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वे मज़दूर थे, इसलिए उनकी मौत पर सरकार मौन है!

8 October 2009 5 Comments

आलोक प्रकाश पुतुल, बाल्‍को नगर से

कोरबा के पास बाल्‍कोनगर में हुए एक हादसे में सरकार के मुताबिक 47 मज़दूर मारे गये। अपने ही बताये आंकड़ों के आक्रोश में फ़ौरन कार्रवाई की बात की गयी, लेकिन दो हफ़्ते गुज़र गये, कार्रवाई की सुगबुगाहट तक नज़र नहीं आ रही है। सरकार चुप है तो उसकी मंशा समझी जा सकती है, लेकिन मीडिया क्‍यों चुप है? क्‍या छत्तीसगढ़ के मीडिया के लिए 47 मज़दूरों की मौत का सवाल बेमानी हो चुका है? या फिर आरोपी कंपनी वेदांता ने मीडिया वालों के मुंह पर पैसों की पट्टी चिपका दी है? जो भी है, मुद्दा तब तक ज़‍िंदा रहेगा, जब तक इंसाफ़पसंद लोग अपनी ज़‍िम्‍मेदारी निभाते रहेंगे। पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने इस पूरे प्रकरण पर विस्‍तार से रिपोर्ट फाइल की। यह पहले रविवार डॉट कॉम में छपा और अब इसे मोहल्‍ला लाइव पर प्रस्‍तुत कर रहे हैं : मॉडरेटर

vedanta_balco_mishap_aslamबाल्‍को में घरों को रौशन करने के लिए बनायी जा रही विशाल चिमनी ने ही सैकड़ों घरों को हमेशा-हमेशा के लिए अंधेरे में डुबा दिया है। रोजी-रोटी के लिए झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश से आये मज़दूर छत्तीसगढ़ की औद्योगिक नगरी कोरबा से सटे बाल्‍को में बनायी जा रही इस चिमनी के मलबे में दफन हो गये। अब वेदांता के बिजली संयंत्र और बाल्‍को नगर में केवल चर्चा के दौर हैं। इस चर्चा में किस्से हैं, आंकड़े हैं, तर्क हैं, अफवाह हैं, झूठ के कुतुबमीनार हैं और इन सब के साथ भयावहता है।

इस हादसे को पंद्रह दिन हो गये हैं। वेदांता के संयंत्र में मलबा निकालने का काम करने वाली भीमकाय मशीनों का शोर थम चुका है। मलबे के हर ढेर को सांस रोक कर देखने वाले लोग अब घटनास्थल पर नहीं हैं। क्षत-विक्षत लाशों को निकालने वाले राहत दल के सदस्य अपने घरों को लौट चुके हैं। कथित रूप से ‘सील’ कर दिये गये पूरे घटनास्थल के बाहर पुलिस के जवान ऊंघते, गप्प मारते और चाय पीते हुए अलसायी दोपहरी में कुर्सियों पर पसरे हुए हैं।

सामने विशाल मलबे का ढेर है। छड़, मिट्टी, सीमेंट, रेत, कीचड़। वेदांता का दावा है कि हमने चिमनी का फर्श देखने के बाद मलबा हटाने का काम बंद कर दिया क्योंकि हमारी राय में इससे अधिक खुदाई की ज़रूरत नहीं है। मलबे से 41 मज़दूरों की लाशें निकाली गयी हैं और इसके अलावा 6 मजदूर घायल हुए हैं।

शाम के साथ आयी मौत

छत्तीसगढ़ का कोरबा राज्य का पावर हब कहा जाता है। 2001 में कोरबा तब चर्चा में आया जब एनआरआई उद्योगपति अनिल अग्रवाल की लंदन में रजिस्टर्ड कंपनी वेदांता-स्टरलाइट ने 551 करोड़ रुपये में भारत सरकार के उपक्रम भारत एल्युमीनियम कंपनी यानी बाल्‍को की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी थी। तब से बाल्‍को पर अनिल अग्रवाल की वेदांता का कब्जा है और वेदांता के साम्राज्य का विस्तार लगातार जारी है।

