क्या शिमला में संस्मरण सेशन भी चल रहा है?
♦ अभय

विमल जैसी लेखिका का संस्मरण पुराण देख कर धक्का लगा। पुराण इसलिए कहा कि पुराण शैली में ही लेखिका ने अपनी राम कहानी कही है। इस सेमिनार में संस्मरण का भी सेशन भी रखा गया है, यह जानकर अच्छा लगा। लेखिका ने अपनी निजी खुन्नस को सिद्धांत का जामा पहनाना चाहा है। जो हर लिहाज से भर्त्सना योग्य है। कहते हैं कि हिंदी वाले निजी खुन्नस को जनम-जन्मांतर तक निभाते हैं। विमल थोराट ने इसे सही साबित कर दिया है। विमल थोराट को इतना तो समझना चाहिए कि संस्मरणों के आधार पर कुछ भी साबित किया जा सकता है। विमल थोराट से जुड़े संस्मरण सुनाने वाले भी ढेरों मिल जाएंगे। चलिए मान लेते हैं कि विमल थोराट सिर्फ सच बोलती हैं। सच के सिवा कुछ नहीं बोलती। हम उनकी ही कहानी की पड़ताल कर लें।
पाठक सोचें कि विमल थोराट का एडमिशन नामवर सिंह ने रोक दिया!! और फिर छह महीने बाद उन्हें प्रवेश मिल गया!!!
पाठकों आप ही सोचें कि बीस में से जिन दस लड़को का नाम नामवर सिंह ने काटा होगा क्या वो सभी दलित थे? अगर वो सभी दस लड़के दलित नहीं थे, तो क्या उन सभी की जाति से नामवर सिंह का विरोध था?
जिन दस का प्रवेश लिया गया था, क्या उनमें कोई दलित नहीं था? विमल थोराट को लगता है कि उनका नाम नामवर सिंह ने काटा… तो उसका बदला वो आज और इस छिछले तरीके से ले रही हैं। उनकी इस सैद्धांतिकी को क्या नाम दिया जाए?
ग्यारहवें स्थान पर विमल थोराट का नाम था तो बारहवें और तेरहवें स्थान पर किसका नाम था? विमल थोराट का नाम उन्हीं के कहे के अनुसार ग्यारहवें स्थान पर था। तो क्या नामवर सिंह ने उनका नंबर दस लड़कों से कम कर दिया थ और नौ लड़कों से ज्यादा? नामवर सिंह जिसका प्रवेश नहीं होने देना चाहते थे, उसका प्रवेश छह महीने बाद हो गया तो कैसे हो गया? छह महीने बाद वीसी ने विमल थोराट को क्यों बुला लिया? वीसी ने बारहवें, तेरहवें स्थान वालों को बुलाया की नहीं? नहीं बुलाया तो क्यों नहीं बुलाया?
बकौल विमल थोराट वाया रिपोर्टर विनीत कुमार मैनेजर पांडे जूठन का नाम सुन कर कुर्सी से गिर पड़ते हैं और संजोग देखिए, विमल थोराट वहीं मौजूद थीं उन्हें उठाने के लिए। और इस घटना से साबित हो गया कि समूचा हिंदी साहित्य दलित विरोधी है। अब उन लोगों का क्या किया जाए, जिन्होंने जूठन को मॉडर्न क्लासिक घोषित किया था। ऐसे लोगों के बारे में विमल थोराट न जाने क्यों चुप रह गयी हैं?
बकौल विमल थोराट निर्मला जैन दलित और स्त्री साहित्य विमर्श को बेमतलब का मानती हैं। इसलिए वो दलित विरोधी हो गयीं? विमल थोराट के फार्मूले और इस संस्मरण से यह भी तो साबित हो गया कि निर्मला जैन स्त्री विरोधी भी हैं! क्या मज़ेदार स्थापनाएं हैं!
व्यक्तिगत संस्मरणों के आधार पर विमल थोराट और कौन-कौन सी स्थापनाएं सामने लाने वाली हैं? वो जितनी जल्द ऐसा करें, बौद्धिक समाज का उतना ही अधिक लाभ होगा।
कुछ मूर्खों को लगता है कि दलितो के लिए सिर्फ दलित ही सोच सकते हैं। ऐसे लोगों का गेल ओम्वेट के बारे में क्या खयाल है? कुछ लोगों का कहना है कि आंबेडकर के खिलाफ कुछ बोल देना दलित विरोध है। ऐसे मूर्खों का रंगनायकम्मा के बारे में क्या कहना है?
