क्या वीओआई कर्मियों की आवाज़ अनसुनी ही रह जाएगी?
♦ अविनाश
वीओआई कर्मचारियों का आंदोलन, मालिकों के घर नारेबाजी
जनतंत्र ♦ वॉयस ऑफ इंडिया के कर्मचारियों का आंदोलन तेज हो गया है। गुरुवार को उन्होंने त्रिवेणी मीडिया के दोनों मालिकों मधुर मित्तल और सुमित मित्तल के घर के बाहर धरना प्रदर्शन किया। न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में उनके घर के बाहर करीब तीन सौ कर्मचारी जमा हुए और जमकर नारेबाजी की। कर्मचारियों के उग्र तेवर को देखते हुए वहां बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।
उसके बाद सभी कर्मचारी त्रिवेणी ग्रुप के दफ़्तर पहुंचे। मथुरा रोड पर मौजूद दफ़्तर के बाहर भी उन्होंने मित्तल बंधुओं के ख़िलाफ़ नारेबाजी की। वहां पर भी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी मौजूद थे। फिर कर्मचारियों का पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल मित्तल बंधुओं से मिलने पहुंचा। पिछली कई बैठकों की तरह यह बातचीत बेनतीजा ख़त्म हुई। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल से मित्तल बंधुओं ने साफ कर दिया कि वो पैसे देने की हालत में नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके ख़िलाफ़ जो कर्मचारी कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं वो कर सकते हैं।
वॉयस ऑफ इंडिया के ही एक कर्मचारी ने जानकारी दी कि बहुत से साथियों को छह-छह महीने के तनख्वाह नहीं मिली है। दिल्ली में मौजूद कर्मचारियों को तीन महीने से वेतन नहीं दिया गया है जबकि ब्यूरो में तैनात लोगों को छह-छह महीने से एक पैसा नहीं मिला है। ट्रांस्पोर्टरों के किराए का भुगतान भी नहीं किया गया है। स्ट्रिंगर्स को भी पैसे नहीं दिए गए हैं। इससे उन सभी कर्मचारियों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
वॉयस ऑफ इंडिया के ही एक और कर्मचारी ने जानकारी दी कि हक़ की लड़ाई में शामिल होने के लिए कई ब्यूरो के रिपोर्टर और स्ट्रिंगर भी दिल्ली पहुंच गए हैं। गुरुवार को हुए विरोध प्रदर्शन में दिल्ली और उससे सटे इलाकों के स्ट्रिंगर भी शामिल हुए थे। इस बीच कर्मचारियों का एक धड़ा लगातार नोएडा स्थित दफ़्तर में डटा हुआ है। वो सभी कह रहे हैं कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक उनके पैसे नहीं चुका दिए जाते। यही नहीं उनका यह भी कहना है कि पैसे चेक के जरिए नहीं बल्कि नकद चाहिए। कंपनी के मालिकों मित्तल बंधुओं पर कर्मचारियों को ज़रा भी यकीन नहीं है।
पिछली बार जब वीओआई के आंदोलनरत कर्मियों ने समझौते की अफवाह के बाद अपनी मुहिम रोकी थी, तो मुझे वो उन सबके दुख का पटाक्षेप कतई नज़र नहीं आया था। मुझे लग रहा था कि कोई साज़िश है, जो असमंजस में पड़े मीडियाकर्मियों को आगे सब कुछ ठीक होने के भरोसे का खिलौना थमा रही है। लेकिन ये क़तई उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी उनके पैरों के नीचे की ज़मीन खींच ली जाएगी और सभी मीडियाकर्मियों को फिर से दुविधा और हताशा की हवा में हाथ-पांव मारने के लिए छोड़ दिया जाएगा। मित्तल से चैनल नहीं चला, तो साईं का सुमिरन करने वाला सीईओ बुलाया गया। उसने न सिर्फ बाहर की खबरिया आवाज़ों को मैनेज किया, बल्कि महीनों तक वीओआई में रेगिस्तान के चश्मे की तरह की भूलभुलैया बनाये रखा। इस पूरे नाटक के क्लाइमेक्स में उसने अलग राह पकड़ी, मित्तल ने अलग राह पकड़ी। दोनों के बीच वीओआई की दीवार को देखते हुए कर्मचारी को समझ में नहीं आ रहा है कि माजरा क्या है?
माजरा दरअसल मित्तल और सिन्हा की मिलीभगत हो सकती है – ज़रा इस पर भी सोचना चाहिए। सोचना चाहिए कि 500 कर्मचारियों की समग्र बेचैनी और सामूहिक प्रतिरोध को समय की सतह पर कुंद करने के लिए सीईओ सिन्हा की इंट्री करायी गयी। ये सच है कि आज वीओआई कर्मी एक हारी हुई लड़ाई को सुलगाने की बेजान कोशिश कर रहे हैं। उनके साथ आज सिर्फ वे ही हैं। बाक़ी मीडिया हाउस को इसलिए उनकी परवाह नहीं है क्योंकि मामला बिरादराना है। पत्रकारों का नहीं बल्कि सांस्थानिक रिश्तों का बिरादराना।
पिछली बार ही जब वीओआई के लड़के प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे थे – तो उन्होंने सभी टेलीविज़न के असाइनमेंट डेस्क को कॉल किया। सब तरफ से जवाब रूखा ही आया कि हम कवर नहीं कर पाएंगे। हमने भी अपने एक अभिन्न टीवी अधिकारी को फोन करके कहा कि इस मसले को कवर करो, तो उन्होंने कहा कि कहां आप भी ख़तरनाक आइडिया दे रहे हैं – आप ही सोचिए, ऐसा कभी हो सकता है क्या? मैं सन्न था, क्योंकि मुझे लगा कि अरे… इस देश में ऐसी भी आवाज़ हो सकती है, जो चाहे घुट जाए, सुनी नहीं जाएगी!
