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अशांत राष्‍ट्र के “शांतिपुरुष” ओबामा को नोबुल प्राइज़

10 October 2009 7 Comments

♦ जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

बराक ओबामा को शांति का नोबुल मिला, तो कुछ विजिटर्स ने इसे हास्‍य-प्रसंग मान कर हमें मेल किया। कहा कि हद हो गयी – अशांति और न्‍याय के प्रतीक राष्‍ट्र के मौजूदा नायक को यह प्राइज़ मिलना कितनी बड़ी विडंबना है! मोहल्‍ला लाइव में इस पर कुछ आना चाहिए। ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार देने पर खुद स्वीडेन की दो बड़ी राजनीतिक पार्टियों सिव जेन्सेन और एर्ना सोलबर्ग ने विरोध दर्ज कराया। कहा कि ओबामा को शांति पुरस्कार देने की घोषणा चौंकानेवाली है क्योंकि राष्ट्रपति के रूप में बराक ओबामा ने 10 जनवरी को शपथ ली थी और नोबेल शांति पुरस्कारों के लिए नामिनेशन की आखिरी तारीख 1 फरवरी 2009 को थी। नोबेल शांति पुरस्कारों का चयन करनेवाली टीम ने दो सप्ताह में अंतरराष्ट्रीय शांति के कौन से प्रयास देख लिये कि उनको नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा कर दी? इसी बीच हमें हमारे सर्वाधिक सक्रिय लेखक जगदीश्‍वर चतुर्वेदी का मेल मिला। उन्‍होंने बताया कि नोबेल प्राइज़ कमेटी ने ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह में दिये गये भाषण को कंसीडर किया है। बहरहाल, हम जगदीश्‍वर जी का लेख मोहल्‍ला लाइव में बांच रहे हैं : मॉडरेटर

Obama Tatooअमेरि‍का के राष्‍ट्रपति‍ बराक ओबामा को शांति‍ के लि‍ए नोबुल पुरस्‍कार मि‍ला, यह खुशी की बात है। वह नि‍श्‍चि‍त रूप से इसके हकदार हैं। अमेरि‍का में वि‍गत चालीस सालों में पहली बार एक ऐसा व्‍यक्‍ति‍ राष्‍ट्रपति‍ बना है, जो शांति‍ की भाषा बोल रहा है। युद्ध की भाषा की जगह शांति‍ की भाषा का माध्‍यमों और सार्वजनि‍क वि‍मर्श के केंद्र में आना ओबामा की सबसे बड़ी सफलता है। वह इसके लि‍ए नोबल पुरस्‍कार के हकदार हैं। वि‍गत दो दशकों से हमारे कान शांति‍ और सदभाव की भाषा सुनने को तरस गये। ओबामा ने वाक्-कला के जरिये अमरीकी जनता को सम्मोहित करने की कोशिश की। कहीं प्रत्यक्ष, कहीं प्रच्छन्न, कहीं रंगभेद के खिलाफ तो कहीं आर्थिकमंदी और आर्थिक कुप्रबंधन के बारे में बुश प्रशासन पर प्रत्यक्ष हमले किये। यह इमेज बनायी कि वह किसी से नफरत नहीं करता और व्यक्तिगत हमले नहीं करता। ओबामा ने अपने भाषणों में कभी भी अश्वेत और यथास्थिति को बदलने वाले की इमेज से विचलन नहीं दिखाया। अनुशासित, सौम्य, शांत राजनीतिज्ञ की इमेज प्रस्तुत की।