कुछ दलित चिंतक ब्राह्मणवादी सोच के शिकार हैं। वो चाहते हैं कि दलितवाद का खेत उनके चरने के लिए छोड़ दिया जाए। वो सरकार की तरफ से मिलने वाले नगद लाभ पर ऐश करें। कुछ लोग सिर्फ इसलिए चिंतक बने फिरते हैं कि वो दलित हैं। जो उनका विरोध करे उसे उसकी जाति के नाम पर खारिज़ कर दिया जाए। ये लोग दिवंगत विद्वानों की भूल-गलती को उछालते रहते हैं। यही लोग बता दें कि कौन-सा विद्वान ऐसा जन्मा है, जिसने गलतियां नहीं की हैं? ये एक नाम बता दें।
इस प्रतिक्रिया से जुड़ा लिंक : “नामवरों की साज़िश ने दलित विमर्श को हाशिये पर रखा”









bahut khub. In logo ki yahi dikkat hai. Kuch aata jata nahi hai, pad nahi sakate, kisi vimarsh ke layak dimag hai nahi, to dalit hone ka sahara le lete hai. abhi abhi mere kendriy vi9shvidyalay me lecture ek mitra ki kahani chhapi, maine unse puchh ki aapne lekh nahi likhkar kahani kyo likhi to unka jawab tha, lekh me 10 kitaben padani hoti hai, jiska mere pas wakt nahi tha. aage ki bat samajhne layak hai, agar koee us kahani ki aalochana karega to use dalit virodhi kah diya jayega.
to kul milakar baat yahi hai ki ye log apne agyan ko chhipane ke liye dalit ka sahara lete hai.
विकास जी आपका नीयत पर सवाल खड़ा करना मेरा मकसद नहीं है लेकिन इतना जरूर कहुंगा कि आपके कमेंट में वही जातिवादी झलक रहा है जिस पर मैंने एतराज जताया है।
जिन्हें आप दलित कहते हैं उनमें से डा़ धर्मवीर,तुलसी राम,ओमप्रकाश वाल्मिकी,मोहन दास नैमिशराय,विमल थोरात जैसे दर्जनों नाम हैं जो आपके किसी भी तथाकथित सवर्ण कलमघिस्सु से बेहतर ठहरते हैं। लेकिन जिस तरह से कालांतर में मूरख ब्राह्मणों को भी विद्वान माना जाता रहा और कायर क्षत्रियों को भी वीर माना जाता रहा है उसी तरह आज यह मान लिया गया है कि कोई दलित है तो वो दलित हित का सबसे बड़ा सिद्धांतकार है। जबकि ऐसा होता नहीं है। मुझे तो यह नहीं समझ आता कि विमल,धर्मवीर,वाल्मिकी जैसे लोग इस बात पर कोई एतराज क्यूं नहीं करते कि उन्हें दलित विचारक या लेखक क्यों लिखा जाता है। वो समाज के सबसे वंचित तबके के लिए सोचते हैं तो इससे खुद उन्हें विचारक के बजाए दलित विचारक क्यों कहा जाए ? इस टर्मिनाल्जी में वही बीज छिपा हुआ है जो समाज में दलित कहने का बीज है। यानि किसी व्यक्ति को दलित कहते ही उसकी समस्त मानवीयता तिरोहित हो जाती है। अब वह किसी निकृष्ट दर्जे का अमानव टाइप कोई चीज हो गया। यही हाल बौद्धिक दुनिया का है। तमाम पढ़े लिखे अपने छोटे-छोटे हितों के लिए बड़े ही शौक से अपने नाम के आगे दलित विशेषण का प्रयोग करने की खुली छूट देते हैं।
आज के जनसत्ता में किसी ने लिखा है कि एक समाजशास्त्री ने सार्वजनिक रूप से भरी सभा में बताया कि वो कोई मैगजीन तभी खरीदते हैं जब उसमें कोई दलित जाति को व्यक्ति लिखता हो !! अब आप ही सोचिए कि ये खांटी ब्राह्मणवादी सोच है या नहीं !! ऐसी ज्ञान विरोधी जिद्द का कोई क्या करे ??
लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू देखिए। जब किसी विद्वान के नाम के आगे दलित लिख दिया जाता है तो तमाम जातिवादी मूरखों की आंख पर पट्टर पड़ जाता है। सवर्णवादी उस लेख की कमजोरी खोजने में लग जाते हैं और दलितवादी उसकी महानता। ऐसे घोर जातिवादी तरीके से कोई बौद्धिक दुनिया कब तक चलेगी। ऊपर के प्रसंग में ही देखिए कि ओमप्रकाश वाल्मिकी की रचना को मार्डन क्लासिक मान लिया गया है। हिन्दी साहित्य का बहुसंख्यक वर्ग इस रचना की मेरिट को स्वीकार करता है। लेकिन विमल थोरात ने एक निजी संस्मरण के आधार पर न जाने क्या साबित करना चाहा है। यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूं कि खुद विमल थोरात को लेकर यह पहला अवसर रहा है कि मैं उनसे निराश हुआ। वरना मैं उनके अब तक लिखे को बहुत सम्मान के साथ देखता था।
जातिवादी विमर्शों का उद्देश्य जाति का उन्मूलन नहीं है तो वो किस काम के हैं। इसका उद्देश्य एक जाति के बरक्स किसी दूसरी जाति को मजबूत करना ही है तो फिर यह घोर जातिवादी विमर्श है। ऐसे जातिवादी दंगल में कोई रुचि कैसे ले ? यह दंगल तो भारत में हजारों साल से होता रहा है। जिन्हें जानना हो वो थोड़ा शोध करें तो जान जाएंगे कि तमाम दलित समझे जाने वाले लोग भी अपने बाहुबल से क्षत्रिय घोषित होते रहे। अंतर इतना है कि इस जातिवाद का लोकतांत्रिक कहलाने वाली सरकारें पाल रही हैं। मीरा कुमार एक दलित महिला हैं !! बाबा साहब का कोई अध्येता यह बताए कि बाबा साहब की परिभाषा के अनुसार मीरा कुमार दलित हैं क्या ? केन्द्रिय मंत्री रहे जगजीवन राम की पुत्री को किस छुआछुत या दमन का सामना करना पड़ा है ? और यदि एक केन्द्रिय मंत्री की उच्च पर आसीन,उच्च शिक्षित बेटी आज तक अपने जातिगत वर्गीकरण(पढ़ें घेटोआइजेशन) से नहीं निकाल पाई है तो फिर वो कब निकलेगी।
मुस्लिमों के लिखने वाले मुस्लिम विद्वानों के नाम के आगे क्यों नहीं लिखा जाता कि मुस्ल्मि लेखक। ठीक इसी तरह ब्राह्मण,सिक्ख,क्षत्रिय,इसाई भी लिखना चाहिए। फिर दलित क्यों ??
जाति से दलित वर्ग से आना कोई विचारधारा नहीं है। यदि कोई लेखक दलित है और दलितवाद का पैरोकार है तो उसके नाम के आगे दलितवादी लेखक लिखिए। और दलितवादी विशेषण का प्रयोग उन सभी लेखकों के लिए करिए जो कि दलितवाद के पैरोकार है। ऐसा न हो कि दलितवादी को दलित की तरह जातिसूचक संदर्भ में प्रयोग करने लगे !! सभी जानते है कि सभी औरतें नारीवादी नहीं होती !! ठीक उसी तरह दलितवादी को हमें विचारधारा के रूप में बरतना चाहिए न कि जातिगती खांचे में ढकेले गए चिंतन के रूप में। ताकि मार्क्सवादी,समाजवादी,पंूजीवादी की तरह दलितवाद का वैचारिक पक्षधरता स्पष्ट हो सके। लेकिन हिन्दी वाले हैं कि दलित शब्द का जातिवाचक अर्थों में खुल्लम-खुल्ला प्रयोग करते हैं।
बाबा साहब ने जातिगत संबोधन से मुक्ति तथा वर्गीय अवस्थिति के आधार पर वंचित-शोषित तबके को दलित कहा और चाहा कि दूसरे भी इसे स्वीकार करें। लेकिन आज विडंबना यह है कि दलित शब्द भी जातिसूचक सम्बोधन का पर्यायवाची बन चुका है। आज किसी को चमार या दुसाध कहने के बजाए दलित कहा जाता है लेकिन उनके प्रति हिकारत और अपमान का बोध वही पुराना रहता है। यानि दलित नाम की एक नई जाति का निर्माण हो गया !!! अब दलित समुदाय को हिन्दु समुदाय के समतुल्य रख कर देखे। हिन्दुओं के समुदाय में जो स्थिति ब्राह्मणों की है वही स्थिति दलितों में चमारों की है। अनसूचित जनजाति समुदाय में मीणा लोगों की स्थिति हिन्दु समुदाय के ब्राह्मणों के ही समान है। पिछड़े समुदाय में वही स्थिति यादवों की है। यानि हर वर्ग के भीतर एक ब्राह्मण वर्ग पैदा हो चुका है जो उस वर्ग के हिस्से की मलाई का सबसे बड़ा हिस्सा चाट जाता है।
मैंने कुछ इशारे भर किए हैं। जरूरत पड़ी तो आंकड़ों के साथ बहस हो सकती है। ऊपर मैंने जो टिप्पणी लिखी है और इस टिप्पणी के पाठ की विडंबना है कि मेरी जाति सार्वजनिक हाते ही समस्त वैचारिकी एक तरफ जातिवादी पाठ एक तरफ। फिलवक्त यही उम्मीद है कि बौद्धिक समाज ऐसी बचकानी ऐतिहासिक भूलें करने से बचने की कोशिश करेगा।
abhay ji,
mujhhe ek bat batiye aapko kese pata chal ki me dalit hoon ya nahi?
