छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के तरीक़े पर सवाल क्‍यों?

बहस के लिए

Chhatradhar Mahato 1अभी जब लालगढ़ में छत्रधर महतो गिरफ़्तार हुए, तो बिरादराना अस्मिता के हिमायती पत्रकारों की एक बड़ी फौज कलम लेकर उठ खड़ी हुई। “बंगाल पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया” और “पुलिस के धोखे से पत्रकारों की जान ख़तरे में, मीडिया ख़ामोश” जैसे नारों के साथ वर्चुअल पन्‍ने रंगे गये। लेकिन सवाल ये है कि पुलिस ने क्‍या ग़लत किया? जिसे वह पकड़ना चाहती है, उस तक पहुंचने के लिए उसने वही हथकंडे अपनाये, जिसका चलन पहले भी रहा है। वह आम आदमी के वेश में भी आरोपियों को पकड़ती रही है, तब तो किसी मीडिया वाले ने ये सवाल खड़ा नहीं किया कि पुल‍िस का ये तरीक़ा आम आदमी के भरोसे से खिलवाड़ है? छत्रधर महतो से हमारी सहानुभूति हो सकती है, क्‍योंकि वो लालगढ़ में व्‍यवस्‍था के खिलाफ़ जन-संघर्ष के नायक हैं – लेकिन मीडिया-एक्‍सपोज़र को लेकर उनके आकर्षण ने ही उन्‍हें पुलिस के जाल में फंसा दिया। पुलिस ने वही किया, जो उसका चरित्र है – लेकिन पुलिस के तरीक़े पर कुछ मीडिया-बुद्धिजीवियों का स्‍यापा अहंकार और विशिष्‍टताबोध के आग्रहों से भरा हुआ है। इसलिए क्‍योंकि जब तहलका रक्षा सौदों में दलाली से पर्दा उठाने के लिए स्त्रियों का इस्‍तेमाल करता है, तो इसी तर्क के आधार पर ये भी कहा जा सकता है कि तहलका ने स्‍त्री जाति के नाम पर विश्‍वासघात किया। लेकिन हम ऐसा नहीं कहते, क्‍योंकि इस तरह हम हर उस मुखौटे के इस्‍तेमाल से महरूम हो जाएंगे, जो विभिन्‍न नागरिक रूपों के होते हैं और स्टिंग के दौरान हम जिनका इस्‍तेमाल करते हैं। मुझे लगता है कि छत्रधर महतो के मामले में भी सिस्‍टम ने इसी तरीक़े को जनसंघर्ष के ख़‍िलाफ़ इस्‍तेमाल किया है। फिर भी ये मुद्दा व्‍यापक बहस की मांग करता है। आप क्‍या कहते हैं?

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