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साइबर स्‍पेस में घायल प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव

14 September 2009 One Comment

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

prabhash-pushpraj1साइबर संस्‍कृति‍ से परहेज करने वालों की इन दि‍नों शामत आयी हुई है। प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव जैसे बड़े लेखक जो नेट से नफरत करते हैं अथवा नेट पर लि‍खे को संवाद योग्‍य नहीं समझते, उनके दि‍माग की नसें तनी हुई हैं। वे नेट से होने वाले हमलों से घायल हैं और कराह रहे हैं। साइबर घायलों का कहीं इलाज नहीं होता, कोई अस्‍पताल उनका केयर नहीं करता। यहां तक कि‍ गांठ की बुद्धि‍ भी काम नहीं देती। समझ में ही नहीं आता कि‍ नेट पर इतने ताबड़तोड़ हमले के पीछे राज क्‍या है? वह भी ऐसे लेखकों से, जि‍नका साहि‍त्‍य और पत्रकारि‍ता में कुछ भी दांव पर नहीं लगा है। नेट लेखकों का यदि‍ ज़मीनी स्‍तर पर कहीं कुछ दांव पर लगा हो तो वे अपने लगुए-भगुओं से कह कर ठीक भी करा दें। लेकि‍न इस नेट का क्‍या करें। इसने तो रातों की नींद और दि‍न का चैन हराम कर दि‍या है। नेट पर इन दोनों महानुभावों के बारे में कोई तीखी आलोचना प्रकाशि‍त होती है, तुरंत भक्‍तगण दौड़े जाते हैं, महाराज कुछ करो ये चुप नहीं हो रहे। वे दोनों अपने भक्‍तों से कहते हैं जाओ और धावा बोल दो। धावा बोलने के चक्‍कर में कुछ लोग वापस अपने घर आकर सो जाते हैं। जि‍नकी मजबूरी है, वे उल्‍टी-सीधी टि‍प्‍पणि‍यां लि‍खकर अपने गुरु के प्रति‍ दायि‍त्‍व की इति‍श्री समझ लेते हैं।

प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव को ‘हिंदीयुगल’ कहना ठीक होगा। इन दोनों की तान को जि‍स तरह नेट ने बेताला कि‍या है, उसने नेट लेखन और प्रिंट लेखन से जुड़े कुछ बड़े सवालों को उठा दि‍या है। ‘हिंदीयुगल’ पर हुए हमले का पहला सबक है – नेट का हमला स्‍थानीय नहीं ग्‍लोबल होता है। ‘जनसत्ता’ या ‘हंस’ को स्‍थानीय पाठक पढ़ते हैं। नेट को ग्‍लोबल पाठक पढ़ते हैं। दूसरा सबक – नेट लेखन और इमेज वर्षा अंतत: वर्चुअल यथार्थ है, यथार्थ नहीं है। इसकी यथार्थ से संगति‍ खोजना बेवकूफी है।

नेट लेखन, इमेज, भाषा, प्रतीक आदि‍ कि‍सी को भी पढ़ने, लि‍खने और समझने के लि‍ए हमें वर्चुअल रि‍यलि‍टी से वाकि‍फ होना होगा। यह लेखन और इमेज का रेगि‍स्‍तान है। लेखन के रेगि‍स्‍तान के नि‍यम वैसे ही होते हैं, जैसे रेगि‍स्‍तान के होते हैं। लेखन के रेगि‍स्‍तान में लि‍खे को देख कर हिंदी के इन लेखकों के भक्‍तों को यह भी लगा कि‍ इस प्रक्रि‍या में कोई ‘फेक’ लि‍ख रहा है। मजेदार बात यह थी कि‍ अनेक ‘फेक’ नाम से बहस में राय भी दे रहे थे। नेट लेखन का ‘फेक’ लगना और अखबार लेखन का वास्‍तव लगना, यह अपने आपमें आनंद की चीज है।

जब नेट पर बहस चल नि‍कली तो बेलगाम थी। जि‍सके मन में जो आ रहा था, लि‍ख रहा था। कोई अनुशासन नहीं, कोई संपादक नहीं। कोई सेंसरशि‍प नहीं। सब कुछ पारदर्शी वर्चुअल था। बहस में बार बार वि‍षयांतर हो रहा था। लोग बहस को पकड़ कर मुद्दे पर ला रहे थे और बार-बार बहस हाथ से नि‍कली जा रही थी और यही नेट के रेगि‍स्‍तान की खूबी है। जैसे रेगि‍स्‍तान में अंधड़ मि‍ट्टी के टीले को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह ले जाता है ठीक वैसे ही नेट लेखन चीजें जहां हैं, वहां नहीं रहने देता। सबवर्सि‍ब भूमि‍का अदा करता है।