aapki or meri chintaye ek hain. dalit hote hue bhi me dalit lekhan ke nam par adhkachara vimarsh karne valo se khafa hoon. ek lecturer ki baat me likh hi chuka hoon. dharmvir ka lekhan mujhe fascist aur narivirodhi lagata hai, vimal ji ke lekhan ne mujhe kabhi prabhavit nahi kiya, ha valmiki ji ka shuraati lekhan mujhe bahut pasand aaya, unki khaniya meri pasdida kahaniyo me shamil hai or tulsiram ka research mujhe bahut pasand hai. agar aap chahe or kahenge to zarrur hi me mere un pasandida lekhako ke nam bhi bata dunga jo jati se dalit hai, lekin bahut achcha likhate hai, unke liye chintaye yvapak hai.
aap ke post vimal thorat par kendrit tha, isliye maine comment me ullekh karna zaruri nahi samjha lkin mere comment me “in logo…..” se aashay vimal ji or unske aas-pas ki mandali se hi tha.
mujhe is baat ka behad dukha hua (halank shuru me hansi aayi tyhi) ki aapne mujhe sawarnwad ke sath joda, yah aapki nihayat hi ghatiya mansikata hai, jisake tahat aap yah man lete hai ki dalit ki aalochana ka adhikar kisi geer dalit ko nahi hona chahiye.
बिकास जी
मुझे उम्मीद है कि मैंने अपनी प्रथम टिप्पणी में आपका कोई अपमान नहीं किया था। आपके पहले कमेंट को मैंने दुबारा तिबारा पढ़ा। मेरी समझ में आप का कमेंट कहीं न कहीं समूचे दलित लेखन को एक तराजु में तौलता नजर आया। और जैसा कि आपने माना है कि किसी के सवर्ण या दलित होने से उसकी अवधारणा निर्धारित नहीं की जा सकती। यह हमारे लिए भी सही है।
आपने खुद रेखांकित किया है कि धर्मवीर के लेखन की सीमाएं क्या हैं ! उसी तरह हंस के संपादकीय में एक तथाकथित संपादकीय में एक दलित ने ब्राह्मणों का यशगान किया है। वैसा संपादकीय किसी ब्राह्मण ने लिखा होता तो उसका मानमर्दन हो चुका होता। लेकिन उस लेखक को…….
