इस ख़तरनाक समय में कमला प्रसाद का बयान
ज्ञानरंजन के इस्तीफे और अन्य विवादों को लेकर प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव का प्रो कमला प्रसाद का बयान
विगत कुछ दिनों प्रकाशित पत्रिकाओं-समाचार पत्रों के कुछ लेखों तथा हमारे सम्मानित लेखक ज्ञानरंजन की टिप्पणियों ने प्रलेस से संबंधित सांगठनिक स्तर पर कुछ सवाल पैदा किये हैं। प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरी जिम्मेदारी बनती है कि उठाए गए सवालों के बारे में वस्तुस्थिति स्पष्ट करूं। सवाल हैं कि प्रमोद वर्मा संस्थान द्वारा आयोजित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह’ में प्रलेस की भागीदारी क्यों हुई? प्रगतिशील वसुधा ने गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान से फोर्ड फाउंडेशन की राशि से प्रदत्त कबीर चेतना पुरस्कार चुपके-चुपके क्यों ले लिया?
पहले प्रमोद वर्मा स्मृ्ति समारोह के बारे में बातें करें। इस आयोजन में जलेस-प्रलेस और जसम के अलावा अन्य महत्वेपूर्ण लेखकों को आमंत्रित किया गया था। संस्थान की ओर से भेजे गए पहले निमंत्रण पत्र में वे नाम थे, जिन्हें आमंत्रण भेजा गया था। दूसरे और आखिरी निमंत्रण पत्र में वे नाम थे – जिन्होंने आने की स्वीकृति दी थी। पूछने पर ज्ञात हुआ कि जिनकी स्वीकृति नहीं मिली उन्हें छोड़ दिया गया। जहां तक प्रमोद वर्मा का सवाल है – वे मार्क्सवादी और मुक्तिबोध, परसाई के साथी थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मंडल में रहे हैं। छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि रही, इसलिए बहुत से लेखकों से उनके वैचारिक पारिवारिक रिश्ते थे। विश्वरंजन तब उसी क्षेत्र में पदस्थं होने के कारण प्रमोद जी की मित्र मंडली में थे। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान बना, तो उसमें रूचि से वे सहयोगी बने। छत्तीसगढ़ के अनेक लेखकों के साथ आजकल वे इसके अध्यक्ष हैं। निर्णय का अधिकार अकेले उन्हें ही नहीं है। पृष्ठभूमि के रूप में इसे जानना जरूरी है। इस कार्यक्रम की घोषणा हुई-तो मैंने छत्तीसगढ़ प्रलेस के साथियों से पूछा कि क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ के साथियों ने सलाह दी कि प्रमोद वर्मा पर कार्यक्रम प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान की ओर से है। सरकारी अनुदान नहीं है। इसलिए आना चाहिए। स्वीकृति देने वाले लेखकों में मैंने अनेक वैचारिक साथियों और संगठनों में शामिल लेखकों के नाम देखे तो जाना तय किया। समारोह में आने वालों में छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण लेखकों के अलावा प्रमुख – खगेंद्र ठाकुर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, शिवकुमार मिश्र, कृष्णमोहन, प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे नाम थे। कृष्ण मोहन और श्री भगवान सिंह को आलोचना पुरस्कारर भी दिया गया था। अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद वर्मा समग्र का प्रकाशन हुआ।
कार्यक्रम के उदघाटन समारोह में मुख्यमंत्री और कुछ नेताओं के आने तथा विवादास्पद वक्तव्य देने पर आए लेखकों में व्यांपक प्रतिक्रिया हुई, जिसका आक्रामक उत्तर लोगों ने अपने-अपने वक्तव्यों में दिया। पूरे आयोजन में प्रमोद वर्मा की विचारधारा ‘मार्क्सवाद बहस का आधार बनी रही। इसी दौरान कहीं से चर्चा में सुनाई पड़ा कि एक मित्र लेखक ने ‘पब्लिक एजेंडा’ में विश्वरंजन अर्थात डीजीपी छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम के समर्थन और नक्सवलपंथियों के विरोध में छपे इंटरव्यू को मुद्दा बना कर कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित किया है। उस समय तक लोगों ने ‘पब्लिक एजेण्डा’ का इंटरव्यू नहीं देखा था। इसके अलावा सीधे भाजपा शासित सरकारी कार्यक्रम न होने के कारण लोग आये थे। उन्हें पहले से पता था कि सलवा जुडुम भाजपा सरकार के एजेंडे में है। आमंत्रित लेखकों ने प्रमोद वर्मा स्मृति के पूरे आयोजन को लेकर कुछ आपत्तियां दर्ज करायीं। संस्थान के साथियों को परामर्श दिया गया कि इसे हमेशा सत्ता के प्रमाण से अलग रखा जाए।
छत्तीसगढ़ के जलेस-प्रलेस के साथियों तथा वामपंथी राजनीतिक दलों ने लगातार सलवा जुडुम के मसले पर सरकार का विरोध किया है। डॉ विनायक सेन की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई के लिए हुए आंदोलन में ये सभी लेखक शामिल रहे हैं। लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में यह प्रमुख मुद्दा था। याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं। मध्यप्रदेश में पिछले छह वर्षों में अल्पसंख्यकों पर सैंकड़ों अत्याचार और हत्याएं हुईं हैं। प्रलेस के लेखकों ने यहां लगातार सरकारी कार्यक्रमों का समय-समय पर विरोध और यथासमय बहिष्कार किया है। एक सूची प्रकाशित की जानी चाहिए कि मध्यप्रदेश में इन सारे प्रदेशों के सरकारी कार्यक्रमों में किनकी-किनकी कहां-कहां भागीदारी रही है। मैं नहीं मानता कि गैर सरकारी प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शामिल होने मात्र से लेखकों का हत्यारों के पक्ष में खड़ा होना कहा जाएगा?
साथियों की ओर से उठाया गया अन्य सवाल वसुधा के फोर्ड फाउंडेशन की राशि से कबीर चेतना पुरस्कार लेने का है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि संस्थान से स्पष्ट जानकारी के बाद कि यह पुरस्कांर राशि संस्थान की ओर से है फोर्ड फाउंडेशन की नहीं, संपादकों ने चुपके-चुपके नहीं एक समारोह में प्राप्त किया है। लोग जानते हैं कि गोविंद वल्लभ पंत सामजिक विज्ञान संस्थान इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का एक प्रभाग है। दलित संसाधन केंद्र उसकी एक ईकाई है। दलित संसाधन केंद्र की ओर से विगत कई वर्षों से दलितों की स्थितियों पर अध्ययन होता रहा है। संस्थान ने दलितों के बारे में दस्तावेजीकरण के अलावा-इलाहाबाद तथा भोपाल जैसे अन्य शहरों में केंद्र की संगोष्ठियां हुईं हैं। मुझे याद नहीं पड़ता कि हिंदी का कौन-सा महत्व्पूर्ण लेखक है, जो इन कार्यक्रमों में नहीं गया और मानदेय स्वीकार नहीं किया। जहां तक कबीर चेतना पुरस्कार की बात है – पहले हंस और तद्भव ने ये पुरस्कार लिये हैं। इनके संपादक भी संगठनों के हिस्सा हैं। प्रगतिशील वसुधा लगातार दलित साहित्य प्रकाशित करती रही है। एक विशेषांक भी प्रकाशित हुआ था इसलिए निर्णायकों ने इस पत्रिका की पात्रता तय की है। प्रलेस से सीधी जुड़ी होने के कारण प्रगतिशील वसुधा का ऑडिटेड आय-व्यय खुले पन्नों में है। कभी भी देखा जा सकता है।
दोनों सवालों का तथ्यात्मक ब्यौरा पेश करने के बाद मेरा कहना है कि आज की परिस्थितियों में जिस तरह सांप्रदायिक शक्तियों का जाल देश में फैल रहा है, समूची मानवीय संस्कृति का बाजारीकरण हो रहा है, मूल्यों को तहस-नहस करने की साजिश है, उस समय अपने-अपने संगठन को अधिक क्रांतिकारी अथवा व्यक्तिगत रूप से स्वयं को अतिशुद्ध सिद्ध करने की कोशिश सांस्कृतिक आंदोलन की एकजुटता खंडित करेगी। मर्यादाएं टूटने के बाद आंदोलन छूट जाएगा और लोग व्याक्तिगत हमलों पर उतर आएंगे। माना कि अब लेखकों के संगठन प्रेमचंदकालीन नहीं हैं, हो भी नहीं सकते। पर आज की परिस्थितियों में जो संभव है – हो रहा है। जरूरत पड़ने पर इनका जुझारू रूप देखा जा सकता है। इनके बिना सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों पर आवश्यक सामूहिक पहल की कल्पना असंभव होगी। विरोधी शक्तियां इन्हें तोड़ना चाहती हैं। कदाचित इनके विघटन की प्रक्रिया शुरू हो गयी, तो वह दिन खतरनाक होगा।









अच्छा लगा कि यहां आकर आपने स्पष्टीकरण दिया।
पर ये सवाल जितने महत्वपूर्ण है उनका जवाब इतना सरलीकृत जवाब नहीं हो सकता। ग्वालियर विमोचन कार्यक्रम अब भी एक सवाल है लेकिन उस पर यहां खुले में कोई विवाद खडा करने का मेरा इरादा नहीं है…पर यही मैं नामवर जी के जसवंत सिंह और फिर सुमित्रा महाजन के साथ मंच शेयर करने को लेके नहीं कह सकता। और अशोक चक्रधर के साथ सारे वाम लेखकों के बहिष्कार के बावज़ूद उनके उपस्थित होने को लेकर भी नहीं। वह कौन सी टैक्टिकल या प्रैक्टिकल वज़ूहात हैं जो हमारे बडों को बार-बार खींच कर सत्ता प्रतिष्ठानों के करीब ले जा रही हैं? इसके पहले परमानंद जी भी उदयप्रकाश के कुख़्यात सम्मान समारोह में उपस्थित थे। मेरी जानकारी के मुताबिक वह प्रलेस में हैं। क्यों इनसे कोई सवाल नहीं पूछा गया? क्या वे संगठनों से ऊपर जा चुके हैं?
