अरविंद चतुर्वेद की कविता “प्‍यार” पहले छपी थी

अब हमारे लिए तय करना सचमुच मुश्किल है कि अरविंद चतुर्वेद की कविता प्‍यार और प्रदीप सौरभ की कविता उसने मुझसे कहा में से पहले कौन लिखी गयी। वैसे ये मामला हमारे तय करने का है भी नहीं। जैसे जैसे तथ्‍य सामने आ रहे हैं, वैसे वैसे उसकी व्‍याख्‍याएं बदल रही हैं। पहले नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक में छपी प्रदीप सौरभ की कविता को हमने अरविंद चतुर्वेद की कव‍िता की नकल कहा। लेकिन जब प्रदीप सौरभ ने हमें साप्‍ताहिक हिंदुस्‍तान की 88 की फाइल से अपनी उस कविता का पेज स्‍कैन करके हमें भेजा, तो हमें लगा कि नकल अरविंद चतुर्वेद ने की है। अब अरविंद चतुर्वेद ने अनल नाम की पत्रिका में मार्च 83 में छपी अपनी उस कविता की स्‍कैन कॉपी हमें भेजी है। यानी मामला जहां सीसे की तरह साफ़ होना था और उलझ गया है। इस बार इसे सुलझाने का ज़‍िम्‍मा एक बार फिर प्रदीप सौरभ के पाले में है।

arvind chaturved scan

बहरहाल, जब हमने पहली बार ये मसला उठाया, तो पूरे मामले के प्रति हम खुद ही खास संजीदा नहीं थे। यूं ही एक सूचना थी, जो हमने बस शेयर कर दिया था। लेकिन साहित्‍य में शब्‍द और भाव भूमि की चोरी से जुड़ी घटनाओं के बारे ईमेल आने शुरू हो गये हैं। एक ईमेल तो कवि-पत्रकार गीत चतुर्वेदी की भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार प्राप्‍त कविता मदर इंडिया को लेकर आया। कहा गया कि यह कविता विजय कुमार की वसुंधरा कविता की हूबहू ज़मीन है। यानी पूरी कविता का सेंस चुरा लिया गया है और पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ एक नयी कविता रच दी गयी है। ख़ैर, जिन्‍होंने हमें मेल किया था, उन्‍हें वापिस हमने ये जवाब भेजा कि ऐसा लगता नहीं है। लेकिन हमारी साहित्यिक समझदारी वैसे भी मोटी है – इसलिए हम दोनों कविताओं को अपने पाठकों के आमने सामने कर रहे हैं।

मदर इंडिया

(उन दो औरतों के लिए जिन्होंने कुछ दिनों तक शहर को डुबो दिया था)

गीत चतुर्वेदी

दरवाज़ा खोलते ही झुलस जाएं आप शर्म की गर्मास से
खड़े-खड़े ही गड़ जाएं महीतल, उससे भी नीचे रसातल तक
फोड़ लें अपनी आंखें निकाल फेंके उस नालायक़ दृष्टि को
जो बेहयाई के नक्‍की अंधकार में उलझ-उलझ जाती है
या चुपचाप भीतर से ले आयी जाए
कबाट के किसी कोने में फंसी इसी दिन का इंतज़ार करती
कोई पुरानी साबुत साड़ी जिसे भाभी बहन मां या पत्नी ने
पहनने से नकार दिया हो
और उन्हें दी जाए जो खड़ी हैं दरवाज़े पर
मांस का वीभत्स लोथड़ा सालिम बिना किसी वस्त्र के
अपनी निर्लज्जता में सकुचाईं
जिन्हें भाभी मां बहन या पत्नी मानने से नकार दिया गया हो
कौन हैं ये दो औरतें जो बग़ल में कोई पोटली दबा बहुधा निर्वस्त्र
भटकती हैं शहर की सड़क पर बाहोश
मुरदार मन से खींचती हैं हमारे समय का चीर
और पूरी जमात को शर्म की आंजुर में डुबो देती हैं
ये चलती हैं सड़क पर तो वे लड़के क्यों नहीं बजाते सीटी
जिनके लिए अभिनेत्रियों को यौवन गदराया है
महिलाएं क्यों ज़मीन फोड़ने लगती हैं
लगातार गालियां देते दुकानदार काउंटर के नीचे झुक कुछ ढूंढ़ने लगते हैं
और वह कौन होता है जो कलेजा ग़र्क़ कर देने वाले इस दलदल पर चल
फिर उन्हें ओढ़ा आता है कोई चादर परदा या दुपट्टे का टुकड़ा

