथ कैसे ढील होती है और वे इसके बारे में कितने तथ्य जानते हैं ,यदि उसकी थोडी सी भी झलक वे देते तो देश का बडा भला होता।
प्रभाष जोशी ने जिस प्रमोद रंजन को “कोई प्रमोद रंजन” और बेहद अश्लील तरीके से “नयनसुख प्रमोद रंजन” कहा है उनके मूल लेख को फुट नोट समेत यहां पढ़ें:
http://janatantra.com/2009/09/06/pramod-ranjan-on-news-for-sale/
प्रभाष जोशी, ये ३० साल से कम उम्र के एक लेखक की शोधपरक रचना है (उनकी किताब भी छप चुकी है, और ये प्रभाष जोशी की किताबों की तरह महज लेखों का संकलन नहीं है!) जिसमें हर बात को फुट नोट से पुष्ट
किया गिया है। प्रभाष जोशी, आप अपने ५० साल के पत्रकारीय कैरियर को पीछे मुड़कर देखिए और बताइए कि आपने ऐसा एक भी स्कॉलरी लेखन किया है। कभी आपने फुटनोट लगाए भी हैं? कोई शोध किया है? एक भी?
हम सब इंतजार करेंगे प्रभाष जोशी के स्वनामधन्य चेलों का भी है। विद्वता का मुकाबला अभद्र और अशालीन लेखन नहीं होता है प्रभाष जोशी। न विद्वता मुंह के पोपले होने का इंतजार करती है। आप तथ्यों के साथ नहीं लिखते, ये दुनिया जानती है। प्रभाष जोशी को माफी मांगनी चाहिए कि उन्होंने प्रमोद रंजन, ए एल प्रजापति और अन्नू आनंद के बारे में इतनी अभद्र भाषा में बात की।
एक बार मेरी एक दोस्त ने माननीय प्रभाष जोशीजी को अमर सिंह के चैंबर के आगे एप्यांटमेंट के लिए इंतजार करते देखा और मेरे से सिर्फ इतना ही कह पायी..ये क्रांति की मसाल जलाकर मिसाल पैदा करनेवाले देश के सबसे प्रभावी पत्रकार हैं।.
अविनाश जी को की बोर्ड सम्हालना आता है.जगदीश्वर जी के पास काफ़ी समय और समर्पण है.हमारे समय में बड़े मुश्किल से यह संयोग घटित हुआ है.आप दोनों मिलकर पत्रकारिता में ऐसा महान काम करिए जो इस धंधे से बेहतर हो.अगर आप जानते हैं कि अमुक अज्ञानी है,कंगाल है तो ढोल पीटने में लगनेवाला समय भी बचा लीजिए.प्रभाष जोशी जैसों से महान तो आप दोनों कबके हो चुके.अब सिर्फ़ जनसत्ता से महान अख़बार निकालने की कसर है.हम धन्य हुए.मोहल्ला लाइव के सभी युग पुरुषों,न्यायाधीशों को बारंबार प्रणाम.
“एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे …”
मतलब यह कि “ब्राह्मणवाद चलने ” का आरोप जब लगा तो आप अपनी मंडली सहित हंसे। सबको इकट्ठा करके आपने इसे “मनोरंजक खबर” मानकर जाहिर है, प्रजापतिजी का मजाक उड़ाया। ताज्जुब है, यह सब कन्फेस करते हुए आपको शर्म छू तक नहीं गई और आप इसे इस मंच पर भी किसी विजय-कथा की तरह बखान रहे हैं।
और फिर–
”कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।”
”मैंने (संपादक) और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे एनडीटीवी की मालकिन
हैं।”
तो आप सिर्फ ब्राह्मण ही नहीं, एक ‘पुरुष’ भी हैं जिसने दूसरे पुरुष/ पुरुषों के साथ मिलकर किसी महिला को यह या वह ‘बनाने’ का फैसला किया और उस पर अमल भी किया!
” एक्सप्रेस की महिलाएं भी” आपकी “रखी हुई ” थीं। गज़ब! कमाल है!
