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“मोहल्‍ला लाइव बंगाल पुलिस का दलाल हो गया है!”

30 September 2009 9 Comments

बंगाल पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया

आनलाइन हस्ताक्षर द्वारा विरोध अवश्य करें

पश्चिम बंगाल की सीआइडी पुलिस ने मीडिया के नाम पर विश्वासघात किया है। लालगढ़ आंदोलन के चर्चित नेता छत्रधर महतो को पकड़ने के लिए पुलिस ने पत्रकार का वेश बनाकर 26 सितंबर को ऐसा किया। यह मीडिया के प्रति लोगों के भरोसे की हत्या है। यह मीडिया की स्वायत्तता का अतिक्रमण है। यह बेहद शर्मनाक, आपत्तिजनक एवं अक्षम्य अपराध है। इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए। इस संबंध में तत्काल एक स्पष्ट कानून बनना चाहिए। कृपया अपना विरोध दर्ज कराने के लिए यहां क्लिक करके प्रधानमंत्री के नाम पत्र पर आनलाइन हस्ताक्षर करें

http://www.petitiononline.com/wbmisuse/petition.html

कल एक साथी ने कहा कि मोहल्‍ला लाइव पुलिस का दलाल हो गया है। वे हंस कर टालना चाह रहे थे, लेकिन मामला गंभीर था। संदर्भ आप समझ रहे हैं। छत्रधर महतो की गिरफ़्तारी के लिए बंगाल पुलिस का पत्रकार बनने का स्‍वांग। हमने सिर्फ यही सवाल उठाया कि बंगाल पुलिस ने अगर पत्रकार बन कर अपने लक्ष्‍य में कामयाबी पा ली, तो पत्रकारों को मिर्ची क्‍यों लग गयी? बहुत सारे मौक़ों पर बर्बर और शातिर जैसी संज्ञाओं से पुलिस को नहलाने वाले मीडिया को अगर पुलिस ने दुलत्ती दी है, तो अपनी चारित्रिक विशेषताओं का ही एक नमूना दिखाया है। ऐसा तो है नहीं कि पुलिस इस प्रकरण में ही साज़‍िश कर रही हो और बाक़ी तमाम पिछले कारनामों में पवित्रता से काम करती रही हो? हमारा सवाल यही था कि मीडिया का शोर एक धूर्तता भरा शोर है। यही मीडिया जब लालगढ़ में पुलिस की कार्रवाई चल रही थी, आदिवासियों के ख़‍िलाफ़, जनता के ख़‍िलाफ़ रिपोर्टिंग कर रहा था। मुझे एक भी रिपोर्टिंग दिखाइए, जो वहां के लोगों का पक्ष रही हो। नहीं मिलेगी। वही मीडिया आज अपने इस्‍तेमाल पर पुलिस पर बरस रहा है। उसे ऐसा करने का कोई हक़ नहीं है। इस मीडिया की विश्‍वसनीयता आज दो कौड़ी की भी नहीं है। ज़्यादातर पत्रकारों को इस मुल्‍क से कोई मतलब नहीं है, अपने स्‍वार्थ से मतलब है। आज मेल से एक पीटीशन पर हस्‍ताक्षर करने के अनुरोध का मेल आया, तो यही भाव मन में जगे। आप ज़रूर पुलिस के ख़‍िलाफ़ इस पीटीशन पर हस्‍ताक्षर कीजिए। मैं भी करूंगा। लेकिन सिर्फ मीडियाकर्मी होने के नाते नहीं। पूरी आम जनता से दर्द का रिश्‍ता होने के चलते। पुलिस के धोखे का एक और नमूना सामने आने के चलते।

आप क्‍या कहते हैं?

9 Comments »

  • अभय said:

    इस पोस्ट का लेखक कौन है ?

