आपने जीवन भर पत्रकारिता कम, प्रौपेगैंडा ज़्यादा किया
♦ जगदीश्वर चतुर्वेदी
प्रभाष जोशी का अतिरंजित लेखन साधारण लोगों को भ्रमित करता है। ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जो उन्हें जनसंपादक और जनता का बुद्धिजीवी मानते हैं। वे जनसंपादक नहीं कारपोरेट संपादक थे। वे जनता के बुद्धिजीवी नहीं, पावर के बुद्धिजीवी हैं। पावर का बुद्धिजीवी विचार नियंत्रक होता है। जो दायरे के बाहर जाता है, उससे कहता है, टिकोगे नहीं। टिकोगे नहीं की भाषा मर्द भाषा है, नियंत्रक की भाषा है। अलोकतांत्रिक भाषा है।
हिंदी में सही धारणाओं में सोचने की परंपरा विकसित नहीं हुई है। अत: ये सब बातें करना बड़ों का अपमान माना जाएगा। यह अपमान नहीं मूल्यांकन है। सच यह है प्रभाष जोशी कारपोरेट मीडिया में संपादक थे। एक ऐसे अखबार के संपादक थे, जिसका प्रकाशन हिंदुस्तान का प्रमुख कारपोरेट घराना करता है। प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के कागद कारे स्तंभ के ताज़ा लेख में जो बातें कहीं हैं, वे जनपत्रकारिता के बारे में नहीं हैं, बल्कि कारपोरेट पत्रकारिता के बारे में हैं।
जोशी ने लिखा, जनसत्ता हिंदी का पहला अखबार है, जिसका पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया। जोशी यह भर्ती की कारपोरेट संस्कृति है। परीक्षा, क्षमता, योग्यता और मेरिट आदि कारपोरेट संस्कृति के तत्व हैं। जनसंपादन कला के नहीं। निराला, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी के यहां भर्ती के कारपोरेट नियम नहीं थे।
प्रभाष जोशी ने अपने समूचे पत्रकार जीवन में अवधारणात्मक नियंत्रक का काम किया है। लिखा है, अखबार मित्र की प्रशंसा और आलोचना के लिए ही नहीं होते। उनका एक व्यापक सामाजिक धर्म भी होता है। यह सामाजिक धर्म क्या है? जानते हैं, प्रभाष जोशी इसे कारपोरेट मीडिया की भाषा में कहते हैं अवधारणात्मक नियंत्रण। हिंदी पाठक किन विषयों पर बहस करे, किस नजरिए से बहस करे, इसका एजेंडा इसी सामाजिक धर्म के तहत तय किया जाता है। इस सामाजिक धर्म के बहाने किनका नियंत्रण करना है और किस भाषा में करना है यह भी आपने बताया है। लिखा है, वह दलितों-पिछड़ों की राजनीतिक ताकतों, वाम आंदोलनों और प्रतिरोध की शक्तियों का भी आकलन मांगता है और जिसकी जैसी करनी उसको वैसी ही देने से पूरा होता है। यानी आपने दलित, पिछड़े और वाम का मूल्यांकन किया। किस तरह के पत्रकारों से कराया मूल्यांकन? किसी प्रतिक्रियावादी से वाम का मूल्यांकन कराइएगा तो कैसा मूल्यांकन होगा? एक दलित का गैर दलित नजरिये से कैसा मूल्यांकन होगा? एक मुसलमान की समस्या पर गैर मुसलिम नजरिया कितनी हमदर्दी के साथ पेश आएगा? प्रभाष जी आप जानते हैं अमेरिका में काले लोग जब मीडिया में काम करने आये तब ही काले लोगों का सही कवरेज हो पाया।
प्रभाष जोशी आप धर्मनिरपेक्ष हैं। मुसलमानों के हिमायती हैं। कृपया बताएं आपके संपादन काल में मुसलमानों के कार्यव्यापार, जीवन शैली, सामाजिक दशा के बारे में कितने लेख छपे थे। आपके यहां पांच अच्छे मुस्लिम पत्रकार नहीं थे। अब यह मत कहना मुसलमानों को लिखना-पढ़ना नहीं आता। खैर हिंदू पत्रकारों को तो आता था। उनसे ही मुसलमानों की जीवनदशा पर सकारात्मक नजरिए से समूचे संपादनकाल में दस बेहतरीन खोजपरक लेख तैयार करवाये होते। किसने रोका था? कोई चीज़ थी जो रोक रही थी। अभी भी हालात ज़्यादा बेहतर नहीं हैं। आप मुसलमानों के बारे में वैसे सोच ही नहीं सकते क्योंकि शासकवर्ग नहीं सोचते। आपकी पिछड़ों और दलितों के प्रति कितनी और कैसी तटस्थ पत्रकारिता रही है, उसके बारे में भी वही सवाल उठता है जो मुसलमानों के बारे में उठता है। कारपोरेट पत्रकार, संपादक होने के नाते आपने जनप्रिय पदावली में शासकवर्गों के लिए अवधारणात्मक नियंत्रक की भूमिका अदा की। कारपोरेट प्रेस में वस्तुपरकता और तटस्थता को मीडिया की सैद्धांतिकी में प्रभाष जोशी मेनीपुलेशन कहते हैं। हिंदी के भोले पाठकों को इन पदबंधों से अब भ्रमित करना संभव नहीं है।