साफ है कि हम मीडिया के लोग इस मायने में विपन्न हैं कि हमारे अधिकारों की लड़ाई हमारा अख़बार और हमारा टेलीविज़न नहीं लड़ सकता। प्रेस से जुड़े संगठनों का हाल सब जानते ही हैं। शायद ही कभी इन संगठनों ने कभी किसी मीडियाकर्मी का खोया हुआ वाज़िब अधिकार उसे वापिस दिलाया हो। दूसरे संगठनों और आंदोलनकारियों को इसलिए मतलब नहीं है क्योंकि संघर्षरत मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो मीडिया-संस्थानों से बैर नहीं ले सकते। हमारे देश में तो बहुत सारे आंदोलन मीडिया अटेंशन की वजह से ही तो राष्ट्रीय ख्याति के बन गये! मीडियाकर्मियों का साथ देकर वो इस अटेंशन का आसमान क्यों खोना चाहेंगे?
तो क्या हम मान लें कि वीओआई कर्मियों की लड़ाई का कोई नतीजा नहीं निकलेगा? हम ये मान लें कि मीडियाकर्मियों को कभी अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ना चाहिए? वो लड़ाई एक ऐसे असरहीन पटाखे के गीले बुरादे की तरह ही होगा, जिसे जलाने के लिए बुलंद नारों से भरी हुई कोई तीली काम नहीं आएगी? सब कुछ नक्कारखाने में तूती की तरह दीवार से टकरा टकरा कर हम तक ही लौट आएंगे?
मुझे तो कुछ सूझ नहीं रहा। आप सब बताएं कि मीडियाकर्मियों को इस तरह के हालात में क्या स्टैंड लेना चाहिए?










कोई क्या बताएगा , और क्यों बताएगा ? सभी अपनी-अपनी फटी को सिल रहें हैं . फुर्सत किसे है किसी के बारे में किसी को सोचने की ? हमलोग ( यानि पत्रकार भाई लोग ) जानवरों से भी गए बीते होते जा रहें हैं . एक प्रेस क्लब नहीं चला पा रहें हैं ,और दावा कर रहें हैं दुनिया को चलाने और चराने का . बडा दुःख हुवा भाई अविनाश ! आपकी अंतिम लाईन के ” आर्तनाद ” को महसूस कर. उपाय तो बहुत नहीं सिर्फ एक है , सभी मिलकर एक जनहित याचिका दाखिल की जाये.
क्षमा करेंगें ये है बड़ा मूर्खतापूर्ण प्रस्ताव . हमें भूख अभी लगी है ,और हम खेती करने की सलाह दे रहें हैं . लेकिन देश गुलामी की और बड़ी तेजी से बढ़ रहा है . गरीबी रेखा का घटता -बढ़ता आंकडा और उन सबों के बीच झूलते – झूमते , पत्रकार भाई लोग ………हा…हा….भारत दुर्दशा न देखि जाई.
जेट की हड़ताल और मीडिया का करतब देखते ही बनता है, नरेश गोयल के घडियाली आंसू हों या बाजार की दुहाई पीली ड्रेस कि चकाचौंध मीडिया को लुभाता है और जेट कर्मचारियों के लिए एक स्वर में रेंकने वाला मीडिया वी आई ओ के कर्मचारियों या फिर कहें की मीडिया जगत में होते उठापटक पर किस बिल में घुसा होता है,
वस्तुतः ये मीडिया जगत पर लाला जी का काबिज होता अधिपत्य ही तो है कि अन्य जगहों के कर्मचारी अधिकारी को रखना निकालना खबर मगर मीडिया के अंदरुनी को बाहर ही ना आने दो.
नरेश गोयल के साथ ताल पर ताल मिलाता मीडिया जगत क्या अपने बिरादरी के लिए भी आवाज उठाएगा, या गिरगिट कि तरह रंग बदलते लाला जी के साथ पत्रकारिता को भी गिरगिटिया चरित्र से सरोबार हीरखेगा.
हम सब चुप थे जब हमें दस के बजाये चालीस हज़ार रूपए की तनख्वाह मिल रही थी. हम सब चुप थे जब बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर टाइप लोग मीडिया के कारोबारी बनकर आ रहे थे. हम सब चुप थे जब संगठन की संस्कृति और उसकी धार को बाजारवाद के हरम में भेजा जा रहा था. हम सब चुप थे जब प्रतिस्पर्धा और गुणवत्ता की दुहाई देकर हमारे जीवन में बाज़ार की एंट्री कराइ जा रही थी. अब हम चिल्ला रहे हैं क्योकि ‘डीलर’ टाइप कारोबारी ने हमे ठीक वही ठोकर मारी है जहाँ दर्द सबसे ज्यादा होता है.
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यहाँ……………………………..हमारी मौत पर आंसू ना बहाए …आगे आये………{exclusive}
सलाम ज़िन्दगी
http://salaamzindagii.blogspot.com/
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