  • sorvb said:

    होगा कौण? मॉडरेटर ही होवेगा

  • अविनाश (author) said:

    माफ़ कीजिएगा। नाम देना भूल गया। इस पोस्‍ट को मैंने लिखा है।

  • Abhishek Srivastava said:

    अजीब बात है…

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    ‘मोहल्‍ला लाइव’ ने नेट पत्रकारि‍ता के नि‍यमों के अनुरूप वस्‍तुगत प्रस्‍तुति‍ का ख्‍याल रखते हुए काम कि‍या है,आशा है भवि‍ष्‍य में भी यह स्‍प्रि‍ट बनी रहेगी।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    लालगढ से हाल ही में गि‍रफतार कि‍ए गए बागी नेता छत्रधर महतो फि‍लहाल पुलि‍स हि‍रासत में हैं। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स उनसे पूछताछ कर रही है। पूछताछ के नाम पर अब प्रेस में ‘आधि‍कारि‍क तथ्‍य’ भी आने लगे हैं। राज्‍य पुलि‍स के एक अधि‍कारी ने प्रेस को बताया छत्रधर महतो का एक करोड़ रूपये का जीवन बीमा पॉलि‍सी है। ऐसा स्‍वयं महतो ने पुलि‍स को बताया है । इसमें सत्‍य क्‍या है यह तो जीवन बीमा नि‍गम ही बता पाएगा। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि‍ क्‍या क्षत्रधर महतो को एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी कराने का हक है ? नागरि‍क के नाते छत्रधर महतो को यह हक है,इसके बावजूद मीडि‍या में यह बात कुछ इस तरह पेश की जा रही है गोया ,एक करोड़ की बीमा पॉलि‍सी का हक उसे नहीं है, उसका ऐसा करना अवैध है। दूसरा सनसनीखेज तथ्‍य पुलि‍स ने यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के पास उड़ीसा के मयूरभंज में एक मकान है। क्‍या मकान होना अपराध है ? तीसरा सनसनीखेज तथ्‍य यह दि‍या है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ के लि‍ए चंदा देने वालों में 150 लोगों के नाम हैं ,इनमें अनेक वि‍ख्‍यात लेखकों और संस्‍कृति‍कर्मियों के नाम हैं। वस्‍तुगत तौर पर पुलि‍स को ये सारे तथ्‍य अदालत में रखने चाहि‍ए थे। पुलि‍स का जांच के तथ्‍यों को अदालत को बताने से पहले सीधे प्रेस को कानून की अवमानना है। इससे एक चीज जाहि‍र है कि‍ पुलि‍स की लालगढ में कत्‍ल कर रहे लोगों तक पहुँचने में कोई दि‍लचस्‍पी नहीं है, उसकी सारी दि‍लचस्‍पी उन चीजों में है जि‍नका लालगढ में मारे गए नि‍र्दोष लोगों की मौत से कोई लेना देना नहीं है। छत्रधर महतो करोडपति‍ है या खाकपति‍ है इस चीज का लालगढ के कत्‍लेआम और अराजकता से कोई संबंध नहीं है। आश्‍चर्य की बात है कि‍ मीडि‍या ने भी पुलि‍स के द्वारा दी गयी सूचनाओं को मुखपृष्‍ठ पर बड़ी खबर बनाया है। यह गलत को सही और अवैध को वैध बनाने की मीडि‍या साजि‍श है। मीडि‍या की पुलि‍सि‍या गुलामी है। पुलि‍स को छत्रधर महतो के बारे में चल रही जांच-पड़ताल को इस तरह सार्वजनि‍क करने का कानूनी हक नहीं है।
    दूसरी ओर मीडि‍या को तथ्‍य,सत्‍य,वैध,अवैध में फर्क करना चाहि‍ए। मीडि‍या बेहूद‍ी के कारण मीडि‍या की साख खत्‍म हो चुकी है। इससे भी बड़ी बात यह है कि‍ छत्रधर महतो के नेतृत्‍व में चलने वाली ‘पुलि‍स दमन वि‍रोधी कमेटी’ वैध संगठन है। उसके लि‍ए चंदा लेना और देना कानूनन वैध है। अत: इस कमेटी को चंदा देने वालों की राष्‍ट्रद्रोही के रूप में प्रस्‍तुति‍ सही नहीं है। इस संदर्भ में ‘एसोसि‍एशन फॉर प्रोटेक्‍शन ऑफ डेमोक्रेटि‍क राइटस’ (एपीडीआर) प्रधान सुजातो भद्र का कहना है कि‍ ”पुलि‍स के सामने दि‍या गया बयान अदालत में ग्रहण योग्‍य नहीं होता। कोई नहीं जानता कि‍ आखि‍रकार कि‍न परि‍स्‍थि‍ति‍यों में यह बयान लि‍या गया है। यह भी हो सकता है पुलि‍स चुनकर या वि‍कृत करके मीडि‍या को सूचनाएं दे रही हो। पुलि‍स आन्‍दोलन को लांछि‍त करना चाहती है।” सुजातो भद्र ने सही कहा है ” पीसीपीए को चंदा देना अपराध नहीं है।”

