लेखक की प्रतिबद्धता कैसे तय होगी, कौन तय करेगा?
♦ रंगनाथ सिंह
लेखक की प्रतिबद्धता को लेकर अक्सर सवाल खड़े किये जाते रहे हैं। पीछे मुड़ कर देखा जाए तो वामपंथियों ने इस मुद्दे पर काफी बहसें भी की हैं। आज (1991 के बाद) की वैश्विक परिस्थिति में यह बहस फिर से ज़रूरी हो गयी है। हाल फिलहाल की बात करें तो हिंदी जगत में उठी ऐसी किसी बहस में यह स्पष्ट नहीं होता है कि मूल मामला व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अहम की टकराहट का है या फिर वैचारिक अहमतियों और संघर्षों का? विगत वर्षों में हिंदी जगत में लेखकीय प्रतिबद्धता का प्रश्न बार-बार उठता रहा है। विज्ञापन से लेकर विमोचन तक पर वैचारिक खुदबुदाहटें होती रही। सम्मान और पुरस्कार को लेकर स्वीकार और प्रतिकार की वैचारिक नारेबाजी होती रही है। इन बहसों की सीमा यह थी कि इनमें से ज्यादातर बहसें किसी एक लेखक के खिलाफ सुनियोजित तरीके से आहूत बहसें दिखीं। आरोपित और आरोपी दोनों ने इस प्रश्न को सीमित और संकुचित दायरों में रख कर आरोप-प्रत्यारोप की अंताक्षरी खेली। कोई भी बहस “मैं अंधा तो तू कोढ़ी” से आगे नहीं बढ़ सकी। मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखने से सभी बचते दिखे। हमें लगा कि एक बार इस मुद्दे को बीच बहस में लाना जरूरी है। इसलिए यह बहसतलब लेख लिखा है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हिंदी जगत में उठे हालिया विवाद ही इस लेख का प्रस्थान बिंदु हैं।
हिंदी में सर्वाधिक चर्चित तीनों वामपंथी लेखक संगठन संसदीय वामपंथी हैं। इसलिए इनसे जुड़े लेखकों से क्रांतिकारी वामपंथी लेखकों सरीखी अपेक्षाएं नहीं रखी जा सकती हैं। संसदीय वामपंथ के लेखकों की पक्षधरता भी संसदीय तरीके से अभिव्यक्ति होगी!
संसदीय प्रणाली ऐसी प्रणाली है कि आप को हमेशा अपने राजनीतिक विपक्षी के साथ एक ही छत के नीचे बैठना पड़ता है। ऐसे में कौन किसके साथ किस मंच पर जाकर बैठता है, इसको अत्यधिक तूल देना कहीं न कहीं ब्राह्मणवादी शुचितावाद और अछूतवाद से प्रेरित दिखता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आस्था जताने के बाद साझा मंच शेयर करने का सवाल उठाने वालों की राजनीतिक दृष्टि को समझना कठिन हो जाता है। एक ही मंच से कोई वामपंथी अपनी बात कहे और दक्षिणपंथी भी अपनी बात कहे, तो यह राजनीतिक रूप से सही है या ग़लत, इस पर एक खुली बहस होनी ही चाहिए।
मैं प्रलेस से जुड़े लेखकों की राजनीतिक नीयत के ऊपर कोई सवाल खड़ा नहीं करना चाहता। लेकिन यह प्रश्न जरूर उठता है कि जिस राजनीतिक संगठन से यह लेखक संघ जुड़ा दिखाई देता है, खुद उस दल की आज की राजनीति में क्या प्रासंगिकता है? वह दल परिवर्तन की राजनीति के लिए क्या कर रहा है? और ऐसे संगठन से वर्षों से जुड़े हुए लेखक खुद को किस तरह की जमीनी राजनीति का पक्षधर मानते हैं?
इस संदर्भ में प्रलेस के राजनीतिक जुड़ाव पर खगेंद्र ठाकुर का बयान एक अलग ही परिप्रेक्ष्य सामने रखता है।
“नामवर जी को पता है कि लेखन के क्षेत्र में ऑफिशियल मार्क्सवाद उसी दिन समाप्त हो गया, जब सन उन्नीस सौ तिरपन में प्रगतीशील लेखक संघ के दिल्ली अधिवेशन में कम्युनिस्ट पार्टी का यह संदेश लेकर ईएमएस नंबूदरीपाद गये थे कि प्रगतिशील लेखक संघ को भंग कर दिया जाए और लेखकों ने इसे नहीं माना, उसे जारी रखा।”
(प्रगतिशील आंदोलन के इतिहास पुरुष, पृष्ठ 113, खगेंद्र ठाकुर, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली / 2008)
वामपंथी राजनीति में लेखक संगठन और राजनीतिक दल के बीच जिस तरह का स्पष्ट संबंध आवश्यक माना जाता है, उसके संदर्भ में खगेंद्र ठाकुर के बयान के बाद समूचा प्रलेस ही सन 1953 से एक गैर-राजनीतिक संगठन रहा है। फिर खुद को राजनीतिक कहने वाले लेखक 1953 से 2009 तक इस संगठन से क्यों जुड़े रहे?
