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वीएन राय ने एक नक़लची को बना रखा है एचओडी

10 October 2009 28 Comments

कल प्रेमरंजन नाम के एक सज्‍जन ने बताया कि कैसे हिंदू सांप्रदायिकता के कट्टर विरोधी के रूप में प्रचारित मगांअंहिंविवि के कुलपति वीएन राय हिंदू कर्मकांडों के चक्‍कर में फंसे हैं। आज हमें मेल से कुछ अख़बारों की कटिंग मिली, जिनमें मगांअंहिंविवि के पत्रकारिता विभाग के एचओडी डॉ अनिल कुमार राय अंकित के बारे में कुछ डीटेल्‍स छपे हैं। ये कतरनें कृष्‍णमोहन सिंह की रिपोर्ट के रूप में हैं। हम यहां कुछ अंश छाप रहे हैं। ताज्‍जुब है कि इन सबको जानते-बूझते न्‍यायप्रिय वीएन राय ने डॉ अंकित को एचओडी क्‍यों बनाया और जब बनाया, तब अगर नहीं पता था तो पता चलने के बाद कार्रवाई क्‍यों नहीं कर रहे हैं : मॉडरेटर

स्‍वदेश, ग्‍वालियर से निकलने वाला एक अख़बार
कुलपति ने नकलची को बनाया एचओडी

Ankit Bookवीएन राय ने अपनी भूमिहार जाति के अनिल कुमार राय अंकित को पत्रकारिता का प्रोफेसर व विभागाध्‍यक्ष (एचओडी) बना दिया। वीएन राय की जातिवादी कृपा से 40 साल की उम्र में पत्रकारिता के प्रोफेसर बन गये अनिल कुमार राय अंकित छात्रों से अपने को पत्रकारिता का सबसे कम उम्र का और सबसे अधिक अंग्रेज़ी व हिंदी में पुस्‍तकें लिखने वाला प्रोफेसर हेड कहने लगे हैं। इस पत्रकारिता गुरु के काले कारनामों में से फिलहाल एक नमूना देखें। डॉ अंकित ने नकल करके जो एक दर्जन से अधिक पुस्‍तकें लिखी हैं, उनमें एक है communication management, listening versus hearing. इस पुस्‍तक के पब्लिशर और डिस्ट्रिब्‍यूटर्स हैं shree publishers & distributors, 20, ansari road, daryaganj, new delhi 110002. यह पुस्‍तक 2006 में प्रकाशित हुई है। 244 पेज की है, मूल्‍य 750 रुपये है। यह पुस्‍तक प्रो. प्रदीप माथुर को समर्पित की गयी है। जब इस पुस्‍तक का अध्‍ययन किया गया, तो पता चला कि यह किस-किस जगह से चोरी कर छापी गयी है।

पेज 1 से 16 – डॉ अंकित ने अपनी इस पुस्‍तक के अध्‍याय 1 मैनेजिंग कम्‍युनिकेशन का 1 से 16 पेज का मैटर राइस यूनिवर्सिटी हस्‍टन टेक्‍सास की वेबसाइट www.pyton.ric.edu पर उपलब्‍ध पुस्‍तक के अध्‍याय 7 इफेक्टिव कम्‍युनिकेशन सेंडिंग एंड रिसिविंग मासेज से नकल किया है। अंकित ने इस पुस्‍तक के 7वें अध्‍याय के पहले व दूसरे पैराग्राफ को छोड़ कर तीसरे पैरा की सातवीं लाइन से अपनी किताब के पेज एक की शुरुआत की है। बीच-बीच में हेडिंग हटा या बदल दी गयी है। रिकग्‍नाइजिंग द सिकर्स फ्रेम ऑफ रिफरेंस की जगह रिकग्‍नाइजिंग द स्‍पीक कर दिया है। इसी तरह पाथवेज टू बेटर कम्‍युनिकेशन की जगह अपनी पुस्‍तक में बेटर वेज ऑफ कम्‍युनिकेशन कर दिया है।

पेज 17 से 62 – डॉ अंकित ने अपनी पुस्‍तक के पेजेज़ 17 से 62 तक की सामग्री रोनाल्‍ड बी एल्‍डलर एवं जार्ज रोडमास की पुस्‍तक अंडरस्‍टैंडिंग ह्यूमन कम्‍युनिकेशन से उतारी है।