  • Rajeev Kunwar said:

    Jagdeshwar je aap bhe chanda de dijiye. Likhne main kya jata hai. Arajakta kya hote hai ese samajhna aur bat hai likhna aur. maut per likhna bahut asan hai. waise aap budhejewe ho. kuch bhe stand le sakte ho. – Rajeev

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    राजीव कुंवर जी, समस्‍या मेरे या उसके चंदा देने की नहीं है। पश्‍चि‍म बंगाल पुलि‍स यदि‍ मीडि‍या ट्रायल चलाएगी तो लालगढ के हत्‍यारों पर से ध्‍यान हट जाएगा। माकपा के सदस्‍यों और हमदर्दों को जि‍स तरह अकारण मौत के घाट उतारा जा रहा है उसके बारे में ज्‍यादा केन्‍द्रि‍त होकर चर्चा होनी चाहि‍ए,दूसरी बात यह कि‍ पश्‍चि‍म बंगाल की पुलि‍स यदि‍ कोई गलती करती है तो उसकी सार्वजनि‍क आलोचना होनी चाहि‍ए। लालगढ का पुलि‍स ऑपरेशन ठीक है,हमने उसका समर्थन भी कि‍या है किंतु इसके बारे में प्रचार अभि‍यान की जो पद्धति‍ पुलि‍स ने अपनायी है वह सही नहीं है। जो बुद्धि‍जीवी खुलेआम लालगढ में कत्‍लेआम का समर्थन कर रहे हैं,वे गलत रास्‍ते पर हैं। उन्‍होंने अंध कम्‍युनि‍स्‍ट वि‍रोध का मैकार्थीवादी मार्ग चुन लि‍या है उन्‍हें वि‍चारधारात्‍मक तौर पर नंगा कि‍या जाना चाहि‍ए। यह काम पुलि‍स नहीं कर सकती, बुद्धि‍जीवी ही कर सकते हैं। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि‍ माकपा और वामदलों के पास हजारों बुद्धि‍जीवि‍यों की फौज है,ये ऐसे बुद्धि‍जीवी हैं जो वि‍चारधारा और सर्जनात्‍मक क्षमता में आज भी बेजोड़ हैं। सवाल यह है कि‍ लालगढ में चल रहे अहर्नि‍श कत्‍लेआम पर वे चुप क्‍यों हैं ? वे लोग लोकतंत्र और शांति‍ के प्रति‍ हमेशा प्रति‍बद्ध रहे हैं उन्‍हें वि‍गत चार महीनों में मीडि‍या में चुप्‍पी लगाए देख रहा हूँ। हम चाहते हैं कि‍ लालगढ में जो कज्‍लेआम माओवादी मचा रहे हैं,साथ ही देश के दूसरे इलाकों में वे जि‍स तरह का हिंसाचार कर रहे हैं उसको ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुँचाया जाए,यह कार्य तथ्‍य और सत्‍य की रक्षा करते हुए होना चाहि‍ए। कि‍सी भी बुद्धि‍जीवी के लि‍ए वह दुर्भाग्‍य का दि‍न होगा कि‍ वह हिंसकों को चंदा दे। जि‍न बुद्धि‍जीवि‍यों ने लालगढ में कत्‍लेआम करने वालों को चंदा दि‍या है वे नैति‍क तौर पर हत्‍याओं के लि‍ए जि‍म्‍मेदार हैं। लेकि‍न पुलि‍स को इस प्रसंग में जि‍तने भी तथ्‍य मि‍लते हैं उन्‍हें अदालत को सबसे पहले बताना चाहि‍ए। पुलि‍स के जरि‍ए माओवादि‍यों के खि‍लाफ प्रचार अभि‍यान चलाकर पश्‍चि‍म बंगाल सरकार को न तो नैति‍क बल मि‍लेगा और नहीं राजनीति‍क लाभ ही होगा। पुलि‍सि‍या प्रचार अंतत: हत्‍यारों की मदद करता है।