वैसे यह सवाल मेरा भी है कि जब चंडीगढ़ एक्सप्रेस में आधी महिलाएं थीं जो आपकी रखी हुई थीं, तो ऐसा ही कारनामा आपने अपने ही अखबार में दिल्ली में क्यों नहीं कर दिखाया? दिल्ली में “महिलाओं” की कमी थी या हिंदी में?
प्रभाष जी, ब्राह्मण पुरुष होने का इतना अहंकार लिए जब आपने यह सब लिखा तो आखिर अपने ही खिलाफ! खास तौर पर जबकि आप जानते हैं कि जिस बहस के जवाब में जिस जगह यह कहा जा रहा है वहां आपके चेले/समर्थक या निष्क्रिय श्रोता या पाठक ही नहीं बल्कि हर शब्द- कॉमा-फुल स्टॉप की संदर्भों के साथ चीर-फाड़ करने वाले भी हैं । फिर भी आप वह सब कह गए जो कि सच था और आपके लिए सहज-स्वाभाविक था। इसे आपकी असावधानी समझें, ईमानदारी या मासूमियत ? या फिर यह वही रावण वाला अज्ञानता का अहंकार है, जिसमें अपनी सोच ही सही और वास्तविक लगती है, बाकी सब मिथ्या और गैर-मौजूद।
सबसे पहले तो ये कहना चाहूंगा कि बहस का स्तर काफी गिर गया है। किसी की गलती के लिए आलोचना करना तो अच्छी बात है, लेकिन आलोचना की भाषा का इतना गिरना शर्मनाक है। खासतौर पर, प्रभाष जोशी जैसे वरिष्ठ पत्रकार की इस तरह की आक्रामक भाषा में आलोचना ठीक नहीं है।
मुझे ऐसा लगता है कि पत्रकारिता को लेकर प्रमोद रंजन द्वारा उठाए गए सवाल और उस पर पत्रकारिता के भीष्म पितामह यानी प्रभाष जोशी के जवाब दोनों ही कहीं न कहीं पूर्वाग्रह से प्रेरित दिखती हैं। और इस दोनों सवाल-जवाब पर पोस्ट की गई ज्यादातर टिप्पणियां तो दुराग्रह की सीमा तक पहुंच गई दिखती हैं।
चूंकि सवाल प्रमोद रंजन ने उठाए हैं, इसलिए उन्हीं से शुरू करते हैं। प्रमोद जी के मीडिया के जातिवादी आरोपों से एक हद तक तो मैं भी सहमत हूं। और भी लोग इससे सहमत होंगे, भले ही निजी फायदे को देखते हुए इसे स्वीकार न करें या खुलकर न बोलें। लेकिन मैं यह पूछना चाहता हूं कि भारत में किस क्षेत्र में और कहां जातिवाद नहीं है? ऐसे देश में, ऐसे समाज में जहां वोट जाति के आधार पर पड़ते हैं, सरकारें, मंत्री, मुख्यमंत्री जाति के आधार पर तय होते हैं, तो मीडिया जातिवाद से बिल्कुल अछूता होगा, ये कैसे संभव हो सकता है? फिर, मीडिया में एंट्री का कोई तय पैमाना तो आज तक जब बना ही नहीं, जान-पहचान और पैरवी के बल पर जब ज्यादातर पत्रकारों की नियुक्ति होगी तो यह पूरी तरह से निष्पक्ष कैसे होगी? और जब पत्रकारों की नियुक्ति ही निष्पक्ष तरीके से नहीं होगी तो फिर निष्पक्ष खबरों की उम्मीद कैसे की जा सकती है? अब सवाल जान-पहचान के मामले की है तो मीडिया का राजनीति और ब्यूरोक्रेसी से चोली-दामन का साथ होता है। किसी का एक-दूसरे के बिना काम नहीं चल सकता। पत्रकार को खबर चाहिए तो आमतौर पर उसके सूत्र नेता या अफसर ही होंगे। जाहिर है, जिनसे खबरें मिलेंगी, उनका खयाल रखना पत्रकारों की मजबूरी भी होती है। मगर, ज्यादातर पत्रकार, नेताओं और अफसरों के साथ उठने-बैठने का फायदा उठाने लगते हैं तो नेता और अफसर भी पत्रकारों का (खबर के रूप में) फायदा उठाएंगे ही। यह सही है