पेज 63 से 77 – डॉ अंकित ने अपनी पुस्‍तक के अध्‍याय 2 लिसनिंग वर्सेज हियरिंग के पेज नं 63 से 77 तक की सामग्री यूनाइटेड स्‍टेट के इंग्लिश लैंग्‍वेज प्रोग्राम डिपार्टमेंट ऑफ स्‍टेट की वेबसाइट www.eca.state.gov पर उपलब्‍ध पुस्‍तक इंग्लिश टीचिंग फोरम पीस एजुकेशन के अध्‍याय 4 विंग गुड कम्‍युनिकेटर का केवल शीर्षक हटा कर पूरा का पूरा मैटर नक़ल कर छाप लिया है।

पेज 77 से 88 – डॉ अंकित ने पेज नंबर 77 से 88 तक की सामग्री वाशिंगटन डीसी एएएएस प्रोजेक्‍ट 2061 की वेबसाइट www.project2061.org पर उपलब्‍ध सामग्री साइंस फॉर ऑल अमेरिकन्‍स के अध्‍याय 13 इफेक्टिव लर्निंग एंड टीचिंग से उतारा है। जिसका पहला पन्‍ना छोड़ कर बाक़ी पूरा का पूरा मैटर छाप लिया गया है।

पेज 88 से 111 – नकलची डॉ अंकित ने पेज 88 से 111 तक की सामग्री मिसौरी यूनिवर्सिटी के रूरल साइकोलॉजी विभाग के प्रोफेसर राक्‍स कम्‍प की पुस्‍तक ली‍डरश‍िप गेटिंग इन डन के अध्‍याय 2 और अध्‍याय 4 से लिया है। पहले अध्‍याय 4 की सामग्री अपनी पुस्‍तक के पेज नंबर 88 से 97 तक और फिर अध्‍याय 2 प्रिंसिपल ऑफ वालंटरी लीडरशिप को पेज नंबर 97 से 111 में से हूबहू उतारी गयी है।

पेज 112 से 125 – डॉ अंकित ने अपनी पुस्‍तक के अध्‍याय 3 के 112 से 125 में जो कुछ लिखा है, वह सामग्री यूएस इनवायरमेंटल एजेंसी की वेबसाइट www.epa.gov पर उपलब्‍ध पुस्‍तक के अध्‍याय 11, कम्‍युनिकेशन विद द पब्लिक का केवल पहला पैरा छोड़कर हूबहू छाप लिया है। इसकी हेडिंग बदल कर अपनी पुस्‍तक में पब्लिक कम्‍युनिकेशन कर दिया है।

पेज 125 से 139 – चार विदेशी प्रोफेसरों द्वारा एक साथ मिल कर लिखे एक शोध पत्र को डॉ अनिल कुमार राय अंकित ने हूबहू चुरा कर अपनी पुस्‍तक के अध्‍याय 3 के पेज नंबर 125 से 139 में छाप लिया है। जान हापकिंस यूनिवर्सिटी के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन सिस्‍टम एंड नेटवर्क लाग, कंप्‍यूटर साइंस डिपार्टमेंट की वेबसाइट www.ends.jhu.edu पर वर्ष 2002-03 में यह शोध-पत्र प्रकाशित हुआ है। यह शोध पत्र जान हापकिंस विवि के कंप्‍यूटर साइंस विभाग के Year Amir Je Cristina Nita – Rotaru, जार्ज वाशिंगटन विवि के कंप्‍यूटर साइंस विभाग के Jonathan Stanton और कैलिफोर्निया विवि के इनफॉरमेशन व कंप्‍यूटर साइंस विभाग के Gene Tsudik ने संयुक्‍त रूप से तैयार किया है, जिसका शीर्षक है स्‍केलिंग सेक्‍योर ग्रुप कम्‍युनिकेशन सिस्‍टम : बीयांड पेयर टू पेयर। इस 12 पेज के शोध पत्र में अंत में 35 संदर्भ दिये गये हैं।

पेज 139 से 148 – डॉ अंकित ने अपनी पुस्‍तक के पेज नंबर 139 से 148 में Waikato Hamiton University Newzeland के डिपार्टमेंट ऑफ मैनेजमेंट सिस्‍टम के प्रो. राबर्ट जे माक्‍वीन, हेमी रावू और मिलराय द्वारा संयुक्‍त रूप से लिखे शोध पत्र को ही छाप लिया है। शोध पत्र का शीर्षक हाई इलेक्‍टॉनिक ग्रुप कम्‍युनिकेशन फार कल्‍चर सपोर्ट : मायोरी इलेक्‍ट्रॉनिक नेटवर्किंग इन न्‍यूजीलैंड। यह शोध पत्र नेशनल यूनिवर्सिटी सिंगापुर के डिपार्टमेंट ऑफ डिसीजन साइंसेज द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है। इस शोध पत्र के पहले पैरा में सारांश है, जिसे अंकित ने हटा दिया है और इंट्रोडक्‍शन शीर्षक हटा कर अपनी पुस्‍तक में इलेक्‍ट्रॉनिक ग्रुप कम्‍युनिकेशन कर दिया है।