  • मुशर्रफ़ अली said:

    नन्दीग्राम, न्यूक्‍लीयर डील और हेनरी किसिंजर के भारत आने का मतलब?
    मुशर्रफ़ अली

    शांति के नोबिल पुरस्कार से सम्मानित हेनरी किसिंजर अपने जमाने के एक मंझे हुए राजनयिक रहे हैं। उन्होंने मध्यपूर्व की राजनीति में अमरीका और इज़राइल के हितों की रक्षा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, इसलिये उन्हें शांंती का नोबिल पुरूस्कार, कैम्प डेविड सम-हजयौता कराने व मध्यपूर्व में निभायी उनकी भूमिका के लिये ही दिया गया था। साम्राज्यवाद की सेवा का उनका लम्बा काल रहा है इसीलिये उनके अनुभवों को देखतें हुये ही संकट के इस दौर में उन्हें भारत भेजा गया है। अमरीकी अरबपति जान डी राकफ़ेलर की ही तरह वह भी तीसरी दुनिया के देशों की ब और `यूज़लेस ईटर´ सम-हजयकर उनकी आबादी को नियंत्रित किये जाने की योजना पेश की थी। यह दस्तावेंज़ अभी भी एन.एस.एस.एम.200 के नाम से इण्टरनेट पर उपलब्ध है। यूं तो उन्हें शाँती का नोबिल पुरूस्कार दिया गया था लेकिन वह कभी शाँती के पक्षधर रहें नहीं हैं। 11 सितम्बर को `वल्र्ड ट्रेड सेन्टर´ पर हुये हमले के बाद पत्रकारों ने जब उनसे पूछा था कि इस समय अमरीका को क्या करना चाहिये तो उनका जवाब था कि वही करना चाहिये जो उसने पर्लहार्बर पर जापानी हमले के बाद किया था। अर्थात द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जिस तरह अमरीकी राष्ट्रपति ट्रूमैन ने जापान पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिराकर तीन लाख से अधिक बेगुनाह जापानियों की हत्या कर दी थी इसी तरह वर्तमान अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश को भी इराक़ और अफ़गानिस्तान पर परमाणु बम गिरा कर हैरी.एस.टुरूमेन का अनुकरण करना चाहिये। यह उद्गार थे शाँती के नोबिल पुरूस्कार विजेता श्री हैनरी किसिंजर के। वही हैनरी किसिंजर जो ज़िन्दगी के अन्तिम पड़ाव पर सक्रिय राजनीति से अलग जीवन गुज़ार रहे थे। उनके साथ और किन मुदद्ों पर बात हुई और डील को सफ़ल बनानें के लिये कौन सी योजना उन्होने श्री अडवानी जी को सम-हजयायी इसका खुलासा नहीं हो पाया है।