कि अच्छे संबंधों को निभाने के चक्कर में कई बार पत्रकार, पत्रकार नहीं रह जाता है। और ऐसे पत्रकारों की तादाद दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। प्रमोद रंजन का यह कहना कि पत्रकारिता का यह पतन वैश्विक मंदी के कारण वर्ष 2009 में अचानक घटित होने वाली घटना नहीं है। पत्रकारिता में जाति, पद और परिचय पर आधारित पत्रकारिता का फर्रुखाबादी खेल वर्षों से चलता रहा है और चल रहा है। मगर इस आधार पर प्रमोद का यह तर्क “वस्तुतः पैकेज ने जातिजीवी संपादकों की मुट्ठी में कैद अखबारों के खिड़की-दरवाज़े सभी जाति के धनकुबेरों के लिए खोल दिये हैं। और पैकेज लेकर खबर छापने से अधिक बुरा है पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह।” बिल्कुल गलत है। प्रमोद रंजन का- पैसे लेकर खबर छापने या प्रसारित करने जैसी गंभीर समस्या का बचाव करना ठीक वैसा ही है जैसे संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने को सही ठहराने या फिर चूंकि बिना घूस के सरकारी दफ्तरों में काम नहीं होता है, इसलिए घूस लेने-देने को कानूनी मान्यता देने की बात। वस्तुत: दोनों ही बातें- पैसे लेकर खबर छापना-प्रसारित करना और खबर में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह करना, निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता के नाम पर कलंक है। प्रमोद रंजन का तर्क या तो उसी जातिवादी भावना से कहीं न कहीं ग्रसित दिखाई दे रहा है, जिसकी वह बार-बार आलोचना कर रहे हैं, या फिर उनसे बड़ी तथ्यात्मक भूल हुई है। या फिर लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को उन्होंने ठीक से, व्यापक और समग्र रूप में समझा ही नहीं है।
शायद, इसिलिए भीष्म पितामह (प्रभाष जोशी) को उखड़ने का मौका मिल गया और उन्होंने अपने लेख में-
“प्रमोद रंजन जैसे बच्चे ताली बजाएं…
एक प्रमोद रंजन…
नयनसुख प्रमोद रंजन…
एक अनु आनंद…
एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे”
जैसी भाषा का इस्तेमाल कर डाला। नि:संदेह उनकी भाषा में अहंकार दिख रहा है। कम से कम उनसे ऐसी भाषा की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।
फिर प्रभाष जोशी जी के लेख के कुछ उद्धरण-एक: कि “जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया।” और “इंटरव्यू के लिए भारतीय जनसंचार संस्थान के संस्थापक निदेशक महेंद्र देसाई, प्रेस इंस्टीट्यूट के भूतपूर्व निदेशक चंचल सरकार, गांधीवादी अर्थशास्त्री एलसी जैन, इंडियन एक्सप्रेस के संपादक जॉर्ज वर्गीज, मैं और एक विशेषज्ञ। कई दिन तक इंटरव्यू चले। लिखित और इंटरव्यू की मेरिट लिस्ट के मुताबिक लोगों को काम करने बुलाया। वेतन, पद उसी से तय हुए। कोई भी किसी की सिफारिश या किसी के रखे नहीं रखा गया। इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया हो नहीं सकती थी।”