क्या संगठन में पुरस्कारों, सम्मानो को लेकर कोई गाईडलाईन नहीं बननी चाहिये?
यह सच है कि कोई ख़ुद को ज़्यादा सफ़ेद साबित करके कुछ महत्वपूर्ण नहीं कर रहा है। पर यह भी सच है कि संगठन में कहीं कुछ भारी गडबड है जिसने लोगों को ऐसा करने का मौका दिया है। हम इन्डिविज़ुएल इकाई हैं बस जिन्हें अब विचार से अधिक स्वार्थ, मज़बूरियां या व्यक्तिगत दोस्तियां जोडती हैं। पुरस्कारों और सम्मानों ने लोगों को मज़बूत करने की जगह धीरे-धीरे नष्ट किया है। साहित्य समाज में अपने लिये एक बेहतर पोजीशन बनाने का साधन बन गया है। सम्मानों की सूचनायें और साथ मे लगे फोटो हमें शहर के संभ्रान्त तबके में प्रवेश का पास देते हैं और प्रतिरोध धीरे-धीरे मरता जाता है।
आप उन लोगों में से हैं जिन्होंने इस संगठन को बनाया और चलाया है तो इस श्रेय के साथ इस स्थिति की ज़िम्मेदारी का भी बडा हिस्सा आपका है। आज अगर हमे सच में समाज को प्रभावित करना तथा उन हालात से लडना है जिसका ज़िक्र आपने किया है… तो एक बार फिर इसे ऊपर से नीचे तक फिर से संयोजित तथा संशोधित करना होगा। वरना जिस ढलवें संतुलन पर हम खडे हैं पतन की न जाने किन गर्तों तक पहुंचेंगे। और इसके ज़िम्मेदार हम सब होंगे।
com. aapako nahin lagata ki aapake lidar ka jo bayan upar chhapa hai vah sire se jhooth hai. aur beshrmi se paga. aap pwa me hain, satyanarayan patel aapake mitr bhi hain, unhone sangathan ke bhitar hi bat karane ki koshish ki thi, lekin unake saath kya huaa kya aap nahin janate, kisi se bhi behatar aap janate honge.lekin aapake swar me se bhi jo gandh aa rahi hai, vah kya marxwadi chetana se prerit hai?
यह सब तो ठीक है पर ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने उदयप्रकाश के खिलाफ तीन महीने आंदोलन चलाया और प्रभाषजोशी पर तीन लाइन की टिप्पणी डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। अब वही नामवर के खिलाफ उछल रहे हैं। उनकी मंशा भी समझ लीजिए।
ये अशोक पाण्डे वही है जो ‘विकीपीडिया’ देख कर ‘मार्क्सवादी’ होने की ताल ठोंकते हैं. फ़ायरबाख को फ़ोरवाक और एन्गेल्स को एन्जिल कहते हैं. ये कट्टर जातिवादी लुंपेन हैं. उदय प्रकाश के पारिवारिक शोकसभा पर घटिया राजनीतिक दुष्प्रचार करने वाले गिरोह के भाड़े के सदस्य. तीन महीने तक समवेत रूप से एक लेखक के चरित्र हनन का घट्कर्म करने वाले मंगलेश डबराल, अजय तिवारी, वीरेन डंगवाल,रामशरण जोशी, मैनेजर पांडे वगैरह तमाम बाम्हनों के पतन, कुकर्म, सत्ता के और कार्पोरेट घरानों के साथ नाभिनाल संबंध पर ्बिल्कुल खामोश हैं. ग्वालियर में इन्हें सब चिरकुट दलाल के रूप में जानते हैं. इसकी कुल पहचान दूसरों (गैर-ब्राह्मण पर) पर कीचड़ उछालना बार-बार झूठ बोलना है. इस पूरे अभियान के पीछे कौन है, इसे जानना बिल्कुल आसान है.
नीरज पास्वान तुम कौन हो मुझे पता नहीं
तुम्हारे जैसों को जवाब देने की मुझे ज़रूरत नहीं
मैने कब फ़ायरबाख को फ़ोरवाक और एन्गेल्स को एन्जिल कहा है बताना
तुम उदय के भाडे के दलाल हो और घटिया इन्सान
ग्वालियर के जिस की भी हिम्मत हो यहां आकर बोले
तुम्हारे पारिवारिक सदस्य आदित्यनाथ के अलावा कौन कौन है बताना
जिसे मेरा नाम तक ढंग से पता नहीं वह मेरे बारे में बोल रहा है
यह भी बताना कि इस चिरकुट दलाली से मुझे कौन-कौन से पद और पुरस्कार मिले हैं।
हां विकिपिडिया से मार्क्सवादी होना भी सिद्ध करो उस आदमी का जिसके 40 से अधिक लेख पिछ्ले तीन साल से समयान्तर, फ़िलहाल से लेकर हर जगह छप चुके हैं। जातिवादी मुझे कह रहे हो जिसने दस साल पहले अन्तर्जातीय विवाह किया था और पारिवारिक संबंध निभाने वाले कुण्वर उदय प्रकाश महान
आज़ाद साहब मुझे आपके कहे से ज़्यादा एतराज़ नहीं है…मै ख़ुद इन सब चीज़ों से त्रस्त हूं। पर मै यह चाहता हूं कि कुछ टूटे तो अगला इससे बेहतर बने।
और सब पर चुप रहने वाले बेनामियों के लिये मैं पहले भी लिख चुका हूं देखिये
मुझे बुजदिलों के प्रतिनिधि के रूप में किसी बेनामी टिप्पणी का इंतज़ार था भी।
ना तो मै उस प्रकरण पर चुप था ( देखिये एक जिद्दी धुन पर मेरी प्रतिक्रिया) ना मेरा ‘ रीछ का बच्चा’ है। वह अशोक पाण्डे कबाडखाना ब्लाग के स्वामी हैं और नैनीताल के हैं। मै ग्वालियर मे रहता हूं नाम में भी फ़र्क है।
आप की प्रजाति सारे बडों की चरण वन्दना में शामिल रहती है और उस पर हमला होने पर भों भों करती है और बदले में उच्छिष्ट खाकर डकारते हैं। आप जैसे श्वान मनुष्यों ने ही साहित्य को ऐसा गंदा स्थान बना दिया है। उसके प्रतिनिधि के रूप में मैने आपकी भों भों लगा दी पर अब किसी बेनामी टिप्पणी को नहीं लगाऊंगा। कम से कम नाम और मेल आई डी होने पर ही प्रतिक्रिया प्रकाशित होगी।
मुझे बुजदिलों के प्रतिनिधि के रूप में किसी बेनामी टिप्पणी का इंतज़ार था भी।
ना तो मै उस प्रकरण पर चुप था ( देखिये एक जिद्दी धुन पर मेरी प्रतिक्रिया) ना मेरा ‘ रीछ का बच्चा’ है। वह अशोक पाण्डे कबाडखाना ब्लाग के स्वामी हैं और नैनीताल के हैं। मै ग्वालियर मे रहता हूं नाम में भी फ़र्क है।
आप की प्रजाति सारे बडों की चरण वन्दना में शामिल रहती है और उस पर हमला होने पर भों भों करती है और बदले में उच्छिष्ट खाकर डकारते हैं। आप जैसे श्वान मनुष्यों ने ही साहित्य को ऐसा गंदा स्थान बना दिया है। उसके प्रतिनिधि के रूप में मैने आपकी भों भों लगा दी पर अब किसी बेनामी टिप्पणी को नहीं लगाऊंगा। कम से कम नाम और मेल आई डी होने पर ही प्रतिक्रिया प्रकाशित होगी।
सर्वप्रथम कमला प्रसाद जी के स्पष्टीकरण के बारे में चंद बातें…!
