आहत-धर्म मन की खीस, संदर्भ : कागद कारे

♦ मुसाफिर बैठा

kaagad kaareजनसत्ता, 06 सितंबर 2009 के अंक में प्रभाष जोशी जी, आपने काले धंधे के रक्षक नाम से कागद कारे किया है। चोट निशाने पर है, तभी तो आप इस आलेख में दलित, पिछड़ा और वाम आंदोलन संदर्भ को छह छह बार गींजते हैं। इस जिक्रे-बारंबार में कभी दलित-पिछड़ा-वाम आंदोलन को क्षति पहुंचाने वाला जवाब देने की आपकी कोढ़िया-थूक सदृश धमकी है, तो कहीं यह भाव व्यक्त कर इन आंदोलनों को औकात दिखाने की कोशिश कि व्यापक सामाजिक पत्रकारिता धर्म के निकष पर इनको परखना अभी बाकी है। बाद में ऐसे आंदोलनों की परख करने की गिदड़भभकी भी है। जाहिर है, अबके कागद कारे की सारी ऊर्जा आपने तिलमिलाहट में अपने मित्र धर्म पर पड़े छींटे धोने की कवायद की ही भेंट चढ़ा दी है। आपका यह कर्म चोट लगे पहाड़ फोड़े घर की सिलौट सरीखा है। बहरहाल, आपके दाग कितने हट-छंट पाये हैं, पाठक ही बताएंगे!

जोशी साहब, आपने अपने इस व्यथा लेख में हंसुआ के बियाह में खुरपी का गीत कम नहीं गाया है। हालांकि यह अन्यथा नहीं है, बल्कि चोर की दाढ़ी में तिनका उग आने का निदर्शन है। अपनी नायाब सोच में अंटा कर आपने दलित-पिछड़ों-वाम आंदोलनों आदि से मीडिया के सरोकारहीन हो जाने को बाजारवाद और ब्राह्मणी पूंजीवाद के साथ साथ दलित-पिछड़ों की स्वार्थपरक राजनीति से मिसफिट कर दिया है। क्या प्रकारांतर से आप यह कहना चाहते हैं कि सवर्ण और दक्षिणपंथी आंदोलन आदि से मीडिया के सरोकार इसलिए हैं कि उनके राजनीतिक प्रतिनिधि, सवर्ण और दक्षिणपंथी, इन आंदोलनों का सिंचन करते रहे हैं तथापि ये धन व सत्तालोलुप नहीं हैं! इनकी ये कथित सफलताएं ही मीडिया के उपजीव्य हैं, न कि दलित-पिछड़ा-वाम राजनीति का क्षरण! भई, कायदे से तो कोई भी क्षरण – चाहे राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक हो, लोकसंवेदी मीडिया के लिए जायकेदार खुराक बननी चाहिए न, न कि निस्संगता-उपेक्षा के पात्र। आप दलित-पिछड़ा-वाम आंदोलन को गरिया कर और प्रमोद रंजनों को बच्चा ठहरा कर एवं अपनी लठजोर से काले धंधे के रक्षक साबित कर खुद पाक-दामन नहीं हो जाते। जैसे कि कोई सती समर्थक और बहुजन-वामविरोधी वाकपटु शख्स खुले मंच से अपनी करनी का व्यंग्यकारक स्वीकार कर अपने कुकर्मों-कुवचनों के कठघरे से बच नहीं निकल सकता। आपके ही शब्द विन्यास उधार लेकर कहूं – अपने मित्र धर्म की पोल खुलते देख खबरों के बेचने के काले धंधे में शामिल होने का सरासर झूठा तोहमत लगा उलटे कोतवाल को डांटने का ध्यान भटकाऊ कुचक्र रचते हो?

