Articles Archive for October 2009
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, शब्द संगत »
उत्तमा दीक्षित ♦ प्रलय के दौरान मनु और श्रद्धा का प्रेम मुझे प्रेरक लगा। कल्पना की उस समय की। मैं जैसे खो सी गयी। मैंने तत्काल पेपर पर स्केच बनाना शुरू किया और देखते ही देखते मनु का चित्र उतर आया। बेशक, अन्य कल्पनाओं की तरह यह कल्पना भी मुश्किल नहीं थी। पहले चित्र का स्केच मनमुताबिक आना शुरू हुआ तो उत्साह बढ़ा। हालांकि विषय की संवेदना और भाव-भंगिमा को चित्र में उतारने में बाद में खासी मेहनत करनी पड़ी। प्रलय के कारण भावशून्य हुए मनु के रूप में मुझे मन दिखाना था और श्रद्धा के रूप में दिल। रहस्य, स्वप्न, आशाएं, कर्म, काम, वासना, आनंद, लज्जा, ईर्ष्या और चिंता के भावों का चित्रण करना सचमुच चुनौतीपूर्ण है।
मोहल्ला दिल्ली, समाचार, सिनेमा »
उमेश पंत ♦ सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में ओसियान की रंगत ख़त्म। ओसियान के पिटारे से निकली सौ से ज़्यादा देशी-विदेशी फिल्मों का लुत्फ लोगों ने खूब लिया। पर कई लोगों की ये शिकायत भी रही कि इस बार ओसियान की टिकट महंगी हो गयी। तीन सौ रुपये की रजिस्ट्रेशन फीस कई लोगों को रास नहीं आयी। वैसे इस बार ओसियान में लोगों की आवाजाही पिछले सालों की अपेक्षा कम रही। हो सकता है फीस का बढ़ना इसके कारणों में से एक हो। खैर इस फिल्म फेस्टिवल की समाप्ति के बाद अब सिरीफोर्ट में स्लोवाक फिल्मों का दौर चलने वाला है। आपमें से कई के लिए ये राहत की बात हो सकती है कि यहां फिल्में मुफ्त में दिखाई जाएंगी।
मोहल्ला मुंबई, शब्द संगत, समाचार »
विभा रानी ♦ मुंबई में 8वां महिला नाट्यलेखक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन यानी Women Playwright International (WPI) 1 से 7 नवंबर, 2009 तक मुंबई विश्वविद्यालय के अकेडमी ऑफ थिएटर आर्ट तथा स्त्री मुक्ति संघटना, मुंबई के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है। WPI के गठन का उद्देश्य थिएटर के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाना है। इस बार के सम्मेलन की थीम है, उदारता व सहिष्णुता (Liberty and Tolerance)। इसके सब थीम में हैं, अपनी पहचान, संस्कृति और उसकी विभिन्नता, अहिंसा के रास्ते जीवन जीना, पितृसत्तात्मकता की चुनौतियां, सामाजिक-राजनीतिक विश्व में थिएटर की भूमिका, थिएटर में हास्य आदि हैं।
मोहल्ला दिल्ली, शब्द संगत, समाचार »
संवाददाता ♦ “हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी” का मुद्दा पुराना रहा है। इसी विषय को लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र ने अपने दूसरे स्थापना दिवस और अल्युमनी मीट के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। यह संगोष्ठी दो दिन 28-29 अक्टूबर 2009 तक चली, जिसमें साहित्य और मीडिया जगत के चर्चित नामों और जेएनयू के पूर्व छात्रों को आमंत्रित किया गया। हिंदी-उर्दू भाषा का यह झगड़ा पाकिस्तान के विभाजन का एक मूल कारण था, क्योंकि लोगों ने हिंदी को हिंदू और उर्दू को मुसलमानों की भाषा के रूप में स्वीकार किया। भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो चमनलाल ने हिंदुस्तानी भाषा को प्रेमचंद की विचारधारा से जोड़ कर बताया।
मोहल्ला दिल्ली, स्मृति »
जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ कैंपस में चौकसी और मीटिंगें चल रही थीं। आसपास के इलाकों में जेएनयू के बहादुर छात्र अपनी पहलकदमी पर जाकर आग बुझाने का काम कर रहे थे। सारा कैंपस इस आयोजन में शामिल था। श्रीमती गांधी के अंतिम संस्कार होते ही उसके बाद वाले दिन हमने दिल्ली में शांतिमार्च निकालने का फ़ैसला लिया। मैंने दिल्ली के पुलिस अधिकारियों से प्रदर्शन के लिए अनुमति मांगी। उन्होंने अनुमति नहीं दी। हमने प्रदर्शन में जेएनयू के शिक्षक और कर्मचारी सभी को बुलाया। जेएनयू के अब तक के इतिहास का यह सबसे बड़ा शांतिमार्च था। इसमें सारे कर्मचारी, छात्र और सैंकड़ों शिक्षक शामिल हुए। ऐसे शिक्षकों ने इस मार्च में हिस्सा लिया था, जिन्होंने अपने जीवन में कभी किसी भी जुलूस में हिस्सा नहीं लिया था।
नज़रिया, मीडिया मंडी, समाचार »
जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ मीडिया के द्वारा जिन स्रोतों के जरिये ख़बरें दी जाती हैं, उनकी भी दशा सोचनीय है। आमतौर पर पुरुषों के स्रोत के आधार पर ख़बरें तैयार की जाती हैं। प्रकाशित ख़बरों में 85 फ़ीसदी ख़बरें पुरुष स्रोत के हवाले से लिखी गयीं। इनमें 92 फ़ीसदी गोरे थे। यही स्थिति भारत की भी है, यहां पर अधिकांश ख़बरों के स्रोत पुरुष हैं और हिंदू हैं। और अधिकतर ख़बरें पार्टीजान स्रोत से लिखी जाती हैं। हमें भारत के संदर्भ में यह भी देखना चाहिए कितनी ख़बरें खाते-पीते, खुशहाल लोगों के स्रोत के आधार पर लिखी गयीं और कितनी गरीबों के स्रोत के आधार पर लिखी गयीं?