जॉर्ज बुश ने अमेरिका की आक्रामक पहचान बनायी थी। अपने शासन के दौरान मीडिया में युद्ध की भाषा को आम भाषा बनाया और इस तैयार वातावरण का ओबामा ने चर्च पादरियों की धार्मिक-आक्रामक भाषण शैली के जरिये दोहन किया। चर्च पादरियों की धार्मिक प्रवचन कला आक्रामकता को भक्ति और उन्माद में तब्दील करती है। अनुकरणमूलकता का माहौल बनाती है। श्‍वेत ईसाई कट्टरपंथी समुदायों को अपील करने में सफलता हासिल की। अस्मिता के सम्मोहन की राजनीति के आधार पर ही ओबामा ने “एकता” और “परिवर्तन” के नारे को जनप्रिय बनाया। ओबामा की चर्चशैली की भाषण कला ने आम ईसाई भावबोध को सीधे संबोधित किया और इसके कारण उन्‍हें श्‍वेत कट्टरपंथियों को आकर्षित करने में भी मदद मिली।

ओबामा ने अपने भाषणों में नि‍रंतर अमरीका की सैन्य महानता को उभारा है। सैन्य महानता को सिद्ध करने के लिए ओबामा ने पाकिस्तान के खिलाफ नए युद्ध की घोषणा भी की है। ओबामा का चरित्र युद्ध को गलत नहीं मानता। यहां तक कि ओबामा ने इराक युद्ध को भी ग़लत नहीं कहा है। ओबामा के नोबुल पुरस्‍कार की नींव उनके शपथ ग्रहण समारोह में दि‍ये भाषण ने रखी। शपथ ग्रहण के मौके पर दिये गये भाषण की मूल दिशा सकारात्मक थी। ओबामा ने सबसे जटिल संकट की अवस्था में “सदभावना और धैर्य” के साथ काम करने और “विभिन्न देशों के बीच व्यापक समझ और सहमति” पर जोर दिया। गंभीर आर्थिक संकट के खिलाफ “सख्त” और “शीघ्र” कार्रवाई का वायदा किया। ओबामा अच्छी तरह जानते हैं कि आर्थिक संकट ने संचित पूंजी को घरों के बाहर निकाल दिया है। यही वजह है कि “विकास की नयी आधारशिला” रखने की बात कही। ओबामा ने कहा अमरीका के सत्तर साल के इतिहास का यह सबसे भयानक आर्थिक संकट है। इराक और अफगानिस्तान युद्ध ने नयी जिम्मेदारियां सौंपी हैं। ओबामा की स्वीकारोक्ति थी अमरीकी अर्थव्यवस्था “बुरी तरह कमजोर है”। इसे दुरुस्त करना सर्वोच्च प्राथमिकता है।

पहली बार ऐसा हुआ था कि‍ कि‍सी शपथ ग्रहण भाषण में नये राष्‍ट्रपति‍ ने पुराने राष्‍ट्रपति‍ की नीति‍यों की तीखी आलोचना की। ओबामा ने कहा, अर्थव्यवस्था “लालच और गैरजिम्मेदारी” का शिकार हो गयी है। अर्थव्यवस्था का संकट बताता है कि बाजार उछल कर “सतर्क आंखों के परे” चला गया। विदेश नीति पर प्रशासन का रवैया व्यक्त करते हुए ओबामा ने कहा अमरीका इराक से “जिम्मेदाराना” ढंग से निकलना चाहता है। अफगानिस्तान में शांति स्थापित हो। ओबामा ने यह नहीं बताया कि अमरीकी सेनाएं कब तक इराक से वापस लौटेंगी। अमरीका-इराक समझौते के अनुसार अमरीकी सेनाओं को सन 2011 के अंत तक इराक छोड़ देना है। ओबामा ने अफगानिस्तान में तालिबान की तेज़ सरगर्मियों को देखते हुए अमरीकी सैनिकों की संख्या में इज़ाफा करने का आदेश दिया है।

ओबामा का नयी “आधारशिला” से क्या तात्पर्य है? यह चीज कुछ अरसे के बाद ही साफ हो पाएगी। ओबामा ने कहा “कानून का शासन और मानवाधिकारों” को संरक्षित करने की जरूरत है। “आदर्श और सुरक्षा” के बीच में से चुनने की पाखंडी कोशिशों को एक सिरे खारिज़ करके बुश प्रशासन की नीति को अस्वीकार किया और सुरक्षा और आदर्श के संतुलन पर जोर दिया।

ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह 90 मिनट चला, जिसमें ओबामा का भाषण 15 मिनट का था। समारोह स्थल पर लाखों लोगों ने कड़कड़ाती ठंड़ में अलस्सुबह से ही जमा होना शुरू कर दिया था। अमरीका के विभिन्न प्रांतों से लाखों लोगों ने आकर शिरकत की। युद्ध और आर्थिक संकट, ये दो सबसे बड़ी समस्या हैं, जिनके समाधान की ओर साधारण लोग आंखें लगाये बैठे हैं। इसके अलावा अमरीका की शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का पूरी तरह कबाड़ा हो चुका है। इन सबको प्राथमिकता के साथ कैसे ओबामा हल करते हैं, इसकी ओर सबकी नज़रें लगी हैं।

ओबामा ने अपने भाषण में इनफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य परिसेवा, परिवहन, संचार वैकल्पिक ऊर्जा के क्षेत्र में ज़्यादा बड़े कार्यों की ओर ध्यान देने की बात कही। बुश प्रशासन में विज्ञान का दर्जा कम हुआ। विज्ञान को ओबामा पुन: सर्वोच्च प्राथमिकता देना चाहेंगे। ओबामा को बुश प्रशासन से युद्ध की विरासत मिली है, उससे अमरीका कैसे निकलता है, इस ओर सारी दुनिया का ध्यान लगा है। अमरीका अपने युद्धपंथी इरादों के बाहर निकल पाता है, तो यह मानवता की सबसे बड़ी सेवा होगी। अमरीका का वायदा है कि इराक से आगामी डेढ़ साल में सेनाएं वापस आ जाएंगी, किंतु अफगानिस्तान से कब सेनाएं लौटेंगी, कोई नहीं जानता। दुनिया के सौ देशों में 750 से ज्यादा सैन्य ठिकानों से अमरीकी सैनिक स्वदेश कब लौटेंगे, कोई नहीं जानता। अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान को लेकर नयी मोर्चेबंदी शुरू हो गयी है। इससे भविष्य में भारतीय उपमहाद्वीप में स्थितियां और भी बिगड़ सकती हैं।

jag(जगदीश्‍वर चतुर्वेदी। कलकत्ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय में हिंदी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या वि‍शेषज्ञ और आलोचक। इसी साल इनकी ‘ओबामा और मीडि‍या’ नामक कि‍ताब प्रकाशि‍त हुई है। यह कि‍ताब ओबामा के राष्‍ट्रपति‍ चुनाव ख़त्‍म होते ही प्रकाशि‍त हुई थी। भारत से कि‍सी भी भाषा में प्रकाशि‍त ओबामा के चुनाव कवरेज पर पहली कि‍ताब है। पता : ए 8, पी 1/7, सीआईटी स्‍कीम, 7 एम, कोलकाता 700054)

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7 Comments »