पेज 148 से 162 – Enrico Coiera द्वारा तैयार की गयी वेबसाइट www.corera.com में प्रकाशित सामग्री गाइट टू हेल्‍थ इनफॉरमेटिक्‍स के दूसरे संस्‍करण की भूमिका को अंकित ने नक़ल करके अपनी पुस्‍तक के पेज नंबर 148 से 154 में और गाइड के अध्‍याय 4, कम्‍युनिकेटिंग को पेज नंबर 154 से 162 में छाप लिया है।

पेज 176 से 230 – अर्ली इंटरवेंशन प्रोग्राम डिपार्टमेंट ऑफ हेल्‍थ न्‍यूयार्क ने विभिन्‍न क्षेत्र के 14 विशेषज्ञों से एक रिपोर्ट तैयार करायी थी। इस रिपोर्ट के अध्‍याय 3 की सामग्री को हूबहू उतार कर डॉ अंकित ने अपनी पुस्‍तक का अध्‍याय 4 कम्‍युनिकेशन बिहेवियर बना लिया है और रिपोर्ट के अध्‍याय 3 के केवल अंतिम भाग कंसीडरेशन स्‍पीज को हटा कर उस अध्‍याय की बाक़ी सामग्री को अपनी पुस्‍तक के पेजन नंबर 176 से 230 में छाप लिया है। इस रिपोर्ट के बाक़ी अध्‍यायों को अनिल कुमार राय अंकित ने अपनी एक अन्‍य पुस्‍तक COMMUNICATON : PRINCIPLES & PRACTICE में छापा है।

28 Comments »

  • hindi wallah said:

    Hame SHARM aatee hai !
    Yahi hai Hindi ke shaasakon aur shoshakon kaa asali cheharaa!
    yahi hain Hindi ke Vidvaan….!

  • Hamesha such said:

    V.N. Rai ne shuru mein jis trah apne ko prastut kiya ki wo hindi university mein ek bada badlao layenge,sab ek shigoofa thaa bas.anil ankit 2 kauri ke teacher se jaada kuch nhi ek number ke jugari aur ekdam jaati vaadi hain.ye ram mohan pathak ,v.n.rai ye sab mil ke jo jaati vaadi khel khel rahe hain wo university ko gart mein hi le jaa rha hai.V.N. rai koi durdarshi kulpati kabhi nhi ho sakte,ek polioce waale aur ek academician ke soch mein kaafi frk hota hai.ye university kaa durbhagya hai ki wahan bas sanmirn rajniti ho rhi hai.aap university ke past ko dekhein gopinathan ne jo bhi teacher’s appoint kiya sab bas jugari bhrast aur knoeledga ke level par to aise ki kai baar student se bhi khaar khaane lagte hain.wo chahe women’s studies kli supriya pathak ho yaa translation kaa anwar ahmad siddqui.naam kai hain.ek knowledge test enquiry commission honi chahiye.tab dekhiye kaise sachai saamne aati hai.wardha mein manmaani kaa pura raaj hai .naye kulpati kaa bas mukhouta alag hai.haan buliding ke naam par thoda sudhaar dikh jaayega jo academic duniya ko bharmane ke liye kaafi hai.maas comm ke naye teacher akhtar aalm to jaankaari mein mamle mein fissidi thare.Ram mohan pathak Aur ganga prasad vimal dono ko to hindi university mein entry nhi karne dena chahiye.

  • sudhir said:

    चमाडिया जी जिन छात्रों को बेवकूफ़ बनाकर कम निकाल रहे है असल मे वे वैसे है नही. अस्तु अनिल मिस्र जो क्रन्तिकारी होने का दम्भ भरता है उसकि हैसियत प्यादे की है.एम फ़िल के लिखित परीक्षा मे ३६ नं और साकक्षातार मे ९० नं . यह है मानवाधिकार की लडाइ लड्ने वाले विनयक सेन कि पत्नी एलिना सेन का कमाल. यही नही अनुपस्थित क्षात्र को भी अंक दिया एलिना ने .पर क्म्युनिस्त कुल्पति ने दंड नही दिया. आपको बिना अर्हता के प्रोफ़ेसर बना दिया. ज्वाइन करते समय शर्म आइ कि नही. विवि मे क्लास नहि लेते पर दिल्ली मे जरूर क्लास लेने आयेंगे. शाबाश मिट्टी के शेर.
    भुमिहार -२ की रट लगाने वालो .क्या भुमिहार को रहने ,नौक्री करने का हक नही है इस देश मे . अनिल चमाडिया पर सवाल क्यो नही उटता है.क्रीष्न्मोहन अपने को क्यो नही देखता है. एक ही रिपोर्ट को इधरुधर छपवाता है. ये करता क्या है. चोरी के मोबाइल का प्रयोग करता है .रही बात वी एन राय की तो कितने भुमिहार को नौकरी दिया है उन्होने . विवि मे कम्युनिस्तो को तो भरा है. जिन क्षात्रो का कही प्रवेश नही होता वे सब मास काम मे शोध कर रहे है और ब्लोग लिख कर विद्वान बन रहे है और चमाडिया के साथ दारु पी रहे है .खबर्दार भुमिहार शब्द का दुरुपयोग मत करो. व्यक्तिगत आरोप थीक है पर जातिगत आरोप बर्दाश्त नही. नही तो हिम्मत है तो साम्ने आकर बात करो‌. सुधीर