यही सवाल जलेस से भी पूछा जा सकता है कि जिस राजनीतिक दल से यह संगठन जुड़ा हुआ है, उसकी हालिया राजनीति पर इस संगठन के लेखकों का स्पष्ट स्टैंड कब और किस मंच पर सामने आया। उनकी पार्टी के हालिया कृत्यों और शीर्ष नेतृत्व पर बैठे नेताओं के बयानों से वामपंथ के मुंह पर जो स्याही पुती है, उस पर जलेस के लेखकों की क्या राय है?
नंदीग्राम, सिंगूर के संदर्भ में सुमित सरकार, महाश्वेता देवी की तर्ज पर जलेस के किन वरिष्ठ लेखकों का नाम लिया जा सकता है?
जसम इनमें सर्वाधिक नया संगठन है। एक नौजवान के खाते में किसी बुजुर्ग के बनिस्बत पापों की संख्या कम होने के स्पष्ट जैविक कारण होते हैं। यही बात संगठनों के लिए भी सच है। जातिवाद, सांमतवात, सुविधावाद, अवसरवाद इत्यादि छींटों से यह संगठन अपने दामन को किस हद तक बचा सका है, इसका जवाब लेकर जसम के लेखकों को सामने आना चाहिए। किसी संगठन पर इनमें से कोई भी आरोप लगते हैं, तो उसके राजनीतिक निहितार्थ हैं। किसी संगठन का अपनी सुविधा और सहूलियत के अनुसार किसी खास लेखक के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज कराना भी एक राजनीतिक कर्म है। राजनीति को विस्तृत आयाम में रखने पर ऐसे ही दूसरे कई प्रश्न भी उठेंगे!
अपनी तरफ से बहस की शुरुआत करते हुए मैं क्षमा करो हे वत्स, टुकड़े टुकड़े शालिग्राम, शहर कोतवाल की कविता, नालंदा पर गिद्ध जैसी चर्चित कहानियों के लेखक देवेंद्र का यह बयान प्रस्तुत करता हूं। देवेंद्र के सामने मैंने लेखक की प्रतिबद्धता का सवाल रखा। देवेंद्र ने इस प्रश्न का जवाब सीधे नहीं दिया। उन्होंने कहा कि यही प्रश्न उन्होंने अपने लेखन के शुरुआती दौर में रामविलास शर्मा के सामने रखा था। देवेंद्र के अनुसार रामविलास जी ने लेखक का मूल्यांकन करने के लिए उन्हें चार प्रतिमान बताये। इन प्रतिमानों का महत्व क्रमवार ही है। सबसे पहले प्रथम को देखना होगा, फिर दूसरे को और उसके बाद क्रमशः बाकी दोनों को देखना होगा।
रामविलास शर्मा के अनुसार किसी लेखक का मूल्यांकन करते वक्त हमें निम्न चार बातों का इसी क्रम में ध्यान रखना चाहिए।
लेखक ने जिस समाज का जो चित्रण किया है, वो कितना प्रमाणिक है? यानि उसका लिखा यथार्थ के कितने करीब है?
लेखक उस समाज के अंदर मौजूद अंतरविरोधों और संघर्षों को कितनी बारीकी और सफलता के साथ चित्रित कर पाया है?
इन संर्घषों को चित्रित करते वक्त उसकी पक्षधरता किसके साथ है, शोषक वर्ग के साथ या शोषित वर्ग के साथ? अपने लेखन में वह जिन मूल्यों की वकालत करता है, वो किस वर्ग के मूल्य हैं, शोषिक वर्ग के या शोषित वर्ग के?
लेखक अपनी पक्षधरता को किस राजनीतिक विचारधारा के माध्यम से आगे ले जाना चाहता है?
अब यह मुद्दा जेरे-बहस है कि आखिरकार लेखक की प्रतिबद्धता कैसे तय होगी?
नोट : यह बहस सिर्फ प्रलेस, जलेस, जसम को लेकर नहीं है। इसके दायरे में समूचा हिंदी लेखक समुदाय है। हिंदी के अधिकांश लेखक इन्हीं तीनों संगठनों से जुड़े रहे हैं। इसके लिए इन तीनों संगठनों का मुखर उल्लेख किया गया है।













AAj ke samay mein lekhkon ka bhari patan hua hai, lekin mushkil yeh hai ki abhi bhi ispar koi bat nahin karna chahta. Ab sangathan kewal kuch logon ke labh uthane ke sadhan matra reh gaye hain. Unmein bahut safai ki jarurat hia. Vyaktigat labh lene wale, vampanth par kayam na rahane wale, gair pratibadh logon ko bahar kar, vastwik karykartaon ko jimmedari sopna chahiye tabhi sahi arthon mein sangthan bach sakenge.
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