    इसके बाद से ही कूटनीति के इस महारथी की कार्यवाही भारत में शुरू हो जाती है। योजना यह है कि संसद में परमाणु मुददे् पर होनें वाली बहस से पहले सी.पी.एम. को बंगाल में इतना उल्-हजया दिया जाये कि उसकी `बारगेनिंग पावर´ कमज़ोर पड़ जाये, बाद को होने वाली घटनायें उसी योजना का एक हिस्सा है। सबसें पहले मीडिया को मैनेज किया गया और तब आपने देखा होगा कि हर एक चैनल पर स्वंयभू रक्षा विशेषज्ञ (सही नाम हथियार दलाल), व विदेशी मामलों के विशेषज्ञ ( सही नाम जयचंद ) नज़र आने लगे, वह सभी वहाँ आयोजित बहसों में भारत अमरीकी दोस्ती के लाभ गिनाकर उसकी पुरजा़ेर वकालत करते नज़र आ रहे थेे। यही वह वक्त है जब नन्दीग्राम में आग भड़कादी गयी। नन्दीग्राम जहाँ बंगाल सरकार ने कैमिकल उद्योग लगाने के लिये योजना बनायी थी जिसे व्यवहार में नहीं लाया गया था लेकिन जमीन अधिग्रहण किये जाने की सम्भावना के मुददे्पर स्थानीय लोगों को भड़का दिया गया। इसपर बंगाल सरकार ने 3 फ़रवरी 2007 को इस नन्दीग्राम योजना को ही रदद् करने की घोषणा करके विवाद को समाप्त कर दिया था। अब केवल सरकार यह चाहती थी कि नक्सलवादियों और त्ऱणमूल कांग्रेस के लोगो ने नन्दीग्राम क्षेत्र से आतंकित करके भगा दिये गये 3500 लोगों को जो एक साल से खजूरी नामक स्थान पर कालिज में बनाये शरणार्थी कैम्प में रह रहे थे, उनके घरों में वापस पहुँचा दिया जाये। लेकिन जैसे ही उन्हें पहुँचाने का प्रयास किया जाता उनपर सी.पी.एम. के विरोधियों और अमरीकी साम्राज्यवाद के औज़ार के रूप में इस्तेमाल हो रहे नक्सलवादियों द्वारा हमला कर दिया जाता । विस्थापितों को उनके घर पहुँचाने के इस प्रयास को ही राज्यपाल ने सी.पी.एम. द्वारा नंदीग्राम के गांवों को `रिकैप्चर´ करना कहा यानि उन्होनें अपने इस बयान से यह स्वीकार कर लिया कि उन गांवों पर त्रणमूल और माओवादियों का कब्ज़ा है। यहीं से शुरू होती है भारत की जनता को गुमराह करने वाली मीडिया की भूमिका । जार्ज बुश के राष्ट्रपति बनने पर आयोजित शपथग्रहण समारोह में आमंत्रित पूँजीपति श्री सुब्रत राय के चैनल `सहारा समय´ को तो जैसे सी.पी.एम. के खिलाफ़ दुश्:प्रचार का ठेका ही दे दिया गया था, वह चौबीस घन्टे बिना विज्ञापन के वाममोर्चे के खिलाफ़ दुश्प्रचार में जुट गया। एन.डी.टी.वी, नन्दीग्राम में हथियार चलाते जिन लोगों को माओवादी बता रहा था `सहारा समय´ उन्हें सी.पी.एम. कार्यकर्ताओं के रूप में पेश कर रहा था। किसी न किसी माध्यम से चर्चा में बनी रहने की ख्वाहिशमंद सुश्री मेधापाटेकर को जो विस्थापितों के हक़ के लिये संघर्ष करने वालों के रूप में पहचानी जाती हैं उन्हें इस बार घर उजाड़ने वालों के पक्ष में बंगाल पहुँचाया गया था। नन्दीग्राम के हालात ठीक नहीं हैं ऐसे में वहाँ कोई उनपर हमला न कर दे इस मकसद से उन्हें वहाँ जाने से रोका गया बस इससे वह भड़क उठीं और भूख हड़ताल पर बैठ गयीं, उधर सुश्री ममता बनर्जी ने इस्तीफ़ा देने का अपना पुराना नाटक शुरू कर दिया।