आपने मुझसे पूछा है कि मुझे कैसा पता चला कि आप दलित हैं कि नहीं !! मैंने अपने कमेंट में कहीं भी यह निर्धारित नहीं किया है कि आप की जाति क्या है। न जाने, आपको ऐसा क्यों लगा ? आपने बहुत ही कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए मेरी मानसिकता को घटिया कहा है। खैर,आपकी निजी राय के कारणें की पड़ताल संभव नहीं है। न ही उसकी जरूरत है। बिकास जी अगर बात बहस की है तो यह पूछा जा सकता है कि आप दलित है या सवर्ण यह मैं अभी भी कैसे जान सकता हूं ? जब तक आपकी सार्वजनिक पहचान जाहिर न हो तो कोई भी सिर्फ स्वम्भू दावे से किसी पर विश्वास नहीं करेगा। अब उस पर बात हो जाए जो मैंने कहा था।
मैंने लिखा था कि आपके कमेंट में वही जातिवाद झलक रहा है…….आपके कमेंट में ऐसी कोई ध्वनी है या नहीं इसका निर्णय हम दोनों के बीच कोई तीसरा ही कर सकता है। मैं आपके कमेंट को देवनागरी में टाइप कर के लगा रहा हूं। जो कोई तीसरा पढंेगा निर्णय करेगा।
बिकास का पहला कमेंट –
“बहुत खूब। इन लोगों की यही दिक्कत है। कुछ आता जाता नहीं है, पढ़ नहीं सकते, किसी विमर्श के लायक दिमाग है नहीं, तो दलित होने का सहारा लेते हैं। अभी-अभी मेरे केन्द्रिय विश्वविद्यालय में लेक्चरर एक मित्र की कहानी छपी, मैंने पूछा की आपने लेख नहीं लिखकर कहानी क्यों लिखी तो उनका जवाब था, लेख में दस किताबें पढ़ना होती है, जिसका मेरे पास वक्त नहीं था। आगे की बात समझने लायक है, अगर कोई उस कहानी की आलोचना करेगा तो उसे दलित विरोधी कह दिया जाएगा।”
आपके दूसरे कमेंट में आपने ने अन्य जो विचार व्यक्त किए हैं उनसे मेरी पूरी सहमति है।
mera pahala comment purnath aapke post ke sandharbha me hi tha, koee galat fahamee na rahe isliye apne dusare comment me usko spasht bhi kar diya. yaha repeat kar raha hoon (kuch proof ki galatiya thik karte hue)..
“aap ka post vimal thorat par kendrit tha, isliye maine comment me unka ullekh karna zaruri nahi samjha lekin mere comment me “in logo…..” se aashay vimal ji or unke aas-pas ki mandali se hi tha.”
abhay ji, meri or aapki chintaye ek hai, me jab pahala comment likh raha tha to mere dhhyan me sirf aapka post tha, me sirf us par comment kar raha tha, uske bahar nahi, or jab aapka post vimal ji par kendrit hai to us par comment me “in logo” ko likhane ka matlab hi yah hai ki vimal ji or inhi tarah lekhan kerne vale log. Dalit vimarsh ne vimarsh ki duniya me naye aayam jode hai, aaj bhi vah utna hi mahtvapurn aur zaruri hai jitna shuruaat ke samay tha, mera virodh sirf unse hai jo dalit l3ekhan ke nam par kamaee kar rahe hai or sahi mayano me unka dalit lekhan ya fir hashiye par ji rahe logo ke prati contribution kuchh nahi hai. lekin jaise me yah baat kahata hoon, fir me dalit virodhi ho jata hoon, or mujhe sunana padata hai ko ‘aapke sawarn kalamgissu lekhak ne contribut kiya hai.’
aapko nahi laga hoga lekin maine apne aapko apmanit anubhav kiya, jab aapka likha yah vakya pada, “……जो आपके किसी भी तथाकथित सवर्ण कलमघिस्सु से बेहतर….” is vakya me ‘आपके’ laga kar aapne mujhe sawarnvad se nahi joda to kya kiya. agar esa prayog main ya koee bhi aapke sath karta to aapko bhi dukh hi hota. usi dukh me kade shabdo ka prayog kar gaya.
aapne likha ki ‘आपके दूसरे कमेंट में आपने ने अन्य जो विचार व्यक्त किए हैं उनसे मेरी पूरी सहमति है।’ isliye me jyada nahi likh raha hoon, lekin sahi bat yah hai ki mera pahal comment sirf comment tha or dusara spashtikaran- basically dono me koee antarrvirodh nahi hai. sara confusion ‘in logo’ shabd se hua. mera in logo se tatpary kahi par bhi samuch lekhan nahi hai, or ho bhi nahi sakta kyoki me baat achce lekhan or bure lkhan ki kar raha tha, na ki dalit or ger dalit lekhan ki.
Bikas ji
mera net kyi din se kharab hai isliye jawab dene me deri huyi. aapne meri jis pankti par aapatti jatayi hai use dubara padhane ke bad mai aapki bat se sahmat hu. usase galt dhvani nikalti hai. ummid hai aap is anyatha nhi lenge. kshanik aawesh me mujhse aisi truti huyi hogi. mai iske liye kshmaprarthi hu.
shes bato par humari ray kamobesh ek hai isliye itna hi.
