साइबर युग में ‘ई’ निरक्षरता शर्मिंदगी है
♦ जगदीश्वर चतुर्वेदी
बुद्धिजीवी स्वभाव से ठलुआ होता है। भारतीय बुद्धिजीवी का ठलुआपन अब और भी परेशानी पैदा कर रहा है। वह पढ़ा लिखा अनपढ़ है। उसने अपनी अपडेटिंग बंद कर दी है। संचार क्रांति के लिए जरूरी है इस ठलुआ बुद्धिजीवी की चौतरफा धुनाई की जाए। जिस तरह अशिक्षित होना अपमान की बात मानी जाती थी उसी तरह साइबर अशिक्षित अथवा ‘ई’ अशिक्षित होना भी अपमान की बात है। हमारे पिछड़ेपन का संकेत है। साइबर पिछड़ेपन पर वैसे ही हमला बोलना चाहिए जैसे निरक्षरता पर हमला बोलते हैं। निरक्षरता सामाजिक विकास की सबसे बड़ी बाधा थी तो साइबर निरक्षरता महाबाधा है। साइबर बेगानेपन को किसी भी तर्क से वैधता प्रदान करना देशद्रोह है, सामाजिक परिवर्तन के प्रति बगावत है। इसे किसी भी तर्क से गौरवान्वित नहीं किया जाना चाहिए।
अखबार और पत्रिका का संपादक जब गर्व से कहता है हम कंप्यूटर पर नहीं लिखते, हम इंटरनेट पर नहीं लिखते तो सवाल किया जाना चाहिए कि क्यों नहीं लिखते? कंप्यूटर पर नहीं लिखना, इंटरनेट पर नहीं पढ़ना और नहीं लिखना ई-निरक्षरता है। ई-निरक्षरता पर हमारे बुद्धिजीवी को गर्व नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे शर्म आनी चाहिए।
कंप्यूटर लेखन, इंटरनेट लेखन नये युग की साक्षरता है। अक्षरज्ञान पुराने युग की साक्षरता थी, जो आज सामाजिक और बौद्धिक विकास के लिए अपर्याप्त है। साइबर निरक्षर वैसे ही होता है जैसा निरक्षर होता है। कॉलेज, विश्वविद्यालयों से लेकर स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक अपने साइबर अज्ञान का महिमामंडन करते रहते हैं। आज के युग में साइबर अज्ञानी और कंप्यूटर पर लिखने से परहेज करने वाला लेखक बुनियादी तौर पर निरक्षर लेखक है।
साइबर संस्कृति का तेजी से विकास हो रहा है। हम चाहें या न चाहें, साइबर संस्कृति हमारे घर आ गयी है। साइबर संस्कृति के घर आने के साथ ही साइबर भाषाएं भी घर में आने के लिए दस्तक दे रही हैं। भारत सरकार की मदद से सभी 22 भाषाओं के फॉन्ट मुफ्त में इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। भारत सरकार ने भारतीय भाषाओं के फॉन्ट और यूनीकोड सिस्टम के विकास पर तकरीबन 1300 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। जाहिर है भाषा के निर्माण में अब तक का यह सबसे बड़ा निवेश है। इसके दूरगामी सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनीतिक परिणाम सामने आएंगे। भारत सरकार ने हाल ही में अपने एक फैसले के तहत बीस हजार कॉलेजों और पांच हजार शोध संस्थानों को ‘सूचना, संचार और तकनीकी मिशन’ के तहत ब्रॉडबैंड सुविधा मुहैया कराने का फैसला किया है। इसके अलावा आज भारत की सभी प्रमुख भाषाओं के फॉन्ट मुफ्त में उपलब्ध हैं। कल बंगलौर में बांग्ला, कोंकणी, संथाली, सिंधी और मणिपुरी भाषा के साफ्टवेयर को जारी करने बाद आज भारत की सभी 22 भाषाओं में कंप्यूटर लेखन की व्यवस्था उपलब्ध हो गयी है। इसे आसानी से www.ildc.in से डाउनलोड किया जा सकता है। अभी तक भारतीय भाषाओं की सात लाख सीडी डाक से भेजी जा चुकी हैं। तकरीबन 39 लाख लोगों ने इंटरनेट से डाउनलोड किया है। भारत की जनसंख्या और संभावित कंप्यूटर यूजरों के लिहाज से यह संख्या बहुत ही कम है। भारतीय भाषाओं के मुफ्त साफ्टवेयर की उपलब्धता के कारण इन भाषाओं का इंटरनेट पर इस्तेमाल और भी तेजी से बढ़ेगा। केंद्र सरकार की योजना के अनुसार प्रति छह गांवों में से एक गांव में ‘कॉमन सर्विस सेंटर’ खोला जाएगा, जिसके जरिये जनता को स्थानीय भाषा में ईमेल करने की सुविधा उपलब्ध होगी। इस प्रक्रिया में स्थानीय भाषाओं में कंप्यूटर का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ेगा।