    तो यह है हैनरी किसिंजर और उनकी कूटनीति का कमाल कि उन्होने आते ही तमाम स्वंय सेवी संगठनों, रूपर्ट माडोZक के सभी बगलबच्चों, हथियार दलालों और भारत में विभिन्न आवरणों में कार्यरत साम्राज्यवादी मशीनरी को वामपंथियों के खिलाफ़ पूरी तेज़ी से सक्रिय कर दिया और इसके बाद से ही विदेशी फण्डों से चलने वाले एन.जी.ओ. ने पाल्तू बुद्धिजीवियों के लाव-ंउचयलश्कर के साथ बंगाल कूच का हुक्म दिया। दूसरी तरफ़ साम्प्रदायिक ताकतों ने मोर्चा संभाल लिया। अमरीका का विरोध करने का नतीजा 12 नवम्बर को की गयी हड़ताल में देखा जा सकता है जिसमें साफ़तौर पर त्रणमूल के कार्यकर्ता बाकायदा अपनी पार्टी का -हजयण्डा लिये बसों को जलाते व तोड़फा़ेड़ करते देखे जा सकते थे लेकिन चैनल वहाँ पहली बार नक्सलवादियों की कारगुज़ारियों को नज़रअन्दाज़ करके उनकी तारीफ़ करते नज़र आ रहे थे क्योंकि उन्हें काँटे से काँटा निकालना था और तीस साल से जमी हुई सी.पी.एम. पूंजीवाद के लियेे चुनौती बन गयी थी इसलियें त्रणमूल की इस तोड़फोड़ को भी सी.पी.एम के मत्थे मने में नाकाम रेडिकल वामपंथी, वाममोर्चे के खिलाफ़ ऐसा माहौल बनाने में लग गये हैें जिससे वह संसद में न्यूिक्लयर डील पर होने वाली बहस पर अपना ध्यान केिन्द्रत नहीं रख पायें और यही अमरीका चाहता भी है। सुब्रतराय के `सहारा समय´ चैनल पर 11 नवम्बर को जव सीपीएम पोलिट ब्यूरो की दिल्ली में मीटिंग जारी थी समाचार में कहा जा रहा था कि नन्दीग्राम के कारण क्या सीपीएम की न्यूिक्लयर डील पर बारगेनिंग पावर कमज़ोर हुई है, ऐसा लगता था कि चैनल हैनरी किसिंजर को संबोधित हो और उन्हें यकीन दिला रहा हो कि जो `टास्क´ आपने दिया है उसे पूरा करने में हम पूरी ताकत से लगे हुयें है। और यही मकसद था श्री हैनरी किसिंजर के भारत आने का। लेकिन इससे भी ज़्यादा संकटों को -हजयेल चुके वामथिंयों ने केवल 11 नवम्बर को नन्दीग्राम पर चर्चा की, 12 नवम्बर में पोलिट ब्यूरो की मीटिंग में न्यूिक्लयर डील ही उनका वास्तविक ऐजेण्डा था। अब भी बंगाल में सारा हंगामा उसी योजना की एक कड़ी है । इधर विरोधी इस बात से खुश है कि बहुत दिनों बाद सी.पी.एम. से दुश्मनी निकालने का मौका मिला है तो उधर अमरीका में बैठेे हेनरी किसिंजर इस बात पर मन ही मन मुस्क्रा रहे होंगे कि जो काम वह भारत में अपने लोगों को सौंंप कर आये हैं वह सही दिशा में जारी है।

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