आपके लेखन की एक विशेषता है चीजों को व्यक्तिगत बनाने की। व्यक्तिगत चयन के आधार पर संप्रेषित करने की। मीडिया थ्योरी में इसे बुनियादी चीज से ध्यान हटाने की कला कहते हैं। अथवा जब किसी अंतर्वस्तु को पतला करना हो, तो इस पद्धति का इस्तेमाल किया जाता है। सब जानते हैं, आप पचास साल से पत्रकारिता कर रहे हैं। आप जिस वैचारिक संसार में मगन हैं वह पावर का संसार है, कारपोरेट संसार है। उसे जनसंसार समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। अपने इसी लेख में आपने उन तमाम लोगों, व्यक्तियों, नेताओं, पत्रकारों आदि का जिक्र किया है, जिनसे आपके व्यक्तिगत संबंध रहे हैं, और हैं। यह मेनीपुलेशन की शानदार केटेगरी है। विश्वास न हो तो प्रभाष जोशी अपने किए के बारे में जरा हर्बर्ट शिलर और नॉम चोम्स्की से ही पूछ लो, उनकी किताबों में आपको अपने द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे वैचारिक अस्त्रों का सही जबाव मिल जाएगा। प्रभाष जोशी जब आप किसी चीज को व्यक्तिगत चयन की केटेगरी में रखकर पेश करते हैं अथवा व्यक्तिगत बनाते हैं तो अतिरिक्त असत्य से काम लेते हैं। प्रभाष जोशी आप स्वयं ही बताएं – सरकारी नीतियों और कारपोरेट घरानों पर आपने केंद्रित ढंग से कब हमला किया? मैं सिर्फ एक उदाहरण दूंगा। विगत वर्षों में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप ने 130 से ज्यादा कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। लंबे समय तक वे आंदोलन करते रहे, क्या आपको कभी अपने समानधर्माओं की याद आयी? आप शानदार पत्रकार हैं लेकिन कारपोरेट घरानों के, जनता के नहीं। क्योंकि आपको इस बात से कोई बेचैनी नहीं है कि प्रेस में आखिरकार विदेशी पूंजी क्यों आ रही है। आप उसका कहीं पर भी प्रतिवाद नहीं करते, आप चुप क्यों हैं? आपको रूपर्ट मर्डोक से लेकर गार्जियन के मालिक तक सभी देशभक्त नजर आते हैं? प्रभाष जोशी आपके संपादन की सबसे कमजोर कड़ी है विदेश की खबरें। सच सच बताना आपने विदेश की खबरें कम से कम क्यों छापीं? जानते हैं संपादकीय मेनीपुलेशन का सबसे नरम स्थल है यह। आपने दुनिया को बदलने और देखने के बारे में अब तक जितने भी विकल्प सुझाएं हैं, वे किसी न किसी रूप में सत्ताधारी वर्ग के ही विकल्प हैं। जिसे सचमुच में विकल्प राजनीति कहते हैं, वह सत्ताधारी विचारों के परे होती है। आपने सारा जीवन पत्रकारिता, कम प्रौपेगैंडा ज़्यादा किया है। प्रौपेगैंडिस्ट को ओरवेल के शब्दों में बड़े भाई कहते हैं।
इससे पहले की पोस्ट पढ़ें : ब्राह्मणवाद पर बोले जोशी, ढाल खबरों के धंधे को बनाया









प्रभाष जोशी बेहद चालाक है। धूर्त कहना चाहिए। ब्राह्मणवादी धतकरम के बारे में उठे सवालों से बचाने के लिए खुद को एक ऐसे चैंपियन के तौर पर पेश कर रहे हैं, जिन्होंने पैकेज पत्रकारिता के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा किया है।
प्रभाष जोशी, पैकेज पत्रकारिता वो भी थी जब इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार के खिलाफ छापना बंद कर दिया था और उप्र सरकार ने एक्सप्रेस को मीडिया बिजनेस चलाने के लिए फिल्म सिटी नोएडा में करोड़ों की जमीनी सब्सिडाइज्ड रेट पर दी। उस बिल्डिंग में एक्सप्रेस ग्रुप मीडिया का कितना काम करता है, ये बात दिल्ली का हर पत्रकार जानता है। इसके खिलाफ बोलेंगे? एक्सप्रेस बिल्डिंग के सामने हो जाए आपका एक धरना या एक कागद कारे ही सही। या सिर्फ जागरण और हिंदुस्तान के खिलाफ ही बोलेगे। इसलिए कि ये आपको घास नहीं डालते? ईमानदारी सलेक्टिव नहीं हो सकती। प्रभात खबर के मालिक को कोयला खान दिलाने का किस्सा कौन नहीं जानता। ये आपकी मुहिम के दायरे में है या नहीं?