भारतीय भाषाओं के कंप्यूटरी रूपांतरण की प्रक्रिया बेहद धीमी और गैर शिरकत वाली है। फलत: भारत में अभी भी कंप्यूटर भाषा में दुरुस्तीकरण धीमी गति से चल रहा है। अनेक भाषाओं के साफ्टवेयरों के बारे में शिकायतें भी आ रही हैं। ये शिकायतें जायज हैं, लेकिन इनका समाधान तब ही संभव है जब बुद्धिजीवियों खासकर भाषायी बुद्धिजीवियों की कंप्यूटर भाषा के दुरुस्तीकरण में दिलचस्पी पैदा हो। वे ‘ई साक्षर’ बनें। भाषाई बुद्धिजीवी अभी तक कंप्यूटर का न्यूनतम प्रयोग करते हैं। वे अभी भी कलम-कागज के युग के आगे नहीं जा पाये हैं। कंप्यूटर लेखन को युवाओं का खेल मानते हैं। ब्लॉगरों को छिछोरा मानते हैं। ज़्यादातर बुद्धिजीवी अभी भी कंप्यूटर सामग्री का इस्तेमाल नहीं करते। वे साहित्य को तो मानते हैं और जानते हैं लेकिन ‘ई’ साहित्य को लेकर उनमें कोई दिलचस्पी नहीं है।
‘ई’ साहित्य विकासशील साहित्य है। ‘ई’ साहित्य का किसी भी किस्म के साहित्य, मीडिया, रीडिंग आदत, संस्कृति आदि से बुनियादी अंतर्विरोध नहीं है। ‘ई’ साहित्य और डिजिटल मीडिया प्रचलित मीडिया रूपों और आदतों को कई गुना बढ़ा देता है। जिस तरह कलाओं में भाईचारा होता है, उसी तरह ‘ई’ साहित्य का अन्य पूर्ववर्ती साहित्यरूपों और आदतों के साथ बंधुत्व है। फर्क यह है कि ‘ई’ साहित्य डिजिटल में होता है। अन्य साहित्यरूप गैर-डिजिटल में हैं, डिजिटलकला वर्चस्वशाली कला है। वह अन्य कलारूपों और पढ़ने की आदतों के डिजिटलाइजेशन पर जोर देती है। अन्य रूपों को डिजिटल में रूपांतरित होने के लिए मजबूर करती है। किंतु इससे कलारूपों को कोई क्षति नहीं पहुंचती। यह भ्रम है कि ‘ई’ साहित्य और ‘ई’ मीडिया साहित्य के पूर्ववर्ती रूपों को नष्ट कर देता है, अप्रासंगिक बना देता है। वह सिर्फ कायाकल्प के लिए मजबूर जरूर करता है।
अमरीका में सबसे ज्यादा ‘ई’ कल्चर है और व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा किताबें खरीदी जाती हैं। अमरीका में बिकने वाली किताबों की 95 फीसदी खरीद व्यक्तिगत है। मात्र पांच प्रतिशत किताबें पुस्तकालयों में खरीदी जाती हैं। अमरीका में औसतन प्रत्येक पुस्तकालय सदस्य साल में दो किताबें लाइब्रेरी से जरूर लेता है। एक अनुमान के अनुसार पुस्तकालयों से किताब लाने और व्यक्तिगत तौर पर खरीदने का अनुपात एक ही जैसा है। यानी तकरीबन 95 प्रतिशत किताबें पुस्तकालयों से लाकर पढ़ी जाती हैं। इसके विपरीत भारत में अमरीका की सकल आबादी के बराबर का शिक्षित मध्यवर्ग है और उसमें किताबों की व्यक्तिगत खरीद 25 फीसद ही है। बमुश्किल पच्चीस फीसद किताबें ही व्यक्तिगत तौर पर खरीदकर पढ़ी जाती हैं। हाल ही में किये सर्वे से पता चला है कि विश्वविद्यालयों के मात्र पांच प्रतिशत शिक्षक ही विश्वविद्यालय पुस्तकालय से किताब लेते हैं।
पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति के विकास में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा निर्मित ‘यूजीसी-इंफोनेट’ नामक ‘ई’ पत्रिकाओं के संकलन की महत्वपूर्ण भूमिका है। एक जमाना था जब जेएनयू आदि बड़े संस्थानों के पास ही विदेशी पत्रिकाओं को मंगाने की क्षमता थी, आज स्थिति बदल गयी है। आज यूजीसी के द्वारा संचालित इस वेब पत्रिका समूह का हिंदुस्तान के सभी विश्वविद्यालय लाभ उठाने की स्थिति में हैं। इस संकलन में साढ़े चार हजार से ज्यादा श्रेष्ठतम पत्रिकाएं संकलित हैं। मजेदार बात यह है कि इस संग्रह के बारे में अधिकतर शिक्षक जानते ही नहीं हैं। शिक्षितों की अज्ञानता का जब यह आलम है, तो आम छात्रों तक ज्ञान कैसे