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    ओबामा प्रशासन की सबसे बड़ी खूबी है कि‍ जो उनकी सबसे बड़ी प्रति‍द्वंद्वी थी हि‍लेरी क्‍लिंटन वह उनके प्रशासन का हि‍स्‍सा है,वे लोग जो ओबामा की नीति‍यों के आलोचक थे अथवा बुश प्रशासन में थे, वे भी उनके प्रशासनि‍क अमले का हि‍स्‍सा हैं। कल तक जो अमेरि‍की राजनयि‍क युद्ध के लि‍ए काम कर रहे थे उन्‍हें शांति‍ की तलाश में झंझट के इलाकों में नयी जि‍म्‍मेदारि‍यां दी गयी हैं। सेण्‍ट्रल यूरोप में प्रक्षेपास्‍त्र लगाने के गलत फैसले को दुरूस्‍त कि‍या गया है। गुआनतामावे यातना शि‍वि‍र को बंद करने का फैसला लि‍या गया है ,इस तरह के यंत्रणा केन्‍द्र बनाए जाने की ओबामा ने राष्‍ट्रपति‍ पद संभालते ही निंदा की। अभी यह यंत्रणा केन्‍द्र बंद नहीं हुआ है उसके बंद कि‍ए जाने की प्रशासनि‍क कार्रवाई चल रही है। ईरान और उत्‍तर कोरि‍या से सीधे युद्ध का रास्‍ता त्‍यागकर ओबामा ने बातचीत का रास्‍ता चुना है। फ्रीडम ऑफ इनफोरमेशन एक्‍ट के दुरूपयोग की आलोचना की है। सारी दुनि‍या में स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र खोले जाने की हि‍मायत की है। फि‍लि‍स्‍तीनि‍यों के मानवाधि‍कारों के पक्ष में खुलकर बयान दि‍या है।

  • गिरीन्द्र said:

    ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुने जाने की घोषणा के बाद वाशिंगटन के एक पत्रकार डेनियल की प्रतिक्रिया हमें कई आयामों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। डेनियल कहते हैं कि ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार देना ठीक वैसे ही जैसे किसी ऐसे निर्देशक को ऑस्कर पुरस्कार देना, जिसने कोई फिल्म ही निर्देशित नहीं की हो।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    गि‍रीन्‍द्र जी ,ऐसा नहीं है। ओबामा पक्‍का डायरेक्‍टर है,उसने एक शानदार फि‍ल्‍म भी बनानी शुरू की है, यह फि‍ल्‍म बर्बाद अमरीका के कच्‍चे मसाले से तैयार हो रही है, उसकी शूटिंग चल रही है। अच्‍छे परि‍णाम की उम्‍मीद रखें। अमेरि‍का की राजनीति‍ में बुश और ओबामा में नीति‍गत तौर पर बुनि‍यादी पर अंतर खोजना मुश्‍कि‍ल है। नीति‍यों को बदले बगैर यदि‍ ओबामा ने अमेरि‍का की मंदी ग्रस्‍त अर्थव्‍यवस्‍था में प्राण फूंकने का काम कि‍या है तो यह असाधारण काम है। दूसरी बात यह कि‍ वह शांति‍ की भाषा बोल रहा है। शांति‍ की भाषा हमें चैन देती है। उन तमाम लोगों के लि‍ए ओबामा बेचैन करते हैं जो युद्धपंथी हैं। अपने भाषणों के जादू के जरि‍ए उसने सारी दुनि‍या को मोहि‍त कि‍या है।

  • विश्‍वस्‍त सूत्र... said:

    जगदीश्‍वर जी,

    आप ओबामा से इतने सम्‍मोहित क्‍यों हैं…

    क्‍या अमेरिकी राष्‍ट्रपति की एक व्‍यक्ति के तौर पर अमेरिकी सत्‍ता प्रतिष्‍ठान में कोई हैसियत है… कतई नहीं। पेंटागन की तय की गई नीतियों और प्रोजेक्‍ट फॉर दी न्‍यू अमेरिकन सेंचुरी (पनैक) में किसी भी चुने गए राष्‍ट्रपति का फिट होना ही उसकी नियति है… बता दूं कि इराक और अफ्रगानिस्‍तान पर हमला कोई औचक नहीं हुआ। व‍ह इसी प्रोजेक्‍ट का दो दशक पुराना हिस्‍सा था। देर सवेर ईरान पर भी हमला होगा, ओबामा को नोबेल मिलने से इसका कोई संबंध नहीं।
    ओबामा जैसे लोग अमरीकी साम्राज्‍यवाद के सेफ्टी वॉल्‍व हैं… बहुत बदनामी हो गई थी इधर बीच अमरीका की… ओबामा बस लीपापोती करने आए हैं… बहुत उत्‍साहित होने की जरूरत नहीं।

