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आपके सामने जो है, वो एक अमिताभ नहीं है

12 October 2009 One Comment

abraham hindiwala

amitabh_cartoon

चलिए फिर पढ़ ही लें कि सुस्मिता दासगुप्‍ता अमिताभ बच्‍चन के बारे में क्‍या कहती हैं : अब्राहम हिंदीवाला

♦ मैंने अमिताभ बच्‍चन को एक विषय की तरह पढ़ा। उन कारणों की खोज की, जिन से ऐसी स्थिति बनी कि अमिताभ बच्‍चन सुपरस्‍टार बन गए।

♦ मैंने एम फिल का शोध प्रबंध अमिताभ बच्‍चन के पास भेजा। उन्‍होंने पलट कर मुझे कॉल किया और मुंबई आमंत्रित किया। सेंटूर होटल में मेरे रहने की व्‍यवस्‍था की। घर से अपनी रसोई में बने लजीज खाने भिजवाए। मैं उनके परिवार से मिली। माता-पिता, जया, बच्‍चे और अजिताभ। मैं उनके दोस्‍त रोमेश शर्मा से मिली। उनके सहकर्मियों से मिली। मैं अमिताभ से मोहासक्‍त नहीं थी। किसी भी स्‍टार का सही प्रशंसक उसके बारे में सब कुछ पहले से जानता है।

♦ वे अच्‍छा खाते थे और खास स्‍वाद ही चाहते थे। वे हर तरह की चाय और काफी पीते थे। मैंने उन्‍हें स्‍वाद लेकर रेड वाइन पीते देखा था। वे अलकोहल नहीं लेते थे। उन्‍हें मांसाहारी भोजन अधिक पसंद नहीं था। हालांकि वे सिगरेट और शराब नहीं पीते थे, लेकिन नशेबाज का व्‍यक्तित्‍व था उनका। वे जितना अधिक सोचते और बतियाते थे, उतना ही अधिक चाय और काफी पीते थे।

♦ मैंने पाया कि वे अपने माता-पिता के भक्‍त और बच्‍चों से बहुत प्‍यार करते हैं, लेकिन जया से उनके तार सही तरीके से नहीं मिले हैं। अमिताभ का व्‍यक्तित्‍व एकाकी है। वे अच्‍छी तरह परिभाषित भूमिकाओं में अपने व्‍यक्तित्‍व का एक हिस्‍सा देते हैं। वे अच्‍छे बेटे और पिता हैं और सबकुछ मुहैया कराने वाले पति हैं। लेकिन जहां तक उनकी अपनी बात है, वे एकांतप्रिय व्‍यक्ति हैं। वे एक घेरा बना लेते हैं, जिसे उनकी बीवी भी नहीं तोड़ पातीं। वे खामोश रहना पसंद करते हैं।

♦ उनकी एक आदत है कि वे एक खोल से निकलकर दूसरे खोल में घुस जाते हैं। व्‍यक्तित्‍व बदल लेते हैं। अमिताभ एक नहीं है। वे अपनी खोल से निकल कर एक साथ कई व्‍यक्ति बन जाते हैं। आप के सामने एक अमिताभ का एक शरीर खड़ा रहता है, लेकिन मानसिक स्‍तर पर कई अमिताभ वहां होते हैं। और किस समय कौन से अमिताभ आप के सामने हैं… आप नहीं जान सकते। मैंने महसूस किया कि पति-पत्‍नी के बीच के तार टूटे हुए हैं। उन दिनों बेटे से भी उनका अधिक जुड़ाव नहीं था। मुझे लगा कि बच्‍चे मां के अधिक करीब हैं…

… आगे का हिस्‍सा कल पढ़ें।

(यह पोस्‍ट सोसायटी पत्रिका में छपे सुस्मिता दासगुप्‍ता के लंबे इंटरव्‍यू के अंशों पर आधारित है।)

One Comment »

  • गिरीन्द्र said:

    शुक्रिया कल का इंतजार रहेगा।

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