rajendra yadavनेट की बहसों में लेखकगण नि‍जी कल्‍पनाशीलता के आधार पर शि‍रकत करते हैं। यथार्थ के आधार पर शि‍रकत नहीं करते हैं। वि‍भि‍न्‍न वेबसाइट वालों ने प्रभाष जोशी के रवि‍वार डॉट कॉम वाले साक्षात्‍कार को प्रकाशि‍त करके उस पर जब बहस चलायी और यूजरों से प्रति‍क्रि‍याएं मांगी तो प्रभाष जोशी का साक्षात्‍कार बार-बार उनकी बड़ी ही त्रासद छवि‍ बना रहा था। पढ़ने वाले प्रभाष जोशी को बड़े ही दुखी भाव से देख रहे थे और मन ही मन कह रहे थे प्रभाषजी आपने ऐसा क्‍यों कहा। यदि‍ यह सब न कहते तो इतनी फजीहत तो कम से कम नहीं होती। इस मामले में नेट लेखक रि‍यलि‍टी टीवी के पैटर्न का अनुगमन करते हैं। नेट पर जो आता गया अपना राग सुनाता गया और चीजों को पारदर्शी रूप में देखता गया। आप प्रभाष जोशी के पक्ष में बोलें या वि‍पक्ष में, अंत में नाटक तो प्रभाष जोशी, राजेंद्र यादव का ही हो रहा था। नेट लीला का यह रि‍यलि‍टी टीवी रूप था, जि‍समें वर्चुअल रि‍यलि‍टी अपना खेल खेल रही थी। इसमें ‘अच्‍छे’ और ‘बुरे’ के बीच का वर्गीकरण भी चल रहा था।

नेट लेखन में सामान्‍य लेखन की तरह नैति‍क पक्ष भी प्रच्‍छन्‍न रूप में आ धमकता है। इस पूरी प्रक्रि‍या से सबसे ज्‍यादा प्रभावि‍त और पीड़ि‍त प्रभाष-राजेंद्र यादव और उनकी भक्‍तमंडली महसूस कर रही थी। नेट की शक्‍ति‍ ने प्रभाष जोशी-राजेंद्र यादव की पूरी कि‍स्‍सागो क्षमता को सोख लि‍या था। पढ़ने वाले तकलीफ पा रहे थे, कुछ आराम महसूस कर रहे थे। अब प्रभाष जोशी – राजेंद्र यादव स्‍वयं नेट पर एक कहानी बनकर रह गये थे। वे दोनों परेशान थे कि‍ हमने जो कहा नहीं, कि‍या नहीं, पता नहीं कहां से खोज खोजकर हमारे आख्‍यान के साथ नत्‍थी कर दि‍या गया और जो आख्‍यान बनाया जा रहा था, वह टुकड़ों में बि‍खरा हुआ था। कोई टुकड़ा इस वेब पर था तो कोई दूसरा टुकड़ा अन्‍य वेब पर था। इन दोनों की कहानी का एक हि‍स्‍सा ‘क’ के बयान में था तो अन्‍य पहलू ‘ख’ के बयान में था। ये दोनों महारथी अपनी नेट कहानी पहचान नहीं पा रहे थे। इन्‍हें अपने चेहरे और वि‍चार अपने नजर नहीं आ रहे थे। इसी को कहते हैं नेट वि‍पर्यय।

ये दोनों ही लेखक अपने शब्‍दों के असर को पहचान नहीं पा रहे थे, सोचने में असमर्थ पा रहे थे कि‍ उनके शब्‍दों का इतना व्‍यापक प्रभाव है। जो तल्‍खी और गुस्‍सा इन दोनों पर चली बहस में सामने आया है, वह यह बताने के लि‍ए पर्याप्‍त है कि‍ शब्‍दों के प्रभाव को ध्‍यान में रख कर लि‍खना चाहि‍ए। जो मन में आया बोल दि‍या, जो मन में आया लि‍ख दि‍या, इसका कम से कम लेखक और बड़े लेखक को तो खास तौर पर ख्‍याल रखना चाहि‍ए। इन दोनों के लेखन पर चली बहस ने नेट पाठकों का अच्‍छा-खासा मनोरंजन भी कि‍या, कुछ मर्माहत हुए तो कुछ लोगों को अपना गुस्‍सा जाहि‍र करने का मौका मिला।

नेट लेखन में नि‍ज-संदर्भ, विडंबना, प्रामाणि‍कता और पुनरावृत्ति पर सबसे ज्‍यादा लि‍खा जाता है। यह उत्तर आधुनि‍क खेल यहां पर भी चला। जो आलोचनात्‍मक टि‍प्‍पणि‍यां आयीं वे यथार्थ का अति‍क्रमण करने वाली थीं।‍ यथार्थ में इन दोनों लेखकों ने जो कहा उसकी इनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ में मीमांसा की गयी। प्रभाष जोशी-राजेंद्र यादव के भक्‍त चाहते थे, अतीत को अतीत रहने दो। उसे अब सामने लाने से क्‍या लाभ जबकि‍ अन्‍य कह रहे थे जब बहस उनके लेखन के सांस्‍कृति‍क संदर्भ पर हो रही है तो हमें उनके अतीत और व्‍यवहार को भी वि‍वादि‍त गद्य के साथ जोड़ कर देखना चाहि‍ए। वे इन दोनों लेखकों के बहाने वर्तमान में प्रेस और समाज की दशा पर भी बातें कर रहे थे।