नवसाम्राज्यवादी सत्ता के गुंडागर्द सिपाही अमरीका के विश्वसनीय चाटुकार भारत के दलाल शासक वर्ग की ख़ूनी और ख़तरनाक परियोजना के भयावह असर को महसूस करने वाली छत्तीसगढ़ की युद्धरत धरती पर हिंदी के मूर्धन्य, अधिकतर ’मार्क्सवादी’ साहित्यकारों के विचरण के बारे में आपका स्पष्टीकरण, महानुभाव कमला प्रसाद जी, राष्ट्रीय महसचिव, प्रलेस, बेहद भोथरा है। इस बहाने आपने येन केन प्रकारेण जो स्थापित करने की कोशिश की है कि “प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान” द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जाना उनकी स्मृतियों का सम्मान करना ही है। इसमें अगर पूरे आयोजन में आपको ख़ूंखार सत्ता प्रतिष्ठानों द्वारा अपने मुखौटों को गढ़ने की सुनियोजित सांस्कृतिक राजनीति तथा हमारे कई सम्मानित (भूतपूर्व, अब नहीं) हिंदी लेखकों का घोर पतन नहीं दिखाई दे रहा है तो अब यह घोषणा सार्वजनिक कर देनी चाहिए कि हमारी भाषा के लेखक और नैतिकता के बीच संबंध शेष नहीं हैं।
अब बात आती है, भाजपा नीति सरकार द्वारा (अ)प्रायोजित कार्यक्रम में शिरकत, डीजीपी विश्वरंजन की भूमिका तथा कार्यक्रम के दौरान पूर्वघोषणा के बग़ैर ही मुख्यमंत्री महोदय की उपस्थिति तथा उनके द्वारा लेखकों को भाषण पिलाने के बाद प्रतिबाद तथा सल्वाजुडुम मे विरोध के बारे में….।
उसके पहले एक बात कहनी बहुत बहुत ज़रूरी लग रही है; जब मैं यह विश्लेषण लिख रहा हूं, जब शायद आप इसे पढ़ रहे होंगे या जब कभी भी हम इन सवालों पर बहस कर रहे होंगे तब उस हर वक़्त में, छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश के किसी भी हिस्से में विनाशकारी “विकास” का प्रतिरोध कर शोषणमुक्त समाज का सपना देखने वालों को ’नक्सलपंथी’ या ’माओवादी’ का चस्पा लगाया जा रहा होगा। इस आधार पर लोगों के व्यापक नरसंहार की रणनीति के क्रियान्वयन के लिए हमारे देश के नौकरशाह, राजनेता, सैन्य विशेषज्ञ, अमरीकी युद्ध रणनीतिकारों के साथ मिलकर पहले ही योजना बना चुके हैं।
अपने नहीं सुना, संप्रग-१ के वित्त मंत्री और आज के गृहमंत्री पी चिदंबरम को? देश की खस्ताहाल हो चुकी अर्थव्यवस्था में कभी “नई जान” फूंकने का दावा करने वाले अर्थशास्त्री और अपनी दूसरी पारी खेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को? नव उदारवाद के ये अभिजात्य चेहरे भाजपा सरकार से संबद्ध नहीं हैं लेकिन इनमें और फ़ासीवादी विचारधारा के खूंखार नुमाइंदों मसलन नरेन्द्र मोदियों, शिवराज सिंह चौहानों और रमन सिंहों में क्या फ़र्क़ है? आपने कहा है कि ’याद रखना होगा कि अपनी-अपनी तरह से हत्यारी नीतियां छत्तीसगढ़ की ही नहीं अन्य भाजपा शासित राज्यों की भी हैं।’ क्या आपको नहीं लगता है कि एक ज़िम्मेदार लेखक और और सबसे बढ़कर एक हस्तक्षेपधर्मी नागरिक की हैसियत से आप भारतीय राज्य सत्ता के बर्बर चरित्र के बारे में बेहद बौना और रत्ती भर का आकलन कर रहे हैं? यह लेखकीय पतन नहीं तो और क्या है?
जिस डीजीपी विश्वरंजन की आप बात कर रहे हैं उन्होंने सल्वा जुडुम के विरोधियों को नेस्तनाबूद करने के लिए एक नियोजित मनोवैज्ञानिक युद्ध की रणनीति के तहत लगभग एक साल पहले क्रांतिकारी मज़दूर नेता शहीद शंकर गुहा नियोगी को छत्तीसगढ़ का पहला ’नक्सली’ कहा था। उसके बाद का प्रसंग आप विश्वरंजन से ख़ुद पूछ सकते हैं। डीजीपी विश्वरंजन अपनी कवि प्रतिमा को आगे रखकर छत्तीसगढ़ सरकार की दमनकारी नीतियों के बारे में जो बड़बोला कुप्रचार कर रहे हैं वह किस लेखकीय ईमानदारी से उपजा है? आप उनसे ‘प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ का अध्यक्ष होने के नाते पूछ सकते हैं। क्योंकि छत्तीसगढ़ की ही एक घटना का ज़िक्र करना यहां ज़रूरी लग रहा है कि छत्तीसगढ़ इप्टा ने पिछले साल अपने एक कार्यक्रम में उन्हें मुख्य अतिथि बनाया था। और अभी तक़रीबन एक हफ़्ते पहले की घटना के बारे में बस्तर में सीपीआई के साथियों से ज़रूर तहक़ीक़ात करिएगा कि बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा ज़िले में ’नक्सली’ होने के आरोप में जिन सात लोगों को मारा गया है वे कौन लोग थे? आप आदिवासी महासभा (सीपीआई से जुड़े आदिवासी संगठन) के सरगुजा के नेता इंद्रदेव नाग से पूछ सकते हैं कि दो साल पहले पुलिस द्वारा जब उनकी भयंकर पिटाई करते हुए जान से मारने की धमकी दी गई थी तो छत्तीसगढ़ के किस लेखक ने उसका विरोध किया था?
मैं ऐसे कई मामलों को गिना कर आपसे यह नहीं कहना चाहता हूं कि इन सारे मामलों की जानकारी आप जैसे लेखकों को होनी ही चाहिए। लेकिन यह ज़रूर कहूंगा कि रायपुर में ’प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ के आयोजन से लौटकर नौकरशाह कवि श्री अशोक वाजपाई ने इस कार्यक्रम के बारे में जनसत्ता के अपने साप्ताहिक स्तंभ में यह लिखा कि “छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों का नहीं, नक्सलियों का नरसंहार” कर रही है तब भी क्या आप इस कार्यक्रम के गुप्त एजेंडे के बारे में विभ्रम में थे?
उपरोक्त तथ्यों और इन तथ्यों के प्रति हिंदी के व्यापक लेखक समुदाय अनभिज्ञता या न जानने की सचेत इच्छा को आप पतन के अलावा और क्या कहेंगे? यह किसी एक लेखक समुदाय के सांगठनिक ढांचे के भीतर, मात्र आंतरिक उथल पुथल का ही मामला नहीं है बल्कि हिंदी लेखकों के रचनात्मक सरोकार की संकीर्णता का मामला है। आप एक महत्त्वपूर्ण पत्रिका निकालते हैं। हिंदी के लगभग सभी लेखक उसको पढ़ते होंगे। हिंदी की संपूर्ण रचनाशीलता के सरोकारों को पुनर्पारिभाषित करने तथा उनके बीच आपस में एक न्यूनतम संस्कृतिक हस्तक्षेप की ज़िम्मेदारी क्या आप उठा सकते है? हिंदी में जितनी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाएं निकल रही हैं उनकी मुख्य धारा कम से कम प्रगतिशील तथा मार्क्सवादी तो है ही और उनके पाठक वर्ग भी बहुलता में आपको प्रगतिशील ही मिलेंगे लेकिन क्या लेखकों ने अपने रचनाकर्म में मार्क्सवादी संस्कृति के बुनियादी तत्त्वों को आत्मसात किया है? आप इन गंभीर सवालों के जवाब आज के प्रचलित नेताओं जैसे चलताऊ तरीक़ों तथा पर्स्पर विरोधी बातें कहकर नहीं दे सकते। आपने देखा ही होगा कि वाणी प्रकाशन की “वाक” नामक पत्रिका में लेखक संगठनों के आस्तित्त्व और उनकी कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं उस आलोचना का कोई तर्कसंगत जवाब आज तक नहीं दिया गया है।
आप ज़रा ठहर कर क्या इस बारे में सोचेंगे कि मुक्तिकामी युगकवि मुक्तिबोध और बातों-बातों में अपने व्यंग्य से सत्ता की नस नस उधेड़ने और हिंदी भाषा को एक प्रगतिशील संस्कार देने वाले परसाई तथा उनके आत्मीय मित्र और ख़ुद एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी लेखक प्रमोद वर्मा इन स्थितियों की व्याख्या किस तरह से करते?