  • ranjanakumari said:

    aap ki khabar shahi hai sab check kar chuk hai .lekin sudir ji ko kaise pata ki krishnamohan singh chori ka mobile liye hai. kahi kudh to ankit ki taraha chor nahi hai

  • sanjay said:

    allibaba chalish chor ka ye shirf 1k chor hai. sudhir ji lagta hai ankit ke chele hai.

  • kunalsharma said:

    anil ankit ke bare main jo likha hai wo sab sahi ho sakta hai kyo ki mai kai aise prof ko janta ho jinhone chori kar ke books likhi hai.

    agar koi krishnamohan singh jaisa patrakar aur ho to un choro ke bare main bhi likhe.

    ish report ko padha kar man kush ho gaya.

  • mai ho parashuram said:

    dr anil k rai ankit ke bare main jab khabar chapi to delhi ke trade centre par pure desh ke bhoomiharo ne meeting ki ki chor bhai ko kaise bachaya jaaya. phir sab ne set kiya ram bahadur rai ji ho. jo patrakarita ke sher mane jate hai!uhone bhi na jane kish majboori main ankit ka patra apni maggine main chap diya.wo bhi letters to editor wale page par.

    sab jante hai sachai kya hai .

  • विश्‍वस्‍त सूत्र... said:

    अनिल कुमार राय ‘अंकित’ ने श्री प्रदीप माथुर के निर्देशन में और प्रोफेसर बनने के शॉर्ट कट रास्‍ते संबंधी उन्‍हीं की सलाह पर एक साल में 22 किताबें लिख डाली हैं…

    और वही क्‍यों, इस विभाग के बाकी प्रोफेसर और रीडर क्‍या अपने पद के लायक हैं… कुलपति के विशेषाधिकार की कृपा है बस…।

    जरा सुभाष धूलिया जी पर भी सवाल उठाएं, कि उन्‍होंने कौन सी पीएचडी की है…और उनकी पुस्‍तक के पीछे की कहानी क्‍या है जिसके आधार पर वह प्रोफेसर और विभागाध्‍यक्ष बने हुए हैं…

    भाई, कुएं में ही भंग पड़ी है… क्‍या करें।

    और सूचनाओं के लिए संपर्क करें…

  • kay sach kya jhoot said:

    इस देश का कबाडा हो चुका है -दुर्भाग्य है कि यह तंत्र केवल भ्रष्टाचारियों को सपोर्ट कर रहा है -इनका एक एक दुश्चक्र राष्ट्रीय स्तर पर जड़े जमा चुका है -अब कौन कृष्ण आएगा जो इस दुश्चक्र और दुरभिसंधियों को को अपने सुदर्शन चक्र से तिरोहित करेगा -मुझे भी इसकी आतुर प्रतीक्षा है

  • akhilesh akhil said:

    anil ankit ko mai vyaktigat taur par janta hun. gaon aur chhote sahar ke aadmi hai. mere sath hi ymca se patrakarita ka cource kiya tha. kai antarang chijo ko bhi mai janta hun. rahi bat kitabo ki nakal ki , itna batana chahunga ki anil angreji me ki kitab nahi likh sakte. hindi chhatra rahe hai. aur behter chhatra hai. anil ka kahna hai ki unhone kitab likhi nahi hai patrakarita ke chhatro ke liye matter ka compilation hai. agar compilation hai to is per kisi ko bakhera khara nahi chahiye. aur fir agar anil ne matter ki chori ki hai to yeh mamla copy right ka hai. anil ne spast kiya hai ki jaha se usne matter liya hai , free matter hai. han, anil agar kitab ke sampadak hai to koi bat nahi, aur yadi lekhak hai to is mamle me unper aarop lag sakte hai. aur jaha tak jati ka sawal hai yeh to nichta ki had hai. patrakaron ko jativad se uper uthana chahiye. krishnmoham bhi hamare sathi hai. aur behter patrakarita kar rahe hai. unhe bhi jan bujh kar koi aarop nahi lagana chhiye. is pure khel me pradeep mathur ji ka hath lagta hai. unhone hi is tarah ki kitab banane ke liye anil ko aage badhaya hoga. sabse pahle kitab ki jach honi chahiye ki oh sampadak ki haisiyat se likha gaya hai ya lekhak ki haisiyat se.