पैकेज पत्रकारिता में बदला क्या। यही ना कि पहले जो काम आप जैसे पत्रकार निजी फायदे के लिए करते थे वो अब मालिक अपने फायदे के लिए करने लगे। यानी बनियों ने बाह्मणों के मुंह से घी चुपड़ी रोटी खींच ली। इसी का दर्द है ना आपको। मालिकों ने एक फुटकर धंधे को संस्थागत रूप दे दिया। लूट में हिस्सा न मिलने से विचलित हैं आप।
जोशी जी, किसी को भ्रम नहीं होगा कि आप सरकारी कमेटियों में और सरकारी पदों पर क्यों बैठाए जाते थे। वो सब भी पैकेज का ही सौदा था। अभी भी तो आप कई कमेटियों और संस्थानों में बैठे होंगे।
अरे भाई शंबूक और जगदीश्वर जी
आप लोगों को काम-धाम नहीं है क्या…. एक ऐसे पत्रकार के पीछे पड़ गए हो जिसके सामने रत्ती भर की औकात नहीं है आपलोग करते क्या है भाई जरा अपने बारे में विस्तार से बताओ तो आपको भी तो जानें आप किस कल्चर के पत्रकार हो या फिर ऐसे ही भ्रमण करने वाले वल्चर हो।
हम “महान” लोगों के भाग्यविधाता हैं विनोद भाई। हमने जब जनसत्ता को पढ़ना बंद कर दिया तो वो प्रभाष जोशी के संपादक होने के बावजूद (या इस वजह से) लगभग बंद हो गया और बूम टाइम में उसके दो एडिशन बंद हो गए। हम तथाकथित महान पत्रकारों के मालिक हैं विनोद जी। हमें पाठक कहते हैं और आम जन भी। हम धूल हैं पर आंखों में पड़ जाएं तो रुला देते हैं। जैसा कि अभी हम कर रहे हैं। प्रभाष जोशी की महान बनाई गई और बताई गई प्रतिमा के मिट्टी में मिलने के गवाह तो आप भी हैं। ये हमने किया है विनोद जी।
वैसे नेट पर हैं तो नेट के नियमों से खेलिए। यहां तो जो लिखा गया वही परिचय है, वही कुल है, वही खानदान है, वही बायोडाया है। बाकी कुल-खानदान जानकर क्या करेंगे। कृपया भयभीत न हों। महानायकों का दौर खत्म हो गया है अब खंडित प्रतिमाओं का दौर है। इसलिए कृपया ये उम्मीद न करें कि प्रभाष जोशी को हम महान मान लेंगे। आप उनके गंदे चरणों को धोकर उसका पान करें। हमें माफ करें।
दो बहरों के संवाद से जो हासिल हो सकता है वह ही हो रहा है. जगदीश्वर जी को चाहिए कि वे प्रभाष जोशी के ऊपर एक किताब लिखें जिसमें उनके बारे में, उनकी पत्रकारिता के बारे में एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करे. इस तरह के लेखन से बात अधूरी छूट जाती है. हम लोग तो जोशी जी को बहुत अच्छा पत्रकार मानकर उनका आदर करते आये हैं. जगदीश्वर जी जो लिख रहे हैं उसे भी सिरे से खारिज करने का मन नहीं होता लेकिन क्या इस तरह के लेखन से हिन्दी का भला हो रहा है?
