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	<title>Comments on: आपने जीवन भर पत्रकारि‍ता कम, प्रौपेगैंडा ज़्यादा कि‍या</title>
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		<title>By: संजय दृष्टि</title>
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		<dc:creator>संजय दृष्टि</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 18:31:21 +0000</pubDate>
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		<description>प्रभाष जोशी ने कौन सा आंदोलन किया है अमलेंदु, कि आप उन्हें आंदोलन से निकला मसीहा टाइप कुछ बता रहे हो। 35 साल से वो शख्स पूंजी की चाकरी करता रहा है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हजारों लोग करते हैं।  पत्रकारिता को जिन वजहों से सत्ता का चारण माना जाता है वैसा कौन सा एक काम उन्होंने नहीं किया है? 
क्या वो सरकारी कमेटियों में नहीं रहे है? 
क्या उन्होंने लाभ के पद नहीं लिए हैं?
क्या वो सरकारी संस्थाओं को चलाने वाली गवर्निंग बॉडी में नहीं रहे हैं?
क्या उन्होंने संस्थान के व्यावसायिक हितों का ख्याल सत्ता के गलियारों मे नहीं रखा है?
क्या उन्होंने रुपए पैसे वाले सरकारी पुरस्कार नहीं लिए हैं? 
विनोबा के आंदोलन में कितने कदम चले हैं आपके प्रभाष जी?
आप तो जहां काम कर चुके हैं, वहां तमाम राज खुले होंगे आपके सामने। आपसे क्या छुपा है। उनके इंटरव्यू पर ही बात करें तो बेहतर। व्यक्ति प्रभाष जोशी में तमाम वो कमजोरियां हैं जो पत्रकारों में आम तौर पर होती हैं। उन्हें नजरअंदाज करके विचारों पर ही बात होनी चाहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रभाष जोशी ने कौन सा आंदोलन किया है अमलेंदु, कि आप उन्हें आंदोलन से निकला मसीहा टाइप कुछ बता रहे हो। 35 साल से वो शख्स पूंजी की चाकरी करता रहा है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। हजारों लोग करते हैं।  पत्रकारिता को जिन वजहों से सत्ता का चारण माना जाता है वैसा कौन सा एक काम उन्होंने नहीं किया है?<br />
क्या वो सरकारी कमेटियों में नहीं रहे है?<br />
क्या उन्होंने लाभ के पद नहीं लिए हैं?<br />
क्या वो सरकारी संस्थाओं को चलाने वाली गवर्निंग बॉडी में नहीं रहे हैं?<br />
क्या उन्होंने संस्थान के व्यावसायिक हितों का ख्याल सत्ता के गलियारों मे नहीं रखा है?<br />
क्या उन्होंने रुपए पैसे वाले सरकारी पुरस्कार नहीं लिए हैं?<br />
विनोबा के आंदोलन में कितने कदम चले हैं आपके प्रभाष जी?<br />
आप तो जहां काम कर चुके हैं, वहां तमाम राज खुले होंगे आपके सामने। आपसे क्या छुपा है। उनके इंटरव्यू पर ही बात करें तो बेहतर। व्यक्ति प्रभाष जोशी में तमाम वो कमजोरियां हैं जो पत्रकारों में आम तौर पर होती हैं। उन्हें नजरअंदाज करके विचारों पर ही बात होनी चाहिए।</p>
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		<title>By: जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/09/07/jagdishwar-chaturvedi-react-on-prabhash-joshi-kaagad-kare/comment-page-1/#comment-1742</link>