  • अविनाश (author) said:

    लेकिन अखिल जी, ग़ौर से देखिए – उस किताब में लेखक के रूप में उनका नाम है। और अगर कम्‍पाइलेशन है, तो स्रोत का उल्‍लेख करना ज़रूरी है। नहीं तो ये ज्ञान के इलाक़े में एक तरह का अपराध है। अगर आप सहपाठी होने की वजह से उनका पक्ष ले रहे हैं, तो मुझे आपकी समझदारी और आपके पत्रकारीय कौशल पर संदेह होगा।

  • akhilesh akhil said:

    avinash bhai. maine apni taraf se kuchh nahi kaha hai. kal anil ka ph. aaya tha. puchhne per bataya ki compillation hai. aur aap thik kah rahe hai ki matter kahi ce liya gaya hai to sandave likhna jaroori hai. agar aisa nahi hai to anil ne apradh kiya hai. aur ise matra nakal hi mana ja sakta hai.

  • विश्‍वस्‍त सूत्र... said:

    अखिलेश अखिल जी की बात पर एक अंग्रेजी का मुहावरा याद आ रहा है, जिसका हिंदी में अर्थ होता है, ‘देखो देखो, कौन बोल रहा है’, यानी लुक हू इज़ स्‍पीकिंग…

  • अविनाश (author) said:

    बहुत शुक्रिया अखिलेश भाई। मेरी बातों का मर्म समझने के लिए।

  • kay sach kya jhoot said:

    anil ankit ne arar compilation kiya hai to apni books per author kyo likha hai. jaha tak compilation ka sawal hai to dr rai jhoot bol rahe hai aur sari besarmi ki had par kar gaye hai bat wahi hai chori upar se sina jori.

    man lijiye ankit ji ne free ka matter chapa patrakarita ke students ke liye to shirrf hard copy main hi unki books kyo hai 2500.00 rs ki kya koi book student kharidega.

    copy right to ankit ji apne baccho ko padhate bhi hoge unko pata hoga niyam kanoon.

    ankit ph d karne wale sudents se bhi bolte hai ki free ka matter chap ke phd kar lo. aur agar free ka matter chapa hai unko to thx kar dete jaha se liya hai.

    aab tak to hero ban rahe the jab chori pakdhi gaye hai to paresan kyo ho rahe hai.

    naitikta ke aadhar par sanyash lelijiye aur himalaya ki kisi gufa main aage ki jindagi guriye to hi thik hai.

    chote bhai ki haishiyat se meri ye rai hai……..

    mohalla ko ye khabar ham tak pahuchane ke liye thx.

  • Ramesh Tyagi said:

    education ki field main pahali bar itne badhe paimane par chori ka mamla samne aaya hai.

    prof ho chuke anil ko main acchi taraha se janta jab wo sahara main the.
    jogaradh sanshkrit main pura vishwash rakne wala anil aaj tak har chize usi se paya hai.
    jab ambedhakar college delhi main adhok par lecturer tha to p c patanjali head rahe. patanjali jab purvanchal university jaunpur ke vc bane to ankit ko waha par lecturer bana diya.

    anil enlish ka 10 line ek sath nahi bol sakte. aise isthit main wo book likhna to door usko compile bhi nahi kar sakte.

    iske giroha ke anya members ko bhi expose karna chahiye.
    jo jo tarfdari kar rahe hai wo bhi lagta hai chor ke sath mile hue hai

  • drarvind said:

    बौद्धिक समाज में साहित्यिक चोरी एक घृणित प्रसंग है -ऐसे व्यक्ति का जाति (बुद्धिजीवी वर्ग ) निकाला होना ही चाहिए !

