हम सब पत्रकार नहीं, कुछ और बनने आये थे!

♦ पूर्व आईआईएमसी छात्र

आईआईएमसी के साक्षात्कार में एक सवाल सभी से पूछा गया था कि पत्रकार क्यों बनना चाहते हो? पता नहीं कैसे आनंद प्रधान यह नहीं समझ पाये कि उनके पास आया एक भी बच्चा पत्रकार बनने नहीं आया था। कोई जनसंपर्क अधिकारी बनने की आस लिये इलाहाबाद से आया था, तो कोई सहरसा से राजनीति के गुर सीखने। कोई कोरबा से पैसे कमाने आया था, तो कोई दरभंगा से आईपीएस बनने। कोई वहां पत्रकार बनने के लिए नहीं आया था।

मैं भी अपवाद नहीं था। मेरे लिए भी पढ़ाई-लिखाई इस व्यवस्था में हिस्सेदारी लेने का एक जरिया थी। मैं भी गांव से लॉ फैकल्टी इसीलिए आया था और आईआईएमसी भी। जाति से मेटल जो हूं।

इसलिए मैं सौरभ द्विवेदी से कहना चाहूंगा कि कृपया यह न समझें कि यहां आकर्षण का केंद्र केवल दीपक चैरसिया या मनोरंजन भारती ही हैं।

बात सिर्फ भेल में कुछ लोगों के बैठने या नहीं बैठने की भी नहीं है। आज अगर आनंद प्रधान की साख पर सवाल उठाये जा रहे हैं तो मैं भी यह सोचने के लिए विवश हूं कि आखिर क्यों वह एक शिक्षक के रूप में असफल हो गये?

मैं उनकी क्लास का शायद इकलौता ऐसा स्टूडेंट था, जो उनसे सबसे ज़्यादा असहमत रहता था और आईआईएमसी में मैंने जो कुछ भी सीखा, वह उसी असहमति की वजह से सीखा। पर असहमत होने का साहस कितने लोगों में था? ऐसे कई मौके आये, जब मैंने उनसे कहा कि आप ग़लत हैं और खुद को सही साबित करके दिखाया। आज जो लोग उन पर कीचड़ उछालने के खेल में लगे हुए हैं, उन्हें खुद से यह पूछना चाहिए कि क्या आनंद प्रधान ने उन्हें वह स्पेस नहीं दिया था?

एक जुमला जो ईजे, आरटीवी और एडपीआर की आवारा नस्ल के लिए मैं अक्सर इस्तेमाल किया करता था “विक्टिम्स ऑफ कल्चरल डिसॉर्डर”, जाने कैसे मेरे साथियों को यह रोग लग गया! कॉन्वोकेशन तक मुझे एहसास नहीं हुआ कि मेरे साथी भी उसी सांस्कृतिक रूप से अष्टावक्र पीढ़ी का हिस्सा हैं जो अपने छात्र होने की मर्यादा भूल गये हैं।

दोष उनका नहीं है। आखिरकार क्लास में दो तरह के बच्चे जो थे। एक वह, जिनके भीतर एक गांव बसता था और जिन्हें अपने भदेसपन से लगाव था। दूसरे वह भी थे, जिन्होंने कोई गांव नहीं देखा था। ये और बात है कि सांस्कृतिक रूप से अष्टावक्र लोग इस भदेसपन को गंवारपन का नाम देते थे।

आईआईएमसी के नौ महीने के तजरबे से मुझे लगता है कि आनंद प्रधान गुरुकुल परंपरा की आखिरी कड़ी हैं। कुछ लोग भले ही मुझसे इत्तेफाक न रखें पर वो इसके लिए आज़ाद हैं। उम्मीद है कि कम से कम एचजे के मेरे साथी तो मुझसे सहमत होंगे।

नाम लेना कभी-कभी असंसदीय होता है, इसलिए अपने उस छत्तीसगढ़ी मित्र का नाम लिये बिना कह रहा हूं कि प्रतिभा दोधारी तलवार की तरह होती है। उसके कुछ ख़तरे होते हैं। अपनी ही धार से ज़ख़्मी होना बड़ा तकलीफदेह होता है दोस्त! तुम्हारी बातें सही होते हुए भी ग़लत मालूम दे रही हैं। क्यों कि तुम जाने अनजाने कीचड़ उछालने के इस खेल में शामिल हो गये हो।

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