दिल्ली की साहित्यिक डाक कोलकाता कैसे पहुंची?
यह शिक़ायती पत्र प्रकाश पुरोहित ने ज्ञानपीठ के कर्ताधर्ता श्री साहू अखिलेश जैन को लिखा है। प्रकाश ने अपनी एक रचना नया ज्ञानोदय में छपने को भेजी, लेकिन आरोप है कि संपादक रवींद्र कालिया ने उसे अपनी पत्रिका में छापने के बजाय किसी और को दे दी। प्रकाश का सवाल है कि रचना का छपना या न छपना तो संपादक की मर्जी पर तय रहता है, लेकिन रिजेक्ट रचना कहां छपेगी, यह विशेषाधिकार किसी संपादक को कैसे मिल जाता है? सवाल वाज़िब है और इस पत्र के माध्यम से हम वर्चुअल हिंदी संसार के बीच इसे रख रहे हैं: मॉडरेटर
श्री साहू अखिलेश जैन,
प्रबंधन न्यासी, भारतीय ज्ञानपीठ
प्रिय महोदय,
करीब चार माह पहले मैंने अपनी रचना किताब का कार्यक्रम उर्फ क्रियाकर्म नया ज्ञानोदय को भेजी थी। कोई जवाब नहीं आया, तो लगा शायद नहीं छाप रहे हैं…! तब कोई पत्र-व्यवहार भी नहीं किया।
मगर अभी यही कोई दस दिन पहले पश्िचम बंगाल से प्रकाशित लघु पत्रिका सदीनामा का ताज़ा अंक मिला। न तो मैंने इस पत्रिका का नाम सुना… न ही इसके बारे में कोई जानकारी ही थी। सदीनामा के पन्ने उलट-पलट रहा था तो यकायक एक शीर्षक पर नज़र अटक गयी… कि अरे यह तो मेरा शीर्षक है। लेख पढ़ने लगा तो पाया लेख भी मेरा ही था… और आख़िर में नाम-पता भी मेरा ही छपा था।
यह लेख कहीं और भेजा नहीं था, छपा नहीं था, इसलिए किसी और पत्रिका में छपने का तो सवाल ही नहीं था। जब इस बारे में सदीनामा के संपादक जितेंद्र जितांशु से बात की और जानना चाहा कि उन्हें यह लेख कहां से मिला, तो उनका जवाब चौंकाने वाला था – “पिछले दिनों दिल्ली गया था… वहीं नया ज्ञानोदय के दफ्तर में मित्र रवींद्र कालिया से बात हो रही थी। तब मैंने कहा कि अच्छे व्यंग्य लेख नहीं मिल रहे हैं सदीनामा के लिए… आप कुछ नाम-पते दे दें। रवींद्र जी ने अपनी टेबल की दराज से यह लेख निकाल कर मुझे दिया और कहा कि “इसे छाप देना।” मैंने कहा भी कि नया ज्ञानोदय के लिए आयी रचना मैं कैसे छाप सकता हूं तो कालियाजी ने कहा – “आप तो छाप लीजिए… बाकी बात मैं कर लूंगा।” तब मैंने यह रचना छापी और पत्रिका का वह अंक भी आपको भेजा।”
इस बारे में जब मैंने रवींद्र कालिया को फोन लगा कर बात की तो उन्होंने फौरन इनकार कर दिया कि उन्होंने कोई रचना, किसी को नहीं दी। यह भी कहा कि आपकी कोई रचना भी मुझे नहीं मिली है और मैं आपको जानता भी नहीं हूं। यह चोरी का मामला है… आपको जो करना है, करिए। मेरा इससे कुछ लेना-देना नहीं है। चिढ़े हुए अंदाज़ में बोल रहे थे रवींद्र कालिया, जैसे कि चोरी पकड़ी गयी हो।
फिर मैंने जितेंद्र जितांशु से बात की और रवींद्र कालिया के उदगार बताये। बेचारे जितांशु सिवाय हंसने के कुछ भी नहीं कह पाये। सिर्फ इतना ही कहा, “अगर यह रचना हमने कहीं से चुरायी होती तो लेखक को पत्रिका का अंक तो नहीं ही भेजते! और फिर नया ज्ञानोदय को भेजी रचना सदीनामा में कैसे पहुंच गयी? दिल्ली के बजाय सीधे कोलकाता! यह रचना उन्होंने ही दी थी।”
महोदय, रचना का छपना या न छपना तो संपादक की मर्जी पर तय रहता है, लेकिन रिजेक्ट रचना कहां छपेगी, यह विशेषाधिकार किसी संपादक को कैसे मिल जाता है? यह हिंदी साहित्य की अनूठी घटना है… जो लेखक के अधिकार पर हमले की तरह है। मेरी रचना है, तो मैं ही तय करूंगा कि वह कहां छपेगी! किसी संपादक के पास यह अधिकार सुरक्षित नहीं है। यह हेराफेरी है।
मेरी रचना का तो भट्ठा बैठ गया। चूंकि वह सदीनामा में छप चुकी है तो अब किसी और पत्रिका में भेजने का सवाल ही नहीं उठता है… और फिर कोई पत्रिका इसे क्यों छापेगी?
