हॉल खाली था, बांग्ला नाटक ने दुखी किया
♦ विभा रानी
नेहरु सेंटर थिएटर फेस्टिवल में 1970 में उत्पल दत्त द्वारा स्थापित पीपुल्स लिटिल थिएटर (पीएलटी) ने उन्हीं का लिखा नाटक “किरात पर्व” प्रस्तुत किया। उत्पल दत्त इसके पहले लिटिल थिएटर ग्रुप (एलटीजी) की स्थापना कर चुके थे। पीपुल्स लिटिल थिएटर अब तक 60-61 नाटक प्रस्तुत कर चुका है। यह ग्रुप बांग्ला के शंभू मित्र के “बहुरूपी”, अजितेश बनर्जी के “नंदीकार” या बादल सरकार के थिएटर से अलग है। इसके अपने आदर्श हैं।
बंगाल कला, संस्कृति की धरती है और बंगालियों में बचपन से ही इसके प्रति रुझान देखा जा सकता है। बांग्ला थिएटर भारत मे एक समृद्ध थिएटर के रूप में माना जाता है और हिंदी थिएटर की परिपक्वता, मानसिकता, निर्वहन आदि की बात आने पर बांग्ला और मराठी थिएटर से उसकी तुलना कर के हिंदी की अपरिपक्वता की बात की जाती है। इस नाटक को देखते हुए इस पर अब बहस की जा सकती है, मगर यहां नहीं।
कथावस्तु के मूल में कह लें कि शासक और शोषित की चली आ रही और कभी भी ख़त्म न होनेवाली परंपरा है। आर्य और अनार्य, ब्राह्मण और शूद्र और आर्यों द्वारा अनार्यों पर अपना जबरन अधिकार मगर उनके प्रति उतनी ही घृणा, जो आज के ब्राह्मणवाद के बहुत करीब है। जिन अनार्यों, किरात, निषाद, राक्षस आदि से शरीर के छू जाने पर भी उन्हें तत्काल मृत्युदंड दे देना बदन पर पड़ी धूल झाड़ देने के समान है, युद्ध के समय उन्हीं लोगों के युवाओं को मरने के लिए भेज देना आम बात है। युद्ध में मारे गये पांच पुत्रों की मां का प्रश्न बहुत सहज है, जिसका उत्तर आज तक कोई नहीं दे सका है कि “जीवन तो ले लेते हो, जीवन क्या वापस ला कर दे सकते हो?” वेद पाठ करनेवाले शूद्रों को जीवित जला देना शास्त्रसम्मत मान लिया जाता है। महाभारत काल की कथा के माध्यम से इनके प्रति भेदभाव और ब्राहमणवाद, क्षत्रियवाद या यों कह लें कि सुविधाभोगी समाज में सुविधाभोगियों द्वारा सभी कायदे-कानून अपने हिसाब से बना लेना और उस पर चलना यह सत्ताधारियों या तथाकथित बड़े लोगों का सबसे मनोरंजक शगल है।
यह प्रश्न सहज ही उठता है कि आखिर क्या बात है कि पौराणिक आख्यानों का बार-बार हम मंचन करते हैं? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि उनमें से आज के लिए प्रासंगिकता की खोज। यह नाटक भी इसी की एक खोज है। मैंने यह नाटक पढ़ा नहीं है, मगर महाभारत की प्रस्तुति और आर्य-अनार्य की चर्चा के बाद अचानक हिटलर का प्रसंग ले आना और फिर महाभारत प्रसंग ला कर नाटक ख़त्म करना एकाएक नाटक की तंद्रा में बड़ा भारी झोल पैदा करता है। हो सकता है कि हिटलर के समय में भी वही शुद्धतावादी रक्त का आग्रह था, इसलिए इसे यहां डाला गया हो, मगर यह आग्रह तो अभी भी अपने समाज में ही है। आज भी शूद्रों पर ताने कसना, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों की मेधा पर संदेह करना आम बात है। अगर अपने ही देश की इस तरह की घटनाओं को लेकर इसे जोड़ा जाता तो यह अधिक सटीक बन पड़ता। महाभारत के आख्यान की तरह ही यदि कोई ग्रीक, जर्मन पौराणिक आख्यान जोड़ा जाता तब भी आख्यानों की सटीकता के साथ उसके संदर्भ को देखा जा सकता था। मगर हिटलर प्रसंग तो एक ऐतिहासिक प्रसंग है। उससे इस पूरे नाटक में एक अजीब सा घालमेल पैदा हो गया।
नाटक बहुत ही धीमी गति में था। कलाकारों में ऊर्जा (एनर्जी) का भयंकर अभाव दिखा। शायद ऐसा लगभग सभी कलाकारों के उम्रदराज होने की वजह से भी हो सकता है। संवाद की बहुलता तो हिंदी नाटकों को भी मात कर रही थी। कृष्ण की हंसी कंस की हंसी जैसी थी और अर्जुन अपने मद में चूर दिखे। सबसे अधिक कोफ्त पैदा कर रही थी शबरी की भूमिका में रीता चक्रवर्ती। नाटक से पूरी तरह असंपृक्त सारे समय अपने कपड़े ठीक करने में लगी रही। संवाद बोलने के समय बस बोल दिया और छुट्टी।
वेशभूषा ठीक थी, मगर अस्त्र-शस्त्र को देख कर हंसी आ जाए। ऐसे, जैसे रामलीला हो रही हो। शूद्र संत पालुका पर फेंके जा रहे थर्मोकोल के पत्थर करुणा के बदले हास्य उत्पन्न कर रहे थे। इतने पुराने नाट्य ग्रुप से ऐसी प्रस्तुति की उम्मीद नहीं थी।
(पुनश्च : इस नाटक में दर्शकों का हाल भी दो दिन पहले खेले गये मलयालम नाटक जैसा ही था। सभागार के कर्मियों ने ही हंसते हुए कह दिया कि आप कहीं भी बैठ सकती हैं। सभागार के बाहर लगनेवाली कतार का कहीं नामो-निशान नहीं था। खुद नेहरु सेंटर के अधिकारीगण मध्यांतर के बाद नहीं दिखे। अकादमी ऑफ आर्ट के छात्र भीड़ दिखाने में ज़रा कामयाब रहे, क्योंकि उन्हें इस फेस्टिवल पर प्रोजेक्ट करना है। अधिकांश दर्शक बांग्लाभाषी थे। मध्यांतर के बाद उनमें से भी कई चले गश्े। पत्रकार दीर्घा लगभग खाली था। एक युवा मराठी दर्शक ने कहा कि ये लोग इतना क्यों बोलते हैं? मेरे पास इसका जवाब नहीं था, इसलिए मैं भी गोल-गोल मुंह बना कर रह गयी। निर्देशक असित बासु ने बातचीत करने में कोई रुचि नहीं दिखायी। धन्यवाद उनके एक कलाकार प्रताप घोष का, जिन्होंने बात की। जानकारियां दीं और बहुत मुद्दे की बात यह कही कि हमलोग थिएटर से पैसे लेते नहीं, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर देते ही हैं और यह भी कि हम थिएटर से पैसे नहीं, बस केवल नाम और यश चाहते हैं।)
(विभा रानी। हिंदी और मैथिली की सुपरिचित लेखिका। रंगकर्मी। नाटककार। मुंबई में रहती हैं और अवितोको नाम की एक सामाजिक संस्था का संचालन करती हैं। मूलत: मिथिला क्षेत्र से आने वाली विभा रानी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। छम्मकछल्लो कहिस उनका मशहूर ब्लॉग है।)












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