  • जगदीश्‍वर चतुर्वेदी said:

    वि‍श्‍वस्‍त सूत्र जी, समस्‍या सम्‍मोहि‍त होने की नहीं है। घटनाओं को सही परि‍प्रेक्ष्‍य में देखने की है। आपके मूल्‍यांकन से काफी हद तक सहमत हूँ। सम्‍मोहि‍त और उत्‍साहि‍त होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ओबामा कि‍सवर्ग के चाकर हैं, क्‍यों आए हैं, क्‍या कर रहे हैं,मंशा क्‍या है,यह फि‍लहाल ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण नहीं है। नोबेल पुरस्‍कार दि‍या जाना महत्‍वपूर्ण है। यह नि‍श्‍चि‍त रूप से स्‍वागत योग्‍य कदम है यह बात तो फि‍देल कास्‍त्रो, हम्‍मास,नेल्‍सन मंडेला फाउंडेशन आदि‍ भी मानते हैं। बधाई भी दी है। कोई अच्‍दी बात कह रहा है तो स्‍वीकारने में क्‍या हर्ज है।अच्‍छे बयान साधुवाद मांगते हैं।

  • विश्‍वस्‍त सूत्र... said:

    अरे सर,

    ‘अच्‍छे बयान पर साधुवाद’ प्रकट करना और ‘चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्‍य में देखना’ दोनों अलग चीज़ें हैं। अच्‍छे बयान पर साधुवाद कहीं आपका परिप्रेक्ष्‍य निर्माण न कर डाले, इसे लेकर सतर्क रहना होगा। यदि आप मेरे मूल्‍यांकन से सहमत हैं, तो वह परिप्रेक्ष्‍य की बात हुई। यदि आप साधुवाद देना चाहते हैं, तो उसके लिए परिप्रेक्ष्‍य से जुड़ी अनावश्‍यक बातें नहीं करनी चाहिए। ‘ओबामा को बधाई’- ये तीन शब्‍द काफी हैं उसके लिए।
    साधुवाद की औपचारिकता कहीं अपनी छवि को न बिगाड़ दे, इसे लेकर सतर्क रहना होगा…

  • jagadishwarchaturvedi said:

    ओबामा को नोबेल शांति‍ पुरस्‍कार जब मि‍ला तो मीडि‍या में जैसे भूचाल आ गया,अचानक ओबामा वि‍रोधि‍यों ने अपने तरकश से तीर नि‍कालने शुरू कर दि‍ए और नोबेल कमेटी पर हमला बोल दि‍या। शांति‍ पुरस्‍कार ओबामा की शांति‍ की कूटनीति‍क भाषा की वि‍जय है। ओबामा ने जो मीडि‍या उन्‍माद चुनाव के दौरान पैदा कि‍या था उसका सीधे प्रति‍बि‍म्‍बन है। ओबामा ने अपने भाषणों से जि‍स तरह सारी
    दुनि‍या का ध्‍यान आकर्षि‍त कि‍या वैसा अन्‍य कोई नेता नहीं कर पाया। भाषण से मोहि‍त करने की अपनी इसी क्षमता के कारण ओबामा आज नोबेल पुरस्‍कार तक पहुँच गए हैं।
    हि‍न्‍दी के प्रसि‍द्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने ओबामा को मि‍ले पुरस्‍कार को उनके काम का आकलन नहीं माना है बल्‍कि‍ लि‍खा है कि‍ यह ‘प्रोत्‍साहन पुरस्‍कार’ है। प्रभाष जी का मानना है ”इस बार यह एक ऐसे व्‍यक्‍ति‍ को दि‍या गया है जो उसने कमाया नहीं है। … वह इसके लायक नहीं है।” आश्‍चर्य की बात है अपने सुंदर गद्य पर मुग्‍ध रहने वाला पत्रकार ओबामा के शांति‍ गद्य और मुग्‍ध करने
    वाली भाषणकला को उपलब्‍धि‍ ही नहीं मानता। उल्‍लेखनीय है इस बार के शांति‍ पुरस्‍कार की दौड़ में 172 व्‍यक्‍ति‍ और 33 संगठन शामि‍ल थे।
    रूस के राष्‍ट्रपति‍ दमि‍त्री मेदवेदेव ने ओबामा को नोबेल पुरस्‍कार दि‍ए जाने पर बधाई दी है और कहा है वि‍श्‍व सुरक्षा के लि‍हाज से रूसी-अमेरि‍की मैत्री और भी पुख्‍ता बनेगी। वहीं दूसरी ओर रि‍पब्‍लि‍कन पार्टी के लोगों का मानना है कि‍ इस पुरस्‍कार के बाद अमेरि‍का में ओबामा के लि‍ए चंदा वसूली और भी तेज हो जाएगी। क्‍यूबा के पूर्व राष्‍ट्रपति‍ फि‍देल कास्‍त्रो ने ओबामा
    को पुरस्‍कार दि‍ए जाने को सही दि‍शा में उठाया कदम बताया है। दक्षि‍ण अफ्रीका के राष्‍ट्रपति‍ और महान् कम्‍युनि‍स्‍ट नेता जेकोब जुमा ने कहा है कि‍ यह पुरस्‍कार काले समुदाय के लोगों के लि‍ए खास महत्‍व रखता है। उन्‍होंने अपनी भाषा में इसे ‘उबुन्‍तू’ कहा है। इसे काले लोगों की सामुदायि‍क स्‍प्रि‍ट के अर्थ में लि‍या जाता है। जुमा ने कहा है ओबामा काले लोगों की मानवीय
    सामुदायि‍कता के उत्‍सव के प्रतीक हैं।
    उल्‍लेखनीय है ओबामा से पहले तीन महत्‍वपूर्ण लोगों को नोबेल शांति पुरस्‍कार मि‍ला है ये हैं, वुडरॉव वि‍ल्‍सन,थयोदोर रूजवेल्‍ट और हेनरी कि‍सिंजर। नोबेल कमेटी की यह खूबी है कि‍ वह हमेशा सतही कारणों से प्रभावि‍त होकर शांति‍ पुरस्‍कार देती रही है। जि‍न लोगों को यह इनाम मि‍ला है वे महज भाषणों के आधार पर ही इनाम पाते रहे हैं। मसलन् वुडरॉव वि‍ल्‍सन का क्‍या योगदान था ?
    उन्‍होंने लीग ऑफ नेशन बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमि‍का अदा की थी,इसने युद्ध रोकने में कि‍तनी भूमि‍का अदा की आज सारी दुनि‍या जानती है।यह सबसे नि‍ष्‍क्रि‍य युद्ध वि‍रोधी संगठन है। जि‍स समय वि‍ल्‍सन को इनाम मि‍ला था उस समय उन्‍होंने मैक्‍सि‍को पर हमला कर दि‍या था। हैती और डेमोनि‍कन रि‍पब्‍लि‍क पर अपनी सेनाएं भेजकर कब्‍जा जमा लि‍या था। प्रथम वि‍श्‍वयुद्ध के समय यूरोप