जहां तक आलोचना विवेक की बात है, अपनी पीठ आप थपथपा लेने से आप निर्मलकाय नहीं हो जाते। प्रधानमंत्रियों से अपनी दोस्ती का बड़प्पन झाड़ना और यह कहना कि उनके गलत किये का मैंने पूरा विरोध किया – पचने वाली बात नहीं। कोई हमें बताएगा कि अपनी औकात दिखाऊ आलोचना को अब तक बर्दाश्त कर मित्रधर्म निभाने के कोई उदाहरण हैं किसी के पास? ठकुरसुहाती भरी आलोचना के अपने गुड़ पर आप स्वयं मुग्ध हो लें तो कोई क्या करे? चुनाव एवं मंत्रिमंडल में सामाजिक हिस्सेदारी के बरखिलाफ रह आप किस नैतिकता से प्रधानमंत्रियों से मित्रता गांठ सकते हैं और किस मुंह से किन्हीं देवेंद्र द्विवेदी के राज्यपाल बनने के स्वागत को सेलिब्रेट करने की अगुआई में उतर सकते हैं? और अगर आप यह सब कर जैसी बहै बयार पीठ तब तैसी कीजै के अवसरवाद के यकीनी हैं तो फिर, आप यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते कि चुनाव लड़ने या कि मंत्रिमंडल बनाने का यह अवसर नहीं है कि प्रतिनिधित्व की बात की जाए। ऐसा कह कर आप लोकतंत्र को अस्वीकार कर अपनी सामंती सोच को ही सामने ला रहे होंगे! नहीं तो, क्या यह माना जाए कि एक प्रजातांत्रिक एवं संप्रभु राष्ट्र की शासन व्यवस्था में किसी को न्यूनतम मानवीय गरिमाजनक प्रतिनिधित्व देना गलत कृत्य है या फिर मीडिया की भूमिका उससे भी गुरुतर है, जहां जोशियों की प्रतिभा के बूते ही कार्य सध सकते हैं? नि:संदेह, मीडिया के सोच में पलते ऐसे आग्रही सामंती रचाव के संकेतकों को तोड़ना ही होगा।

जोशी साहब, प्रभात खबर के संपादक हरिवंश और पटनिया अखबारनवीस सुरेंद्र किशोर की आप लाख तरफदारी कर लें, सच्चाइयां बदल नहीं जातीं। हरिवंश जी के तमाम अखबारी काबिलियत के बावजूद प्रभात खबर का बिहार संस्करण क्यों हांफ-हांफ कर ही घुटनों के बल रेंग रहा है, वह भी सुशासनी नीतीश के विज्ञापन-कृपा के बलबूते? यह राज-फाश कौन करेगा कि बिहार सरकार का यह चारण अखबार अपने मोटो, अखबार नहीं आंदोलन भी की दंभपरक गर्वोक्ति से अचानक नीचे फिसल कर देश जागे बिहार आगे के दयार्द्र आशावाद पर क्यों उतर आया है? सुरेंद्र किशोर की प्रभाष जोशी अनुमोदित पुरा/पूर्व प्रतिभा का तो मेरे पास कोई हिसाब नहीं, पर इतना तो जरूर है कि उनकी अभी की दयनीयता बीते कामरेड जार्ज के वर्तमान स्खलित विचार-स्‍टैंड से भिन्न नहीं है। सुरेंद्र जी आजकल नीतीश सरकार के निर्लज्ज अभिनंदन में ही अपनी जोशी-शंसित विश्वसनीयता और प्रामाणिकता का सुविचारित निवेश करते दिख रहे हैं। उनको प्रदेश शासन में हरा ही हरा दिख रहा है।

जनसत्ता को ब्राह्मणवाद से बरी करने के लिए जोशी जी, आपने जो कहानी कही है, उसमें अखबार के एक कर्मी अच्छेलाल प्रजापति द्वारा जनसत्ता में ब्राह्मणवाद चलने की एक खबर आपको मनोरंजक भर लगती है, चिंताजनक नहीं, आखिर क्यों? चिंताजनक की जगह मनोरंजक लगना क्या आपके एक खास माइंड सेट को नहीं जताता? आपने साबित करने की कोशिश की है कि अखबार में ब्राह्मण बहुसंख्यक जरूर थे पर सबके सब सर्वथा योग्य। फिर, आपका दंभपरक दावा है कि जनसत्ता का पूरा स्टाफ संघ लोक सेवा आयोग से भी ज्यादा सख्त परीक्षा के बाद लिया गया, एक हास्यास्पद, ज्ञानस्खलित, लापरवाह एवं अति कथन है। आयोग की बहुस्तरीय सघन जांच प्रक्रिया की गुणवत्ता व विश्वसनीयता को भला किसी लफ्फाज का सर्टिफिकेट क्या चुनौती देगा? किसी चयन के लिए बाहरी एजेंसी से परीक्षा-साक्षात्कार लिया जाना पारदर्शिता का सर्टिफिकेट नहीं हो जाता। उनमें मित्र-धर्म की तमाम गोपन व्यवस्थाएं बड़ी चालाकी से योजित हो सकती हैं। पद-पुरस्कारों की बहुत सी सरकारी गैरसरकारी प्रक्रियाएं भी ऐसे ही पारदर्शी दिखती रही हैं पर आये दिन इनकी गड़बड़ियां सबूत सहित उजागर होती रही हैं। भारत भवन, साहित्य अकादेमी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय आदि के पद-पुरस्कारों में हुई अनियमितताओं के उदाहरण हमारे सामने हैं। यह कहना प्रौढ़ जोशी का बचकाना कृत्य ही कहा जाएगा कि इससे ज्यादा वस्तुपरक और तटस्थ कोई प्रक्रिया ही नहीं हो सकती थी। जिस चयन प्रक्रिया से एक ही जाति का प्रतिभा बाहुल्य कुकुरमुत्ते की तरह उग आये उसमें कहीं न कहीं खोट जरूर होगी। भई, सत्य हरिश्‍चंद्र जोशी जी, आप तो अपने ही तर्कजाल में फंस कर अपनी युद्धिष्ठरी उंगली गला जाते हैं, जब आप एक अंगना, अन्नू आनंद से कह डालते हैं कि आप जानती हैं कि एक्सप्रेस की महिलाएं भी मेरी रखी हुई हैं। और चंडीगढ़ एक्सप्रेस में तो आधी महिलाएं थीं। यहां काबिलेगौर है कि आपके निष्कलुष निष्पक्षता के खांचे में महिलाएं भी मेरी रखी हुई हो सकती हैं, भी यानी अन्य जगह की नियुक्तियों का खेल भी वस्तुत: आपके द्वारा ही रचा गया, चाहे आपने अपनी नाक सीधे न छूकर पारदर्शिता के गिर्द घुमाकर छूई हो! तो कहीं आपको खुद महिला को नौकरी पर रखने का एकाधिकार प्राप्त है तो कहीं आपके चयन की पारदर्शी शैली में आधी महिलाएं निकल आती हैं और कहीं एक जातिविशेष की प्रतिभा ही उफना जाती है! वाह री पवित्र चयन प्रक्रिया एवं निष्पक्ष चयनधर्मिता! फिर, प्रश्न यह भी शेष है कि यह कथित पारदर्शिता भी कितने मीडिया संस्थानों के यहां बरती जाती है?