		<dc:creator>जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 15:08:24 +0000</pubDate>
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		<description>अमलेन्‍दु उपाध्‍याय जी, मेरी प्रभाष जोशी से कोई नाराजगी नहीं है। मेरा परि‍चय तक नहीं है। जि‍स कटु सत्‍य की आपने बात कही है, अथवा जि‍सका तथाकथि‍त भ्‍ांडाफोड उन्‍होंने कि‍या है,और जैसा उन्‍होंने लि‍खा भी कि‍ प्रेस परि‍षद को भी वह सारी सामग्री भेजी है। खबर बेचने वाला प्रसंग वहीं पर खत्‍म हो गया। उसका हाल में उठे वि‍वाद से क्‍या लेना देना  । आप जानते हैं वि‍वाद की जड़ में उनका रवि‍वार डॉटकॉम को दि‍या साक्षात्‍कार है। कायदे से प्रभाष जोशी को इसके बारे में इपनी राय साफ करनी चाहि‍ए था,उस साक्षात्‍कार के बारे में जो सवाल उठे हैं उनके बारे में स्‍पष्‍टीकरण देना चाहि‍ए था, व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर कौन क्‍या करता है और कौन कि‍तना बि‍का है,उससे हमारा क्‍या लेना देना। आप यह कैसे उम्‍मीद करते हैं कि‍ शासकों के खेल में शामि‍ल होने वाला पत्रकार अपने साथ साधारण बुद्धि‍जीवि‍यों को साथ पाए,उनके साथ वही लोग होंगे जो शासकीय शतरंज के जाने अनजाने मोहरे हैं। खबरों को बेचने के खेल के प्रभाष जोशी पुराने चैम्‍पि‍यन हैं। आपने मेरी बाबरी मस्‍जि‍द आंदोलन के दौरान जनसत्‍ता की भूमि‍का वाली टि‍प्‍पणी जरूर देखी होगी,दोस्‍त बि‍ना बि‍के &#039;जयश्री राम&#039; की शैली में खबरें वह भी इफरात में कैसे छप सकती हैं ? सती वाला संपादकीय बनवारी का लि‍खा था,लेकि‍न रवि‍वार डॉटकॉम वाला साक्षात्‍कार तो उन्‍होंने होशोहबास में दि‍या था। बाबरी मस्‍जि‍द के कवरेज पर साम्‍प्रदायि‍क कवरेज को तरजीह देने पर कि‍सी भी तथाकथि‍त धर्मनि‍रपेक्ष संपादक को बख्‍शा नहीं जा सकता। कम से कम आज तो प्रभाष जोशी प्रायश्‍चि‍त कर सकते हैं? मैंने उपरोक्‍त लेख उनके संपादकीय व्‍यक्‍ति‍त्‍व के सैद्धान्‍ति‍क पक्ष पर लि‍खा है। यह व्‍यक्‍ति‍गत नहीं है। यह एक पत्रकार-संपादक का वि‍चारधारात्‍मक मूल्‍यांकन है। यह मजाक में अथवा उन्‍हें अपमानि‍त करने के लि‍ए नहीं लि‍खा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमलेन्‍दु उपाध्‍याय जी, मेरी प्रभाष जोशी से कोई नाराजगी नहीं है। मेरा परि‍चय तक नहीं है। जि‍स कटु सत्‍य की आपने बात कही है, अथवा जि‍सका तथाकथि‍त भ्‍ांडाफोड उन्‍होंने कि‍या है,और जैसा उन्‍होंने लि‍खा भी कि‍ प्रेस परि‍षद को भी वह सारी सामग्री भेजी है। खबर बेचने वाला प्रसंग वहीं पर खत्‍म हो गया। उसका हाल में उठे वि‍वाद से क्‍या लेना देना  । आप जानते हैं वि‍वाद की जड़ में उनका रवि‍वार डॉटकॉम को दि‍या साक्षात्‍कार है। कायदे से प्रभाष जोशी को इसके बारे में इपनी राय साफ करनी चाहि‍ए था,उस साक्षात्‍कार के बारे में जो सवाल उठे हैं उनके बारे में स्‍पष्‍टीकरण देना चाहि‍ए था, व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर कौन क्‍या करता है और कौन कि‍तना बि‍का है,उससे हमारा क्‍या लेना देना। आप यह कैसे उम्‍मीद करते