ये पूरी तरह खुली हैं खुलेपन का स्‍वागत करते वक़्त में
ये उम्र में इतनी कम भी नहीं, इतनी ज़्यादा भी नहीं
ये कौन-सी महिलाएं हैं जिनके लिए गहना नहीं हया
ये हम कैसे दोगले हैं जो नहीं जुटा पाये इनके लिए तीन गज़ कपड़ा

ये पहनने को मांगती हैं पहना दो तो उतार फेंकती हैं
कैसा मूडी कि़स्म का है इनका मेटाफिजिक्‍स
इन्हें कोई वास्ता नहीं कपड़ों से
फिर क्यों अचानक किसी के दरवाज़े को कर देती हैं पानी-पानी

ये कहां खोल आती हैं अपनी अंगिया-चनिया
इन्हें कम पड़ता है जो मिलता है
जो मिलता है कम क्यों होता है
लाज का व्यवसाय है मन मैल का मंदिर
इन्हें सड़क पर चलने से रोक दिया जाए
नेहरू चौक पर खड़ा कर दाग़ दिया जाए
पुलिस में दे दें या चकले में पर शहर की सड़क को साफ़ किया जाए

ये स्त्रियां हैं हमारे अंदर की जिनके लिए जगह नहीं बची अंदर
ये इम्तिहान हैं हममें बची हुई शर्म का
ये मदर इंडिया हैं सही नाप लेने वाले दर्जी़ की तलाश में
कौन हैं ये
पता किया जाए

इसी कविता पर गीत को 2007 का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार मिला था।

वसुंधरा

विजय कुमार

दूर उपनगर के प्लेटफार्म नंबर तीन पर
एक नंगधड़ंग औरत खड़ी है
दिन दहाड़े
सरेआम
बेखबर
आसमान तकती

यह रेनुआं का कोई पुराना चित्र नहीं है

इस औरत को दो आदमी घूर रहे हैं
बीस आदमियों ने घूरा उसे
फिर तो दौ सौ आदमी घूरने लगे हैं

पगली है, पगली है
हंसे दो आदमी
बीस आदमी हंसे जोर से
अब तो दो सौ आदमियों की डरावनी हंसी है
प्लेटफार्म पर यहां से वहां तक

थोड़ी सी शर्म इस हंसी में
ढेर सारी मौकापरस्ती
और एक छापामार किस्म का सुख
बीसवीं सदी के अंतिम दशक का
पर हंसते हुए ये लोग पिछले जमाने के बर्बर लोग नहीं हैं
कि हंसे तो हंसते ही चले जाएं
ये हंसते हुए दो सौ आदमी
पल भर में गायब हो जाते हैं
सिर्फ एक गाड़ी के आते ही
दूर उपनगर के प्लेटफार्म नंबर तीन पर सुबह साढ़े नौ बजे खड़ी हुई
हे सृष्टि की सबसे अनमोल रचना
अब इस प्लेटफार्म पर सिर्फ तुम्हारा
निपट नंगापन बचा है
अगली गाड़ी के आने तक

तुम धरती की जिस खोह से निकल कर
हमारे इस संसार में अचानक चली आयी हो
अपनी उस खोह में लौट जाओ
अगले वक्त में हम
तुम्हारे लिए थोड़ा सा रेशम
थोड़े से फल
एक आईना
और कुछ स्मृति जुटा लेंगे

देखो हमें ध्यान से देख लो जरा
शायद हम इस संसार के अंतिम मनुष्य गिने जाएं।

यह कविता विजय कुमार के कविता संग्रह चाहे जिस शक्‍ल से में संकलित है। ये संग्रह 1995 में छपा।

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