पहुंचेगा? ज़रूरत इस बात की है कि ‘ई’ साक्षरता और ‘ई’ लेखन को नौकरीपेशा शिक्षकों और वैज्ञानिकों के लिए अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जो शिक्षक, शोधार्थी और वैज्ञानिक नियमित ‘ई’ लेखन नहीं करे उसकी पगार, स्कॉलरशिप, तरक्की, इनक्रीमेंट रोक लेने चाहिए। जो लोग भारत सरकार का बौद्धिक उत्पादन के लिए धन पाते हैं, उन्हें बदले में अपने विषय में ‘ई’ लेखन के लिए मजबूर किया जाना चाहिए। भारत की नयी ज्ञान संपदा का बड़ा हिस्सा अभी भी अंग्रेजी में आ रहा है अत: हमारे बुद्धिजीवियों को अपनी भाषा में कुछ न कुछ सामग्री इंटरनेट पर उपलब्ध करानी चाहिए। हमें यह भी सोचना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि जगदीशचंद्र बोस, सत्येंद्र बोस जैसे महान वैज्ञानिक बांग्ला में भी विज्ञान लेखन कर लेते थे और आज अमर्त्यसेन जैसा लेखक अपनी मातृभाषा में एकदम नहीं लिखता। अपनी भाषा के प्रति बुद्धिजीवी के इस बेगानेपन से हमें लड़ना चाहिए।
(जगदीश्वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्म। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर। मीडिया और साहित्यालोचना का विशेष अध्ययन। तकरीबन 30 किताबें प्रकाशित। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफिल, पीएचडी। संपूर्णानंद संविवि से सिद्धांत ज्योतिषाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)









साइबर-साक्षरता अक्षर-साक्षरता से आगे की चीज़ है जैसे बी.ए. के बाद एम.ए. है। अब कोई बी.ए. किया व्यक्ति एम.ए. किए को अनपढ़ कहे तो उसका क्या करें !? हमारे तथाकथित महान बुज़ुर्ग ऐसे ही अनपढ़ों जैसे तर्क दे रहे हैं। अगर मैं कार या स्कूटर नहीं चला सकता तो मैं दस-पांच लापरवाह अमीरज़ादों के उदाहरण देकर ड्रायविंग को लफंगई सिद्ध करने पर उतर आऊं !? तकनीक से डरे बुज़ुर्गवार यही कर रहे हैं।
It should be a must for all educated people in India. It opens up a whole range of possibilties.
बहुत काँटे का लेख है। बिलकुल सही समय पर लिखा गया है। मैं इससे अक्षरश: सहमत हूँ।
- आनंद
अभी नामवर सिंह को बताता हूं कि चेले ने आपको ई-निरक्षर और अज्ञानी और जाने क्या क्या कहा है और कहा है कि “इस ठलुआ बुद्धिजीवी की चौतरफा धुनाई की जाए।” अगला पुरस्कार जगदीश्वर को नहीं देने का गुरु। नौकरी भी लेता है और ये सब भंडोल भी करता है।
रही बात दमखम की, तो नेट पर हिंदी बड़ी कमज़ोर है। सारे ज्ञान के कोश अभी नेट पर बनने बाकी हैं। दूसरी बात यह कि नेट लेखन से भाषा नहीं बनती। नेट लेखन खासकर ब्लाग लेखन वर्चुअल लेखन है, यह ‘है भी और नहीं भी।’ इसके लेखन से भाषा न तो समृद्ध होगी और न भाषा मरेगी। नेट के विचार सिर्फ विचार हैं और वह भी बासी और मृत विचार हैं। उनमें स्वयं चलने की शक्ति नहीं होती, आप नेट पर महान क्रांतिकारी किताब लिखकर और उसे करोड़ लोगों को पढ़ा कर दुनिया नहीं बदल सकते।
नेट लेखन सिर्फ संचार है और संचार से ज़्यादा इसकी कोई अन्य भूमिका भी नहीं है। संचार में आप गाली दें, बकवास करें, प्रेम करें, विवाद करें, खुशी की बातें करें, यहां सब कुछ वर्चुअल है और कभी ठोस नहीं बन सकता। वर्चुअल के आधार पर आप किसी लेखक, पत्रकार, विचारक, नेता आदि को प्रतिष्ठित अथवा अपदस्थ नहीं कर सकते। वर्चुअल में न सम्मान होता है और अपमान होता है, वर्चुअल तो वास्तव में होता ही नहीं है, फलत: प्रभाव के परे होता है। नेट लेखन बलवानों का खेल नहीं है, यह तो महज लेखन है। वैसे ही जैसे कोई बच्चा लिखता है और भूल जाता है।
@@@@-जगदीश्वर चतुर्वेदी@@@@@@
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