उद्धरण-दो “कुछ बरस बाद एक अन्नू आनंद ने लिखा कि प्रभाष जोशी देखते नहीं कि इंडियन एक्सप्रेस में कितनी महिलाएं हैं और जनसत्ता में कितनी कम। जब वे मुझे प्रेस इंस्टीट्यूट में मिलीं तो मैंने पूछा – आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं? और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं।”
उद्धरण-तीन “मैंने (संपादक) और रामनाथ गोयनका से तय किया था कि राधिका राय को देश की पहली महिला समाचार संपादक बनाएंगे। आजकल वे NDTV की मालकिन हैं।”
( यहां प्रभाष जी को यह भी बताना चाहिए था कि राधिका ‘राय’ प्रणव ‘राय’ से विवाह के बाद हुई हैं और NDTV की ‘मालकिन’ भी इसीलिए बनी हैं, लेकिन उन्होंने इसे राज ही रहने दिया)
खैर जाने-अनजाने प्रभाष जी ने अपने पहले उद्धरण की तटस्थता दूसरे और तीसरे उद्धरण से गलत करार दे दिया। मतलब साफ है कि प्रभाष जी ने खुद ही जब यह मान लिया है कि जिस भाषा में जैसे लोग पत्रकारिता में निकल कर आएंगे वैसे ही तो रखे जाएंगे। इसी तरह उन्हें यह भी मानना चाहिए था कि जिस जाति से ज्यादा लोग पत्रकारिता में आएंगे, उसी जाति के लोग ही तो रखे जाएंगे और उन्हें ही तो प्रमोट किया जाएगा (जैसा कि राधिका रॉय के मामले में उन्होंने किया)। अगर यह सही है तो उन्हें स्वीकर करने में हिचकने की क्या जरूरत है?
प्रभाष जोशी जी से एक और जगह तथ्यात्मक भूल हुई है या और कुछ ये तो वहीं जानें। मगर जरा उनके इस वाक्य को पढ़ें-
“वंशवाद और धन के लोभ ने लालू, मुलायम, चौटाला, नीतीश कुमार, अजित सिंह और मायावती को मजबूत विपक्ष बनने के बजाय बिन बुलाये कांग्रेस समर्थक क्यों बनाया है? क्योंकि सबके कंकाल सीबीआई के पास हैं।” प्रभाष जी ने नीतीश कुमार पर भी वंशवादी, कांग्रेस समर्थक होने और सीबीआई के पास उनका कंकाल होने के आरोप मढ़ दिए हैं, जो कि इस समय तक कि खबरों के लिहाज से तथ्यात्मक रूप से ठीक नहीं है।
प्रभाष जी का ये उद्धरण भी गले नहीं उतरा कि “एक अच्छेलाल प्रजापति हुआ करते थे। कुछ ही महीने काम करके वे कोलकाता गये। वहां से खबर आयी कि उनने कहा कि जनसत्ता में तो बड़ा ब्राह्मणवाद चल रहा है। मैं तब डेस्क पर साथियों से मिल कर पहला संस्करण निकाल रहा था। निकल गया तो सबको इकट्ठा करके हमने इस मनोरंजक खबर का मजा लिया। फिर मेरे सुझाव पर पूरी टीम की जातिवादी मर्दुमशुमारी की गयी। ब्राह्मण ज्यादा थे। मैं कहा – देख लो अपने ही एक टीम साथी ने आरोप लगाया है। अब हमें ठीक से काम करना है। हम सब हंसे …”
प्रभाष जी के इस बात से कहीं न कहीं “ब्राह्मणवाद” या ” सवर्ण” दंभ झलक रहा है। उम्र के इस पड़ाव में उन्हें ऐसे उद्धरण से बचना चाहिए। पत्रकारिता में उनकी बहुत साख रही है। बचपन से प्रभाष जी को पढ़ा है, लेकिन उनके इस लेख से निराशा हुई है।
मुझे तो प्रभाष जोशी ना ब्राह्मणवादी लगते हैं ना किसी के पक्षधर या विरोधी, अपनी महत्वाकांक्षा को लेखनी के सहारे परवान चढाने वाले इस कुटिल लेखक ने ना सिर्फ पत्रकारिता को अपमानित किया वरन पत्रकारिता में ऐसे ऐसे दलालों को बढावा दिया कि अब तो पत्रकारों को भी नहीं पता कि कोई गणेश शंकर विद्यार्थी भी थे !