  • nam kya kare ke jan ke said:

    aaj ek mitra ka phone aaya tha unhone batya ki deko mohalllive par ek prof ke bare main story hai. aaj night shift hai khabre bhi kam hai socha kuch likh do.

    ish desh main kaise kaise guru hai. mai guruo ki bahut izzat karta ho aur aaj apne ek guru ji ki bate yad aagaye unhone kaha tha beta jiwan main kabhi short cut ke chakar main pat padhna mehanat se aage jana. unki bate aaj bhi main jiwan main palan karta ho.

    ye jis prof ki story di gaye unhe to main nahi janta lekin itna jaroor hai ki bahut bekar aadmi hai . kaise kaise gatiya type ke nakal karne wale sina phoola ke chalne wale bina english k jankar ko vc ne prof bana diya samjh main nahi aata bagwan ish desh ko bachaye.

    prof nakaladiraz -frado ke maharaz – jhoto ke sartaz maharajadhiraj anil kumar rai ankit ki jai ho.

  • shiv said:

    अंकित सर से एक अनुरोध है.लोगों को बोलने का मौका क्यो दे रहे हैं आप सर..आप अपनी किताब पुस्तकालय में क्यों नहीं लाते?यदि आप सही हैं तो आपको अपनी किताब लोगों के सामने सार्वजनिक तौर पर रखनी चहिये..

  • anaam said:

    बनारस में इन दिनों कृष्णमोहन सिंह के पिटे जाने की चर्चा पत्रकार बिरादरी में शर्म के साथ जारी है| चर्चा है कि कृष्णमोहन सिंह अपने दाढी वाले पत्रकार मित्र के साथ दिल्ली से काशी गए थे, कुछ को धमकाने और वसूली के लिए गांधीजी के विश्वविद्याय के जिस वरिष्ठ हिन्दी प्रोफेसर के घर रुक कर दुसरे प्रोफेसरों से ही वसूली की साजिश रच रहे थे जिसकी भनक उस मेजबान प्रोफेसर को लग गई |वसूली करने के लिए उसने अपनी कार कृष्णमोहन को नहीं दिया लेकिन मित्र धर्म निभाते हुए किराए की कार की व्यवस्था कर दी|
    अगले दिन किसी अखबार की खबर को पढ कर ,कि वसूली करते धरे गए कृष्णमोहन सिंह और लोगों ने तोड़ा उसके साथ का कैमरा प्रोफेसर साहब ने कृष्णमोहन सिंह अपना पल्ला झाड़ लिया|
    खबर तो यह भी है कि अपनी कार न देने से बचे नास्तिक प्रोफेसर साहब भोले बाबा के दर बार जाकर बेलपत्र चढाया|

  • sachi bat said:

    anam ke nam se comment karne wale wo chor guru hai jo chori karke kitab likne ka dhanda karte varanasi ke logo ki mane to ye chor guru aur bhi kai dhande karte the.
    krishnamohan singh ke pite jane ki banaras main to charcha nai hai lekin ye charch jaroor hai kai chor guro ki nid haram hai wo anil ankit se mil kar taraha taraha ki racha racha rahe hai.

    sachai sabko pata khai ki kaun pita gaya hai.
    jhoth bolne wale ki utpati lagtahi kisi galat biz ki den hai.

  • sachi bat said:

    modrater ko anam ke comments ko delete kar dena chahiye ya phir uska jawab de aise nahi chale ga ki apna portal chalate rahe

  • S K P said:

    प्रथम प्रवक्ता ( हिन्दी पाक्षिक )
    “नक़लची बना पत्रकारिता गुरु ” न सिर्फ सराहनीय खोजपरक लेख है बल्कि ऐसे बेशर्म एवं अपराधिक प्रवृति के लोगों को भी बेनकाब करता है जो सरकारी तंत्रों का गलत तरीके से फायदा उठा के उच्च पदों पर पहुँच जाते हैं. इसके साथ-साथ यह लेख उन भ्रष्ट लोगों को भी बेनकाब करता है जो अपने पदों का दुरपयोग करने से बाज नाही आते, चाहे वो “अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,
    वर्धा के कुलपति हों या वो जिन्हें “एक्सपर्ट” के तौर पर बुलाया गया था. वैसे भी पत्रकारिता व्यवसाय की “प्रतिरोधक क्षमता” इतनी मजबूत तो होनी ही चाहिए की अपने शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों (जननी) को ऐसे किसी भी प्रकार के खतरनाक संक्रमण से बचा सके. जिससे आगे “स्वस्थ पत्रकार” ही समाज मे आ सकें. डा0 अनिल राय “अंकित”,डा0 अख्तर आलम, डा0 चौबे जैसे “सामजिक रूप से बीमार” शिक्षक न सिर्फ संस्था को बीमार बनाएँगे बल्कि समाज को भी रूग्णता की ओर ले जाएंगे. लिहाजा ऐसे “खतरनाक बीमारू ” तत्वों संस्थाओं को मुक्त कराना पत्रकारिता का पहला कर्तव्य बनता है.
    ऐसा बिल्कुल ही नहीं है कि जून 2009 शैक्षणिक पदों जिन लोगों की नियुक्ति हुई उनमे से अधिकांश अभ्यर्थियों के पास “अहर्ता एवं योग्यता” दोनों हो. जैसा की किसी भी संस्था मे नियुक्ति के लिए दोनों का होना अनिवार्य है.
    “अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा” मे केवल डा0 अनिल राय “अंकित” और डा0 चौबे ही अयोग्या, भ्रष्टता तथा घृष्टता का अनुपालन नहीं करते बल्कि “व्याख्याता” के पद पर नवनियुक्त “डा0 अख्तर आलम” भी न सिर्फ उसी श्रेणी मे आते हैं बल्कि अनेक मामलों मे वो उनसे भी गए गुजरे हैं. कम से कम डा0 “अंकित” के पास “नक़लची बंदर” बनने की बुद्धि तो है किन्तु डा0 आलम के पास तो वो भी नहीं है.
    ऐसी अतिगंभीर कमियाँ जो किसी भी कीमत पर किसी भी व्याख्याता मे कदापि नहीं होना चाहिए, डा0 आलम मे होने बावजूद उनसे योग्य अभ्यर्थी का चयन नहीं हुआ. जैसे -