प्रसंगवश, आउटलुक साप्ताहिक के एक विशेष अध्ययन का हवाला दूं कि किस तरह भारतीय क्रिकेट टीम में भी ब्राह्मणवाद और क्षेत्रवाद हावी है। बकौल, आउटलुक, स्वातंत्र्योत्तर भारत में 60 से लेकर कोई 80 प्रतिशत तक खिलाड़ी ब्राह्मण कुल से ही चयनित होते रहे हैं। दलित-पिछड़े तो इस चयन मोर्चे पर सदा फिसड्डी ही करार दिये गये। शूद्र विनोद कांबली का दास्ताने दर्द इस बेईमानी भरी साज़‍िश की ताजा-ताजा पोल खोलता है।

अंतिम बात, मीडिया जैसे महत्वपूर्ण जनमहत्व की लोकमत बनाने में महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकने वाली संस्था के लिए संघ लोक सेवा आयोग जैसी किसी विश्वस्त संस्था द्वारा ही नियोजन हो और उसमें समाज के सभी तबाकों-वर्गों की न्यायसंगत नुमाइंदगी सुनिश्चित हो। कई निजी इंजीनियरी व तकनीकी संस्थानों के लिए भी आईआईटी जैसी सरकारी पर विश्वसनीय संस्था की प्रवेश परीक्षा के जरिये ही चयन हो रहे हैं। जाति-धर्म व अन्य मानवसृजित ऊंच नीच की खाई को पाटने के लिए कमज़ोरों-प्रभावितों के हितों की रक्षा के लिए हर क्षेत्र में उनकी समुचित हिस्सेदारी दिलाना एक लोकतांत्रिक गणराज्य का आचरित पक्ष होना चाहिए। योग्यता और प्रतिभा की चालाक व विषयनिष्ठ धारणा को सहलाने के नाम पर सामाजिक न्याय की ज़रूरतों को हम नहीं झुठला सकते। ऐसा अस्वीकार दरअसल, प्रभु जातियों/वर्गों के परंपरा आयातित बरजोर प्रतिआरक्षण या कि अधिकार अतिक्रमण का ही पक्षपोषण करेगा।

जोशी जी, आप तो बेशक, परलोक विश्वासी होंगे! इस ना-आस्तिक मन बच्चे की भी एक विनती है आपसे। अबतक आपने न जाने क्या क्या धर्म निभाया, अपनी चला-चली की उम्र में अब भी तो लोकतंत्र के एक सजग नागरिक बतौर, सार्वजनीन मानव-धर्म के प्रति अपने विचार अनुराग मोड़िए, न सही प्रायश्चित रूप में, अपना परलोक बनाने के खयाल से ही सही!

(मुसाफिर बैठा उभरते हुए युवा आलोचक हैं। पटना में रहते हैं। पता है : द्वारा, बसंती निवास, प्रेम भवन के पीछे, दुर्गा आश्रम गली, शेखपुरा, पटना 14)

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