और अंत में कि गोवंद वल्लभ पंत इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से इसी साल संबद्ध हुआ है इसके पहले वह फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन तथा ऑक्सफ़ेम जैसी बहुराष्ट्रीय फ़ंडिंग एजेंसियों पर ही पलता था। इस बारे में आप पूरा ब्यौरा संस्थान का इतिहास जानकर हासिल कर सकते हैं।
मैं कोई ‘एनानिमस’ नहीं, एक जीता-जागता नौजवान हूं। ग्वालियर के केशव कुशवाहा से पूछना, जिसके भतीजे ने दलाल बम्हनों के माई-बाप कुंवर अर्जुन सिंह की चुनाव में जमानत जप्त कराई थी। वही कुंवर अर्जुन सिंह, जिनकी जीवनी आपकी ‘ब्रह्म-संवादी’ जात के रामशरण जोशी ने लिखी है, जिनके तलवे उनका सलाहकार बनकर तुम्हारी जात के डबराल चाटते रहे हैं। जिस ‘समयांतर’ का तुमने जिक्र किया है, उसके संपादक कुंवर प्रताप सिंह (पंकज बिष्ट) को कुंवर अर्जुन सिंह के चाटुकार रामशरण जोशी ने एक लाख का ‘ईनाम’ दिया था। आप लोग साफ़ करिये कि यह सच है कि नहीं ‘समयांतर’ के संपादक कुंवर प्रताप सिंह (पंकज बिष्ट) और बिहार के माफ़िया कहे जाने वाले की पत्रिका ‘पब्लिक एजेंडा’ के संपादक डबराल, दोनों उत्तराखंड के संघी चीफ़ मिनिस्टर रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के ‘स्टेट गेस्ट’ अभी कुछ दिनों पहले रह चुके हैं या नही?
सुनिये बम्हन, आपने मेरी जाति को गाली दी है. अपने शब्द देखिये. यही आपके दिमाग को दुनिया के सामने ज़ाहिर करने के लिए काफ़ी है :
”आप की प्रजाति सारे बडों की चरण वन्दना में शामिल रहती है और उस पर हमला होने पर भों भों करती है और बदले में उच्छिष्ट खाकर डकारते हैं। आप जैसे श्वान मनुष्यों ने ही साहित्य को ऐसा गंदा स्थान बना दिया है।”
मैं इसे सभी निचली जातियों, दलित और असवर्ण जातियों का अपमान मानता हूं और इसकी घोर भर्त्सना करता हूं।
सुनो …
जब साहित्य की समझ ना हो तो बहस में नही उतरना चाहिये
मैने बात बेनामियों की की थी और श्वान मनुष्य वे प्रतिभाहीन चिरकुट दलाल (शब्द आपके) जो अपने बडे साहित्यिक माई बापों के तलुए चाटते हैं और उच्छिष्ट यानि कि इस तलुए चाटने के बदले में मिलने वाले इनाम इक़राम!। आज दलित बडों की चरण वन्दना नहीं कर रहा वह सीधे संघर्ष में है। मैने गाली चमचों की जात को दी है…तुम्हें लगी तो मुझे कोई दिक्कत नहीं
तुमने मुझे दलाल कहा था … उसी अपने रिश्तेदार ( मेरे पास रिफ़रेंस देने के लिये इतने शक्तिशाली रिश्तेदार नहीं हैं) से पूछना कि मेरा संगठन युवा संवाद कैसे चलता है और क्या करता है। वह तुम्हें बतायेंगे कि यह न तो एन जी ओ है ना किसी से चंदा लेता है बल्कि 200-500 रुपयों में कार्यक्रम करता है और भगत सिंह तथा अंबेडकर के ऊपर पांच-पांच रूपये की पुस्तिकायें।
तुम अपने हिसाब से तर्क गढते हो मै नहीं। पंकज बिष्ट ने तो जोशी से पुरस्कार लिया पर उदय जी ने जो पुरस्कार लिया आई ए एस और बाभन कुलभूषण अशोक बाजपेयी से उसे भूल गये? तुम्हारे आराध्य सहित किसने नहीं लिखा है समयांतर में? हां मूर्खों और अनपढों की बात मैं नहीं करता।और फ़िलहाल तथा इतिहासबोध के बारे में क्या कहते हो? अब तुम्हारा फ़ायरबाख वाला तर्क कहां गया? दिखाओ ना क्षत्रिय कुलभूषण महाविद्वान के शिष्य कि कहां इस विकिपीडिया के नकलची ने लिखा है यह सब? कहीं मेरी किताब छपने से पहले तो नहीं पढ ली तुम्हारे अन्तर्यामी प्रभु ने? बताओ न दलाली के बदले कौन सा ईनाम मिला है मुझे? किसने कितना दिया है?
मैं नहीं जानता कि पंकज गेस्ट रहे कि नहीं तुम इसे साफ़ करो मै फिर बात करुंगा?
तुम जैसे लोग जो हमेशा चुप रहते हो मेरा हिसाब मांग रहे हो? किस हक़ से? जब से मै सक्रिय हूं तबसे जो ग़लत लगता है उसका विरोध करता हूं उसके लिये किसी महापरभु की परमिशन नहीं लेनी पडती।
हां अविनाश महोदय अब मैं इस बहस में नहीं हिस्सा लूंगा। इस कुत्ताघसीटी में अब मेरी कोई रुचि नहीं परसों भगत सिंह का जन्मदिन है। युवा संवाद इसे युवा दिवस के रूप में मनाता है तो बस अब उसकी तैयारी में लगना है। हां हस्तक्षेप जी ने जो कहा है उससे मेरी पूरी सहमति है।
सुधार
वह तुम्हें बतायेंगे कि यह न तो एन जी ओ है ना किसी से चंदा लेता है बल्कि 200-500 रुपयों में कार्यक्रम करता है और भगत सिंह तथा अंबेडकर के ऊपर पांच-पांच रूपये की पुस्तिकायें छाप कर युवाओं और अन्य लोगों के बीच बांटता है।
ये बेशर्म लोग हैं। इनकी ढिठाई देखते ही बनती है।
अमेरिका तक ने एक वंचित को अपना राष्ट्रपति चुना।
सोनिया और मनमोहन ने सिखों से माफी मांग ली।
नमाज़ी मुसलमानों ने इस्लामी आतंकवादियों के खिलाफ प्रदर्शन किए।
लेकिन ये ज़ालिम आज भी आरक्षण का विरोध करते हैं। बैशर्मी देखो कि ऐसे संगठन का नाम रखते हैं ‘यूथ फज्ञर इक्वैलिटी’ ! हज़ार साल का बूढ़ा षड्यंत्र इन्हें यूथ लगता है। भूखे को हज़ार साल बाद मिली रोटी भी उससे छीन लेना इन्हें इक्वैलिटी लगती है।
नीच विचारों के बल पर हर तरह की सत्ता हथियाना इन्हें उच्चता लगती है।
नीच वह होता है जिसके विचार नीच हों।
prabhash joshi ka nam jo aa gaya. jhuthe ko bhagna to tha hi.
जहां तक ‘फ़ोरवाक’ का सवाल है, वह अभी तक आपके आर्काइव में पड़ा होगा। खंगाल लीजिये।
हां, मैं उदय प्रकाश का फ़ैन हूं। वैसा दलाल नहीं, जैसा तुम्हारी जात के ‘वामपंथी’ अर्जुन सिंह, सुब्रत राय, सुदीप बनर्जी, रमेश पोखरियाल, केशरीनाथ त्रिपाठी, पंकज राग, मुरली मनोहर जोशी, कल्यान चक्रवर्ती,वी.एन.राय., दिनेश जुगरान, बेहार , रामनाथ गोयनका, आलोक जैन…(लिस्ट लंबी है)के रहे हैं। और जहां तक ‘भगत सिंह’ का सवाल है, तो सच्चाई यह कि विश्व मानवाधिकार संगठन (W.H.O.)की काली सूची में दर्ज़ ‘भारतीय पुलिस’ के आला भ्रष्ट दो-तीन अफ़सरों की अगुआई में ही यह ‘भगत सिंह’ का खेल चल रहा है। इसे कौन नहीं जानता? वी.के.राय और चमन लाल क्या पुलिस अफ़सर और पुलिस के एजेंट नहीं हैं? क्या वर्धा वि.वि. से लेकर साहित्य अकादमी आज इन्हीं ‘पुलिस वाले बम्हनों’ की ज़ेब में नहीं है?
सच यह है कि आप बमहनों ने इस देश के सारे मुस्तकबिल (भविष्य) को खत्म कर डाला है। मायावती भले ही अपने बम्हन चापलूसों को ‘सैनिटरी पेपर’ की तरह इस्तेमाल करे, आप बम्हन जब अकेले बैठते हो तो रस ले ले के अपनी नफ़रत उगलते हो (मैंने अपने कानों से सुना है) : ‘हाथी नहीं हथिनिया है, मिश्रा जी की बम्हनिया है!”
न तुम लोग कवि हो, न कथाकार, न आधुनिक आदमी।
रही मेरी बात तो पांडे जी, मैं आपके घर के सामने पहुंच रहा हूं, तारीख बता दूंगा। जैसे तुम्हारे माई-बाप कुंवर अर्जुन सिंह की खाट खडी की, तुम्हारी भी हम करेंगे..।
जै भीम !
भैया अक्ल के साथ आंख से भी हांथ धो बैठे का?
हमारा संगठन है युवा संवाद न कि यूथ फ़ोर इक्वेलिटी
हम आरक्षण पर खुली बहस करा कर शहर के बडे बडों के बीच समर्थन कर चुके हैं
मेरे व्यक्तिगत लेखों में इसे पढने की तुम्हारी योग्यता है नहीं वरना कहता पत्रिकाओं में पढ लो!