फिलहाल वेदांता के इस साम्राज्य में 6-6 सौ मेगावाट के दो पावर प्लांट के लिए चिमनी बन रही थी। इस चिमनी के आसपास काम करने वाले मज़दूर बताते हैं कि 23 सितंबर को रोज की तरह काम चल रहा था और दिन के शिफ्ट में काम करने वाले मज़दूर कुतुब मीनार से कोई चार गुना ऊंची, 270 मीटर की इस चिमनी को पूरा करने के लिए जुटे हुए थे। पिछले कुछ महीनों में इस चिमनी को 230 मीटर की ऊंचाई तक बनाया जा चुका था।

कोई चार बजने को आये थे कि तेज हवाएं चलने लगीं और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी। वेदांता के ही दूसरे उपक्रमों में काम कर रहे मज़दूर आसपास के कैंटिन, स्टोर रूम और ऐसे ही अस्थायी टिन शेडों में छुपने लगे। फिर इलाके की बिजली गुल हो गयी और इससे पहले कि मज़दूर कुछ समझ पाते, कथित रूप से भूकंपरोधी 230 मीटर ऊंची चिमनी हवा का दबाव नहीं सह पायी और धंसनी शुरू हो गयी। पूरा ढांचा धंसने और लहराने लगा और मिनटों में ही जमीन में धंसती हुई चिमनी अस्थायी टिन शेडों में बनाये गये कैंटिन और कार्यालयों के ऊपर भरभरा कर गिर गयी।

आसपास काम कर रहे मज़दूरों की मानें तो चिमनी के गिरते ही चारों तरफ कोहराम मच गया। चीख-पुकार के बीच अंधेरे में लोगों ने अपने परिजनों को तलाशना शुरू कर दिया। अपने तईं लोगों ने चिमनी के मलबे में और टिन शैड में फंसे लोगों को निकालने की सफल-असफल कोशिशें की। लेकिन जिन्हें यह सब कुछ करना चाहिए था, वे माजरा समझते ही वहां से फरार हो गये। बाल्‍को की मालिक कंपनी यानी लंदन में रजिस्टर्ड अनिल अग्रवाल की स्टरलाईट-वेदांता, इस चिमनी को बनाने वाली चीन की कंपनी शैनदोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन यानी सेपको और उसकी ठेका कंपनी जीडीसीएल के लोग अपने दफ्तरों में ताला लगाकार वहां से भाग खड़े हुए। असहाय मज़दूर रोते-चीखते-चिल्लाते रहे।

बचाव के बदइंतज़ाम

vedanta_balco_mishap_korbaघटना की ख़बर तेज़ी के साथ बाल्‍को नगर में फैली और दो घंटे भर के भीतर पूरा प्रशासनिक अमला घटनास्थल पर पहुंच चुका था। किसी तरह रोशनी का इंतज़ाम हुआ और फिर शुरू हुआ राहत और बचाव का काम। वैसे इसे बचाव का काम कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि यहां तो केवल मलबे से लाशें निकालने का ही काम बचा था। लेकिन सबसे बड़ा संकट यही था कि मलबा हटाने का काम कैसे शुरू हो? जिला प्रशासन के लिए यह काम नया था और आसपास की सहयोगी कंपनियों एसईसीएल, एनटीपीसी, लैंको, छत्तीसगढ़ पावर कंपनी, नगर निगम के पास भी इस तरह की घटनाओं से निपटने के न तो प्रबंध थे और न ही इंतज़ाम। फिर भी जैसे-तैसे काम शुरू हुआ। रात का अधिकांश समय मलबे के आसपास एकत्रित भारी मशीनों को हटाने में ही गुज़र गया। उसके बाद मलबा हटाने की कोशिशें शुरू हुईं। घटना के तीसरे दिन भुवनेश्वर स्थित सीआईएसएफ के विशेष प्रशिक्षण प्राप्त रेस्क्यू ऑपरेशन टीम के आने के बाद मलबा और मजदूरों का शव निकालने के काम में तेजी आयी।