मुझे नहीं पता कि मेरी रचना का मुआवज़ा आप किस तरह देंगे…! देंगे भी या नहीं! लेकिन आयंदा किसी लेखक के अधिकार पर यूं हमला न होने दें। क्या मालूम इस चौर्य-कर्म की शुरुआत मेरी रचना से ही हुई हो। क्योंकि इससे पहले ऐसा पराक्रम किसी संपादक ने नहीं दिखाया है।
उम्मीद करता हूं कि मुझे बताएंगे कि आप क्या करने जा रहे हैं। रवींद्र कालिया लाख कहें कि उन्होंने ऐसा नहीं किया है, लेकिन उनका यह झूठ ऐसा है कि जिसे दिन के उजाले में देखने की ज़रूरत नहीं है!
धन्यवाद… और जवाब के इंतज़ार में!
प्रकाश पुरोहित
14, संवाद नगर, इंदौर (मध्यप्रदेश)









yodhaon अब jut जाओ. ravindra kalia मिल गए है. prabhash joshi, udai prakash, shashi shekhar के बाद es नाम पर भी कुछ दिन jugaali तो banti ही है.
भई अविनाश, ये यशवेंद्र सिंह नाम के जीव को कहां से पकड़ा है आपने? इसे “पीस” कहना भी बहुत बड़ा अपराध होगा। ये तो अपने आप में पूरा का पूरा “थान” है। इसे नेशनल म्यूजियम में रखना चाहिए। बहुत दुर्लभ जीव प्ततीत होता है।
रवींद्र कालिया जी का यह कर्म नये रचनाकारों के लिए संबल से कम नहीं है .कालियाजी तो साहित्य जगत के बाईपास निकले .उनके यहाँ भेजी गयी रचना नया ज्ञानोदय में छपे न छपे कहीं और तो छप ही जायेगी . कालियाजी के इस कर्म को सलाम .
वाह, कमाल हो गया. सेठ के दलाल कालिया का यह नया रूप भी हमने देख लिया.
कालिया तो वैसे भी लेखक को दो कौडी से ज्यादा का नहीं समझते है. इनके यहाँ तो वही लेखक टिक सकता है जो इनके पैर छुए .. याद कीजिये राष्ट्रीय संग्रहालय में हुआ pustak vimochan समारोह, jisameM vardhaa के प्रेमी लेखक raakesh mishra (जिन्होंने आधा darjan प्रेम किये haiM. ) सहित कइयों ने कालिया के पैर छुए थे वे सब आज भी कालिया के गुड books में shaamil है लेकिन किसी महिला कथाकार ने उनके पैर नहीं छुए तो वे आज ज्ञानोदय के मंच पर कहीं नजर नहीं आ रहीं चाहे वह प्रत्यक्षा हो या कविता या फिर अल्पना मिश्र. वन्दना राग का मामला तो अब देख ही रहे हैं. khair, कालिया की इन बद्तमीजियों पर चर्चा करना भी मैले पर ढेला फेंकने जैसा हो गया है.
आ थू…. आ थू…आ थू……
अरे! क्या बात कर रहे हैं वन्दना राग को कौन अपमानित कर सकता है.अपनी घटिया कहानियाँ वो कहीं भी छ्पा सकती हैं, तहलका हो कि ज्ञानोदय. कमला जी तो वसुधा में उन्हें हर अंक में छाप दें. वो धडाधड हर अंग पर कहानी लिख रही हैं, नाक, कान, आँख, काँख, होंठ, गला..वक्ष…. संपादकों छापो उन्हें. वह तो पति के पद की गरिमा और गौरव अपने कन्धे पर लिए चलती हैं, अभी वो पंकज के साथ कालिया जी से मिलने दफ्तर आई थीं मैं संयोग से वहीं था, गर्व छलका जा रहा था, कालिया जी लपर – लपर…. और उनकी कहानी युवा विशेषाँक में आई है. वह बात अलग है कि यह जून विशेषांक सबसे बुरे और रचनात्मकता के नाम पर दीवालिया टायप के युवा लेखकों – लेखिकाओं की कहानियों से भरा है. ज्योति चावला से कहें कि वह सरिता या गृह्शोभा या मेरी सहेली में लिखे, या फिर ज्ञानोदय भी अब प्रेम , बेवफाई, प्रेम अपराध, यौन कथा, तंत्र – मंत्र, विशेषांक के स्तर पर गिरने को है बस प्रतीक्षा करे.
उमा शंकर खुद तो टीक लिख ले फिर श्रीमति को लॉंच क
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