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अब पांच रुपये में मिलेगी चौथी दुनिया, पन्‍ने भी कम होंगे

29 September 2009 No Comment

chauthi duniya mast headदिल्‍ली से दोबारा शुरू हुआ साप्‍ताहिक अख़बार चौथी दुनिया अपनी दूसरी यात्रा में कोई असर नहीं छोड़ पा रहा है। बल्कि पाठकों की ओर से खार‍िज़ कर दिये जाने के बाद इसके प्रबंधन ने नयी रणनीतियों पर काम करना शुरू कर दिया है। अब चौथी दुनिया का जो अंक आपके सामने होगा, वो सिर्फ 16 पृष्‍ठों का होगा और इसके लिए महज पांच रुपये चुकाने होंगे। हालांकि 16 पृष्‍ठों के लिहाज़ से ये मूल्‍य भी ज़्यादा हैं, क्‍योंकि इससे कम कीमत में दैनिक अख़बार 20 से 24 पन्‍ने देते हैं। इससे पहले चौथी दुनिया 20 पन्‍ने का था और हर पन्‍ने की कीमत थी एक रुपये। यानी चौथी दुनिया का एक अंक पढ़ने के लिए आपको 20 रुपये हॉकर को देने होते थे।

चौथी दुनिया को अपने पुनर्प्रकाशन के पहले दिन से ही पाठकों ने रिजेक्‍ट कर दिया। मैगज़ीन कॉर्नर्स में पॉलीपैक में बंद चौथी दुनिया 99 फीसदी अनसोल्‍ड होती रही। हालांकि दोबारे शुरू होने से पहले बड़ा हव्‍वा खड़ा किया गया था। लेकिन इसकी डमी ने ही बता दिया कि चटख रंगों के बारे में अराजक नज़रिया इस अख़बार को ले डूबेगा। वही हुआ। अब दोबारे इस अख़बार को रिलॉन्‍च करने की रणनीति बनायी जा रही है। पांच अक्‍टूबर को इसका ये अख़बार नोएडा में शिफ्ट हो रहा है। अब तक इसका संपादकीय कामकाज कनॉट प्‍लेस से चलता रहा है। जगह-जगह होर्डिंग्स भी लगाने की योजना बन रही है। फिलहाल नयी दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के पास एक होर्डिंग लगायी गयी है।

chauthiduniya-first-issueपहली बार एक विज्ञापन एग्‍ज़ीक्‍यूटिव चौथी दुनिया ने बहाल किया है। अब तक इसके जितने भी अंक निकले, उसमें एक भी विज्ञापन नहीं छपा। अगले अंक में एयरटेल सहित चार-पांच विज्ञापन नज़र आएंगे। लेकिन सबसे ख़ास बात है कंटेंट, जो अब तक चौथी दुनिया में पत्रकारिता के सभी मानकों को धता बताते हुए सनसनी की सवारी करता रहा। कहने को इस अख़बार के पास एडिटर (इनवेस्‍टीगेशन) भी है, लेकिन इसके दर्जनों अंकों में एक भी इनवेस्‍टीगेटिव स्‍टोरी नहीं छपी। पहले अंक में भी मोसाद की स्‍टोरी भी दूसरे अख़बार की कवर स्‍टोरी से उड़ायी गयी थी। ज़्यादातर फ्रीलांसर्स से काम चलाया जाता है और एमजे अकबर के संपादन में निकलने वाली पाक्षिक पत्रिका कोवर्ट के आधे अंक के अनुवाद से। यानी हम चौथी दुनिया को कोवर्ट का आधा-अधूरा हिंदी संस्‍करण कह सकते हैं। साहित्‍य के नाम पर एक सतही स्‍तंभ छपता है, जिसमें कभी साहित्यिक बुज़ुर्गों को निशाना बनाया जाता है, तो कभी साहित्यिक पत्रिका के कवर डिज़ाइन को।

अफ़सोस इस बात का है कि चौथी दुनिया की रिलॉन्चिंग में कंटेंट को कोई जगह नहीं मिली है। लिहाजा मोहल्‍ला लाइव उसकी नयी शुरुआत को शुभकामनाएं भी दे तो कैसे?

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