हमारा संगठन इस समय सुभाष गाताडे की अंबेडकर पर लिखी पुस्तिका बांट रहा है। सुभाष आरक्षण के विरोधी हैं या नहीं यह जानने के लिये भी तुम्हें पढना पडेगा… बडी मुश्किल है यार अब तुम पूंछ से ज़्यादा कुछ पढ भी तो नहीं सकते ना।
बेशर्म और जलील वे लोग हैं जो नाम और ट्रैक बदल बदल कर एक व्यक्ति पर बिना उसके बारे में जाने हवाई हमले करते हैं। अपना चेहरा पर्दे में रख बाकी सब नंगा करके घूमते हुए सबकी शुचिता पर सवाल खडा करते हैं।
मै जो हूं जैसा हूं मुझे जानने वाले ख़ूब जानते हैं — जिसके पास मेरे पतन, मेरे समझौते या मेरे द्वारा उठाये गये किसी लाभ के बारे में कोई तथ्य है वह सामने आये उनके साथ!!!
जब चाहे आ जाना
आर्काइव तुम खंगालो आरोप तुमने लगाया था
हां इस बात से सहमत हूं कि
बमहनों ने इस देश के सारे मुस्तकबिल (भविष्य) को खत्म कर डाला है।
अब जिसे भगत सिंह पर युवाओं का विचार विमर्श करना भी ख़लता है उसके दिमागी ख़लल पर शक़ करना बेकार है। भगत सिंह पर जो कथित खेल चल रहा है वो आज क्यूं याद आया? अब तक चुप क्यों थे? व्वैसे तुम भगत सिंह पर भी अंग्रेज़ों के एज़ेंट होने का आरोप लगाओगे तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी?
मेरी जात मेरे जन्म से नहीं मेरे काम से तय होती है और उसके लिये मुझे तुमसे सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिये। मेरे कवि होने की चिंता भी आप ना करें वैसे आर्काइव खंगालें तो आप जिनके फ़ैन हैं उनके सर्टिफ़िकेट दिख जायेंगे।
हां आर्काईव की बात चली तो कभी समयांतर का खंगालना अर्जुन सिंह मार्का सांप्रदायिकता विरोध की धज्जियां उडा चुका हूं और उसके लिए उनसे सहायता लेने वाले लेखकों और लेखक संगठनों की भी।
तुम्हारी दिक़्क़त है कि तुमने अपने मन में एक फ़्रेम तैयार कर रखा है और उसीमें सबको कसने की कोशिश कर रहे हो… मुझे नहीं कर पाओगे। मेरे 35 सालों की ज़िंदगी में एक धब्बा नहीं खोज पाओगे। न कोई इनाम- न सम्झौता- न पुरस्कार- ना किसी की चरण वन्दना। जिनके नाम तुम माला कि तरह जप रहे हो उनमें से शायद ही कोई मुझे जानता हो। अपन इसी शहर में अपनी मस्ती में रहते हैं- जो अच्छा लगता है करते हैं- कोई आ गया तो मिल लेते हैं- जितनी बुद्धि आती है लिख डालते हैं- कोई विद्वान कवि लेखक होने का कोई दावा नहीं किया- ज़रूरत पडेगी तो विकिपिडिया भी देखता हूं और पूंजी भी- और बस ऐसे ही कटती है- दाल रोटी नौकरी देती है और संतोष लिखना- इससे ज़्यादा ना लेने की बाक़ायदा घोषणा कर रखी है।
हां भगत सिंह को पढना अगर संभव हो तो उनके मरने पर तो अपने अख़बार कुडई आरसु में पेरियार तक ने उन्हें इज़्ज़त से याद किया था।
‘आरक्षण पर ‘बह्स’ तुम्हारी तरह जातिवादी नफ़रत से भरा सवर्ण करायेगा क्या? ‘मैं ग्वालियर का पांडे हूं’, ‘कबाड़खाना का पांडे’ नहीं’,
”हमारा तो ‘संगठन है ‘युवा संवाद’ न कि ‘यूथ फ़ोर इक्वेलिटी”’
ये मदारियों की बम्हन भाषा। कितने वर्षों तक सबको ‘उल्लू’ बनाओगे? पूरे वामपंथ पर तुम्हारी जात का कब्ज़ा है। ज.स.म. (मैनेजर पांडे, रवि भूषण पांडे, डब्राल, डंगवाल..गिनते जाओ ..सैकडा बनेगा)…
शर्म करिये..! गांधी की हत्या करने के बाद, उनकी सारी विरासत पर कब्ज़ा कर लेने वालो, अब आपके विरुद्ध इस देश का हर देश भक्त उठेगा!
हिंदी को कलंकित मत करो, हिंदुस्तान को कलंकित मत करो।
अन्य मनुष्यों का सम्मान करो!
jiyo beta niraj Paswan.
lage raho aur is kadar lage raho jaise ki munnabhai lage rahte hain.
padhe likhe ki aisi taisi. Sabse bada sachh wahi hota hai jo Dimag soche. Aur aapke “Dimag” ne jo soch liya, kya majal hai kisi ki use galat mane. jai bhim hi satya hai baki jagat mithya hai.
bahmano ki himmat ki sahi baat bole? balki himmat to dekho ki bol rahe hai!! aap kuchh aisa kariye ki inke bolane par rok lag jaye.
waise mansha to yahi hai aapki jo aap jahir bhi kar chuke hain.
is par to sochna hi nahi chahiye ki samne wala kah kya raha hai…..
और साथी प्रकाश प्रवंचक पढिये हमने प्रभाष जोशी प्रकरण पर क्या कहा था
और अब तुम बताओ कि तुमने क्या कहा था, कहां कहा था?
मुझ पर तीर चलाने वाले तब तुम कहां थे और तुम्हारे गिरोह के ये वीर बलवान कहां थे?
अब तय कर लो कि मै झूठा या तुम सब बुजदिल
अशोक कुमार पाण्डेय said…
इस आदमी को लोग क्रिकेट एक्सपर्ट समझते हैं। अब इनसे पूछा जाये कि भईये ये अज़हरूद्दीन,गावर और बायकाट कौन थे? और अश्वेत कालीचरण और सोबर्स? ससुरे टिकना कहां से सीख गये?
पढकर बिलकुल गंगा किनारे के अपने रिश्तेदारों की याद आ गयी जो दही चूरा खाके खटिया पर पादते हुए ऐसे ही ओरिजिनल प्रलाप किया करते हैं।
August 19, 2009 9:58 PM
अरे सोचने के लिये खुला दिमाग चाहिये
आ जाओ भईये उस बहस की पूरी रिपोर्ट यहां के साथियों से ही पूछ लेना
हां दो रुपये का एक अख़बार निकालते हैं हम युवा दख़ल उस में भी आरक्षण के समर्थन में कई लेख हैं पढ लेना।
तुमने बुजदिलों और भगोडों की भों भों छाप नारा भाषा कहां से सीखी? उदय से या किसी और से यह बाबा साहब की भाषा तो नहीं। वह तो तर्कों पर विश्वास करते थे। और बाबा साहब के साथ गांधी को लेके भी दुख? बाबा साहब तो उन्हें वर्ण व्यवस्था का समर्थक मानते थे ( मै भी मानता हूं पढना समयांतर में अगली बार हिंद स्वराज पर हमारा लेख)। तो जौ भीम या जय गांधी या जय अवसर वाद
मै तो पूरी ताक़त से कहता हूं जय भीम- जय मार्क्स- जय भारत
आपने लिखा महराज : ‘पढकर बिलकुल गंगा किनारे के अपने रिश्तेदारों की याद आ गयी जो दही चूरा खाके खटिया पर पादते हुए ऐसे ही ओरिजिनल प्रलाप किया करते हैं।”
वही आप भी करोगे..! पूर्वजों की तरह!..वही आप हो, शंबूक के हत्यारो !
आरक्षण के दिनों में हम सबके लिए आपकी नफ़रत देखी है हमने! कभी भूल पायेंगे हम? मार्क्सवाद, जसम, जलेस, प्रलेस में अपने चेहरे मत छुपाओ। गहरी नफ़रत है आप्को अपनी जात के अलावा सबसे। बौद्धों, ईसाइयों, सिक्खों, आदिवासियों..इतना ही नहीं आपको तो जो आप्की जात का नहीं है, उससे भी नफ़रत है…! लिस्ट गिनाऊं..?
सच यह है कि आप इस देष में उभरते नाज़ीवाद के असली जेनेटिक आधार हो!