केवल दलित होने से ही न तो कोई दलित चिंतक हो जाता है और न ही प्रगतिशील। दलित चिंतक होने के लिए जरूरी है कि कोई व्यक्ति बुद्ध, फुले और अंबेडकर की प्रगतिशील विचारधारा में विश्वास करता हो, जातिभेद समाप्त करने में विश्वास करता हो, हर प्रकार के आर्थिक, सामाजिक, लैंगिक, राजनीतिक शोषण को समाप्त कर शोषणहीन व्यवस्था में विश्वास करता हो। और यह विश्वास केवल दिखावे में ही नहीं होना चाहिए संस्कारों के स्तर तक होना चाहिए।
लेकिन होता यह है कि शासक वर्ग की विचारधारा ही शासित वर्ग की विचारधारा बन जाती है। इस बनने में शासक वर्ग का प्रचार तंत्र बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिक निभाता है, इसीलिए ब्राह्मणवाद का विरोध करते-करते कभी-कभी अनजाने में ब्राह्मणवादी विचारधारा के कई कीटाणु दलितों में भी आ जाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि अपने विचार और भावबोध को निरंतर अंबेडकरवाद की सान पर पैना किया जाता रहे। और दुनिया के सभी जन समर्थक, प्रगतिशील आंदोलनों के प्रति सहयोगी रवैया अपनाया जाए।
जहाँ तक विमल थोरात और नामवर सिंह की बहस का मामला है, इसकी थोड़ी गंभीर पड़ताल करने की जरूरत है। यदि यह मान लिया जाए कि विमल थोरात बिलकुल सही कह रही हैं तो भी यह टिप्पणी ब्राह्मणवाद का विरोध करते-करते ब्राह्मणों और सवर्णों के विरोध तक चली जाती है, ऐसा न हो, इसके प्रति अंबेडकरवादी चिंतकों को सजगता बरतनी चाहिए।
जहाँ तक नामवर सिंह या अन्य मार्क्सवादियों को सवाल है, ब्राह्मणवाद और सवर्णवाद यानी शासक वर्ग की विचारधारा को चुनौती देना उनकी प्राथमिकता नहीं रही। गाँधी और लोहिया के प्रति तो मार्क्सवादियों ने फिर भी पुनर्विचार किया है, अंबेडकर और फुले उनकी कृपादृष्टि से अभी भी वंचित हैं। रंगानायकम्मा ने अपनी कुतर्की शैली में जिस तरह अंबेडकर और बुद्ध पर हमला किया है, और जिस तरह मार्क्सवादियों ने उस पर साजिशाना चुप्पी साधी हुई है, वह बहुत कुछ बयान कर जाता है।
पर अंबेडकरवादी लेखक मार्क्सवादियों की तरफ आशा की दृष्टि से क्यों देखें? वे अपना खुद का रास्ता चुनें और पूरी दुनिया को शोषणहीन बनाने के लिए वैचारिक नेतृत्व प्रदान करें।
केवल दलित होने से ही न तो कोई दलित चिंतक हो जाता है और न ही प्रगतिशील। दलित चिंतक होने के लिए जरूरी है कि कोई व्यक्ति बुद्ध, फुले और अंबेडकर की प्रगतिशील विचारधारा में विश्वास करता हो, जातिभेद समाप्त करने में विश्वास करता हो, हर प्रकार के आर्थिक, सामाजिक, लैंगिक, राजनीतिक शोषण को समाप्त कर शोषणहीन व्यवस्था में विश्वास करता हो। और यह विश्वास केवल दिखावे में ही नहीं होना चाहिए संस्कारों के स्तर तक होना चाहिए।
लेकिन होता यह है कि शासक वर्ग की विचारधारा ही शासित वर्ग की विचारधारा बन जाती है। इस बनने में शासक वर्ग का प्रचार तंत्र बढ़ चढ़ कर अपनी भूमिक निभाता है, इसीलिए ब्राह्मणवाद का विरोध करते-करते कभी-कभी अनजाने में ब्राह्मणवादी विचारधारा के कई कीटाणु दलितों में भी आ जाते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि अपने विचार और भावबोध को निरंतर अंबेडकरवाद की सान पर पैना किया जाता रहे। और दुनिया के सभी जन समर्थक, प्रगतिशील आंदोलनों के प्रति सहयोगी रवैया अपनाया जाए।
जहाँ तक विमल थोरात और नामवर सिंह की बहस का मामला है, इसकी थोड़ी गंभीर पड़ताल करने की जरूरत है। यदि यह मान लिया जाए कि विमल थोरात बिलकुल सही कह रही हैं तो भी यह टिप्पणी ब्राह्मणवाद का विरोध करते-करते ब्राह्मणों और सवर्णों के विरोध तक चली जाती है
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