    प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक डा0 आलम साक्षात्कार के समय किसी भी संस्थान मे किसी भी प्रकार अपनी सेवाएं नहीं दे रहे थे. “दीन दयाल उपाध्याय, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर का “इंस्टीट्यूट ऑफ जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन” दिसंबर 2007 मे न सिर्फ निलंबित बल्कि समन्वयक डा0 राम दरस राय समेत सभी स्टाफ को बर्खास्त कार दिया गया था. कुलपति डा0 गजभिए ने व्याप्त अनियमितताओं को गंभीरता से लिया था. किन्तु डा0 आलम ने अपने आवेदन पत्र मे स्वयं को ठीक इसी संस्थान मे ” अतिथि व्याख्याता” के तौर पर “कार्यरत” दर्शाया है. जो एक “अपराधिक मामला” है. डा0 आलम ने नौकरी पाने के लिए तथ्यों को छिपाया है. ऐसा नहीं है की साक्षात्कार पैनल मे इस तथ्य को कोई जानता नहीं था, दरअसल प्रो0 राम मोहन पाठक ( पूर्व निदेशक, मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी) जो उस समय साक्षात्कार पैनल के सदस्य थे साथ ही डा0 आलम के शोध-निर्देशक भी रहे हैं, भली-भाँति इस तथ्य से परिचित थे, बावजूद इसके उन्होने साक्षात्कार के समय इस महत्वपूर्ण तथ्य को छिपाने मे डा0 आलम का सहयोग किया. वैसे भी पहले से डा0 आलम प्रो0 पाठक के निरंतर संपर्क मे रहे हैं. यह “अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा” के साथ सरासर धोखा है ही साथ ही जिस प्रकार से चयन किया गया उससे भ्रष्टाचार की बू भी आती है.
    प्रो0 पाठक एक आतिभ्रष्ट प्रोफेसर के रूप मे संपूर्ण देश मे कुख्यात हैं. महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ मे ही उनके खिलाफ दर्जन भर से अधिक भ्रष्टाचार के मामलों मे विजिलेंस की जाँच चल रही है. इन तथ्यों से परिचित होने बावजूद प्रो0 पाठक का “एक्सपर्ट” के तौर पे बुलाना स्वयं कुलपति के नियत पर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है. प्रो0 पाठक के कुकृत्यों के बारे मे विस्तार से ऑक्टोबर 2008 मे “शुक्रवार” मे छप चुका है.
    डा0 आलम जनसंचार के व्याख्याता हैं किन्तु वे संचार के सामान्य साधनों में टेलीफोन के अलावा किसी अन्य आधुनिक साधन का उपयोग नहीं कर सकते. जिस ईमेल को 10-15 साल के बच्चे धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं डा0 आलम अपना ईमेल आपरेट नहीं कार सकते. वे किसी भी सोशल नेटवर्किंग के बारे क, ख, ग…… जानना तो दूर नाम भी नहीं सुना है. ऐसा व्याख्याता जनसंचार क्या पढ़एगा ? प्रभु ही जाने .