घटना वाले दिन जिले के कलेक्टर अशोक अग्रवाल ने कहा – मलबा जब तक हट नहीं जाता, तब तक कह पाना मुश्किल है कि कितने मज़दूर थे। लेकिन हमारा अनुमान है कि 100 से अधिक मज़दूर होंगे। कोरबा के एसपी रतनलाल डांगी ने कहा – हमारे लिए कह पाना मुश्किल है कि कितने मज़दूर मरे हैं क्योंकि हमें न तो चिमनी बनाने वाली कंपनी सिपको के अधिकारी मिल रहे हैं और न ही वेदांता या जीडीसीएल के अधिकारी। राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा – किसी को बख्शा नहीं जाएगा और मामले की न्यायिक जांच होगी।

लेकिन इस तरह के तमाम दावे और बयानों का झूठ भी इन 15 दिनों में चिमनी की तरह ही भरभरा कर गिर गया है। इन 15 दिनों में आज तक प्रशासन यह बताने की स्थिति में नहीं है कि घटना वाले दिन कितने मज़दूर काम कर रहे थे। हालत ये है कि इस दुर्घटना की जिम्मेवारी अब तक तय नहीं की जा सकी है। न्यायिक जांच के बारे में अब तक यह नहीं पता चला है कि जांच कौन करेगा और उसके बिंदू क्या होंगे। जाहिर है, इतने बड़े हादसे में अब तक किसी की गिरफ्तारी का तो सवाल ही नहीं है।

सरकारी कार्रवाई के फरेब

जहां तक सिपको, वेदांता और जीडीसीएल के अधिकारियों के नहीं मिलने की बात है, प्रशासन ने पहले ही दिन बिना बयान लिये सेपको के 76 चीनी अधिकारियों को अपने संरक्षण में देश से बाहर जाने के लिए भारी सुरक्षा के बीच एयरपोर्ट भी पहुंचाया गया। भला हो केंद्र सरकार का, जिसने इन अधिकारियों के देश छोड़ कर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

लंदन की जिस वेदांता के लिए यह जानलेवा चिमनी बन रही थी, उसके सीईओ गुंजन गुप्ता दूसरे दिन घटनास्थल पर थे लेकिन आज तक न तो गुंजन गुप्ता से पूछताछ हुई और न ही गिरफ्तारी। पूरे मामले की लीपापोती में जुटी राज्य सरकार के अधिकारियों का दावा है कि उन्होंने गुंजन गुप्ता को नोटिस जारी किया है।

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के मज़दूर युनियन से संबद्ध सुधा भारद्वाज पूछती हैं – “जब भोपाल गैस कांड में एंडरसन के प्रत्यार्पण की कोशिश जैसे उदाहरण हमारे सामने हैं, तो इस पूरे मामले के लिए सीधे तौर पर जिम्मेवार वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल और उनके मातहत गुंजन गुप्ता को अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है?”

इसका जवाब कोई भी देने के लिए तैयार नहीं है। ट्राईबल वेलफेयर सोसायटी के प्रवीण पटेल कहते हैं कि राज्य सरकार का जो रवैया है, उससे लगता है कि वह वेदांता के दबाव या प्रलोभन में काम कर रही है और उसका पूरा ध्यान मामले को रफा-दफा करने में है।

सरकार का वेदांता प्रेम

वेदांता जिस जमीन पर चिमनी का निर्माण कर रही है, उस पर वेदांता के बेजा कब्‍जे को लेकर मामला न्यायालय में है। भाजपा सरकार के पिछले कार्यकाल में जब कोरबा निवासी राज्य के वन मंत्री ननकी राम कंवर ने वेदांता के ख़‍िलाफ़ मोर्चा खोला और 1036 एकड़ वन भूमि पर बेजा कब्जे का सवाल उठाया तो हफ्ते भर बाद उनका विभाग छिन गया। उसके बाद यह मामला कोर्ट तक गया। जब मामला कोर्ट में था, उसी समय सरकार ने मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र कवर्धा यानी कबीरधाम का एक बड़ा हिस्सा वेदांता को खनिज उत्खनन के लिए दे दिया। मध्यप्रदेश ने 16 जून 1969 को एक अधिसूचना जारी की थी कि इस इलाके में खनिज उत्खनन का काम केवल सरकारी उपक्रम ही कर सकते हैं। अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी कई कंपनियों को इसी आधार पर यहां उत्खनन की अनुमति नहीं दी गयी। लेकिन वेदांता के लिए इस नियम को किनारे करके बैगा आदिवासी बहुल यह इलाका बाक्साइट खनन के लिए दे दिया गया। बिना आदिवासियों के विस्थापन का काम किये वेदांता ने खनन का काम शुरू कर दिया और सरकार आंख बंद किये बैठी रही।

छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में वेदांता को करोड़ों की जमीन कौड़ियों में दिये जाने को लेकर भी विधानसभा में खूब बहस हुई लेकिन सरकार का वेदांता प्रेम कम नहीं हुआ और सरकार ने लगातार कोशिश की कि करोड़ों की ज़मीन इस तरह कौड़ियों में दिये जाने को जायज ठहराया जा सके। ऐसे में अचरज नहीं कि वेदांता के इस निर्माण को लेकर सरकार का रवैया चुप्पी साधने वाला ही रहा। इसके अलावा जब विपक्ष ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की तो सरकार ने इस मांग को खारिज़ कर दिया गया।

कोरबा के महापौर लखनलाल देवांगन कहते हैं – “हमने इस चिमनी के अवैध निर्माण के ख़‍िलाफ़ वेदांता को कई बार नोटिस जारी किया। यहां तक कि चिमनी हादसे से हफ्ते भर पहले हमने इसका निर्माण कार्य भी रुकवा दिया था। लेकिन वेदांता के अधिकारियों ने चुपके-चुपके फिर से काम शुरू कर दिया। अगर वेदांता ने नियमानुसार काम किया होता तो शायद इतने मज़दूरों की जान नहीं जाती।”

घटिया निर्माण

घटनास्थल से लौटे राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं – “चिमनी निर्माण के लिए घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा था और मैं एक इंजीनियर होने के नाते जानता हूं कि निर्माण कैसे होता है।”

अजीत जोगी मरने वाले मज़दूरों की संख्या पर भी सवाल खड़े करते हैं। लेकिन वेदांता के संवाद प्रमुख बी के श्रीवास्तव सफाई देने वाले अंदाज में कहते हैं – “ ज़‍िला प्रशासन के नेतृत्व में बचाव का काम किया और खुदाई में कुल 41 मज़दूरों की लाशें बरामद हुई हैं। इसके अलावा इस दुर्घटना में 6 मज़दूर घायल हुए हैं।”

क्या आपको लगता है कि चिमनी में केवल 47 मज़दूर काम कर रहे थे और जिन कैंटिन व शेडों पर यह चिमनी गिरी, उसमें कोई नहीं था? श्रीवास्तव कहते हैं – “जो कुछ है, वह सबके सामने है। हमारे पास कोई लिस्ट नहीं है, जिससे यह बताया जा सके कि चिमनी में कितने मज़दूर काम कर रहे थे।”

श्रीवास्तव अपने स्वर में परेशानी का भाव लाते हुए बताते हैं कि 23 सितंबर को बारिश और आंधी के साथ चिमनी पर आकाशीय बिजली गिरी, जिसके कारण यह दुर्घटना हुई। लेकिन श्रीवास्तव इस बात का जवाब नहीं देते कि अगर चिमनी पर आकाशीय बिजली गिरी थी] तो चिमनी में काम करने वाले एक भी मज़दूर के शरीर क्यों नहीं जले या निर्माण में प्रयुक्त छड़ों पर इनका असर क्यों नहीं हुआ? श्रीवास्तव इसके बाद 9/11 के उदाहरण के साथ अपने तर्क गढ़ने लग जाते हैं।

स्थानीय पत्रकार मोहम्मद असलम बताते हैं कि वेदांता ने इस मलबे को जहां फेंका है, वहां मानव शरीर के कई अंग बिखरे हुए हैं, जिन्हें आवारा कुत्ते और दूसरे जानवर खा रहे हैं।

लेकिन बिहार में कभी कबाड़ी के रूप में अपनी जीवन यात्रा शुरू करने वाले वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल के पास अभी इतना वक्त नहीं है कि वो इस तरह की दुर्घटनाओं पर सोचें या इसकी जिम्मेवारी तय करें। लंदन स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट की गयी 1.8 बिलियन यूएस डॉलर वाली इस कंपनी के काम में वे बहुत व्यस्त रहते हैं। और जब व्यस्त नहीं रहते, तो अनिल अग्रवाल अपना खाली समय हिंदी फिल्म देखने, योग करने और कभी-कभी साइकलिंग में गुज़ारना पसंद करते हैं।