    को कत्‍लगाह बनाने में वि‍ल्‍सन साहब का महान योगदान था। रूजवेल्‍ट के हाथ क्‍यूबा पर हमले के खून से रंगे हैं। इसके अलावा फि‍लीपीन्‍स के कि‍सानों के खून की स्‍याही अभी भी इति‍हास से मि‍टी नहीं है। रूजवेल्‍ट को जि‍स समय नोबेल पुरस्‍कार मि‍ला था उस समय उन्‍होंने जापान और सोवि‍यत संघ के बीच शांति‍ समझौता कराया था। लेकि‍न उस समय मार्क टवेन जैसे महान लेखक को शांति‍
    पुरस्‍कार नहीं मि‍ला था ,क्‍योंकि‍ उन्‍होंने रूजबेल्‍ट की नीति‍यों की तीखी आलोचना की थी। उसी समय साम्राज्‍यवाद वि‍रोधी लीग के महान नेता वि‍लि‍यम्‍स जेम्‍स भी मौजूद थे उन्‍हें भी शांति‍ पुरस्‍कार के योग्‍य नहीं समझा गया।
    जि‍स समय हेनरी कि‍सिंगर को नोबेल पुरस्‍कार दि‍या गया उस समय उनका शांति‍ में क्‍या योगदान था ? उनका योगदान था कि‍ उन्‍होंने वि‍यतनाम युद्ध की समाप्‍ति‍ पर जो अंति‍म समझौता हुआ था उस पर हस्‍ताक्षर कि‍ए थे। इस समझौते को तैयार करने में उनकी बडी भूमि‍का थी। इसके अलावा किंसि‍जर की वि‍यतनाम युद्ध में वि‍ध्‍वंसक भूमि‍का रही थी। वि‍यतनाम,लाओस और कम्‍बोडि‍या के हजारों
    कि‍सानों की हत्‍या में उनका हाथ था। युद्धापराधी की जि‍तनी भी कानूनी परि‍भाषाएं उपलब्‍ध हैं उनके अनुसार वह युद्धापराधी की कोटि‍ में आते हैं लेकि‍न नोबेल कमेटी ने उन्‍हें शांति‍ पुरस्‍कार के लायक समझा। इस परि‍पेक्ष्‍य में ओबामा को दि‍ए पुरस्‍कार को देखेंगे तो चीजें ज्‍यादा साफ नजर आने लगेंगी। कम से कम ओबामा ने अभी तक कोई नया युद्ध नहीं थोपा है,वे अभी तक पुराने
    युद्धों के भार और पुरानी नीति‍यों के मार्ग पर ही चल रहे हैं। उन्‍होंने एकमात्र परि‍वर्तन कि‍या है कि‍ वे शांति‍ की भाषा बोल रहे हैं। भाषा में आया यह परि‍वर्तन वि‍श्‍व जनमत के लि‍ए बेहद महत्‍वपूर्ण है। ओबामा के बारे में जि‍तनी भी आलोचनाएं आ रही हैं वह उनके वायदों पर अवि‍श्‍वास करते हुए आ रही है। कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि‍ वह शांति‍पुरूष है। कोई यह मानने को तैयार
    नहीं है कि‍ उन्‍होंने कोई काम कि‍या है, कोई यह मानने को तैयार नहीं है वे इसके योग्‍य हैं। ऐसी स्‍थि‍ति‍ में यह सवाल उठना स्‍वाभावि‍क है कि‍ आखि‍रकार शांति‍ के कि‍सी कर्म व्‍यक्‍ति‍त्‍व को पुरस्‍कार क्‍यों नहीं दि‍या गया ? शांति‍ के वाचालपुरूष को यह पुरस्‍कार क्‍यों दि‍या ? ‍कम से कम शांति‍ ,सामुदायि‍कता और सहयोग की भाषा को केन्‍द्रीय एजेण्‍डा बनाने के लि‍ए हमें ओबामा
    को धन्‍यवाद देना चाहि‍ए,हो सकता है वह कुछ भी बदल नहीं पाएं लेकि‍न शांति‍ की भाषा का वातावरण बनाकर दे जाएं । क्‍या हमें शांति‍ की भाषा में राजनीति‍क आख्‍यान सुनना अच्‍छा नहीं लगता ? शांति‍ के आख्‍यान को जब नोबेल कमेटी ने पुरस्‍कृत कि‍या है तो हमें इसके लि‍ए उसे धन्‍यवाद देना चाहि‍ए और ओबामा को शांति‍ की भाषा और शांति‍ पुरस्‍कार के लि‍ए बधाई देनी चाहि‍ए।

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