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एक बुरे आदमी का इकबालिया बयान…

26 September 2009 No Comment

♦ पूर्व आईआईएमसी छात्र

मैं आईआईएमसी पत्रकार बनने नहीं गया था और न ही दोस्त बनाने। कोई संस्थान बिहारियों (पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोग भी इसमें शामिल हैं) को खबरनवीस नहीं बना सकता क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि वे जन्मजात पत्रकार होते हैं। हम सब के भीतर एक नेता, नौकरशाह, पत्रकार और एक बुरा आदमी रहता है।

मेरे साथियों ने कुछ इस तरह से मेरी तारीफों के पुल बांधे हैं कि इस बतकही में मेरे जैसे बुरे आदमी का इकबालिया बयान देना जरूरी-सा हो गया था।

दोस्त बनाये नहीं जाते हैं, बस बन जाते हैं। मैंने कभी इसके लिए कोई कोशिश नहीं की, फिर भी आईआईएमसी ने मुझे मेरी ज़‍िंदगी के कुछ सबसे अच्छे दोस्त दिये। वो उम्र भर मेरे साथ रहेंगे। मेरी अर्थी के वक्त मुझे कंधा देने के लिए भी मौजूद रहेंगे। पर जाने कैसे मैंने इतने विरोधी बना लिये।

अपने साथियों से एक सवाल पूछ रहा हूं, क्या मैंने कभी किसी को कोई नुकसान पहुंचाया, कोई तकलीफ दी, उनके सम्मान में कोई कमी बरती। फिर भी मैं क्लास का सबसे बुरा आदमी था।

आईआईएमसी के आखिरी दिनों में भाटी ने एक डायरी देकर मुझसे कहा कि इसमें मेरे बारे में कुछ लिखो। मैंने लिखा था, “भाटी तुममें बहुत कुछ ऐसा है, जो बिलकुल मेरे जैसा है। वही भदेसपन जिससे मुझे हमेशा से लगाव रहा है। अफसोस मैं तुम्हारा दोस्त नहीं बन पाया। कभी एक प्याली चाय तक साथ बैठकर नहीं पी।” ऐसा सिर्फ भाटी के साथ ही नहीं था। प्रधान सर की तमाम कोशिशों के बावजूद साथ बैठ कर मुस्कराहटें बांटने के लम्हें वहां कम ही होते थे।

विभाजन की बारीक-सी रेखा तो शिक्षक दिवस के साथ ही खिंच गयी थी। मेरे साथियों ने तब मेरा विरोध कर के कई चीजों के दरवाजे बंद कर दिये। मजबूरन मैं उस रोज़ संस्थान से गैरहाज़‍िर रहा। क्योंकि प्रधान सर ने फ़ैसला दिया था कि जिन्हें सामूहिक आयोजन पर एतराज है, वे ना आएं। समीकरण को संतुलित करने के लिए मुझे एल्यूम्नाई मीट तक का इंतज़ार करना पड़ा। मैं क्लास का सबसे बुरा आदमी जो था।

पिछले लेख की तारीफों में मेरे मेटल होने पर भी कुछ लोगों ने कसीदे गढ़े हैं। मैं उन सब से यह पूछ रहा हूं कि क्या वह अपने पिता का सरनेम अपने नाम के साथ नहीं जोड़ते। क्या इससे उनकी जातीय पहचान का पता नहीं चलता और क्या इससे उन्हें लगाव नहीं होता।

आनंद प्रधान ने एक बार कहा था कि पूरब के चाय वाले भी इंडियन एक्सप्रेस के बड़े अंग्रेजीदां खबरनवीसों से ज्यादा नॉलेज रखते हैं। इस पर मैंने उनसे पूछा भी था कि तब तो कायदे से मेरी क्लास में सभी पूरब के चाय वाले ही होने चाहिए थे।

क्लास को “राज्यसभा” बनाने के उनके विचार से मैं कभी इत्तेफाक नहीं रखता था।

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