लेखनी में दंभ की कितने प्रधानमंत्री मित्र रहे और मैंने क्या क्या किया परिलक्षित करता है कि ये ज्ञान रहित वो ठूंठ है जहाँ “विद्या ददाति विनयम” का भाव ही नहीं. जाती पांति के बाद चाहे अयोध्या हो या गोधरा इस कुलीन लेखक को बस सनसनी और विवाद में रहना पसंद रहा है.
प्रमोग भाई के लेख पर इस अतीत का बिफरना दर्शाता है कि ये कितना बड़ा ज्ञानी रहा है.
प्रभाष जोशी ने पता नहीं कौन सा ऐसा जुर्म कर दिया की कुछ दिन से नामी-गिरामी पत्रकार व कुछ लिखने के शौकीन व नौसिखिये सभी उनके पीछे पड़ गए हैं . असली बात या कारण कोई भी नहीं लिख रहा है. जान- बूझ कर पत्रकारिता या प्रकाशन कार्य को एक व्यवसाय न मानते हुए जातिवाद की उन बातों को उठाया जा रहा है जिन्हें यदि कोई अन्य जाति विशेष का व्यक्ति उस जाति विशेष से जोड़ते हुए कहेगा तो निश्चित तौर से जेल की हवा खायेगा. तो भाइयो मेरा तो आप सब से एक ही निवेदन है की कृपया अपनी लेखनी से जातिसूचक शब्दों (ब्राह्मणवादी ,स्वर्ण या छोटी-जाति ) का प्रयोग मत करें .
प्रभाष जोशी एक वाम-पंथी विचारधारा के समर्थक और पूँजी-पतियो के प्रकाशन-गृह में काम करने वाले एक प्रख्यात लेखक हैं . उनके विरूद्व जो शिकायत है वह मामूली सी बात है. ऐसा सभी पत्रकार करते हैं (विशेषतः वर्तमान समय में ).
हाँ , आप सब के विचार पड़ कर यह तो साबित हो गया की पत्रकारिता जिसे हम इस” प्रजातंत्र का जबरदस्ती चौथा स्तम्ब मानते हैं ” झूठ है. पत्रकारिता कभी आम लोगों की आवाज हुआ करती थी, पत्रकारिता कभी समाज का दर्पण हुआ करती थी क्यूंकि वह सत्य ही लिखती थी ,दर्शाती थी . गोयनका और वर्गीज वाला काण्ड पुराने पत्रकार भाई जानते ही होंगे . वह समय अवश्य ही स्वर्णिम-काल कहा जा सकता है.
आज हम सभी उसी पत्रकारिता व पत्रकारों में राजनितिक दलों व तथाकथित राज-नेताओं के चाटुकार ,पैसा लेकर खबर बनाने व छपने वाले , माफिया व बाहुबलियों को समाज के दबे-कुचले तबके का मसीहा बना महिमामंडित करने वाले व हर प्रकार के भ्रष्टाचार में लिप्त लोग मिलेगे . स्वयं को पत्रकार कहनेवाले , प्रातः काल दो मिनट जरा अपने-अपने गिरेबान में झांक कर तो देखें आपने कल क्या किया था ? जरा अपनी लेखनी को तो देखें की वोह कितनी दाग-दार है ? एक वैश्या तो समाज के कतिथ ठेकेदारों द्वारा जबरदस्ती नरक (जिस्म की मण्डी) में धकेली जाती है. परन्तु पत्रकारों की कलम व पत्रकारिता भृष्टाचार की हर प्रकार की नरक की मण्डी की गंदगी से लिप्त है. क्यूंकि समाज में यही सब हो रहा है.
प्रणाम है उन ईमानदार,निष्पक्ष और बेदाग पत्रकारों व पर्ताकारिता को जिन्हें वास्तव में लोकतंत्र के इस मंदिर का चौथा स्तम्ब कहा जा सकता है.
आशा है की इस व्यर्थ की छीछालेदर को छोड़ कर हम अपने-अपने कर्त्तव्य की और भी तनिक ध्यान देंगे ताकि समाज को अच्छे पत्रकारों व पत्रकारिता से जागरूक किया जा सके.
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