हैं कि‍ शासकों के खेल में शामि‍ल होने वाला पत्रकार अपने साथ साधारण बुद्धि‍जीवि‍यों को साथ पाए,उनके साथ वही लोग होंगे जो शासकीय शतरंज के जाने अनजाने मोहरे हैं। खबरों को बेचने के खेल के प्रभाष जोशी पुराने चैम्‍पि‍यन हैं। आपने मेरी बाबरी मस्‍जि‍द आंदोलन के दौरान जनसत्‍ता की भूमि‍का वाली टि‍प्‍पणी जरूर देखी होगी,दोस्‍त बि‍ना बि‍के &#8216;जयश्री राम&#8217; की शैली में खबरें वह भी इफरात में कैसे छप सकती हैं ? सती वाला संपादकीय बनवारी का लि‍खा था,लेकि‍न रवि‍वार डॉटकॉम वाला साक्षात्‍कार तो उन्‍होंने होशोहबास में दि‍या था। बाबरी मस्‍जि‍द के कवरेज पर साम्‍प्रदायि‍क कवरेज को तरजीह देने पर कि‍सी भी तथाकथि‍त धर्मनि‍रपेक्ष संपादक को बख्‍शा नहीं जा सकता। कम से कम आज तो प्रभाष जोशी प्रायश्‍चि‍त कर सकते हैं? मैंने उपरोक्‍त लेख उनके संपादकीय व्‍यक्‍ति‍त्‍व के सैद्धान्‍ति‍क पक्ष पर लि‍खा है। यह व्‍यक्‍ति‍गत नहीं है। यह एक पत्रकार-संपादक का वि‍चारधारात्‍मक मूल्‍यांकन है। यह मजाक में अथवा उन्‍हें अपमानि‍त करने के लि‍ए नहीं लि‍खा है।</p>
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	<item>
		<title>By: amalendu upadhyaya</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/09/07/jagdishwar-chaturvedi-react-on-prabhash-joshi-kaagad-kare/comment-page-1/#comment-1733</link>
		<dc:creator>amalendu upadhyaya</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 09 Sep 2009 08:21:47 +0000</pubDate>
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		<description>जगदीश्वर जी,
लगता  है आप खाम्ख्वा नाराज़ हो गए. मैंने आपको खबरे बेचने वाले नहीं कहा है. अखबारों के मालिकों को कहा है जिन्होंने पौसे लेकर ख़बरों का स्पेस बेच दिया. और यह katu सत्य है की प्रभाष जी ने ही इन पूंजीपतियों के खिलाफ आवाज़ उठायी. जो नादाँ बच्चे अभी अमरीका से उधार की अक्ल लेकर आये हैं वोह आन्दोलनों से निकले आदमी का दर्द नहीं समझ सकते. ऐसा नहीं है की मेरी प्रभाष जी के हर विचार से सहमती है, कमुनिस्तों के विषय में उनके विचारों से मुझे ज़बरदस्त असहमति है, लेकिन जहां तक पत्रकारिता के उसूलों का सवाल है वाकई प्रभाष जी बेमिसाल हैं. हो सकता है आपकी प्रभाष जी से कोई व्यक्तिगत नाराजगी हो, लेकिन खबरे बेचने walo के सवाल पर हमें उनके साथ क्गदे होना चाहिए 
शुभकामनाओं के साथ 
अमलेन्दु उपाध्याय</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जगदीश्वर जी,<br />
लगता  है आप खाम्ख्वा नाराज़ हो गए. मैंने आपको खबरे बेचने वाले नहीं कहा है. अखबारों के मालिकों को कहा है जिन्होंने पौसे लेकर ख़बरों का स्पेस बेच दिया. और यह katu सत्य है की प्रभाष जी ने ही इन पूंजीपतियों के खिलाफ आवाज़ उठायी. जो नादाँ बच्चे अभी अमरीका से उधार की अक्ल लेकर आये हैं वोह आन्दोलनों से निकले आदमी का दर्द नहीं समझ सकते. ऐसा नहीं है की मेरी प्रभाष जी के हर विचार से सहमती है, कमुनिस्तों के विषय में उनके विचारों से मुझे ज़बरदस्त असहमति है, लेकिन जहां तक पत्रकारिता के उसूलों का सवाल है वाकई प्रभाष जी बेमिसाल हैं. हो सकता है आपकी प्रभाष जी से कोई व्यक्तिगत नाराजगी हो, लेकिन खबरे बेचने walo के सवाल पर हमें उनके साथ क्गदे होना चाहिए<br />