गिनाओ तुम दरसल प्रलापी पागल हो जो बस अपना नुक्सान करता है और इस उद्देश्य का भी जिसकी बात वह करता है
तुम्हें दरसल किसी अच्छे साइकेट्रिस्ट की ज़रूरत है भाई उदय के कई परिचित होंगे उनसे पूछ लेना।
पढने वाले जान चुके होंगे कि कौन क्या है। तुम्हारे पास बस नारे हैं, घटिया भाषा और बेह्द तंग नज़र्। मेरे पास 15 सालों की सामाजिक सक्रियता में दिखाया अपना चेहरा। अपने रिश्तेदारों से लडी लडाईयां हैं, आरक्षण के समर्थन मे किये काम और लेखन हैं, एक प्रतिबद्ध समूह है ( न जसम न प्रलेस न जलेस इन पर मेरे विचार समयांतर के दस साल पूरे होने पर निकले विशेष अंक में लिखे लेख को पढ के जान सकता है कोई), दफ़्तर से घर और समाज तक हर जाति और धर्म के मित्रों का विश्वास और प्रेम तथा विश्वास है तथा एक बेहतर समाज का सामूहिक स्वप्न।
तुममें न तो कुछ सकारात्मक करने की योग्यता दिख रही है ना ही बहस के लिये ज़रूरी तमीज़। तुम ख़ुद तो जोशी पर नामवर पर और सब पर चुप रहे और यहां मुझसे सफ़ाई मांग रहे हो
मुझे अपने नाम के जातिसूचक हिस्से पर कोई शर्म नहीं। मै चाहता तो उसे हटा कर आराम से झूठ भी बोल सकता था। पर वह एक नासूर की तरह हमेशा साथ रहता है कि रोज़ ख़ुद को ख़ुद के आईने में देख कर अपनी ही कसौटी पर कस सकूं। यह सब तुम नहीं समझोगे उसके लिए ख़ुद और समाज से संघर्ष की ज़रूरत पडती है।
”हां अविनाश महोदय अब मैं इस बहस में नहीं हिस्सा लूंगा। इस कुत्ताघसीटी में अब मेरी कोई रुचि नहीं परसों भगत सिंह का जन्मदिन है। युवा संवाद इसे युवा दिवस के रूप में मनाता है तो बस अब उसकी तैयारी में लगना है।”
यह घोषणा करने के बाद भी अपना ”…..” चाट रहे हो!
वर्णाश्रमव्यवस्था और जातिवाद, जिसका जन्म ब्राह्मणवाद के कुत्सित दिमाग से हुआ है, वह आज भी एक भयावह सच्चाई है! हिंदी भाषा और हिंदुस्तान (गोबर पट्टी) की राजनीति पर इसी का कब्ज़ा है!
तीनों वामपंथी लेखक संगठनों पर किस जाति का कब्ज़ा है? अध्यक्ष, पदाधिकारी, महा सचिव, कोषाध्यक्ष, कार्यकारिणी, केंद्रीय समिति…सबके नाम गिनाओ ! भाई कोई है, जो सच्चाई को सामने लाये? कितनी संस्थाओं में किस जाति का कौन काबिज है, कोई आये और गिनाए! कितने साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता, सरकारी पुरस्कार विजेता, कार्पोरेट अखबारों के संपादक और पत्रकार किस जाति के कितने हैं, कोई गिनाए!
सूचना के अधिकार के तहत यह सूची मांग्री जानी चाहिए!
कौन बाम्हन या सवर्ण क्या क्या हथिया चुका है, कितने एन.जी.ओ. चला रहा है ;लेकिन उसकी वास्तविक शैक्षणिक योग्यता क्या है? इसको उजागर होना चाहिये!
इस बहु-सांस्कृतिक, बहु-नस्लीय, बहु-धार्मिक, बहु-भाषी, बहु-जातीय देश में जब तक कट्टर-नाज़ीवादी जातिवाद के खिलाफ़ संघर्ष नहीं छेड़ा जायेगा, न तो यहां आचुनिकता आयेगी न सामाजिक सामाजिक समानता।
जहां दसवीं पास बम्हन एक लाख का वेतन पाता है और उससे हज़ार गुना ज़्यादा शिक्षित और योग्य हर रोज कुआं खोद कर पानी पीता है, हर रोज़ आत्महत्या की बात सोचता है…उस देश और उस भाषा पर किसका कब्ज़ा है..इसे जानना बाकी है क्या ?
बाबा साहेब ने कहा था कि अगर जातिवाद के खिलाफ़ लड़ाई लड़नी है तो हिंदू धर्म से बाहर जाना होगा, क्योंकि यह ब्राह्मणवाद के अलावा और कुछ नहीं है…
तो सच तो यह है सत्यनारायण पटेल, बहादुर पटेल और सारे के सारे साथी कि हिंदी में ‘वामपंथ’ और कुछ नहीं ब्राह्मणवाद का एक ‘मुखौटा’ है।
यह एक ऐसा दौर है कि हर महान नाम या आइकन के पीछे एक सबसे नीच चेहरा छुपा हुआ है।
प्रभाष जोशी पर सिर्फ तीन लाइन दूसरे के ब्लाग पर और नामवर और उदय पर ये बड़ी-बड़ी पोस्टें। इतने दिन से मोहल्ला अछूत बन गया था जब प्रभाष जोशी पर बहस चल रही थी। अब पवित्र हो गया। भागे चले आए। ये तीन लाइन का ड्रामा अपने पास रखो, इस ब्लाग के पढ़ने वाले बच्चे नहीं हैं। बताते क्यों नहीं तीन लाइन और तीन महीने के इस फर्क का राज़ क्या है? बीस कमेंट अकेले आज की तारीख में दे चुके हो। दो महीने से खटिया पर पड़े पाद रहे थे क्या ? बताते क्यों नहीं दो महीने हिल-स्टेशन पर चले गए थे कि किसी गैर ब्राहमण सायकियाट्रिस्ट के खिलाफ साजिश में लगे थे ? इन तीन लाइनों की बत्ती बना लो। यहां लोग अब सब समझने लगे हैं। बताओ न तीन लाइन और तीन महीने के फर्क का क्या राज़ है ? बताओ भाई, तुम्ही से पूछ रहे हैं। तीन लाइन बनाम तीन महीना का राज़। टिप्पणी बनाम पोस्ट का राज़। फुसफुसी बनाम हस्ताक्षर आंदोलन का राज़। पाद बनाम पादुका चुंबन का राज़। बताओ भाई, सोच क्या रहे हो। बताते क्यों नहीं ?
अंतिम दो लाईनों को छोडकर बाकी सबसे सहमत हूं
अब तुम अपनी औकात वाली भाषा का प्रयोग कर रहे हो तो उस पर मुझे कुछ नहीं कहना है पाठक सब समझते हैं। सत्यनारायण पटेल, बहादुर पटेल को मै जानता हूं न वे महान हैं ना जातिबादी।
यह एक ऐसा दौर है कि हर महान नाम या आइकन के पीछे एक सबसे नीच चेहरा छुपा हुआ है। बिल्कुल सच और उदय भी एक एसे ही आईकन हैं।
वैसे तुम ने मायावती के लिये जो गंदी भाषा इस्तेमाल की उसने तुम्हारी गंदी ब्राहमणवादी मानसिकता ज़ाहिर कर दी। मै तुम्हारी स्त्री विरोधी होने के नाते भर्त्सना करता हूं।
तुम तो उस समय जोशी जी के तलवे चाट रहे थे और अब यहां पर चकर चकर कर रहे हो।
तुमने इस पर तीन लाईने भी क्यों नही लिखीं? और यहां अब मुह छिपा के अंग विशेष क्यों दिखा रहे हो?
हमसे क्या पूछते हो ? उदय के पीछे हम पड़े थे क्या ? नामवर के पीछे हम पड़े हैं क्या ? जब इन दोनों के पीछे तुम पड़े तो प्रभाष जोशी के पीछे काहे नहीं पड़े ? बताओ ना। बताते क्यों नहीं ? इधर-उधर काहे घुमा रहे हो बात को ? बताते क्यों नहीं ?
क्यूं नहीं पडे तुम? इनकी बत्तियां पसंद थी क्या तुम्हें?
और बताओ कि आदित्यनाथ तुम्हारे रिश्तेदार थे क्या?
इनसे क्या रिश्ता था तुम्हारा की इनके पीछे पडने पर फ़ट तुम्हारी रही है
जवाब दो कि इनकी नंगई दिखाने पर तुम्हारी कौन सी नथ उतर रही है
क्या मिला है इनके समर्थन में दुंदुभि बजाने पर
बताओ ना? किस तरह इनके चरण का प्रसाद पीते होइ और कैसे जोशी की धोती की मैल साफ़ करते हो कि इनके ख़िलाफ़ बोलने में फ़टती है। इसलिये कि ये साधन संपन्न हैं पिछवाडे लात देंगे?
उनसे पूचने की औकात नहीं तो मुझसे पूछने का क्या हक़ है तुम्हें?
कौन हो तो अंबेडकर, बुद्ध मार्क्स या साहित्यिक जज जो अपनी गंदी जबान से मुझसे सवाल पूछ रहे हओ?
जब मेरे ब्लाग पर ओढनी ओढ के आये और गलत तथ्य से रीछ केर बच्चे पर बात की तो मुह दिखाज्कर बोलने की बात पर बत्ति डालकर भाग क्यों आये?
बताओ ना तीन लाईन बनाम ज़ीरो का इक्वेशन?
बम्हन बौरा गया है! गोली चलाएगा ! असली जात उजागर !
binaa kaataar aur neech braahmanvaad par savaal uthaaye, hindi saahity ki koi bhee bahas bekaar hai.
I stand with Neeraj. Well done to expose these dirty ugly faces.
They are the blemish in Indian legacy of tolerance, liberal ethos and equality.
Badhaai Neeraj ji.