इस पार जोशी-उस पार चतुर्वेदी
कितना अद्भुत!
अति मनोरम, अति सुंदर
मैनेजर पांडे विमोचन करें
मंगलेश डबराल समीक्षा गाएं
अशोक वाजपेयी बनावटी सा विरोध करें
और नामवर जी?
राममनोहर राय फाउंडेशन में ४०० कॉपियां लगवा दें
फिर
कोई पांडे जी, कोई शुक्ला जी, कोई चौबे जी
विश्वविद्यालयों में रिकमेंड करा दें!
दीक्षित जी, शर्मा जी, त्रिवेदी जी पुरस्कार दिलवाएं
धन-धन महाराज, थू-थू महाराज!!!
अरे शंबूक जी आप तो उछल गए, उद्वेलित न हों अरे आपको जानता कौन है कम से कम अपना असली नाम पता बता देंगे तो हम कम से कम ये तो कह सकेंगे कि शंबूक जी ने प्रभाष जी पर बंबूक चलाई थी, खैर छोड़िए आप न बताना चाहें तो क्या फर्क पड़ता है, वेबसाइट पर भड़ास निकाल कर कुछ नहीं होगा जाइए प्रभाष जी के पास अभी भी कहीं न कहीं नौकरी दिला देंगे … गुस्सा मत होइए कृपया। प्रोफेसर प्यारेलाल की बात आपलोग मानिए एक किताब लिख डालिए, छा जाएंगे आप ।
मैं लगभग २००० साल से उद्वेलित हूं विनोद। तुमं होते मेरी जगह तो तुम भी उद्वेलित होते। खैर अब तो समय बदल गया है। मेरी बात तुम पढने को मजबूर हो। इतना ही मेरे लिए काफी है। तुम जैसों की आंखों में जबरन घुस जाऊंगा मैं। खैर, तुम तो प्रभाष जोशी की पूजा करो, दारू पीओ और करवट लेकर सो जाओ। मैं तो अभी जगा हूं। गुड नाइट। स्वीट ड्रीम।
प्रो.प्यारेलाल जी,आपने लिखा है ”दो बहरों के संवाद से जो हासिल हो सकता है वह ही हो रहा है।”.बंधु यह बहरों का संवाद नहीं है,विचारों की गुलामी से मुक्ति का संवाद है। अब तक हमारे दोस्तों की आदत लेखक की सिर्फ प्रशंसा करने की रही है। वह मानसिक तौरपर दरबारी सभ्यता में जीता रहा है। विचारों की गुलामी और अनुकरणभाव को हमेशा अपना गुण समझता रहा है। सहमति को उसने सोना समझा है।जाहिर है ऐसे वातावरण में किसी भी किस्म का हस्तक्षेप ‘बहरों’ का संवाद तो लगेगा ही। कल्पना करो यही लेख प्रभाष जोशी ने लिखा होता तब क्या आपकी यही प्रतिक्रिया होती ? आपने तय कर लिया है आप कुछ लोगों के विचारों की पूजा करते हैं,ऐसी मनोदशा में आप अपने आराध्य की आलोचना सुनने को तैयार नहीं होंगे। प्यारेलाल जी आपने लिखा है ”लेकिन क्या इस तरह के लेखन से हिन्दी का भला हो रहा है?” मुश्किल यहीं पर है प्यारेलालजी,आप सिर्फ हिंदी के भले की सोच रहे हैं,किस हिंदी का भला करना चाहते हैं ,गुलामी के विचारों से भरी हिंदी का अथवा ऐसी हिंदी का जो आलोचनात्मक विवेक से भरी हो। कई तरह की हिंदी और कई किस्म के हिंदी विचार और विचारक प्रचलन में हैं। रही बात प्रभाष जोशी के लेखन की तो उसे लिखने के साथ मर जाना होता है। अखबार में लिखी हिंदी अमर नहीं होती।आजकल गुलामी की भाषा का बहुत उत्पादन और पुनर्रूत्पादन हो रहा है,हमें इससे सख्त नफरत है,इस तरह की हिंदी से नफरत करने वाले और भी ढेरों लोग हैं। ध्यान रहे प्यारेलालजी,विचारों की गुलामी सबसे बडी गुलामी है। प्रभाष जोशी कारपोरेट गुलामी को परोसने वाले पत्रकार हैं। उनके विचारों में जनता की कम कारपोरेट विचारों की सुगंध ज्यादा आती है। जाहिर है प्रभाष जोशी जैसा फास्टफूड हिंदी में और कौन दे सकता है,हिंदी के फास्ट फूड गद्य पर अभी किताब लिखने का विचार नहीं है। लेखन और पठन में आदर सम्मान से काम नहीं चलता आलोचनात्मक विवेक से काम चलता है,जो आलोचनात्मक विवेक को त्यागकर सिर्फ आदर सम्मान के साथ पढते और लिखते हैं उनके लिए यही कहना है वे अभी भी विचारों के कैदखाने से बाहर नहीं आए हैं।
क्या बकवास हो रहा है भाई !
