जेएनयू में “भाषा, विचार और लोकतंत्र” विषय पर गोष्ठी
♦ गंगासहाय मीणा
जेएनयू के स्कूल ऑफ लैंग्वेज में 9 सितंबर की शाम “सबलोग” पत्रिका के सितंबर अंक का लोकार्पण और “भाषा, विचार और लोकतंत्र” विषय पर विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जेएनयू शिक्षक संघ के अध्यक्ष प्रो सुबोध नारायण मालाकार ने की। गोष्ठी के आरंभ में गंगासहाय मीणा ने भाषा से जुड़ी हुई दो बातों की तरफ ध्यान आकर्षित किया – पहला, हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं से संबंध सुदृढ़ हो, तभी हमें अंग्रेजी के वर्चस्व से लड़ सकते हैं तथा दूसरा, हिंदी को अपने विकास की प्रक्रिया में बोलियों का भी ध्यान रखना होगा, बोलियों के अस्तित्व की कीमत पर हिंदी का विकास उचित नहीं है।
गोष्ठी में बीज वक्तव्य हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार नीलाभ ने दिया। नीलाभ ने कहा कि हमें इस सवाल पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है कि आखिर हिंदी को खतरा किससे है। चूंकि हिंदी वंचितों और शोषितों की भाषा रही है और जिस हिंदी में हमें अपने विचार व्यक्त करने हैं, वह “राजभाषा” हिंदी नहीं है। मीडिया और बाजार द्वारा प्रयोग की जाने वाली हिंदी मीडिया और बाज़ार के ही लाभ के लिए होती है। ऐसे परिवेश में हमारी पत्रिकाओं का रुख क्या हो, इस पर भी हमें सोचना चाहिए।
हिंदी में अख़बारों की बढ़ती और पत्रिकाओं की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए “संवेद” और “सबलोग” जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संपादक किशन कालजयी ने हिंदी जगत में घटती वैचारिकता का भी मुद्दा उठाया। जीवन विज्ञान के अध्यापक प्रो प्रमोद यादव ने हिंदी में सृजनात्मक साहित्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि हमें हिंदीवाद से संप्रदायवाद की ओर नहीं मुड़ जाना चाहिए। अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो सुबोध नारायण मालाकार ने भाषा के वर्गीय और सांस्कृतिक संदर्भों की बात की। अंग्रेजी वर्चस्व के समय में हिंदी के लिए होने वाले आंदोलनों और भाषा के आमजन से जुड़ाव की आवश्यकता पर प्रो रामबक्ष, डॉ प्रेमपाल शर्मा और डॉ मणींद्रनाथ ठाकुर का ज़ोर रहा। गोष्ठी का संचालन कर रहे प्रो आनंद कुमार ने लोकतंत्र में भाषा की बंदिशों की चर्चा करते हुए कबीर, जायसी जैसी लोक से पैदा हुई भाषा की आवश्यकता पर बल दिया।









हिन्दी आमजन की ही भाषा है, उसे आमजन से दूर करने की सभी कोशिशें नाकाम होनी चाहिए. तभी हम अंग्रेजी के वर्चस्व से लड़ पायेंगे.
हिन्दी हमारी मातृभाषा है. इसको बचाने की जिम्मेदारी हमारी है.
हिन्दी को किसी से कोई खतरा नहीं. जल्दी है यह विश्व की सबसे बड़ी भाषा बनने वाली है. 5 साल बाद दुनिया के मार्केट को सबसे ज्यादा हिन्दी प्रभावित करेगी. जय
मैं इस गोष्ठी में शामिल नहीं हो सका लेकिन इस ब्लॉग पर पढ़कर मैंने उसका सार तो जान ही लिया है. आपको धन्यवाद. मैंने इस ब्लॉग की सदस्यता भी ले ली है.
We must encourage Hindi for expression of our views, feelings, thoughts to share with majority of Indian population.
टिप्पणी के लिए सभी का शुक्रिया.
हिंदी का जितना विरोध अंग्रेजी से है उससे कहीं ज्यादा संस्कृत और संस्कृत-वर्चस्व की मानसिकता से है, इसका यह मतलब नहीं है कि हिंदी संस्कृत शब्दों को नहीं पचा सकती बल्कि यह है कि हिंदी को संस्कृत की वर्णवादी और अभिजात्यी मानसिकता से बचा कर उसके लोकतांत्रिक तेवर को मजबूती प्रदान की जाए ौर जाहिर है कि इसके लिए हिंदी को बोलियों से जुड़ना होगा. और कार्पोरेट और धार्मिक अभिजात्य के हितों के स्थान पर जन हितों से जुड़ना होगा.
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