चलो जान गये ना असली जात
पढने वाले भी जान गये होंगे
अब जा के अपने आराध्य की मूर्ति कि वन्दना करके सो जाओ
और देखो ज़्यादा जय भीम मत कहना नहीं तो उसका गोरखनाथ वाला पारिवारिक सदस्य सचमुच की गोली चला देगा। तुम तो उन्हीं के सुर में सुर मिलाना
जय श्रीराम बोलना- जय सुमित्रा ताई- जय अशोक बाजपेयी- जय नामदेव ढसाल- जय जोशी- जय शिवसेना —- सब बोलना।
तुम्हें भी इनाम मिलेगा
मस्त रहना
जब नेट पर आना या अपने लोगों को चूतिया बनाना होगा तभी बोलना — जय भीम!
jai bheem !
you better stand with him… he has lost this argument and his DIRTY face and badly nrrd his creed…
मुंह छुपाने वाले सारे बुजदिल एक ही पाले में रहें तो बेहतर
हम अकेले ही काफ़ी हैं
Indian legacy of tolerance, liberal ethos and equality.
NOW I have every reason to believe that you guys are UPPER CASTE and SANGH ORIENTED hindus.
तुम सब सवर्ण हो क्योंकि कोई अंबेडकर वादी यहां की जाति आधारित उस संस्कृति की प्रशंसा नहीं कर सकता जिसे अंबेडकर जी ने ढोंग बताया था। तुम सब दलित हो ही नहीं सकते। तुम सावरकर और हेडगेवार की नस्ल के कट्टर संघी सवर्ण हिंदू हो। तुम्हारा नाश हो
Any one who speaks against brahminism, is immediately pronounced ‘sanghi’, rightist, reactionary…!
Brahmins are the ‘purohits’, like ‘mullaah’ in islam and ‘priest’ in christianity. Baba saheb had said, they will never allow any radical social change and will through their weight to sabotage it.
इन्होंने मार्क्सवाद को नष्ट कर डाला, गांधीवाद को खा-पी गये, हिंदी की जुझारू पत्रकारिता को दलाली और जादू-टोने के भोंपू में बदल दिया। मीडिया का जातीय चरित्र बदलिए, ये जादू-टोना, शनि-देव, दाती मंत्र, अंधविश्वास सब काफ़ूर हो जाएगा। ये अंबेडकरवाद में भी घुस चुके हैं। इसके पीछे इनके जाति-तंत्र की पूरी शह है। शैलेश मटियानी जैसे महान कथाकार को इन्होंने जुठे बर्तन धोकर जीने के लिए मज़बूर किया और उन्हें मार डाला। जब कि उनसे कई दर्जा नीचे के दो कौड़ी के इनके जाति के ‘ब्रह्म-संवादी’ लाखों का वेतन और पुरस्कार पाते रहे। सत्तर के दशक का नागपुर का विनायक कराड़े जैसा प्रतिभाशाली कवि आज तक लापता है। उसका परिवार तक नहीं जानता कि वह कहां गया। कविता, कहानी, मीडिया, अखबार…’पक्ष’ और ‘विपक्ष’ …ये हर चीज़ हथिया लेना चाहते हैं। भगत सिंह से लेकर दाती-मंत्र तक। मार्क्स से लेकर जगन्नाथपुरी..चारों धाम तक।
ये सिर्फ़ मदारी हैं साथी। जो बोलते हैं और लिखते हैं, उसमें इनका कोई खुद का विश्वास नहीं। अफ़वाहबाज़ी, दूसरों का चरित्र हनन, बर्बर हिंसा और किसी जबरे-बलशाली को देख कर उसकी चरण वंदना करना इनकी साम्प्रदायिक विशेषता है। लेकिन ये खासे खत्रनाक हैं।
सबसे पहले इन्हें जानो फिर कुछ और…!
वाह अब जितना बोलोगे उतना साफ़ होगा
तुम न नीरज हो ना पासवान
तुम पक्के संघी बाभन हो…आदित्यनाथ के रिश्तेदार
मै मुतमईन हूं अब कि तुम पक्के जातिवादी, अंबेडकर के विरोधी, दलाल सवर्ण हो
तुम अंबेडकरवादी हो ही नहीं सकते
अपनी कलई उतर रही है तो अब मटियानी याद आ रहे हैं
बताओ तुमने मटियानी के लिये क्या किया? क्या किया नागपुर के उस कवि के लिये? क्या नागपुर से संघ मुख्यालय की जूतियां उठाने से फ़ुर्सत नहीं मिली कि उस कवि के लिये कुछ करते?
तुम जवाब दो ? क्यों अब तक चुप रहे इन महान उपेक्षितों के बारे में?
बोलो
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद
भगत सिंह के विरोधी मुर्दाबाद
दक्षिणपंथ मुर्दाबाद
जनविरोधी संस्कृति के समर्थक मुर्दाबाद
पूछो न अपने गुरु से कि अशोक बाजपेयी से लखटकिया पुरस्कार अकेले हज़म करते हुए ये उपेक्षित कवि क्यों नहीं याद आये? पूछो ना कि क्या किया उन्होंने अपने ही प्रदेश के कवि मोहन डहेरिया के लिये? पूछो कि अपने पारिवारिक मित्र आदित्यनाथ से कह के क्यों नहीं पता लगवाते उस नागपुर के उपेक्षित कवि का? पूछो ना कि अब तक उसकी याद क्यों नहीं आई? और तुम भी बताओ आज के पहले किस पत्रिका या वेब पर तुमने कहां इन पर चिन्ता जताई? कब लिखा इनकी उपेक्षा के बारे में? आज जब बहस में नंगे हो रहे हो तो सब याद आ रहा है। अब तक क्या अपने मालिक की चाकरी करने से फ़ुर्सत नहीं मिली? या आदित्यनाथ के साथ दलितों की बस्तियां जला रहे थे? या मोदी के साथ फ़र्ज़ी इनकाउन्टर की साजिश रच रहे थे? या भोजशाला में अल्पसंख्यकों की हत्या प्लान कर रहे थे? मालिक ने अशोक बाजपेयी के बंगले पर तो ड्यूटी नहीं लगा दी थी ना तुम्हारी? बताओ बाभन… बताओ दक्षिणपंथ के प्रवक्ता… एक दलित मास्क लगाकर तुमने देश के सारे दलितों का अपमान क्यों किया…किसके कहने पर्…बताओ?
कहां गये नीरज भामन? अपने गुरु से नये नाम का सजेशन लेने गये हो क्या?
बताओ ना शिखंडी अब किस नाम से आओगे?
किसका अपमान करोगे?
दलित का, महिला का, आदिवासी का, अल्पसंख्यक का?
तुम तो बहुरुपिया हो ना?
वैसे इसका रुपिया भी ख़ूब मिलता होगा!!!
abhi tak nahi bataya ki prabhash joshi par chup kyon tha. bata sakte bhi nahi. sara khel khul raha hai. kaisi galiyan nikal rahi hain. kahan gayi dharan kshamta ? abhi to tumne uska .000000000000000001 pratishat bhi nahi dekha jo tumhari vajah se dalitoN ne saha. abhi se gali-galauj par aa gaye. batayo na kahan chhup gaya tha ye chand prabhash joshi ke waqt ?
ये मारा
आया नाम बदल के आदित्यनाथ का साथी
तुमसे पूछा था ना कि तुम
क्यूं नहीं पडे तुम? इनकी बत्तियां पसंद थी क्या तुम्हें?
और बताओ कि आदित्यनाथ तुम्हारे रिश्तेदार थे क्या?
इनसे क्या रिश्ता था तुम्हारा की इनके पीछे पडने पर फ़ट तुम्हारी रही है
जवाब दो कि इनकी नंगई दिखाने पर तुम्हारी कौन सी नथ उतर रही है
क्या मिला है इनके समर्थन में दुंदुभि बजाने पर
बताओ ना? किस तरह इनके चरण का प्रसाद पीते होइ और कैसे जोशी की धोती की मैल साफ़ करते हो कि इनके ख़िलाफ़ बोलने में फ़टती है। इसलिये कि ये साधन संपन्न हैं पिछवाडे लात देंगे?
उनसे पूचने की औकात नहीं तो मुझसे पूछने का क्या हक़ है तुम्हें?
कौन हो तो अंबेडकर, बुद्ध मार्क्स या साहित्यिक जज जो अपनी गंदी जबान से मुझसे सवाल पूछ रहे हओ?
जब मेरे ब्लाग पर ओढनी ओढ के आये और गलत तथ्य से रीछ केर बच्चे पर बात की तो मुह दिखाज्कर बोलने की बात पर बत्ति डालकर भाग क्यों आये?
मेरी धारण क्षमता कुत्तों से मुह नुचवाने के लिये नहीं है।
अगली बार नया नाम लेके आना
आप उनकी समस्या समझने की कोशिश कीजिए। प्रभाष जोशी पर बोलेंगे तो ब्राहमण सभा और पाण्डे सभा को क्या जवाब देंगे ? असली सरोकार तो वहीं हैं ना। संकल्प तो ब्राहमणवाद और वर्णवाद को बनाए रखने का है। गांधीवाद से लेकर नारीवाद और वामपंथ तक तो सब मुखौटे हैं। माया से मुलायम को लड़ाया। उदय, राजेंद्र यादव और अब नामवर से लड़ाने की कोशिश। याद तो करो उदय के बरक्स नामवर का मुद्दा किसने उठाया ? जी हां, अशोक वाजपेयी ने। और अशोक वाजपेयी कौन ? हां, ठीक समझे। इनकी ‘क्षमता’ नहीं मालूम आपको ? राजेंद्र यादव को धमकाने में औरतों का इस्तेमाल किया। दलित मायावती को जगह दिखाने के लिए मिश्राजी प्लांट किए गए। अब प्रभाष कांड को भुलाने के लिए नामवर और उदय को लड़ाने का नुस्खा। ‘फूट डालो और राज करो’ के मामले में अंग्रेज भी इनके आगे पानी भरते हैं। और मुसलमानों को तो पचा ही लिया क्यों कि वे इनकी जातिप्रथा का सम्मान करते थे। एक तरफ जातिप्रथा के सम्मान के नाम पर सहमति दूसरी तरफ ‘नहीं मैं ब्राहमणवाद की बात नहीं कर रहा हूं’ का हुंकारा। कितना पागल बनाओगे अभी इण्डिया को !? बिलकुल ही पागल समझे हो क्या ?
batao na kahaN the 2 mahine se ?