पत्रकारिता में जातिवाद को रेखांकित किया जा रहा है , बात जिस समय की हो रही है , उन्दिनो
बात ऐसी सोची भी नहीं जाती थी. जो सोचतें होंगें , वे आज भी सोच रहें हैं ,
जगदीश्वर जी अपना काम करें . जहाँ तक मुझे पता है डाक्टर चतुर्वेदी जी कलकत्ता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं , विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों पर लिखें तो जाने.
विनोद जी आपने सही पहचाना कोई काम नहीं है। यही सवाल प्रभाष जोशी से भी पूछा जा सकता है कि उन्हें क्या और कोई काम नहीं है जो इस तरह का लेखन करते रहते हैं। विनोद जी प्रभाष जोशी के लिए दिक्कत की बात यही है कि हमें उनसे नौकरी नहीं चाहिए,यह लेखन है,भडास नहीं है। प्रभाष जोशी ने जो लिखा है वह भडास है।
भारत सागर जी,पत्रकारिता में जातिवाद की सुदीर्घ परंपरा रही है, पत्रकारिता की किताबों में जाति पत्रिकाओं का खूब जिक्र मिलता है। भारतेन्दु युग से प्रभाष जोशी युग तक जातिवादी पत्रकारों की लंबी परंपरा चली आई है।पत्रकारिता में जातिवाद ठोस सच्चाई है। आप नहीं मानेंगे तब भी यह सच रहेगा।जब तक जातिवाद के संरक्षक हैं प्रेस में इसके दर्शन होते रहेंगे और चर्चाएं भी होती रहेंगी। आप सही कह रहे हैं। यह बकबास है। कभी कभी इसके बारे में भी चर्चा करनी चाहिए।
शंबूक जी, अगर उद्वेलित ही हैं तो इंटरनेट पर कुछ सार्थक करने की कोशिश करिए। आप जैसे लोगों की यहां जरूरत है। गप्पाबाजी करके समय खराब न करें। कुछ सार्थक करें। वैसे भी यह समय प्रभाष जी का नहीं है, आपका है। तो क्यों न कुछ सार्थक किया जाए।
मुबारक हो खबरें बेचने वाले बनिए बक्कालों को एक प्रोफेसर साहब भी हिमायती मिल गए.
अमलेंदु उपाध्याय जी, ऐसा नहीं कहते।चीजों को इतना हल्का बनाएंगे तो विमर्श में खत्म हो जाएगा। प्रचार के प्रत्येक तंत्र की तरह वेब भी एक तंत्र है ,लेकिन स्वतंत्र तंत्र है। यहां पर लोग पूर्णत: स्वतंत्र होते हैं। ये लोग खबरें नहीं बेचते। खबरें तो दूसरे माध्यमों में बेची जाती हैं। हम तो ईमानदार कलम के हिमायती हैं।आप ईमानदान लेखन करेंगे तो आपका भी साथ देंगे।मोहल्ला वाले गलत करेंगे तो इनकी भी आलोचना करेंगे। आपने देखा होगा हमने तो इनकी भी सख्त आलोचना की है,बल्िक प्रभाष जोशी-राजेन्द्र यादव से ज्यादा निर्मम आलोचना की है। नागरिक को सत्य प्रेमी होना चाहिए। आप बुरा नहीं मानेंगे।
जगदीश्वर जी,
लगता है आप खाम्ख्वा नाराज़ हो गए. मैंने आपको खबरे बेचने वाले नहीं कहा है. अखबारों के मालिकों को कहा है जिन्होंने पौसे लेकर ख़बरों का स्पेस बेच दिया. और यह katu सत्य है की प्रभाष जी ने ही इन पूंजीपतियों के खिलाफ आवाज़ उठायी. जो नादाँ बच्चे अभी अमरीका से उधार की अक्ल लेकर आये हैं वोह आन्दोलनों से निकले आदमी का दर्द नहीं समझ सकते. ऐसा नहीं है की मेरी प्रभाष जी के हर विचार से सहमती है, कमुनिस्तों के विषय में उनके विचारों से मुझे ज़बरदस्त असहमति है, लेकिन जहां तक पत्रकारिता के उसूलों का सवाल है वाकई प्रभाष जी बेमिसाल हैं. हो सकता है आपकी प्रभाष जी से कोई व्यक्तिगत नाराजगी हो, लेकिन खबरे बेचने walo के सवाल पर हमें उनके साथ क्गदे होना चाहिए