    यद्यपि डा0 आलम अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय मे व्याख्याता हैं किन्तु वे हिन्दी के ही कई शब्दों का सही उच्चारण ही नहीं कर पाते अपितु लिखने में भी काफी दिक्कत महसूस करते हैं. आशा यह भी की जाती है कि कम से कम एक व्याख्याता अंग्रज़ी का सामान्य ज्ञाता तो होगा ही, किन्तु यदि डा0 “अंकित” एक पन्ना अंग्रेजी का नहीं लिख सकते तो डा0 आलम एक लाइन भी शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिख सकते. बोलना तो बड़े दूर की बात है.
    प्राप्त सूचनाओं के मुताबिक डा0 आलम ने करीब आधा दर्जन सेमिनारों मे भाग लिया किन्तु किसी भी सेमिनार मे कोई शोधपत्र प्रस्तुत नहीं कार पाए. किसी जर्नल मे किसी भी शोधपत्र के प्रकाशन का उल्लेख नहीं है. व्याख्याता के लिए कौन सी योग्यता ????
    पत्रकारिता में उन्होने जिस प्रकार के अनुभव का उल्लेख किया है वो बेहद छोटे एवं ग्रामीण स्तर का है कम से कम उसे व्याख्याता पे पद के योग्य तो नहीं माना जा सकता. दरअसल वह ” स्ट्रिंगर” के स्तर का है.
    इन सारे गंभीर अयोग्यताओं के बावजूद डा0 आलम का चयन चयनकर्ताओं के भ्रष्ट आचरण पर गंभीर सदेह उत्त्पन्न करता है. डा0 अंकित, डा0 चौबे आदि के अपने चयन के लिए कितनी रिश्वत दी है ये तो पता नहीं चल पाया किन्तु काशी विद्यापीठ मे इस बात की अच्छी- खासी चर्चा है की “डा0 आलम” ने “प्रो0 राम मोहन पाठक” को चयन के एवज मे 6 लाख (Rs. 6,00,000) रूपए की रिश्वत दी है. इसकी पुष्टि काशी विद्यापीठ, वाराणसी से की जा सकती है.
    इस प्रकार के आरोप न सिर्फ अतिगंभीर है बल्कि इससे हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की साख को बट्टा तो लगता ही है साथ ही हिन्दी भी बदनाम होती है. प्रो0 पाठक, डा0 “अंकित”, डा0 चौबे, डा0 अख्तर आलम जैसे लोग जानलेवा सामाजिक बीमारी के वे विषाणु हैं जिनके संक्रमण से बचना एवं बचाना प्रत्येक संस्थान, समाज एवं तंत्र का पहला कर्तव्य बनता है.लिहाजा जितनी जल्दी कार्यवाही हो उतना बेहतर, नहीं तो इस प्रकार की बीमारी को असाध्य बनते देर नहीं लगती.

  • indian said:

    महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विद्यालय, वर्धा का कुलपति बनाया गया। कुलपति बनने के साथ ही उन्होंने अपने कुनबे का उद्धार कर दिया। उपेंद्र राय, डॉक्टर अनिल कुमार राय “अंकित”, भरत भारद्वाज, मनोज राय एक साथ बिरादरी के कई वंचितों का कल्याण कर दिया। जातिवाद का आलम यह है कि विभूति नारायण राय की हर दो नियुक्तियों में एक भूमिहार मिलेगा। क्यों क्या किसी और जाति में काबिल लोग नहीं थे?

  • Hausala said:

    kya mazedaar bahas hai aaj sach ko sabi karne ke liye bhee darna padta hai ankit jaise log sirf shiksha ka beda gark kar sakte hain iske bahut se saathee jaunpur mai bhee kitaben likh likh kar shiksha ka kafee bhala kar rahen hain ankit ne proffesor banne ka jo rasta dikhaaya hai sab ussee par chal rahe hain , mitron is bahas ka koi fayda nahin hai duniya chaltee rahegee aur ankit badhta rahega VN RAI usko nahin hatayenge

  • Ashish said:

    i love my university. apne do saal ke har pul me maine ise lekar kafi kuch socha. aaj is university ke ander jo kuch chal raha hai mai use dekhar bahut hi dukhi ho.university ka sabse bada department honeke nate mass communication ek kokhla daba ban chuka hai jese koi bhi idhar se uhdhar fekta rahta hai. is kadi me kis kis ka naaam lo…………………………….. har koi gunaghar hai. juth, dokha is department ke aadhar asatanva hai. kulpati na jane kyoi vivekhin fasale le rahe hai. mai sabso se apil karta hu is barbad hone se bachaya.

  • दबाव में झुके वीएन राय, प्रो. अंकित के ख़िलाफ़ जांच शुरू : Janatantra.com said:

    [...] 1. वी एन राय ने एक नकलची को बना रखा है एचओ… [...]

  • Free tattoo designs said:

    Very interesting post. Keep writing dude !!

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