शुभकामनाओं के साथ<br />
अमलेन्दु उपाध्याय</p>
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		<title>By: जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/09/07/jagdishwar-chaturvedi-react-on-prabhash-joshi-kaagad-kare/comment-page-1/#comment-1716</link>
		<dc:creator>जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Sep 2009 12:38:11 +0000</pubDate>
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		<description>अमलेंदु उपाध्‍याय जी, ऐसा नहीं कहते।चीजों को इतना हल्‍का बनाएंगे तो वि‍मर्श में खत्‍म हो जाएगा। प्रचार के प्रत्‍येक तंत्र की तरह वेब भी एक तंत्र है ,लेकि‍न स्‍वतंत्र तंत्र है। यहां पर लोग पूर्णत: स्‍वतंत्र होते हैं। ये लोग खबरें नहीं बेचते। खबरें तो दूसरे माध्‍यमों में बेची जाती हैं। हम तो ईमानदार कलम के हि‍मायती हैं।आप ईमानदान लेखन करेंगे तो आपका भी साथ देंगे।मोहल्‍ला वाले गलत करेंगे तो इनकी भी आलोचना करेंगे। आपने देखा होगा हमने तो इनकी भी सख्‍त आलोचना की है,बल्‍ि‍क प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव से ज्‍यादा नि‍र्मम आलोचना की है। नागरि‍क को सत्‍य प्रेमी होना चाहि‍ए। आप बुरा नहीं मानेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अमलेंदु उपाध्‍याय जी, ऐसा नहीं कहते।चीजों को इतना हल्‍का बनाएंगे तो वि‍मर्श में खत्‍म हो जाएगा। प्रचार के प्रत्‍येक तंत्र की तरह वेब भी एक तंत्र है ,लेकि‍न स्‍वतंत्र तंत्र है। यहां पर लोग पूर्णत: स्‍वतंत्र होते हैं। ये लोग खबरें नहीं बेचते। खबरें तो दूसरे माध्‍यमों में बेची जाती हैं। हम तो ईमानदार कलम के हि‍मायती हैं।आप ईमानदान लेखन करेंगे तो आपका भी साथ देंगे।मोहल्‍ला वाले गलत करेंगे तो इनकी भी आलोचना करेंगे। आपने देखा होगा हमने तो इनकी भी सख्‍त आलोचना की है,बल्‍ि‍क प्रभाष जोशी-राजेन्‍द्र यादव से ज्‍यादा नि‍र्मम आलोचना की है। नागरि‍क को सत्‍य प्रेमी होना चाहि‍ए। आप बुरा नहीं मानेंगे।</p>
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		<title>By: amalendu upadhyaya</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/09/07/jagdishwar-chaturvedi-react-on-prabhash-joshi-kaagad-kare/comment-page-1/#comment-1714</link>
		<dc:creator>amalendu upadhyaya</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Sep 2009 09:33:26 +0000</pubDate>
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		<description>मुबारक हो खबरें बेचने वाले बनिए बक्कालों को एक प्रोफेसर साहब भी हिमायती मिल गए.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मुबारक हो खबरें बेचने वाले बनिए बक्कालों को एक प्रोफेसर साहब भी हिमायती मिल गए.</p>
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