शुभकामनाओं के साथ
अमलेन्दु उपाध्याय
अमलेन्दु उपाध्याय जी, मेरी प्रभाष जोशी से कोई नाराजगी नहीं है। मेरा परिचय तक नहीं है। जिस कटु सत्य की आपने बात कही है, अथवा जिसका तथाकथित भ्ांडाफोड उन्होंने किया है,और जैसा उन्होंने लिखा भी कि प्रेस परिषद को भी वह सारी सामग्री भेजी है। खबर बेचने वाला प्रसंग वहीं पर खत्म हो गया। उसका हाल में उठे विवाद से क्या लेना देना । आप जानते हैं विवाद की जड़ में उनका रविवार डॉटकॉम को दिया साक्षात्कार है। कायदे से प्रभाष जोशी को इसके बारे में इपनी राय साफ करनी चाहिए था,उस साक्षात्कार के बारे में जो सवाल उठे हैं उनके बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए था, व्यक्तिगत तौर पर कौन क्या करता है और कौन कितना बिका है,उससे हमारा क्या लेना देना। आप यह कैसे उम्मीद करते हैं कि शासकों के खेल में शामिल होने वाला पत्रकार अपने साथ साधारण बुद्धिजीवियों को साथ पाए,उनके साथ वही लोग होंगे जो शासकीय शतरंज के जाने अनजाने मोहरे हैं। खबरों को बेचने के खेल के प्रभाष जोशी पुराने चैम्पियन हैं। आपने मेरी बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौरान जनसत्ता की भूमिका वाली टिप्पणी जरूर देखी होगी,दोस्त बिना बिके ‘जयश्री राम’ की शैली में खबरें वह भी इफरात में कैसे छप सकती हैं ? सती वाला संपादकीय बनवारी का लिखा था,लेकिन रविवार डॉटकॉम वाला साक्षात्कार तो उन्होंने होशोहबास में दिया था। बाबरी मस्जिद के कवरेज पर साम्प्रदायिक कवरेज को तरजीह देने पर किसी भी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष संपादक को बख्शा नहीं जा सकता। कम से कम आज तो प्रभाष जोशी प्रायश्चित कर सकते हैं? मैंने उपरोक्त लेख उनके संपादकीय व्यक्तित्व के सैद्धान्तिक पक्ष पर लिखा है। यह व्यक्तिगत नहीं है। यह एक पत्रकार-संपादक का विचारधारात्मक मूल्यांकन है। यह मजाक में अथवा उन्हें अपमानित करने के लिए नहीं लिखा है।
प्रभाष जोशी ने कौन सा आंदोलन किया है अमलेंदु, कि आप उन्हें आंदोलन से निकला मसीहा टाइप कुछ बता रहे हो। 35 साल से वो शख्स पूंजी की चाकरी करता रहा है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हजारों लोग करते हैं। पत्रकारिता को जिन वजहों से सत्ता का चारण माना जाता है वैसा कौन सा एक काम उन्होंने नहीं किया है?
क्या वो सरकारी कमेटियों में नहीं रहे है?
क्या उन्होंने लाभ के पद नहीं लिए हैं?
क्या वो सरकारी संस्थाओं को चलाने वाली गवर्निंग बॉडी में नहीं रहे हैं?
क्या उन्होंने संस्थान के व्यावसायिक हितों का ख्याल सत्ता के गलियारों मे नहीं रखा है?
क्या उन्होंने रुपए पैसे वाले सरकारी पुरस्कार नहीं लिए हैं?
विनोबा के आंदोलन में कितने कदम चले हैं आपके प्रभाष जी?
आप तो जहां काम कर चुके हैं, वहां तमाम राज खुले होंगे आपके सामने। आपसे क्या छुपा है। उनके इंटरव्यू पर ही बात करें तो बेहतर। व्यक्ति प्रभाष जोशी में तमाम वो कमजोरियां हैं जो पत्रकारों में आम तौर पर होती हैं। उन्हें नजरअंदाज करके विचारों पर ही बात होनी चाहिए।
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