ख़बर भी नज़र भी, नज़रिया, मीडिया मंडी, मोहल्ला पटना, समाचार »
अरविंद शेष ♦ ‘अपराधियों के आतंक से मुक्त बिहार’ के प्रचार में मशगूल मीडिया के लिए खुद बिहार सरकार की ओर से विधानसभा में पेश आंकड़े अगर कोई मायने नहीं रखते तो इसके कारण समझना बहुत मुश्किल नहीं है। विपक्ष की ओर से घेरे जाने के बाद बाकायदा विधानसभा में अपराध के आंकड़े सामने रखते हुए सरकार ने कहा कि अकेले 2008 में केवल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के 4,415 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 1,028 मामले बलात्कार और दुष्कर्म के और 902 मामले महिलाओं और लड़कियों के अपहरण के थे। इसके अलावा पिछले छह महीने में 1,571 हत्याएं, 37 फिरौती वसूलने, 346 डकैती, राहजनी की 80, लूट की 395 और बैंक लूट की एक घटना थाने में दर्ज की गयी।
मोहल्ला दिल्ली, समाचार, सिनेमा »
मिहिर पंड्या ♦ एक बार ओम शिवपुरी साहब ने अपने साहबज़ादे को एक चपत रसीद कर दी। अब कर दी तो कर दी। साहबज़ादे ने जवाब में अपने पिता से पूछा कि क्या आपके वालिद ने भी आपको बचपन में चपत रसीद की थी? तो उन्होंने जवाब में बताया, हां। और उनके पिता ने भी।। फिर जवाब मिला, हां। और उनके पिता ने भी? शिवपुरी साहब ने झल्लाकर पूछा, आख़िर तुम जानना क्या चाहते हो? तो जवाब में उनके साहबज़ादे ने कहा, “मैं जानना चाहता हूं कि आख़िर यह गुंडागर्दी शुरू कहां से हुई!” तो इसी तरह मैं भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए जो काम आजकल करता हूं, इसकी असल शुरुआत कहां से हुई, इसे जानने के लिए मैं सिनेमा के सबसे शुरुआती दौर की यात्रा पर निकल पड़ा…
समाचार »
जगदीश्वर चतुर्वेदी ♦ 2009 टैक्नोरती ब्लॉग सर्वे हाल ही में प्रकाशित हुआ है। विश्व ब्लॉग जगत का यह सबसे बड़ा सर्वेक्षण है। विश्व ब्लॉग सर्वे में पाया गया कि टेलीविजन, ब्लॉग और सोशल मीडिया इन तीन माध्यमों का ज़्यादा उपभोग हो रहा है। सर्वे में शामिल ब्लॉगरों ने बताया कि वे सर्च और शेयरिंग के काम पर औसतन तीन घंटे प्रति सप्ताह और वीडियो पर प्रति सप्ताह दो घंटा खर्च करते हैं। ब्लॉग लेखकों में अधिकांश ऐसे हैं, जो प्रति सप्ताह ऑनलाइन अखबार-पत्रिका पढ़ने पर 2-3 घंटे खर्च करते हैं। ब्लॉग लेखकों में मात्र 20 प्रतिशत अपने ब्लॉग अपडेट करते हैं। 80 प्रतिशत अपडेट नहीं करते। मात्र 13 प्रतिशत हैं, जो मोबाइल के जरिये अपने ब्लॉग को अपडेट करते हैं।
रिपोर्ताज »
चंदन पांडेय ♦ झूठ के ऊंचे पहाड़ों पर टिके सत्यम की दास्तान सबके सामने है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे छात्रों ने सत्यम से जुड़े सभी आंकड़ों को रट लिया होगा। कितने करोड़ का हवाला हुआ? कितने कर्मचारी प्रभावित हुए? कौन-कौन से बड़े नाम जुड़े हैं? सॉफ्टवेयर की दुनिया के दूसरे खिलाड़ियों पर इसका क्या असर होगा? इन विषयों पर कितनी स्याही खर्च की गयी होगी, ये किसी को शायद ही पता हो। इसलिए सत्यम से जुड़ी तमाम बड़ी बातों को रोज़ होने वाली चर्चा पर छोड़ते हुए हम अपनी बात एक मोहल्ले, उसके निवासियों तथा उनके रोज़गार की करते हैं।