‘हिंदीयुगल’ के भक्‍त मान कर चल रहे थे नेट की बहस मूर्तिभंजन है। जबकि‍ अन्‍य ऐसा नहीं मानते। इस बहस में सब कुछ नि‍र्मि‍त था, कुछ भी स्‍वाभावि‍क नहीं था, इन दोनों का इति‍हास भी नि‍र्मि‍त था। हम असल में यथार्थ लेखकों से मुठभेड़ नि‍र्मि‍त लेखक के जरि‍ये कर रहे थे। उसका वैकल्‍पि‍क इति‍हास भी बना रहे थे। वर्चुअल रि‍यलि‍टी का नि‍यम है कि‍ जब तक लोग हजम नहीं कर लेते तब तक समझो कुछ नहीं हुआ है। प्रभाष जोशी – राजेंद्र यादव को जब लोगों ने हजम कर लि‍या तब ही पता चला कि‍ आखि‍र हुआ क्‍या है?

‘हिंदीयुगल’ का वैकल्‍पि‍क इति‍हास वह है जो यूजरों के अनुभवों से छनकर सामने आया, इसकी हमें कम जानकारी थी। यूजरों ने अपने व्‍यक्‍ति‍गत अनुभवों की एक-एक रेखा खींचकर जो चि‍त्र बनाया वह वास्‍तव लेखक की प्रचारि‍त इमेज से एकदम भि‍न्‍न था। यह वह इति‍हास है, जो इन दोनों की व्‍यावसायि‍क इमेज और प्रति‍ष्‍ठा के बाहर है। जब लोग अपनी राय दे रहे थे तो कुछ लोग प्रमाण मांग रहे थे। उनसे यही कहना है कि‍ प्रमाण तो लि‍खि‍त पंक्‍ति‍यां ही हैं। इस प्रक्रि‍या में इन दोनों के बारे में बना हुआ भक्‍ति‍ का प्रभामंडल नष्‍ट हुआ। नेट लेखन मूलत: प्रभामंडल नष्‍ट करता है। यदि‍ आपने भक्‍ति‍ भाव से लि‍खा है तो यूजर उसे कभी ग्रहण नहीं करेगा। नेट की बहस में यूजर अपने अनुभवों के साथ दाखि‍ल हो रहे थे और इन दोनों के आभामंडल को नष्‍ट कर रहे थे। साथ ही इन दोनों की रोमैंटि‍क इमेज को भी इस बहस ने नष्‍ट कि‍या। नेट पर सस्‍ती भावुकता और भक्‍ति‍ अपील नहीं करती बल्‍कि‍ आलोचनात्‍मक वि‍वेक अपील करता है। वै‍कल्‍पि‍क नजरि‍या अपील करता है।

jag(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। मथुरा में जन्‍म। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन। तकरीबन 30 कि‍ताबें प्रकाशि‍त। जेएनयू से हिंदी में एमए एमफि‍ल, पीएचडी। संपूर्णानंद संवि‍वि‍ से सि‍द्धांत ज्‍योति‍षाचार्य। फोन नं 09331762360 (मोबाइल) 033-23551602 (घर)। ई मेल jagadishwar_chaturvedi@yahoo.co.in पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

One Comment »

  • संजय ग्रोवर said:

    ऐसा लगता है जैसे राजेंद्र यादव के भेस में प्रभाष जोशी बोल रहे हों।
    पिछले कुछ अरसे से वे बदले-बदल, डरे-डरे से लगते रहे हैं। हंस भी।
    हिंदी-कविता भी वायवीयता से आगे जाकर अब वायु-वीरता या वायु-वीर्यता बनने की फिराक में लगती है। दो चार मुक्तिबोधों, रधुवीर सहायों को छोड़ दे ंतो यह अमूर्त कविता कोई भी मूर्त या जीवित व्यक्ति न तो कोई पढ़ता है, न समझ पाता है। अब इसे दुर्भाग्य कहिए चाहे सौभाग्य कि आज भी आम आदमी अशोक चक्रधर या सुरेंद्र शर्मा को साहित्यकार मानता है। वैसे भी, कोई मूर्ख ही कह सकता है कि ‘अंधेरे में’ जैसी कविताएं आम आदमी की समझ में आने वाली ज़ुबान में लिखी गयी कविताएं हैं। कई बार लगता है कि वायवीय, अमूर्त के नाम पर लिखी गयी कविताओं का उद्देश्य भी वही है जो शादी, मृत्यु या अन्य अवसरों पर पढ़े जाने वाले मंत्रों और कर्मकांडों का है। यानि कि जो कोई काम ही नहीं था निकम्मों ने उसी को काम बना लिया और विद्वान कहलाते हुए धंधा करने लगे।
    वायवीय और अमूर्त का अर्थ और प्राप्ति यही होती है शायद !
    या फिर हमारे इन बुज़ुर्ग विद्वानों को लगने लगा है कि धार्मिक कट्टरता वापिस आ चुकी है और ऐसे में क्यों बुढ़ापे में अपनी मिट्टी ख़राब करवायी जाए।

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