5 Comments »

  • Saroj Sagar said:

    अच्‍छी रिपोर्ट। मॉडरेटर ने भी ठीक सवाल उठाया है कि मीडिया क्‍यों चुप है ? यह जरूरी नहीं कि हर पत्रकार को पैसे दिये गये हों। ऐसे मामलों विज्ञापन और मालिकों की आपसी सांठगांठ का खेल चलता है।

    वैसे भी भारत के अभिजात वर्ग और उसके चारण मीडिया की नजर में गरीबों खासकर बिहार-झारखंड के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं होती। उन्‍हें बेचैनी तब होती है जब रईशों के हरम होटल ताज पर बम पटका जाता है। नहीं तो बाढ-अकाल में सैकडों गरीब मर जाएं उन्‍हें कोई चिंता नहीं।

    आलोक प्रकाश पुतुल जी ने यह अच्‍छी जानकारी दी है कि वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल ने बिहार के एक कबाडी के रूप में अपना कैरियर शुरू किया था। इसके बावजूद उनके मन में निचले तबकों के लिए कोई संवेदना नहीं है। इसे कहते है वर्ग चरित्र…

  • aam admi said:

    aaj ke daur me media se koi ummid lagana bemani hai. khaskar us isthiti me, jabki media to ek ‘product’ke taur par treat kiya jaa raha ho.Satta prathisthan dwara mazduron ko kide -makode samjha jaana utna hairatangez nahin jitna ki humara samvedanhin hote jana. jab abhijatya varg aur satta prathisthan ke charitra ko hum bakhubi samajhte hain to woh kaun ki vajah hai jo hamari awaz ko unke khilaaf buland karne se rokti hai?kyon hum in janvirodhi taqaton ke khilaaf nirnayak dhang se khade nahin ho paa rahe? kyon in taqaton ke virudh uthnewali koi awaz akeli paadti jaati hai?

    asli sawal yeh hai ki ek samaj aur rashtra ke taur par hum nirantar jad kyon hote jaa rahe hain. media aur mediakarmi kahin upar se nahin tapke, we isi jad hote jaa rahe samaj ka ek hissa bhar hain. Isliye sirf media ki jadta par baat karne kaam nahin banega, pure samaj ki jadta par samagrata me baat karni hogi.

  • संजय तिवारी said:

    बहुत सही मुद्दा उठाया है.

  • संदीप said:

    मोहल्‍ला में ऐसा मुद्दा उठता देख्‍ा कर एक सुखद आश्‍चर्य हुआ है। जो भी, आलोक की रिपोर्ट को मोहल्‍ला पर दोबारा प्रकाशित करना एक अच्‍छा कदम माना जाना चाहिए…और अविनाश ने सही सवाल उठाया है कि मीडिया इस पर चुप क्‍या है…
    मित्र मीडिया इस पर इसलिए चुप है कि मजदूर को शायद इंसान नहीं माना जाता, न तो ये डीपीएस स्‍कूल में पढ़ने वाले छात्रों का मामला है, न ही किसी अन्‍य अमीरजादे का मामला,इसमें उन लोगों की जान गई है जो देश की धन-संपदा का निर्माण कर रहे हैं लेकिन खुद असुरक्षित, गरीब, बेबस है; 20 रुपये रोज पर गुजारा करते हैं…और बीस रुपये रोज पर गुजारा करने वालों की क्‍या औकात, जो मीडिया उस पर ध्‍यान देगा…

  • Pravin Patel said:

    The chimney has sunk below the soil where in the base there were almost 100 workers but that portion which has sunk is not excavated. There is every chance of many more dead bodies than that of what has been found so far. There were 3 Benches within the walls of chimney at the base where in each bench machine 3 workers were working and about 30 workers were supplying them the material.

    The statement of Vedanta P.R.O. is false, misleading and an effort to hide the truth to save their skin. There is an urgent need to excavate the entire area over which the base was constructed. The lightning theory put forward by Vedanta is also ruled out.

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