साथियो, साइकियाट्रिस्ट की फ़ौरन ज़रूरत किसे है? लगता है गोरखनाथ पीठ के तांत्रिक ने मूठ चला दिया बम्हन महराज पे! यही ले जाएंगे भगत सिंह के रस्ते पे सबको उल्लू बना के! गुस्से और नफ़रत में डूबे जातिवादी मदारी!
साथी इन्हें पहचानना। जो इनकी जात के खिलाफ़ बोलेगा उसके खिलाफ़ इनका पूरा कुनबा उठ खड़ा होगा।
ये उन्माद में पागल हो कर औड़म-बौड्म कुछ भी बकेंगे। अफ़वाहें फैलांएगे और दूसरों की लाश पर बैठ कर भोज खाएंगे।
और सुनिए महराज, हम दलित मुखौटा नहीं लगाए हैं। ‘काफिला’ में पढिए हमारा लिक्खा।
वैसे हम ग्वालियर तो पंहुच ही रहे हैं। दंगा हो ही जाय।
जियो कुनबा बाजों जियो
जब आना हो आ जाना
गीदडो की धमकी से मै नहीं इन सब बडों का कच्छा साफ़ करने वाले चेहराअ छिपा कर तंज करने वाले बुजदिल दरते हैं
kahaN the Prabhash joshi ke waqt mere jaNbaaz ?
साथियो, अपने आप को कवि, समयांतर फिलहाल का लेखक, भगत सिंह का समर्थक कहने वाले ‘वामपंथी’ ‘युवा संवाद’ के संचालक के भाषाई संस्कार के कुछ नमूने देखिए ! लेकिन ठहरिए, ये सिर्फ़ भाषा के नमूने नहीं हैं, उस जातिवादी नफ़रत से सने दिमाग से बाहर फूटते सच्चाई के उदाहरण हैं। खुद देखिए और फैसला करिए:
1.”पीछे पडने पर फ़ट तुम्हारी रही है”
2.”तुम्हारी कौन सी नथ उतर रही है”
3.”जोशी की धोती की मैल साफ़ करते हो कि इनके ख़िलाफ़ बोलने में फ़टती है। इसलिये कि ये साधन संपन्न हैं पिछवाडे लात देंगे?”
4.”अपनी गंदी जबान से मुझसे सवाल पूछ रहे हओ?”
5.”मेरी धारण क्षमता कुत्तों से मुह नुचवाने के लिये नहीं है।”
हां, बम्हन महराज, हम सब कुत्ते ही हैं। इस हिंदू-हिंदी समाज में ‘इंसान’ तो सिर्फ़ आप लोग ही हो। तो आप हमें अपने संगठन में शामिल करके क्या काम करवाना चाहते हैं?
जय भीम ! जय मार्क्स ! जय बुद्ध ! जय भारत !
mujhe lagata hai bahas bhatak gai hai. kyonki is bahas ki shuruaat satyanarayan patel ke lekh, fir unaki tippani aur sabase badi baat gyanaranjan ka istifaa aur un sab bato sawalo ke jawab me kamala prasad pandey ki besharmi bhare waktvya se hui thi. baat aabhi bhi vahin hai. satyanarayan patel aur jin logone ne ford foundation se kabir chetana samman lene par sawal khade kiye the. p w a ke logon dwara videshi aur deshi pujipatiyon se dhan lene saamraajywadi ejansiyon se paisa lekar unake hit me kam karane ko lekar thi. bahas us par hona chahiye. kya p w a ka n g o karan ho gaya hai ? kya p w a ke karyakrta actioned ki godi me jakar baith gyae hain. asal mudde par bat karo ? nizi khunnsh mat nikalo. kya is puri bahas se nahin lagata lokataantrik dhang se bat na ho rahi ek dusare ko dhamakaya ja raha hai. ashokji yuwa sanwad kaise chal raha isaka yan prchar mat karo ? bata sako to ye batao ki yuaa sanwad waale vyktigat rup se funding ejensiyon se paisaa le rahe hain ki nahin ? bat yaha hai ki kyaa kranti ka sapana funding ajensiyon ke tukadon par palane walo ke dama par saakar hoga ? p w a ab ngo ke dalalo ke samuh me viksit hota nahin lag raha. gyanranjan ke sawal, krishankant nilose ka bayan, dewasa ikai ke saathiyon ka bayan in sab baton ka visleshan karo.
मै देवास के साथियों के बयान से सहमत हूं। मेरी पूरी सहमति मैने उन्हें दर्ज़ करा दी है।
मेरा सवाल विकल्प को लेकर है।
अगर उनसे बातचीत में मै मुतमईन हुआ तो साथ ज़रूर आऊंगा। पर वह बहस किसी मोहल्ले पर नहीं होगी। वे मेरे दोस्त हैं उनसे मै बात करुंगा/ कर रहा हूं। सत्यनारायण ने जो सवाल उठाये उनसे मेरी सहमति है और थी।
मै व्यक्तिगत रूप से एन जी ओ का विरोधी हूं और मैने वहां से कभी कोई सहायता नहीं ली।
पर अगर कोई बेरोज़गार वहां नौकरी कर रहा है तो इसमें क्या बुराई है? हम सब सरकारी नौकरी करते हैं अब सरकार क्या क्रांतिकारी एजेंसी है? जैसे मैं पुलिस से नफ़रत करता हूं पर सत्यनारायण से प्यार।
मै इस बात से सहमत हूं कि किसी लेखक या सामाजिक संगठन को ऐसे फ़ण्ड नहीं लेने चाहिये। साथ ही सवाल उठाने वालों को इसका हक़ होना चाहिये। आपके साथ सुविधा है कि मै खुलकर सामने हूं जबकि आप लोग सब नकली नामों से आ रहे हो।
हां भाषा के संदर्भ में तुमसे नहीं पाठ्कों से— जैसे को तैसा देना पडता है।
यह है इस नीरज उर्फ़ साथी उर्फ़ जाने कौन-कौन की महान भाषाई संस्कार का नमूना
आग लगाओगे तो आंच आयेगी
^^मायावती भले ही अपने बम्हन चापलूसों को ‘सैनिटरी पेपर’ की तरह इस्तेमाल करे, आप बम्हन जब अकेले बैठते हो तो रस ले ले के अपनी नफ़रत उगलते हो (मैंने अपने कानों से सुना है) : ‘हाथी नहीं हथिनिया है, मिश्रा जी की बम्हनिया है^^
ये मदारियों की बम्हन भाषा।
यह घोषणा करने के बाद भी अपना ”…..” चाट रहे हो!
तो सच तो यह है सत्यनारायण पटेल, बहादुर पटेल और सारे के सारे साथी कि हिंदी में ‘वामपंथ’ और कुछ नहीं ब्राह्मणवाद का एक ‘मुखौटा’ है।
दो महीने से खटिया पर पड़े पाद रहे थे क्या
इन तीन लाइनों की बत्ती बना लो।
बम्हन बौरा गया है! गोली चलाएगा ! असली जात उजागर
लगता है गोरखनाथ पीठ के तांत्रिक ने मूठ चला दिया
akele pwa par naheen, baaki jsm aur jls par bhi…aur in par casteist-lobbies ke kabze ki bhi baat zaroori hai.
ye muddaa side line naheen kiyaa jaa sakataa..
YAH sab bekar ki baaten hai
sathi ashok
jaati aor dhrrm ki bat karne vale log gareebo ke dusman hain.
unmaad ki bhasha mey bat karke ye nav-dolatiyo – dalito(parvenu & nouvau riche) ka hit sadhana chahate hain.ek bar apana paksha spast kar dene ke bad inke muh lagane ki jarurat nahi hai.sathi kripaya is bahas
ko aage na badhaye.
[...] है 27 September 2009 No Comment वसुधा के प्रधान संपादक कमला प्रसाद और संपादक राजेंद्र शर्मा ने कबीर [...]
abhi tak nahiN bataya ki 2 mahine se kahan the?
DEAR NEERAJ PASWAN Ji………AAPKI AAPSI GALIGALOJ ME MERI KOI DILCHASPI NAHI. HAN AAPNE VINAYAK KARADE KA NAM LIYA. USKE BARE ME AAP JO KUCHH BHI JANTE HO USE MERE SAATH SHARE KARE PLEASE. WOH MERA DOST THA . YA “HAI” KAISE KAHOON?
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